Porn Hindi Kahani दिल दोस्ती और दारू
12-15-2018, 12:22 AM,
RE: Porn Hindi Kahani दिल दोस्ती और दारू
प्लॅटिनम बार के अंदर ना जा पाने के कारण दिल दुखी तो था लेकिन मेरे दोनो खास दोस्त मुझसे कही ज़्यादा नाराज़ लग रहे थे,जिसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि, बार से वापस कॅंप की तरफ आते वक़्त उन दोनो ने मुझे नोन-स्टॉप गालियाँ बकि.... 

"यार, यदि मेरे पास कोई सूपर पवर होती तो बाई चोद देता उन कल्लुओ की... साले बीसी"पुल पर चलते हुए मैने उदास मन से कहा.."सालो ने रोल मे होल कर दिया..."

"तू...तू चुप रह और यदि अगली बार से कुच्छ उल्टा-सीधा काम हमसे करवाया तो मुँह मे सीधे लवडा दे दूँगा...एक तो पहले कॅंप से भागवाया, फिर पैदल चलवाया इतना ही नही तूने हमे गे भी बना दिया...लेकिन इन सबके बावजूद दारू की एक बूँद भी नसीब नही हुई...."बार के अंदर ना घुस पाने की सारी खुन्नस मुझपर उतारते हुए अरुण चीखा....

"मैने क्या तेरे सर मे बंदूक रख कर साथ चलने को बोला था ...तू खुद अपनी मर्ज़ी से आया था..."जब अरुण के ताने वित रेस्पेक्ट टू दा टाइम,लगातार बढ़ते गये तो मैं भी उसपर चिल्लाया"और अब यदि तूने, मुझे कुच्छ भी कहा तो मैं..."

"तो मैं...क्या,...क्या उखाड़ लेगा बोल.."

"तो मैं...तो मैं...तो मैं...."

"रहने दे तेरे गान्ड मे इतना दम नही है,जो तू मुझे धमका सके..."

"तो मैं अपना वॉलेट नीचे पानी मे फेक दूँगा...जिसमे तेरे ढाई हज़ार रुपये है..."अपनी जेब से वॉलेट निकाल कर मैं पुल के किनारे की तरफ बढ़ा....

"अरे सॉरी यार...मैं तो मज़ाक कर रहा था.तू तो भाई है अपना...आइ लव यू यार...चल एक पप्पी दे इसी बात पे..."

"तेरे गाल को तो मैं अपने लंड से ना टच करू....फिर होंठ से छुने का तो सवाल ही पैदा नही होता..."
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इसके बाद एक-दूसरे को गालियाँ देने का जो सिलसिला चालू हुआ,वो बढ़ते समय के साथ बढ़ता ही गया, हम तीनो के मन मे जो आता वो हम तीनो एक-दूसरे को पुल पर आगे बढ़ते हुए बके जा रहे थे....
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"अबे चुप..."हमारी सूपरफास्ट गालियों की बौछार को रोकते हुए अरुण बोला"अरमान लंड, मुझे ऐसा क्यूँ लग रहा है कि...सामने से जो लड़किया आ रही है, वो वही लड़किया है..जिनसे आज तू बात कर रहा था..."

"हां यार ये तो वही माल है,जिसे तूने अपना 2051 वाला चश्मा एक दिन के लिए उधार मे दिया है..."अरुण के सुर मे सुर मिलाते हुए सौरभ भी बोला....

मैने सामने नज़र मारी तो पाया कि आंजेलीना अपनी उन्ही दो बदसूरत सहेलियो के साथ हँसते-खेलते पुल पर हमारी तरफ चले आ रही थी...
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"कही तुम दोनो वो तो नही सोच रहे जो मैं सोच रहा हूँ... "अरुण और सौरभ को अपने दाँत दिखाते हुए मैने अपनी आँख मारी....

"वो तीनो मान जाएगी क्या..."सौरभ ने अपनी शंका जाहिर की...

"अबे मानेगी कैसे नही...मुझ जैसे स्मार्ट लड़के के साथ तो आंजेलीना जौली भी जोड़ी बना ले फिर तो ये आंजेलीना सिल्वा ही है और भूल मत कि मैने इसे गॉगल उधार मे दिया था..."मैने अरुण और सौरभ को जहाँ खड़े थे,वही खड़े रहने के लिए कहा और चींकी,पिंकी के साथ आ रही सिल्वा डार्लिंग की तरफ बढ़ा....
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"कल की तरह आज फिर कॅंप से भाग गयी...एक लड़की को ये सब शोभा नही देता क्यूंकी आज कल जमाना बहुत खराब है...कौन, कब पकड़ ले कुच्छ नही कह सकते..."आंजेलीना के ठीक सामने खड़े होकर मैने उसे छेड़ा"सारे लड़के मुझ जैसे शरीफ नही होते...वैसे जा किधर रही हो..."

"प्लॅटिनम बार..."

"फिर तो वापस अपने कॅंप का रास्ता नापो,क्यूंकी बिना कपल के साले अंदर नही जाने दे रहे...."

"तुम्हे कैसे पता चला और मैं तुम्हारी बात कैसे मान लूँ..."

"तुम्हे क्या लगता है कि मैं और मेरे दोस्त,नया शर्ट-पॅंट पहनकर...तेल-कंघी करके...क्रीम-पाउडर लगाकर, पुल के दूसरी तरफ बीड़ी पीने गये थे... हम तीनो भी बार से ही आ रहे है और वैसे भी तुम तीनो कोई स्वर्ग की उतरी अप्सरा नही हो जो तुम्हारे साथ कपलिंग करने के लिए हम मर जाए....वो तो हमे बस बार के अंदर जाना है,इसलिए तुम तीनो से कह रहा हूँ..क्यूंकी इधर तुम तीन,उधर हम तीन...."

"मेरे पास बार के अंदर जाने का दूसरा तरीका है..."मुझे रास्ते से हटने का इशारा करते हुए आंजेलीना बोली....

मैं तुरंत सामने से हट गया और ये सोचने लगा कि आंजेलीना का दूसरा तरीका क्या हो सकता है....और जब मुझे कुच्छ-कुच्छ हिंट मिला तो मैं ज़ोर से चिल्लाया...

"गेज़ आंड लेज़्बियन्स आर ऑल्सो नोट अलोड... "

"तुम्हे कैसे क्या पता कि मैं ये सोच रही थी..."जबारजस्ट झटका खाते हुए आंजेलीना पीछे पलटी...

"मैं अंतर्यामी हूँ...मेरी बात मान लो और कपलिंग कर लो...एक बार बार मे एंट्री हो जाए...फिर तुम तीनो अपने रास्ते और हम तीनो अपने रास्ते..."
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आंजेलीना को डिसिशन लेने मे कुच्छ समय तो ज़रूर लगा लेकिन रिज़ल्ट हमारे फ़ेवर मे रहा...वो हां बोलने मे थोड़ा हिचकिचा रही थी और उसने हां बोलने के तुरंत बाद एक शर्त रखी की बार के अंदर जाने के बाद हम सब अलग-अलग हो जाएँगे....

"ऐज युवर विश..."आंजेलीना के पास जाकर मैने अपना फेस उसकी तरफ किया तो वो हड़बड़ा कर पीछे हो गयी...

"डरो मत, किस नही कर रहा...बस कान मे कुच्छ कहना है"

"क्या कहना है..."मुझसे दो कदम और पीछे जाते हुए आंजेलीना घबराई..

"कहा ना कान मे कहना है,और तुम इतनी घबरा क्यूँ रही हो...."

"देखो अरमान ऐसा है कि..."

"कैसा है..."

"तुम तीनो हम तीनो से दस कदम आगे चलना और हम लोग पीछे..नही तो.."आंजेलीना ने अपना हाथ पीछे किया और एक बड़ा सा चाकू मुझे दिखाते हुए बोली"सीधे सीने मे गाड़ दूँगी..."

"तुम मे इतनी हिम्मत नही है..."

"लॅब मे मैने बहुत चीरा-फाडी की है...मैं इन सब कामो मे बहुत एक्सपर्ट हूँ..."

"ठीक है...ठीक है..मैं आगे जा रहा हूँ, मैं तो बस ये कहना चाहता था कि मेरे दोस्तो को भूल से भी ये मत बताना कि तुमने मुझे आज गॉगल वाले मामले मे मुझे हरा दिया था...वरना मेरे रोल मे होल हो जाएगा..."बोलते हुए मैं आगे बढ़ा"और चाकू जहाँ से निकाला है, वही घुसा लो..."
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स्कूल मे जब मैं पूरी क्लास मे फर्स्ट आता था तो रिपब्लिक डे के दिन मुझे स्टेज पर बुलाकर मेरे स्कूल का प्रिन्सिपल हमेशा यही कहता कि "मैं पढ़ने वाला स्टूडेंट बिल्कुल भी नही लगता...मतलब कि ना तो मेरी आँखो मे बड़े-बड़े गोल मटोल चश्मे कभी लगे और ना ही कभी मेरी हरकते एक पढ़ने वाले स्टूडेंट की तरह थी....और इसका अश्चर्य मेरे स्कूल का प्रिन्सिपल हमेशा प्रकट करता, वो भी सबके सामने.....उस समय मैं सबके सामने स्टेज मे खड़ा होकर मुस्कुराता रहता और प्रिन्सिपल के पैर छुकर वापस आ जाता था...लेकिन अक्सर रात को मैं सोने से पहले आईने मे अपनी शकल ज़रूर देखता कि मुझे लोग मेरी शकल देखकर पढ़ने वाला लड़का क्यूँ नही समझते....? 

और ऐसा ही कुच्छ अभी-अभी हुआ था...जब मैं आंजेलीना की तरफ बढ़ा तो उसने मुझे मारने के लिए सीधे चाकू ऐसे निकाल लिया, जैसा साला मैं कोई साइको रेपिस्ट हूँ . खैर, आंजेलीना की इस हरकत से मुझे इतना तो पता चल ही गया था कि वो भी मेरी तरह हमेशा प्लान के साथ चलती है और उसके साथ ग़लत बात करना मतलब अपने पेट मे साढ़े सात इंच का चाकू घुस्वाना है...इसलिए मैं चुप चाप आगे अपने दोस्तो के पास आया और मोबाइल की फ्लश लाइट जलाकर आंजेलीना आंड ग्रूप, से दस कदम आगे चलने लगा....पुल से बार तक के इस पैदल सफ़र मे मैं एक बार भी पीछे नही मुड़ा,क्या पता साली कब चाकू फेक कर मार दे...लड़कियो का क्या भरोसा......
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"अब पास आउ या यूँ 10 कदम की डिस्टेन्स मे रहकर ही बार मे एंट्री करवानी है...."उखड़े-उखड़े अंदाज मे मैं पीछे मुड़कर आंजेलीना से बोला...

"ओके...आ जाओ.."

आंजेलीना की तरफ से ग्रीन सिग्नल मिलने के बाद मैं अरुण और सौरभ के साथ उन तीनो की तरफ बढ़ा....

"कान खोलकर सुन लो बे लवडो..आंजेलीना के साथ मैं रहूँगा."उन तीनो की तरफ आगे बढ़ते हुए अरुण धीरे से बोला...

"तू रहने दे, वो बहुत तेज़ आइटम है...रेप कर देगी तेरा.उसे मेरे साथ रहने दे..."मैने कहा

"तू चुप कर बे, मेरे सामने सब कम है...तू देखना आज रात बार मे ही वो मुझे आइ लव यू बोल देगी..."

"ठीक है,जैसी तेरी मर्ज़ी...लेकिन क्यूँ ना ये फ़ैसला आंजेलीना डार्लिंग पर छोड़ दिया जाए कि वो किसके साथ जाना पसंद करती है..."मुस्कुराते हुए मैने अरुण की तरफ देखा...

अरुण को भी शायद ये लगने लगा था कि आंजेलीना, उसके साथ ना जाकर मेरे साथ बार के अंदर आएगी...इसीलिए वो अगले पल ही मुझे धिक्कारने लगा...

"साले तू एक एमबीबीएस वाली के लिए अपने दोस्त को धोखा देगा..."

"हां...वो भी एक बार नही सौर बार धोखा दूँगा..."

"तू आज के बाद बात मत करना मुझसे...बोसे ड्के..."
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आंजेलीना की तरफ जाते हुए मैने ये सोच लिया था कि मेरी जोड़ी तो उसी के साथ बनेगी और अरुण, सौरभ उसकी बदसूरत सहेलियो चींकी और पिंकी के साथ रहेंगे....अपनी इसी सोच को सच का रूप देने के लिए मैं आंजेलीना के ठीक सामने खड़ा हो गया इस आस मे कि अब वो अपना कदम आगे बढ़ाएगी और मेरे हाथ मे हाथ डालकर बार की तरफ बढ़ेगी....लेकिन उसने ऐसा नही किया, वो मेरी तरफ आने के बजाय, सीधे अरुण के तरफ बढ़ गयी और बोली"चलो..."

"तेरी माँ की फिल इन दा ब्लॅंक्स..."जब मेरी अरमानो को ज़ोर का झटका लगा तो मैं खुद पर चीखा...चिल्लाया.लेकिन अब खुद पर चीखने,चिल्लाने से कुच्छ नही हो सकता था,क्यूंकी लड़की तो अरुण ले गया था...और मेरी फूटी किस्मत मे आंजेलीना की बदसूरत फ्रेंड पिंकी फँसी थी.....

आंजेलीना के साथ बार की तरफ जाते वक़्त अरुण बीच-बीच मे पीछे पलट कर मुझ पर हँसता और साइलेंट मोड मे अपना मुँह चलाकर मुझसे कहता कि"मैं,तुझसे ज़्यादा हॅंडसम और स्मार्ट हूँ..." 

आंजेलीना ने सच कहा था कि कभी-कभी लंगूर के हाथ मे भी अंगूर लग जाते है . 
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"तुम्हारा नाम अरमान है ना..."मेरे हाथ मे अपना हाथ फसाते हुए पिंकी ने अपना मुँह फाडा...

"हां..."दूसरी तरफ देखकर मैने पहले हज़ार गालियाँ उसे दी और फिर हां मे जवाब दिया...

"मेरा नाम पिंकी..."

"कोई फ़र्क नही पड़ता..."

"फ़र्क पड़ता है..ये बताओ मैं तुम्हे कैसे लगती हूँ..."

शुरू मे दिल किया कि उसे अपना गला फाड़-फाड़ कर बताऊ कि वो मुझे एक नंबर की चोदु लगती है..लेकिन इस समय मुझे बार के अंदर जाना था, जिसके लिए उसका मेरा साथ रहना ज़रूरी था..इसलिए मैने अपने दिल पर हज़ार टन का पत्थर रखकर उसकी बढ़ाई कर दी कि'उससे खूबसूरत लड़की मैने आज तक कही नही देखी...'
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"ओह सच मे..."शरमाते हुए पिंकी ने मेरा दिल और दिमाग़ खाना जारी रखा.वो आगे बोली"लेकिन तुम तो आवरेज दिखते हो..."

"आवरेज... "मैं जहाँ था वही रुक गया और पिंकी की तरफ देखकर उसे बोला"शुक्रिया..."(म्सी, मुझे आवरेज कहती है..लवडी पहले खुद को देख...मेरे कॉलेज की मेकॅनिकल डिपार्टमेंट की लड़कियो के झान्ट जैसी दिखती है तू...चेहरा तो ऐसे है जैसे अभी-अभी किसी ने मूठ मार कर गिरा दिया हो..बीसी अब चुप हो जा वरना बाल पकड़ कर 360 डिग्री पर घुमा दूँगा...बकल...रंडी..)

"क्या हुआ, रुक क्यूँ गये...तुम मुझे लाइन तो नही मार रहे ना.."
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"ये ले...अब यही कसर बाकी थी...बोसे ड्के अरुण..., तू मिल बेटा आज मुझे..."

आर.पिंकी की बकवास सुनते-सुनते आख़िरकार हम लोग एंट्री गेट के पास पहुँचे और मैने चैन की साँस ली कि अब इस आर.पिंकी से छुटकारा मिलेगा...जो बआउनसर्स एंट्री गेट के पास खड़े थे उन्होने अबकी बार हमे नही रोका और 'वेलकम टू प्लॅटिनम बार...' बोलते हुए अंदर जाने का इशारा किया....
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प्लॅटिनम बार के अंदर आते ही मैने आर.पिंकी का हाथ डोर झटका और वहाँ से तुरंत दूसरी तरफ भागा...ताकि आर.पिंकी मेरे पीछे ना पड़ जाए...आंजेलीना की उस बदसूरत फ्रेंड से छुटकारा पाने के बाद मैने पूरे प्लॅटिनम बार पर नज़र डाली...साला क्या महॉल था..तेज आवाज़ मे बज रहे ड्ज और ड्ज के साउंड पर नाच रही लड़कियो को देखकर दिल झूम उठा....एक पल मे वो सारी परेशानी मेरे जेहन से उतर गयी,जो कि मुझे यहाँ तक आने के लिए झेलनी पड़ी थी और सबसे ज़्यादा खुशी मुझे जिससे हो रही थी वो ये कि बार मे आने का कोई एंट्री फीस नही था 

उस बार का रंग ही कुच्छ अलग था..मैने देखा कि वहाँ हर सेकेंड कितने बदलाव हो रहे थे...कयि प्रेमी जोड़े जब तक कर डॅन्स फ्लोर से उतर जाते तो उनकी जगह तुरंत अभी-अभी जोश मे आए दूसरे कपल ले रहे थे...कभी किसी थप्पड़ की गूँज सुनाई देती तो कभी किसी के प्यार के बोल सुनाई पड़ते...दारू के काउंटर भी इस बीच काफ़ी भरा पड़ा था...जब एक टल्ली होकर वहाँ से उठ कर जाता तो दूसरा उसकी जगह टल्ली होने आ जाता और इन सबके बीच ड्ज का मदमस्त म्यूज़िक लगातार मेरे अंदर जोश भर रहा था कि मैं भी वो सब कुच्छ करू, जो बाकी लोग रहे थे....

और इसकी शुरुआत मैने दारू से शुरू करने का सोचा...
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"ला भाई कुच्छ पॅक बना..."शराब के काउंटर पर बैठकर मैं बोला...

"जी बोलिए..."

"प्लॅटिनम के 10-12 पेग सीधे बना के दे.."

मेरे द्वारा डाइरेक्ट 10-12 पेग का ऑर्डर मिलने के बाद वहाँ, मेरे सामने खड़ा वेटर कुच्छ देर तक मेरा मुँह तकने लगा और फिर थोड़ी देर बाद बोला..

"मिक्स क्या करू..."

"थोड़ा सा ठंडा पानी डालना और हर पेग मे दो बर्फ के टुकड़े..."

"ओके सर.."

"और हां...पेग ना तो ज़्यादा हार्ड होना चाहिए और ना ही ज़्यादा लाइट...एक दम पर्फेक्ट होना चाहिए, और यदि तुमसे ना बने तो मुझे दारू देना, मैं अपना पेग खुद बना लूँगा...."
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"क्या पी रहा है बे..ज़रा मुझे भी तो टेस्ट करा..."मेरे एक साइड बैठकर अरुण बोला...

"तू लवडे चुप ही रह...तेरे कारण उस झट बराबर लौंडी ने मेरा दिमाग़ का दारू बनाकर पी गयी, साली रंडी...दिल तो कर रहा था कि वही उठा के पटक दूं उसको..."

"ह्म्म...सेम टू सेम फ्लेवर मेरे लिए भी..."वेटर को अरुण ने ऑर्डर दिया...

"अबे तू, मेरी बात नही सुन रहा..."

"बोल ना,सुन रहा हूँ..."

"घंटा सुन रहा है...चल निकल यहाँ से..."

"चढ़ गयी क्या बे...इधर ढंग से रह,वरना पेलाइ होगी.उन बौंसेर्स के हाथ देखे है ना...साला जितना हमारा थाइ है उतना तो उनका बाइसेप्स है..."मेरी दूसरी साइड मे बैठकर सौरभ ने वेटर से कहा"मेरा भी सेम फ्लेवर रहेगा..."
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"बिल कितना हुआ..."जब हम तीनो ने पेट भर दारू पी ली तो मैने वेटर से कहा, जिसके बाद उसने एक सफेद कलर की पर्ची मेरी हाथो मे थमा दी....

"अबे सौरभ...तुझे दिख रहा है क्या की इसमे कितने रुपये लिखे है...मुझे तो दिखना बंद हो गया,ऐसा लगता है..."सौरभ के हाथ मे पर्ची थमा कर मैं बोला"साला, कुच्छ दिख क्यूँ नही रहा...वापस कॅंप भी जाना है.."

"1860.61 "

"साले चोदु बनाते है कुत्ते, 300 रुपये की दारू 600 रुपये मे बेचते है ये...खैर कोई बात नही,अभी मैं बहुत रहीस हूँ...मेरे पास बहुत पैसा है...तुम तीनो बिल की फिक्र बिल्कुल मत करना,मैं भर दूँगा...भर दूँगा मैं.."कहते हुए मैने अपने पीछे की तरफ लेफ्ट साइड वाली पॉकेट मे हाथ डाला तो मेरा वॉलेट उसमे नही था...

"कमाल है यार...मेरा वॉलेट नही मिल रहा...एक काम करो,तुम लोग मेरे दारू के पैसे दे देना...मैं कल सुबह होते ही दस गुने वापस करूँगा..."

"तेरा वॉलेट तेरे राइट साइड वाले पॉकेट मे है,अकल के अंधे..."

"ओह..सॉरी...सॉरी.."
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मैने वेटर को डाइरेक्ट 2000 रुपये दिए और वहाँ से चलता बना...जिस काउंटर पर बैठकर मैं अरुण और सौरभ के साथ टल्ली हो रहा था,उसी के ठीक सामने बैठने का इंतज़ाम था...

"सिगरेट पिएगा..."अरुण ने मुझसे पुछा...

"अब तो एक बूँद पानी की जगह नही बची है...तुम दोनो पी लो,लेकिन..यहाँ नही...मुझे सिगरेट से आलर्जी है..आइ हेट सिगरेट्स...कुत्तो तुम लोग भी मत पिया करो,वरना तुम लोगो के माँ-बाप क्या सोचेंगे"

"तू बेटा मत पिया कर इतनी और इधर ही रहना, हम दोनो 5 मिनिट मे आते है..."

"जाओ...जाओ, मैं अभी होश मे हूँ...बस साला आँख बंद हो रही है और किसी को चोदने का मन कर रहा है...एक काम करो तुम दोनो अपना काम निपटा कर आओ फिर मैं तुम दोनो को ठोकुन्गा..."
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12-15-2018, 12:23 AM,
RE: Porn Hindi Kahani दिल दोस्ती और दारू
अरुण और सौरभ के जाने के बाद मैने अपने दोनो हाथ पीछे किए और आराम से बैठकर अपने आस-पास वालो को देखने लगा....

"ये तो आंजेलीना जानेमन जैसी दिख रेली है...पक्का वही होगी, बीसी बहुत उड़ रही है आज कल,अभी इसके पर काटकर आता हूँ.."बोलते हुए मैं अपनी जगह से उठा और जिस जगह आंजेलीना बैठी थी...ठीक उसी टेबल पर उसके सामने जाकर बैठ गया...

दारू पीने से बहुत सारे नुकसान होते है ये मैने कही पढ़ा था, लेकिन दारू पीने से फ़ायदा क्या होता है ये मुझे मालूम था.दारू पीने के बाद सबसे बड़ा फ़ायदा जो मुझे होता है वो ये कि मुझे फिर किसी का डर नही रहता चाहे वो मेरे थाइ के बराबर बाइसेप्स रखने वाले बार के बाउन्सर ही क्यूँ ना हो....

मैं बेखौफ़ आंजेलीना की तरफ बढ़ा और वहाँ पहूचकर मैने सबसे पहले जो कहा वो ये था कि''क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ''

"बिल्कुल नही..."

"मैं पुछ थोड़े ही रहा हूँ,मैं तो बता रहा हूँ..."कहते हुए मैने एक चेयर खींची और उसपर बैठकर अपने लड़खड़ाते-डगमगाते शरीर को आराम दिया....
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"यदि यहाँ एक पल भी और रुके तो मैं तुम्हारी शिकायत कर दूँगी और मेरी शिकायत के बाद तुम्हारा जो हाल होगा...उसकी कल्पना तुम खुद कर सकते हो...इसलिए बेटर यही रहेगा कि तुम...."

"अरे चुप चाप बैठ ना...बाकी लड़कियो के माफ़िक़ बोर क्यूँ कर रही है...."आंजेलीना अपनी धमकी पूरी दे पाती उससे पहले ही मैं उसपर टूट पड़ा...
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"यहाँ आने की कोई खास वजह...तुम ज़रूर अपना गॉगल लेने आए होगे..."

"ये ले,फिर से पुरानी बातों को लेकर बैठ गयी...गॉगल तू ही रख ले,मेरी तरफ से गिफ्ट समझ कर...."

"फिर यहाँ क्या मुझसे इश्क़ लड़ने आए हो..."रोलिंग आइज़ डालते हुए आंजेलीना बोली..."मैं तुम्हे जानती हूँ, तुम ज़रूर कुच्छ सोच कर ही आए होगे..."
"सोचकर तो आया हूँ...वो तुम्हारी काली कलूटी फ्रेंड पिंकी कहाँ..."
"ज़रा संभाल कर...वो फ्रेंड है मेरी...वरना..."
"तू फिर धमकी देना शुरू हो गयी...ये सब बद-दिमाग़ लड़कियो की निशानी है..."मैने कहा...
आंजेलीना को बाद-दिमाग़,बोरिंग लड़कियो का एग्ज़ॅंपल देकर मैं इसलिए शांत करा रहा था क्यूंकी अभी वो लड़कियो वाले घिसे-पिटे लहजे मे बात कर रही थी और जब मैने उसे ये सब कहकर रोकता तो वो तुरंत चुप हो जाती और फिर मुझे देखकर कुच्छ सोचने लगती....
"वो दोनो कही गयी है...लेकिन तुम्हे उन दोनो से क्या काम है..."आंजेलीना ने अबकी बार धीरे से कहा....
"ऐसिच लड़किया मुझे बहुत पसंद है, जो हर काम मे कॉर्पोरेट करती है"बोलते हुए मैने आंजेलीना के सामने टेबल पर रखा पानी का ग्लास उठाया और पूरा गले के नीचे गटक गया....
"बड़ा अजीब टेस्ट है यहाँ के पानी का..."ग्लास वापस टेबल पर रखते हुए मैने अपना मुँह टेढ़ा किया...
"यूवउुुुउउ स्टुपिड...वो मैने झूठा किया था..."
"ऐसा क्या...तभिच मैं सोचु कि पानी का टेस्ट इतना खराब कैसे हो गया...यार कभी-काभ ब्रश भी कर लिया कर और यदि तेरे पास ब्रश खरीदने के लिए पैसे नही है तो मुझसे ले ले...बहुत रहीस हूँ मैं..."

"स्टूऊवप्प्प....वो पानी नही बियर था और बहुत महनगा भी...इसलिए टेस्ट उसका नही तुम्हारे मुँह का खराब है..."आंजेलीना अपने दांतो के बीच जबर्जस्त फ्रिक्षन लाते हुए बोली...

"वो क्या है ना कि अपुन बियर-शियर नही डाइरेक्ट दारू पीता हूँ...इसलिए इन सॉफ्ट ड्रिंक का टेस्ट मुझे नही मालूम....मैने तेरी बियर पी उसके लिए सॉरी...लेकिन फिकर नोट, मैं एक दूसरी बियर मागाता हूँ...उसका बिल मैं भरुन्गा"
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"मुझे नही चाहिए बियर...तुम चुप हो जाओ और यहाँ से दफ़ा हो जाओ..."

"इतना गुस्सा क्यूँ होती है..."आंजेलीना के सामने वाली चेयर से उठकर मैं सीधे उसके लेफ्ट साइड मे रखे हुए चेयर पर बैठ गया और बोला"इस बार पक्का बिल मैं भरुन्गा...टेन्षन कैकु लेती है..."

"वो मुझे अच्छी तरह से मालूम है कि बिल मुझे ही देना पड़ेगा,अरमान मैं तुम्हारे तिकड़म से बहुत अच्छी तरह वाकिफ़ हो चुकी हूँ...यू कॅन'ट फूल्ड मी अगेन..."

"सच मे बिल मैं दूँगा...तू चाहे तो मेरा दस हज़ार का मोबाइल सेक्यूरिटी के लिए रख ले,या फिर मेरा वॉलेट..."
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बोलने के साथ ही मैने अपना मोबाइल, वॉलेट निकाल कर टेबल के उपर रख दिया और वो पहला मौका था जब आंजेलीना मुझे देखकर दिल से मुस्कुराइ थी....मेरी वो हरकत शायद उसे अच्छी लगी थी, खैर ये तो वही बता सकती है कि वो उस वक़्त मुस्कुराइ क्यूँ थी
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"अंदर रख लो..."वॉलेट और मोबाइल मुझे जेब के अंदर रखने को बोलकर आंजेलीना ने एक बियर माँगाया और हमारी बात-चीत आगे बढ़ी.....
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शुरू मे आंजेलीना ने एक बियर माँगाया लेकिन बाद मे एक के बाद एक, तीन बियर की बोतल हम दोनो ने मिलकर खाली कर दी...इस बीच मैं तो नशे के मॅग्ज़िमम लेवेल पर जा पहुँचा था लेकिन आंजेलीना पर थोड़ा ही असर हुआ था, क्यूंकी वो अब भी पूरी तरह खोलकर (दिल ) मेरे सामने नही आ रही थी....

"एक और मँगाऊ क्या..."मैने पुछा...
"नही..अब हो गया...यदि एक बोतल और चढ़ाई तो चल भी नही पाउन्गी..."
"अरे कुच्छ नही होगा...."ज़ोर देते हुए मैने कहा...
"आइ नो माइ लिमिट्स बेटर दॅन यू..सो प्लीज़ कीप क्वाइट..."मुझे घूरते हुए उसने अपने दांतो के बीच फिर से जोरो का फ्रिक्षन फोर्स लगाया....
"तो मत पी ना..इतना भड़क क्यूँ रही है...और एक बात बताऊ..."
"नही...मुझे घर जाना है...आइ मीन कॅंप ."खड़े होते हुए वो बोली...
"मेरे पास बिल पे करने के लिए पैसे नही है...वॉलेट खाली है और मोबाइल मेरे दोस्त का है..."
"व्हाआटतत्त.... "
"सॉरी...लेकिन यहिच सच है "
"अब मुझसे एक लफ्ज़ भी बात मत करना, मैं सोच रही थी कि यहाँ से जाने के बाद तुम्हारा गॉगल तुम्हे लौटा दूँगी...लेकिन अब सीधे जाकर तोड़ दूँगी..."
"अरे सुन तो...वो गॉगल भी मेरा नही है..."एक और ट्रिक अपनाते हुए मैने आंजेलीना से कहा....लेकिन इस बार उसने मेरी एक भी नही सुनी और वहाँ से सीधे चलती बनी....
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जहाँ मैं बैठा था वो वहाँ से थोड़ी दूर खड़ी होकर चींकी,पिंकी को ढूँढने लगी और जब वो दोनो उसे कही नही दिखी तो उसने अपना मोबाइल निकाला....
"यहाँ क्या कर रहा है बे लोडू..."मेरे अगल-बगल वाली कुर्सियो पर अरुण और सौरभ ने अपना स्थान ग्रहण करके मुझसे कहा"अब बेटा सीधे से कॅंप चलते है...इससे पहले कि कोई लफडा हो जाए..."
"मैं नही जा रहा तुम दोनो जाओ...मैं आ जाउन्गा..."
"ये तो वही बात हो गयी कि लंड खड़ा नही होता और दुनिया का सर्वश्रेष्ट्रा चुदक्कद बनना है...चल बेटा, चल...वरना अकेले तू आज रात तो कॅंप नही पहुच पाएगा..."
"पहले एक काम करो,तुम दोनो किसको यहाँ से बिना कोई सवाल किए हुए..."
"ऐसे कैसे हम लोग खिसक जाए..."
"अबे जाओ,वरना अभिच मैं सामने वाले मोटू को एक झापड़ मारकर लफडा कर दूँगा...."
"हम दोनो जा रहे है...लेकिन तू कोई लफडा मत करना "अरुण और सौरभ ने मेरे हाथ जोड़े और वहाँ से उठकर दूर एक टेबल पर बैठ गये....
मैने सौरभ और अरुण को वहाँ से खिसकने के लिए इसलिए कहा था क्यूंकी आंजेलीना वापस मेरी तरफ आ रही थी और मैं नही चाहता था कि मेरे खास दोस्त उस खास मौके पर मेरे साथ रहे....
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"क्या हुआ..."आंजेलीना को अपने सामने बैठते देख मैने पुछा....
"चींकी और पिंकी का कही कोई पता नही चल रहा....मोबाइल नोट रीचबल बता रहा है..."
"बजा रहा होगा उनकी कोई...लेकिन साली बड़ी बदसूरत है, कपड़े ढक कर भी कोई नही बजा पाएगा...फिर...फिर पक्का दारू पीकर कही पड़ी होंगी..."
"यू आर आ बॅड बॉय...किसी के बारे मे इतना बुरा नही कहना चाहिए..."

"दिल पे ना लो सिल्वा जी....."(मुँह मे ले लो...)
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"अरमान,चल ना लेट हो रहे है..."अरुण फिर से मेरे पास आया और जेंटलमेन वाली स्टाइल मे बोला...

"तू कौन है बे..."

"तेरा बाप..."साइलेंट मोड मे अरुण बोला...

"तू एक काम कर, तू निकल इधर से..मैं 5 मिनिट मे आता हूँ..."

जब अरुण वहाँ से गया तो आंजेलीना की दोनो सहेलिया चींकी और पिंकी ना जाने कहाँ से टपक पड़ी.....

आंजेलीना ने जब उनसे पुछा कि वो दोनो कहाँ थे तो पिंकी ने कहा कि चींकी को वॉमिट हो रही थी इसलिए वो दोनो अभी तक वॉशरूम मे थे....

"अब चलते है...वरना कल की तरह पकड़े जाएँगे..."चींकी का हाथ पकड़ कर आंजेलीना बोली...

"5 मिनिट और रुक जाओ और अपने केयरटेकर से बचने का आइडिया मुझसे लेते जाओ..."मैने बीच मे कहा...."लेकिन वो आइडिया सिर्फ़ मैं सिल्वा जी के साथ शेयर करूँगा, तब तक तुम दोनो...वो दूर बैठकर मक्खिया मार रहे मेरे दोस्तो के साथ बैठ जाओ...."

"हमे कोई ज़रूरत नही तुम्हारे आइडिया की...भगवान ने हमे भी दिमाग़ दिया है,हम भी सोच सकते है..."

"पहले दिन ही पकड़ा गयी थी तू...याद है...यकीन मान, मैं इस काम मे माहिर हूँ..."

आंजेलीना ने मुझे देखा और फिर मेरे दोस्तो के तरफ इशारा करके चींकी,पिंकी को उधर भेज दिया...
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आंजेलीना को मैने एक तरक़ीब सुझाई जिसके बाद उसने मुझसे हाथ मिलाया और बाइ कहकर जाने लगी...

"मोर जर्म्ज़ आर ट्रॅन्स्फर्ड शेकिंग हॅंड्ज़ दॅन किस्सिंग...."आंजेलीना जब वहाँ से जाने के लिए पलटी तो मैने विज्ञान का सहारा लिया....जिसके बाद वो वापस मेरी तरफ पलटने को तैयार हो गयी....

"अरमान...तुम बहुत परेशान करते हो, पता नही तुम्हारे दोस्त तुम्हारे साथ कैसे रह लेते है....तुम क्या एक सेकेंड भी चुप नही रह सकते..."

"मैने ग़लत क्या कहा...ठीक ही तो कहा है और तुम मेडिकल फील्ड वाली हो तो तुम्हे ये पता होगा ऐसा मैं सोचता हूँ..."

"तो क्या अब मैं तुम्हे किस करू..."

"इरादा तो मेरा वही था...आगे तुम्हारी मर्ज़ी..."

"क्या तुम्हे पता है कि तुम बहुत बुरे हो..."वापस बैठकर आंजेलीना बोली"मतलब कि तुम एक लड़की को कॉफी हाउस मे ये कहकर खूब खिलाते-पिलाते हो कि तुम बिल पे करोगे...लेकिन बाद मे बिना किसी परवाह के तुम भाग जाते है...क्या वहाँ से भागते वक़्त तुम्हे एक पल भी ख़याल नही आया कि यदि मेरे पास पैसे नही होते तो हमारा क्या अंजाम होता....कहने को तो ये बहुत छोटी सी मज़ाक-मस्ती थी लेकिन हमारी इतने लोगो के सामने बेज़्जती भी हो सकती थी और एक बात कहूँ...टॅलेंट की कद्र हमेशा अच्छाई की राह पर होती है क्यूंकी बुराई के साथ जो टॅलेंट होता है उसे सिर्फ़ धिक्कारा जाता है..."
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आंजेलीना ने काफ़ी अच्छा लेक्चर दिया था, उसका 'टॅलेंट' वाला डाइलॉग भी सॉलिड था...लेकिन हमारे इरादे तो कुच्छ और ही थे....

"गाँधी जी ने कहा है कि, हेट दा सीन...नोट दा सिन्नर...और इस हिसाब से तुम्हे मुझसे नफ़रत नही करनी चाहिए और एक किस देकर गुडबाइ बोलना चाहिए..."

"यू नो व्हाट...मैं तुम्हे अब कभी नही भूलूंगी...भले ही तुम्हारी अहमियत मेरी लाइफ मे कुच्छ ना हो,लेकिन इतना तो श्योर है कि मैं तुम जैसे एक लापरवाह लड़के को कभी नही भूलूंगी..."परेशान होते हुए आंजेलीना ने अपना सर पकड़ लिया और अपनी फ्रेंड्स को 5 मिनिट और रुकने के लिए कहा....

"अपना तो एक ही फंडा है सिल्वा जी कि आज के पल को जी लो वरना कल आगे जाकर जब आप पीछे मुड़ो तो इसका पछ्तावा नही होना चाहिए कि जीने के पल तो पीछे छूट गये...."
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"ठीक है,मैं हार गयी...तो अब मैं चलूं..."एक बार फिर से आंजेलीना खड़ी हुई,ताकि वो अपने कॅंप जा सके...लेकिन मैने फिर ऐसा कुच्छ कह दिया,जिसकी उम्मीद ना तो उसे थी और ना ही मुझे.....

"दारू पिया हूँ जानेमन...झूठ नही बोलूँगा. आइ वान्ट टू हॅव सेक्स वित यू "

मेरे साथ सेक्स करने के मेरे प्रपोज़ल ने आंजेलीना के दिल-ओ-दिमाग़ पर गहरा आघात पहुचाया था, जिसका अंदाज़ा मैं, मेरे सामने पहली बार नर्वस हो रही आंजेलीना को देखकर लगा सकता था....बीते दिनो जब आंजेलीना से मेरी मुलाक़ात हुई थी, तब से अभी तक मे वो सिर्फ़ अभी बेज़ुबान लग रही थी....

मेरे उस डिज़ाइर ने आंजेलीना को वापस बैठने के लिए मजबूर कर दिया था. वो कभी मेरे तरफ अपनी उंगली पॉइंट आउट करके मुझे कुच्छ कहना चाहती थी, वो मुझपर जबर्जस्त तरीके से भौकना चाहती थी...यदि उस वक़्त उसके शरीर मे मेरे जितनी पॉवर होती तो मैं जिस टेबल पर बैठा था,वो उसी टेबल को उठाकर सीधे मेरे उपर दे मारती...लेकिन हर बार वो कुच्छ करने का सोचती और फिर शांत हो जाती...इस बीच मैने एक चीज़ जो नोटीस कि वो ये थी कि उसके दांतो के बीच फ्रिक्षन फोर्स वित रेस्पेक्ट टू टाइम इनक्रीस हो रहा था और मुझे डर लगने लगा था कि कही उसके जबड़ो मे लगातार बढ़ते फ्रिक्षन के कारण आग ना लग जाए....
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"यू....यू...अरमान...आइ नेवेर...आइ डॉन'ट नो...हाउ डेर यू...रेस्पेक्ट...."ऐसी ही आधे-अधूरे अल्फ़ाज़ अपने गुलाबी होंठो से निकलते हुए वो कभी गुस्से से मुझपर अपनी उंगली पॉइंट आउट करती, या फिर अपना सर पकड़ लेती...
आंजेलीना बहुत कुच्छ कहना चाहती थी, वो बहुत कुच्छ करना चाहती थी...लेकिन मेरे प्रपोज़ल और मैं इतने दमदार थे कि ना तो वो सही ढंग से कुच्छ कह पा रही थी और ना ही कुच्छ कर पा रही थी....
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उन तनाव भरे पल मे उसकी हालत देखकर मैं भी थोड़ा सा डर गया कि कही वो अपना चाकू निकाल कर मेरा सीना खून से लाल ना कर दे, या फिर अपना सॅंडल उतार कर मेरा सर ना लाल कर दे....प्रॉबबिलिटी तो ये भी थी कि वो बाउन्सर्स के ज़रिए मुझे लाल करवा सकती थी...लेकिन उसने ना तो अपना चाकू निकाला और ना ही अपना सॅंडल...उसने बाउन्सर्स को भी नही बुलाया...वो कुच्छ पल शांत रही और फिर अपनी मस्त-मस्त आँखो मे नरक की अग्नि का मुझे अहसास करते हुए बोली...
"सेक्स और तुम्हारे साथ...कभी नही...यदि तुम मेरे हज़्बेंड भी होते तब भी मैं तुम जैसे चीप लड़के के साथ सेक्स नही करती...."

"श्योर..."मैने आँख मारते हुए पुछा....

"श्योर...इसमे श्योर का क्या मतलब....एक बात तुम अपना नाक,कान,आँख,मुँह...सब खोलकर ध्यान से सुन लो कि मैं तुम्हारे साथ सेक्स नही करूँगी...चाहे तुम अमेरिका के प्रेसीडेंट ही क्यूँ ना बन जाओ...गेट लॉस्ट... "
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20 मिनिट्स लेटर.....
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"ये जगह ठीक रहेगी, यहाँ हमे कोई सात जनम तक नही ढूँढ पाएगा....तुम्हे क्या लगता है..."अंधेरे मे जंगल के अंदर एक जगह पर रुक कर आंजेलीना बोली..."मुझे अब भी खुद पर यकीन नही हो रहा है कि मैने तुम्हारी बात कैसे मान ली..."
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आंजेलीना और मैं इस वक़्त बार से निकालकर घनघोर अंधेरे मे डूबे जंगल के अंदर आ गये थे...आंजेलीना को अपने साथ करने के लिए मनाना बड़ा मुश्किल काम था...लेकिन जब मैने बार मे देखा कि मेरे साथ तीन बोतल पी हुई बियर उसपर असर करने लगी है तो मैने एक से बढ़कर एक डाइलॉग छोड़ा...कुच्छ महापुरषो के कोट्स भी आंजेलीना पर दे मारा...और अंत मे कहा कि' वो आज नही तो कल,किसी ना किसी के साथ सेक्स तो करेगी ही...फिर मेरे साथ करने मे क्या दिक्कत है...'
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आंजेलीना उस समय बार के अंदर मेरी बात तो मान गयी लेकिन मुझे पक्का यकीन था कि यदि उसने पेलमपेल बियर ना चढ़ाया होता तो वो इस वक़्त मेरे साथ इस जंगल मे नही बल्कि अपने दोनो सहेलियो चींकी और पिंकी के साथ अपने कॅंप मे होती....

अरुण, सौरभ,चींकी और पिंकी को चोदु बनाने मे हम दोनो को कोई खास दिक्कतो का सामना करना नही पड़ा....सबसे पहले मैं अरुण और सौरभ के पास जाकर बोला कि 'आंजेलीना ने ज़्यादा चढ़ा ली है,तुम दोनो निकल जाओ, मैं आधे एक घंटे मे उसे उसके कॅंप तक छोड़ कर आ जाउन्गा..."

अरुण और सौरभ शुरू मे तो नही माने...लेकिन फिर मैने कहा कि उनका आज का सारा खर्च मैं दूँगा तो वो दोनो तुरंत खुशी के साथ उछल पड़े और बिना समय गँवाए बार से निकल गये....
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अरुण और सौरभ के जाने के बाद आंजेलीना चींकी,पिंकी के पास गयी और उसने उन दोनो से कुच्छ कहा...जिसके बाद वो दोनो भी खुशी से उछल पड़ी और अरुण,सौरभ के पीछे-पीछे चल पड़ी.....
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"सुनकर तुझे अजीब लगेगा पर मुझे शरम आ रही है... "पीछे पलटकर मैने आंजेलीना के फेस पर लाइट मारते हुए बोला...
"नौटंकी कही का..."बोलते हुए वो मेरे पास आने लगी...
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वैसे तो हम दोनो यहाँ चुदाई मचाने आए थे लेकिन अभी तक हम दोनो के बीच गंदे शब्द जैसे की 'लंड, चूत,गान्ड,दूध...'इन सबका का इस्तेमाल नही हुआ था....बोले तो हम दोनो के बीच मर्यादा की दीवार अब तक कायम थी...पूरे रास्ते भर मैं आंजेलीना से सिर्फ़ उसके बारे मे पुछता रहा, जिसके बाद मुझे पता चला कि वो 24 साल की है...वो कहाँ रहती है उसने ये भी बताया...
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"कितनी लड़कियो को बर्बाद कर चुके हो इस तरह..."मुझे कसकर पकड़ते हुए आंजेलीना ने पुछा....

"तुम शायद पहली हो..."

"शायद...."

"शायद से मेरा मतलब है कि...एक मिनिट सोचकर बताता हूँ..."कुच्छ देर के लिए मैं फ्लश बॅक मे गया '9थ क्लास मे गाँव की एक लड़की का दूध दबाया था...लेकिन चोद नही पाया...फिर 10थ मे भी एक लड़की की चूत पर हाथ फेरा था...लेकिन इसे उस लड़की को बर्बाद करना नही बोल सकते...उसके बाद 11थ, 12थ मे शरीफी की ज़िंदगी गुज़ारी...और फर्स्ट एअर मे दीपिका मॅम को छोड़ा...लेकिन साली ने मुझे बर्बाद किया ना कि मैने उसे...तो कुल मिलाकर....."

जब सभी आकड़े मेरे सामने आ गये तो मैने अपने हाथ आंजेलीना की कमर से धीरे-धीरे नीचे सरकते हुए उसके सवाल का जवाब दिया"तुम पहली हो..."

"और शायद आख़िरी भी..."अपनी आवाज़ मे परिवर्तन लाते हुए आंजेलीना बोली...

"आख़िरी मतलब...? "

"आख़िरी मतलब ये भी कि आज मैं कुच्छ ऐसा करने वाली हूँ,जिसके बाद तुम ऐसा किसी के साथ नही करोगे...."

इधर आंजेलीना ने अपनी लाइन पूरी की तो वही दूसरी तरफ मेरी कमर मे कुच्छ जोरदार चुभा....और मैं दर्द से चिल्लाते हुए आंजेलीना को दूर झटक कर उसे दूर किया....
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"खून..."मोबाइल की रोशनी अपने कमर पर डालते हुए मैं बड़बड़ाया और फिर आंजेलीना की तरफ मोबाइल की रोशनी डाली..."तेरा दिमाग़ खराब है क्या...चाकू क्यूँ घुसाया, मर जाता तो..."

"मरे तो नही ना...वैसे भी मुझे अच्छी तरह मालूम है कि किधर चाकू घुसने से इंसान मरता है...मैं तो सिर्फ़ तुम्हे लड़कियो की पॉवर शो कराना चाहती थी...तुमने क्या सोचा कि तुम मुझपर अपनी वो बड़ी-बड़ी फिलॉसोफी झाडोगे और मैं तुम्हारे साथ सोने के लिए तैयार हो जाउन्गी...एक बात गाँठ बाँध लो मिस्टर. अरमान कि लड़किया उतनी भी बेबस या कमजोर नही...जितना तुम उन्हे मानकर चलते हो...मैने तुम्हारे कॉलेज की लड़कियो से तुम्हारे बारे मे पुछा था और तुम क्या हो,उन्होने मुझे अच्छी तरह से बताया....नाउ गेट लॉस्ट और दोबारा मुझसे बात करने की कोशिश भी मत करना...."
Reply
12-15-2018, 12:23 AM,
RE: Porn Hindi Kahani दिल दोस्ती और दारू
शुरू मे तो मैने सबसे पहले अपना शर्ट उतारा और शर्ट को कमर पर बाँधा...फिर सोचा कि अब इस लौंडिया को इसकी करनी की सज़ा दी जाए....मैने आंजेलीना का थोबड़ा पकड़ा और उसके हाथ से चाकू छीन कर दूर फेक दिया....उस दौरान एक बार मेरे मन मे ये भी ख़याल आया कि साली को यही पटक कर जबर्जस्ति चोद दूं...लेकिन अब ना तो मुझे वो पसंद थी और ना ही उसकी खूबसूरती मुझे रास आ रही थी...

मैने उसका थोबड़ा अपने हाथ से दबाया और बोला....

"एक झापड़ मारकर तेरी सारी होशियारी वही घुसा दूँगा, जहाँ से तू निकली है...सेक्स नही करना था तो सीधा सॉफ मना कर देती, यहाँ लाकर चाकू घुसाने की क्या ज़रूरत थी...और तूने अपने आप को समझ क्या रखा है बे...जो ऐसा करने का सोचा...शुक्र मना कि मैं हूँ वरना कोई दूसरा होता तो तुझे पटक-पटक कर यही चोदता... यदि तेरा ये चाकू थोड़ा और अंदर घुसता तो मेरा तो उपर का टिकेट कट गया होता...,तुझे क्या,तू तो यहाँ से चुप चाप खिसक लेती... और तू मुझे लड़कियो की पॉवर दिखाना चाहती है तो सुन...यदि मेरा दिमाग़ सटक गया तो तेरे पेट मे घूमा के ऐसा घुसा मारूँगा कि सारी दवाई फिर तेरे पेट का इलाज नही करा पाएगी....और तूने क्या कहा कि मैं आज के बाद तुझसे बात ना करूँ...अरे लवडा आज के बाद यदि मेरी आँखो ने तुझे भूल से भी देख लिया तो मैं अपनी आँखे फोड़ लूँगा....पता नही कहाँ-कहाँ से चली आती है,सौरभ सही कहता है कि इन लड़कियों को हमेशा चोदते रहना चाहिए तभी साली औकात मे रहती है..."बोलकर मैने आंजेलीना को पूरी ताक़त से पीछे धकेला .जिसके बाद उसके नीचे गिरने की आवाज़ आई और साथ मे एक चीख भी सुनाई दी....आंजेलीना ज़ोर से चीखी थी लेकिन फिर भी मैं नही रुका और अपने मोबाइल की रोशनी मे आगे बढ़ने लगा......
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मेरा माथा बहुत गरम था और मैं बिना कुच्छ सोचे समझे आंजेलीना को गालियाँ बकते हुए आगे बढ़ता चला जा रहा था कि, तभी मुझे आंजेलीना की आवाज़ सुनाई दी....

"क्या हुआ...साली कहीं मरने वाली तो नही...मरने दो, एमसी इसी लायक है, बकल..."बड़बड़ाते हुए मैं फिर आगे बढ़ा...

"हेल्प....हेल्प...अरमान..."

"इसकी तो...मरवाएगी ये लवडी इतनी ज़ोर से चीखकर...एक बार देखकर आता हूँ कि क्यूँ ये अपना गला फाड़ रही है..."

जब आंजेलीना की चीखे और तेज़ होने लगी तो मैने वापस जंगल की तरफ टर्न मारा...क्यूंकी मुझे डर था कि यदि उसे कुच्छ हुआ तो लवडा फसूँगा तो मैं ही 

"क्या हुआ...क्यूँ इतना भौक रही है..."आंजेलीना के पास पहूचकर मैने रूखी आवाज़ मे उससे पुछा....

"तुम्हे शरम नही आती,एक लड़की को इतनी ज़ोर से धक्का देते हुए...मैं इतनी ज़ोर से गिरी हूँ कि अब खड़ी तक नही हो पा रही..."

"यही बात मुझे चाकू मारते समय सोचा होता तो ऐसा नही होता...अब समझ मे आया कि मुझे कितना दर्द हुआ होगा..."

"आइ'म सॉरी...लेकिन अब मुझे जल्दी से उठाओ...मुझे कॅंप पहुचना होगा...वरना बहुत बड़ी आफ़त हो जाएगी..."
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पहले मैने सोचा कि उसे उसके ही हाल पर छोड़ दूं लेकिन बाद मे ध्यान आया कि अगर इसे कुच्छ हुआ तो जान मेरी ही जाएगी...इसलिए मैने ना चाहते हुए भी अपने दिल पर हज़ार टन का पत्थर रखा और उसे उठाकर कर चुप चाप कॅंप की तरफ बढ़ा....
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"आगे बोल बे...रुक क्यूँ गया..."जब मैं रुका तो वरुण बोला...

"थक गया यार, कहानी सुनते-सुनते...अब नींद आ रही है..."मैं वहाँ से उठा और सीधे बाल्कनी पर पहुच गया....

"मुझे ऐसा क्यूँ लग रहा है कि तू मुझे एडा बना रहा है..."मुझपर शक़ करते हुए वरुण भी मेरे पीछे-पीछे बाल्कनी पर आ गया...

"अरुण से पुछ ले...यदि तुझे यकीन ना हो तो..."

"अरुण से क्या पुच्छू...वो तो तेरी हां मे हां मिला देगा...साले गे-पार्ट्नर जो ठहरे तुम दोनो...."

"फिर तो एक ही तरीका है, तुझे यकीन दिलाने का..."बोलते हुए मैने अपना शर्ट उतरा और कमर पर बना हुआ सिल्वा जी के चाकू का निशान वरुण को दिखाया.....

"कमाल है यार...मतलब सच मे उस एमबीबीएस वाली ने तेरे अंदर चाकू पेल दिया था...बहुत डेरिंग लड़की थी वो...यदि वो तेरे कॉलेज मे रहती तो पक्का तुझे सुधार देती. फिलहाल तो ये बता कि फिर आगे क्या हुआ..."

"आगे क्या हुआ, वो कल...मेरा मुँह दुख रहा है बोलते-बोलते...जा एक पेग दारू ला "

"कॅंप वाला चॅप्टर ख़त्म तो कर दे...प्लीज़ "

"उसके बाद कुच्छ खास नही हुआ...मैं और आंजेलीना साथ-साथ कॅंप मे तो आए, लेकिन हमने फिर एक-दूसरे से एक शब्द भी नही कहा...कभी-कभी वो मुझे देखती...लेकिन मैने उसे पलट कर देखा तक नही....जिस वक़्त वो अपने कॅंप जा रही थी उस वक़्त उसने मुझसे कहा था कि मैं अपने घर पहूचकर इंजेक्षन लगवा लूँ ताकि घाव सूख जाए...और फिर..."
"और फिर...क्या "
"और फिर वो अपने कॅंप मे लन्गडाते हुए चली गयी...वो आख़िरी बार था जब मैने उसे देखा था...उसके बाद वो मुझे कभी नही दिखी..."
"कभी नही दिखी का क्या मतलब...उसके अगले दिन क्या वो कॅंप से बाहर नही निकली थी क्या..."

"अगले दिन...."बाल्कनी से बाहर देखते हुए मैने कहा"अगले दिन जब मेरी आँख खुली तो उसका कॅंप हट चुका था...मतलब कि एमबीबीएस वाले मेरे आँख खुलने से पहले सुबह-सुबह ही वहाँ से चले गये थे...हमे भी उसी दिन वापस लौटना था...लेकिन हमारे प्लान के मुताबिक़ हम लोगो ने दोपहर को वो जगह छोड़ी और रात के 11 बजते तक वापस कॉलेज पहुच गये....इस दौरान मेरे दिमाग़ मे पूरी तरह से सिर्फ़ और सिर्फ़ आंजेलीना छाइ रही...जिसकी सबसे बड़ी वजह मेरे कमर का घाव तो जो जाते वक़्त आंजेलीना ने मुझे दे दिया था....उस वक़्त भले ही मुझे उसपर गुस्सा आया था लेकिन अब जब भी उस पल को, उस 24 साल की लड़की को याद करता हूँ तो एक मुस्कान दिल पर छा जाती है और दिल से सिर्फ़ एक ही आवाज़ निकलती है कि 'काश...वो लड़की मेरे कॉलेज मे पढ़ती'..."

चॅप्टर-43:प्लॅन्स आक्टिव अगेन

आंजेलीना के द्वारा दिए हुए ज़ख़्म ने मुझे कुच्छ दिनो तक अपनी चपेट मे पकड़े रखा, लेकिन घाव ज़्यादा गहरा नही था इसलिए मैं एक हफ्ते के अंदर ही फिट-फट हो गया था...आंजेलीना ने मेरी कमर मे जो चाकू घुसेड़ा था उसकी वजह से मैं कुच्छ दिनो तक बुखार से परेशान रहा...जिसके कारण मैं नेक्स्ट वीक मे कयि दिन कॉलेज तक नही जा सका....मेरे खास दोस्तो ने उस ज़ख़्म के बारे मे पुछा कि मेरी कमर मे ये चोट कैसे लगी...उस वक़्त यदि मैं उनको सच बता देता तो मुझे पूरा यकीन है कि वो सब मुझे धिक्कार्ते इसलिए मैने झूठ बोल दिया कि ' आंजेलीना को अंधेरे जंगल मे पेड़ के सहारे चोद्ते वक़्त पीछे वाले पेड़ का नुकीला हिस्सा चुभ गया था...'
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मेरे इस जवाब के बाद तो मेरे और भी फॅन बन गये और अब तो जूनियर्स अक्सर मुझसे लड़की पटाने की टिप्स भी लेने के लिए आने लगे थे...लेकिन उन फलो को कौन बताए कि मेरा काम तो मेरे हाथ से ही चल रहा है.....
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आंजेलीना के द्वारा दिए गये घाव को पूरी तरह भरने मे कयि हफ्ते लग गये और खुद आंजेलीना मेरे दिल-ओ-दिमाग़ मे कयि महीनो तक छाइ रही...लेकिन फिर जैसे-जैसे दिन बीतता गया आंजेलीना पुरानी किताब की तरह हो गयी थी, जो अक्सर एक किनारे पर पड़े-पड़े धूल खाती रहती है...ठीक उस धूल खाती किताब की तरह मैने भी आंजेलीना और आंजेलीना की यादों को अपने अंदर दफ़न कर दिया,क्यूंकी आंजेलीना की यादो को ज़िंदा रखने की कोई खास वजह मेरे पास नही थी....
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कॅंप मे जो कुच्छ भी हुआ...उसकी चर्चा पूरे कॉलेज मे तो कुच्छ दिनो तक हुई,लेकिन फिर बाद मे सभी, सब कुच्छ भूलकर अपने वर्तमान मे जीने लगे...

कॉलेज वापस आकर मैं भी बहुत खुश हुआ था, वैसे तो हमलोग सिर्फ़ तीन दिन के लिए कॉलेज से दूर गये थे,लेकिन मैं खुश इतना था जैसे कि तीन जनम के बाद आज मैं वापस अपने कॉलेज मे आया हूँ...मैं खुश इसलिए भी था क्यूंकी कल से अपनी ज़िंदगी फिर उसी जानी पहचानी नापी-तुली ट्रॅक पर चलने वाली थी और तीन तीनो के बाद फाइनली मैं अपने कॉलेज ठीक-तक तरीके से पहुच ही गया था, जहाँ 'अरमान' शब्द सिर्फ़ मेरा नाम नही, बल्कि एक ब्रांड था...वो भी नंबर.1 ब्रांड 
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फोर्त सेमेस्टर मे मैं 12 सब्जेक्ट्स के एग्ज़ॅम देकर थर्ड एअर मे आया था. इसलिए मेरा विचार तो यही था कि जैसे मस्ती भरी ज़िंदगी मैने शुरू के दो साल मे बिताए थे, वैसे ही बाकी के दो साल भी गुज़ारुँगा...लेकिन थर्ड एअर मे आते ही मुझे खुद लगने लगा कि 'लवडा इसके बाद सिर्फ़ एक साल और बचा है और यदि अब सीरीयस नही हुए तो फिर पूरी ज़िंदगी सीरीयस रहना पड़ेगा...इसलिए बाकी सब चुतियापे को साइड करके सिर्फ़ और सिर्फ़ पढ़ाई पर ध्यान देते है....'
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अपने इसी सोच को सच की शक्ल देने के लिए मैने थर्ड एअर की शुरुआत मे कुच्छ प्लॅन्स बनाए थे लेकिन तीन दिनो की कॅंप की मस्ती और एश के करीब आने की चाह मे मैने अपने ही प्लॅन्स की गान्ड मार ली थी...

कॅंप मे जाने का मेरा जो प्रमुख उद्देश्य था,वो तो पूरा नही हुआ...उल्टा लेने के देने पड़ गये,वो अलग....

कॅंप से वापस आने के बाद मैने अपने बॅच के लौन्डे-लौंदियो मे एक जबरदस्त उत्साह देखा...और वो उत्साह 'गेट' के एग्ज़ॅम के लिए था...साला जिसे देखो वही गेट के लास्ट एअर के कटफ, कॉलेजस के बारे मे बात करता था...कोई 'मेड ईज़ी' के गाते के नोट्स खरीद रहा था तो कोई इंटरनेट से सिर्फ़ और सिर्फ़ स्टडी मेटीरियल डाउनलोड कर रहा था....जिधर देखो, उधर कॉंपिटेटिव एग्ज़ॅम्स का साया दिखता था...तब मुझे अहसास हुआ कि इन सबमे मैं कही पीछे छूट रहा हूँ...क्यूंकी ना तो मैने दूसरो की तरह किसी नामी-गिरामी कोचिंग क्लासस के नोट्स लिए और ना ही मैने गेट, कॅट की कोचैंग क्लासस जाय्न की....इन सबके आलवा मैं जब भी गूगल महाराज के दर्शन करता तो सिर्फ़ और सिर्फ़ पॉर्न वीडियोस और मूवी डाउनलोड करता....कॅंप के बाद की कॉलेज लाइफ ने मुझे बहुत डरा दिया था...मुझे अब सपने मे एश के साथ-साथ, गेट एग्ज़ॅम के मनगढ़त एग्ज़ॅम सेंटर दिखने लगे थे...और जब ये डर मेरे अंदर बढ़ता गया तो मैने भी देल्ही से गेट के नोट्स मॅंगा लिया और नेक्स्ट सेमेस्टर से गेट की कोचैंग जाय्न करने का फ़ैसला किया.....
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मेरा डर मुझपर इस्कदर हावी नही होता यदि हमे मोटीवेट करने के लिए तरह-तरह के सेमिनार आयोजित नही किए जाते तो...सेमिनार मे लेक्चर देने वालो को कॉलेज मे इसलिए बुलाया जाता था ताकि स्टूडेंट्स मोटीवेट हो...लेकिन साला मुझपर तो उन सेमिनार्ज़ का उल्टा ही असर हो रहा था क्यूंकी पहले पूरे टाइम सिर्फ़ और सिर्फ़ टॉपर्स की बाते करते थे...एग्ज़ॅम मे धक्के-मुक्के लगाकर पास होने वाले मुझ जैसे स्टूडेंट्स के लिए सेमिनार मे लेक्चर देने वालो के पास कुच्छ नही था, इस कारण जब भी कोई सेमिनार ख़त्म होता तो एक सवाल मैं हर बार खुद से पुछ्ता कि'एक साल बाद मेरा क्या होगा ?'
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मेरा दिमाग़ पूरे सेमिनार बस उन महापुरषो को गाली देने मे गुज़रता, जो बीसी हम जैसे स्टूडेंट्स की बात ही नही कर रहे थे....हर सेमिनार की शुरुआत कुच्छ जाने-पहचाने या फिर कहे कि कुच्छ बेहद ही घिसे-पिटे सवाल से शुरू होती थी....जैसे कि 'आपने इंजिनियरिंग फील्ड क्यूँ चुना'
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और एक सेमिनार के दौरानी यही सवाल तलवार बनकर मेरा गला काटने को तैयार हुआ. आक्च्युयली हुआ कुच्छ यूँ था कि एक सेमिनार की स्टार्टिंग मे बढ़िया सूट-बूट पहने एक आदमी ने मेरी तरफ इशारा किया और मुझसे पुछा कि'तुमने अपने करियर के लिए इंजिनियरिंग फील्ड ही क्यूँ चुना '
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अब बीसी, मेरी फट के हाथ मे आ गयी, क्यूंकी क्लास मे खड़े होकर बक्चोदि भरे जवाब देना अलग बात थी और यहाँ इतने लोगो के बीच कुच्छ बोलना अलग बात थी...शुरू-शुरू मे मैने सोचा कि रनछोड़ दास छान्छड की तरह मैं भी ये कह दूं कि'सर,मुझे बचपन से मशीनो से प्यार था...........' .लेकिन फिर बाद मे सोचा कि इस साले ने भी तो '3 ईडियट्स' देखी होगी...कही लवडा इन्सल्ट ना कर दे....
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"कमोन, सबको बताओ कि तुमने इंजिनियरिंग करने का फ़ैसला क्यूँ किया...घरवालो ने मैथ दिला दिया इसलिए इस लाइन पर आए या फिर बाइयालजी पल्ले नही पड़ती थी...इसलिए इधर टपक पड़े..."जब मैं चुप-चाप खड़ा था तो सेमिनार के प्रमुख वक्ता ने मेरी खीचाई की....

"मैने इंजिनियरिंग को एक अच्छी नौकरी के लिए चुना, एक अच्छी लाइफ के लिए चुना, अच्छे पैसे के लिए चुना और इन सबसे बड़ी वजह मैने इंजिनियरिंग, एक अच्छी लड़की के लिए चुना...."मुझे उस वक़्त जो सूझा वो मैने फटाफट बोल दिया...

"गुड...यही एम मेरा भी था, सिट डाउन.."
और फिर मैं पूरे शान-ओ-शौकत के साथ बैठा....एक बात जो बतानी ज़रूरी है वो ये कि मेरा डर सिर्फ़ मेरे तक ही सीमित था, बाकियो के लिए मैं पहले वाला ही घमंडी और मार धाड करने वाला अरमान था...यानी कि मेरा आटिट्यूड, मेरा रुतबा जो कॉलेज मे पहले था वो मेरे अंदर डर के इस घने भूचाल के बाद भी कायम था....क्यूंकी मेरे कॉलेज मे 'अरमान' शब्द सिर्फ़ एक नाम नही बल्कि एक ब्रांड था, वो भी नंबर.1 ब्रांड 
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इस बीच हमारे लास्ट सेमेस्टर के रिज़ल्ट आए और हर बार की तरह इस बार भी यूनिवर्सिटी मुझपर मेहरबान दिखी...लेकिन हद तो तब हो गयी,जब मैने देखा कि मैं पूरे के पूरे 12 सब्जेक्ट्स मे पास हो गया था...बोले तो आइ वाज़ वेरी हॅपी 
मेरे इस रिज़ल्ट से सबको बहुत जोरदार झटका लगा, मेरे चाहने वाले जहाँ इस जोरदार झटके से अति-प्रसन्न थे वही मुझसे नफ़रत करने वालो को मेरे एग्ज़ॅम के रिज़ल्ट ने ऐसा झटका दिया था कि उनकी सिट्टी पिटी गुम हो गयी थी और कॉलेज मे मेरी टीआरपी मे जबर्जस्त बढ़ोतरी हुई थी....और मैं...मैं तो खुश ही होऊँगा ना,भला पास होकर कोई दुखी होता है क्या
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मेरे सीपीआइ अब चार सेमेस्टर के बाद 7.5 टच कर चुका था और मेरे रिज़ल्ट ने मुझे दोबारा से अपने प्लॅन्स को आक्टीवेट करने के लिए मजबूर किया...और मैने बिना किसी देरी के अपने प्लॅन्स, जो कि कॅंप मे जाने के कारण टूट कर बिखर गये थे, उन्हे दोबारा जोड़ा और आक्टीवेट किया....उस सेमेस्टर मैने पेलाम पेल पढ़ाई तो नही की लेकिन फिफ्थ सेमेस्टर के एग्ज़ॅम मेरे अब तक के इंजिनियरिंग लाइफ मे सबसे अच्छे बीते थे और ये फर्स्ट टाइम था,जब मैं अपना सीना ठोक कर बोल सकता था कि 'किसी का बाप भी मुझे फैल नही कर सकता...चाहे कोई कितना भी हार्ड कॉपी चेक करे '
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"अरमान, लंच के बाद क्लास बंक करके मूवी देखने चलेंगे..."चलती क्लास के बीच मे अरुण ने एक कागज पर ये लिखा और मेरी तरफ कागज का टुकड़ा सरकाया....
मन तो मेरा भी था कि मूवी देखने चला जाए, क्यूंकी ये तो 6थ सेमेस्टर की शुरुआत है और थोड़ी बहुत मस्ती तो चलती रहती है...लेकिन तभी मेरे 1400 ग्राम के दिमाग़ ने प्लान नंबर.4 का

अरुण से पहली बार मेरी दोस्ती कॉलेज मे हुई थी और दूसरी बार यहाँ नागपुर मे...अरुण जिस दिन से नागपुर आया था,उसी दिन से मुझे मालूम था कि एक दिन वो हँसते-मुस्कुराते मुझे 'गुड बाइ' कहेगा और चला जाएगा.

और आज 7 दिन तक नागपुर मे रहने के बाद अरुण जा रहा था,लेकिन उसने अभी तक मुझे 'गुड बाइ' नही कहा था.जब मैं मैं और वरुण, अरुण को रेलवे स्टेशन तक छोड़ने जा रहे थे तब वो पूरे रास्ते खुद को बहुत कूल,बिंदास दिखा रहा था.वो ऐसा बर्ताव कर रहा था,जैसे की उसे मुझसे दूर जाने मे कोई फ़र्क नही पड़ रहा है....लेकिन हक़ीक़त तो कुच्छ और थी..........
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"वरुण, तू एक काम कर,जाकर टीसी को पकड़ और मथुरा तक की टिकेट जुगाड़ कर...."जिस प्लॅटफॉर्म पर ट्रेन खड़ी थी वहाँ पहुचते ही मैने वरुण से कहा...

"मैं भी यही सोच रहा था..."मुझे दाँत दिखाते हुए वरुण टिकेट का जुगाड़ करने चला गया....

वरुण के जाने के बाद मैने अरुण की तरफ देखा और बोला"दुआ कर लवडे कि टिकेट का जुगाड़ हो जाए,वरना जनरल डिब्बे मे तो तू चुदा...."

"ट्रेन मे भीड़ देखकर मुझे अब ऐसा लग रहा है कि मुझे यहाँ आना ही नही चाहिए था...साला मैं दो ही चीज़ो से डरता हूँ, पहला एग्ज़ॅम के रिज़ल्ट से और दूसरा ट्रेन की भीड़ से...."

"रो मत,जुगाड़ हो जाएगा...वैसे तूने सही कहा कि तुझे यहाँ नही आना चाहिए था..पूरे 7 दिन तक तूने मुझे बोर किया...मेरा दिमाग़ खाया..अब जब तू जा रहा है तो आइ आम वेरी हॅपी...."

"ज़्यादा बोलेगा तो यही पर शाहिद कर दूँगा....."

"मज़ाक कर रहा था जानेमन...दिल पे मत ले, कही और ले..."

"घुमा के अपने पिछवाड़े मे ले ले...ये डाइलॉग बाज़ी अपुन से नही.... "ये बोलते वक़्त अरुण को अचानक कुच्छ याद आया और वो टपक से बोला"जानता है बे, मैं जहाँ काम करता हूँ...वहाँ अपने साथ वालो को कॉलेज के दिनो के डाइलॉग मार-मार कर छोड़ देता हूँ....अभी कुच्छ हफ़्तो पहले की बात है, मेरे साथ जाय्न हुए एक लौंडा मुझसे किसी टॉपिक पर बहस कर रहा था तो मैने उसे कहा कि 'म्सी, दिमाग़ खराब मत कर...वरना एक बार लंड फेक के मारूँगा तो तेरा पूरा खानदान चुद जाएगा तेरा'....जानता है उसके बाद क्या हुआ..."

मैने अपनी गर्दन दो बार ना मे हिला दी और जमहाई लेकर अरुण को इनडाइरेक्ट्ली बताने लगा कि मैं उसकी बकवास मे इंट्रेस्टेड नही हूँ.....

"उसके बाद से साला मुझसे बात ही नही करता...बीसी, चूतिया "
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इसके बाद मैं चुप ही रहा लेकिन अरुण को हर दो मिनिट के बाद एक दौरा पड़ता और वो ऐसी ही घिसी-पिटी कहानी मुझे सुना रहा था....
मैं वैसे तो उसकी बकवास सुनना नही चाह रहा था लेकिन साथ मे मैं ये भी चाहता था कि वो ऐसी ही बाते करके चला जाए...मैं चाहता था कि वो, वो सब बाते ना करे जिसके बारे मे मैं उससे बात नही करना चाहता था....लेकिन साले ने जाते हुए आख़िरकार मेरी दुखती नस को दबा ही दिया....
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"अरमान,याद है तूने एक बार कहा था कि तू मूवी इसलिए देखता है ताकि यदि तेरी लाइफ मे कभी वैसी प्राब्लम आए तो तू वैसी ग़लती ना करे जो मूवी के कॅरेक्टर्स ने की थी...."

"कहा था...तो ? "

"फिर तूने वैसी ग़लती क्यूँ की..."

"मैं कुच्छ समझा नही..."दूसरी तरफ देखते हुए मैने कहा ....

"तुझसे अच्छा कौन समझ सकता है इस बारे मे....मैं एश के बारे मे बात कर रहा हूँ..."

"डेड टॉपिक्स पर मैं फालतू की डिस्कशन नही करता..."अरुण की तरफ देख कर मैने कहा"और तुझे ये बात जितनी जल्दी समझ मे आएगी उतना ही ठीक रहेगा...."

"किसी को नज़र अंदाज़ करने से वो ख़त्म नही हो जाती...और यदि एश तेरे लिए डेड टॉपिक ही है तो आज तक तेरे मोबाइल मे उसके द्वारा तीन-तीन डिफरेंट लॅंग्वेज मे बोले गये, आइ लव यू...वाला वीडियो अभी तक क्यूँ है..."

अरुण ने मेरा मुँह बंद कर दिया था, मुझे अब कुच्छ नही सूझ रहा था कि उससे क्या कहूँ और मैं अपने होंठो के भीतरी भागो को अपने दाँत से चबाने लगा....

"तू मुझसे गले मिलकर जाएगा या फिर मुझसे लात-घुसे खाकर...."मैने हँसते हुए कहा....

"तू वक़्त बेवक़्त सिचुयेशन के अकॉरडिंग आक्टिंग बहुत अच्छी कर लेता है...लेकिन मेरे सामने नही...इसलिए अब हसना छोड़ और जवाब दे"

"अरुण....."कुच्छ देर रुक कर मैने आगे कहा"लड़कियो को लेकर,मेरा फंडा हमेशा क्लियर था कि यदि लड़की दूर जा रही है तो फिर उसे पाने के लिए अपना जी-जान लगा दो या फिर उसे भूल जाओ....8थ सेमेस्टर के बाद, जब एश मेरी ज़िंदगी से चली गयी तो मैने दूसरा रास्ता चुना...क्यूंकी वही रास्ता मुझे आसान लगा...लेकिन....बाद मे मुझे पता चला कि मैं 8थ सेमेस्टर के बाद चाहे कोई सा भी रास्ता चुनता, वो ग़लत ही होता क्यूंकी मेरी मंज़िल ही ग़लत थी....और यही हुआ..."

"कोई रास्ता ग़लत नही होता,अरमान..हर रास्ता हमे किसी ना किसी मंज़िल से जोड़ता ही है...अब तू अपने दूसरे रास्ते को ही देख ले, एश की जगह तुझे निशा मिल गयी..."
"निशा....लेकिन..."
"लेकिन-वेकीन कुच्छ नही...बस तू अपने दिल मे निशा को एश की जगह रीप्लेस्मेंट कर दे...और हमारा प्रोफेशन भी तो वही है कि जब किसी मशीन मे कोई पार्ट खराब हो जाता है तो हम उस खराब पार्ट का शोक मनाने की बजाय, दूसरे पार्ट से रीप्लेस्मेंट कर देते है...."

"पर मैं कोई मशीन नही..."

"अबे मान ले ना की तू मशीन है..ठीक उसी तरह जैसे ज़िंदगी भर हम हर सवाल मे 'X' को मानते आए है...."

"काफ़ी अच्छे-अच्छे डाइलॉग्स मारने लगा है तू...."अरुण के सामने अपने हथियार डालते हुए मैने कहा...
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"तू जानता है...आज मैं बहुत खुश हूँ, क्यूंकी मैने पहली बार तुझे मुँह-चोदि मे हरा दिया लेकिन मैं दुखी भी हूँ क्यूंकी वरुण अभी तक नही आया और ट्रेन की भीड़ देखकर मेरा खून सूख रहा है...."

"चिंता मत कर मैं यूनिवर्सल डोनर हूँ....ब्लड डोनेट कर दूँगा तुझे...."
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अरुण ने घड़ी मे टाइम देखा और उदास भरी निगाह मुझपर डाली. ट्रेन को छूटने मे अब सिर्फ़ 20 मिनिट्स ही बाकी थे कि तभी पसीने से नाहया हुआ मेरा रहीस दोस्त वरुण मुझे प्लॅटफॉर्म पर आते हुए दिखाई दिया...

मुझे नही पता कि वरुण ने इतनी भाग दौड़ कभी खुद के लिए भी की होगी या नही...लेकिन वो आज मेरे सबसे खास दोस्त के लिए इधर से उधर भाग रहा था...तब मुझे लगा कि ज़िंदगी की यही छोटी-छोटी घटनाए वास्तव मे हमारी संपत्ति होती है,जिसे हमे कभी नही खोना चाहिए.....

अरुण के लिए टिकेट का जुगाड़ हो गया था और उसके जाने के बाद जब मैं और वरुण वापस अपने रूम की तरफ आ रहे थे...तो वरुण ने कार ड्राइव करते हुए मुझसे पुछा....

"यार, सेवेंत सेमेस्टर तक की कहानी तो तूने सुना दी...लेकिन विभा मॅम को तो तूने अभी तक नही चोदा ....साले कितना आलसी था तू "

"पर यही सच है...किसी के पसंद करने या ना करने से मैं अपनी कहानी नही बदलने वाला..."

"ओके बेबी...8त सेमेस्टर का थोड़ा इंट्रोडक्षन दे दे...बोले तो ट्रेलर दिखा दे थोड़ा..."

"अभी नही...पहले मैं निशा से मिलिंगा और फिर बाद मे 8थ सेमेस्टर पर पहुचूँगा....साला दिल बहुत उदास है,अरुण के जाने से..."
"वरुण एक काम कर..."जब कार कॉलोनी के अंदर घुसी तो मैने वरुण से कहा....
"बोलो मालिक..."
"तू अपना मोबाइल मुझे दे...कुच्छ इंपॉर्टेंट काम है..."
"घंटा इंपॉर्टेंट काम है...तू ज़रूर उसे कॉल करने के लिए मुझसे मोबाइल माँग रहा है..."
मैने सोचा कि वरुण मज़ाक मे घंटा-वंता कर रहा है, इसलिए मोबाइल लेने के लिए मैने अपना हाथ उसकी तरफ बढ़ाया, लेकिन वरुण ने मुझे अपना मोबाइल देने की बजाय...मेरे हाथ को दूर झड़क दिया....
"चोदु है क्या..."
"मुझे एक आर्तिकल लिख कर कुच्छ दिनो मे सब्मिट करना है, और मुझे मेरे मोबाइल की ज़रूरत पड़ सकती है..."
"मैं लिख दूँगा...लेकिन अभी मुझे अपना मोबाइल दे..."
"शकल देखी है, बड़ा आया आर्टिकल लिखने वाला....बेटा वहाँ म्सी, बीसी, बकल,मकल नही लिखना होता,जिसमे तू माहिर है..."
"आइ कॅन डू एवेरितिंग इन एवेरी फील्ड "
"समझा कर...नही तो मुझे मोबाइल देने मे क्या प्राब्लम होती...."
"प्राब्लम ये है कि मेरा दिल उदास है...जो तू नही समझ रहा...मोबाइल दे दे वरना यही पर शाहिद कर दूँगा...."
"सॉरी...."
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"यदि तू मुझे अपना मोबाइल देगा तो तुझे मैं ये बताउन्गा कि दीपिका मॅम अभी कहाँ है...और वैसे भी तू अपना काम आधे घंटे बाद शुरू करेगा तो तुझपर कोई आसमान नही गिरेगा....."

रंडी.दीपिका का सहारा लेते हुए मैने वरुण से कहा,क्यूंकी जब दीपिका का टॉपिक चल रहा था तो वरुण दीपिका मॅम पर कुच्छ ज़्यादा लार टपका रहा था....इसलिए मैने सोचा कि शायद दीपिका के बारे मे आगे जानने की उत्सुकता उससे मेरा काम करा दे...साला मैं इतना होशियार कैसे हूँ 

"मुझे कोई फ़र्क नही पड़ता कि र.दीपिका इस वक़्त कहाँ मरवा रही है...और वैसे भी आइ लव माइ प्रोफेशन मोर दॅन गर्ल्स... "
"ठीक है प्रोफेशन लवर, फिर कार यही रोक मैं कुच्छ चहल कदमी करके आता हूँ....लेकिन एक बात याद रखना कि दीपिका के बारे मे तुझे कभी कुच्छ नही मालूम चलेगा.मैने सोचा था कि तू ये जानने के लिए बेकरार होगा कि कॉलेज से बट्किक करके निकली गयी दीपिका के साथ क्या-क्या हुआ...वो किस-किस से मिली, उसने कैसे-कैसे काम किए...ईवन मैं तुझे उसकी बिकनी मे फोटो तक दिखा सकता हूँ...खैर जब तू इंट्रेस्टेड ही नही है तो कोई बात नही,अपना क्या...कही ना कही से जुगाड़ कर ही लूँगा.तू नही तो कोई और सही..."कार से निकलते वक़्त बेरूख़ी से मैने कहा....
Reply
12-15-2018, 12:23 AM,
RE: Porn Hindi Kahani दिल दोस्ती और दारू
मेरी बेरूख़ी और दीपिका मॅम को देखने की वरुण की चाह काम कर गयी....मैं अभी थोड़ी ही दूर आगे आया था कि वरुण ने कार आगे बढ़ा कर मेरे बगल मे रोक दी...

"अब जा ना लवडे,अपना आर्टिकल पूरा कर...यहाँ क्या मरवाने आया है..."वरुण को धिक्कार्ते हुए मैने अपना सीना ताना और बड़बड़ाते हुए आगे बढ़ा"जब मोबाइल नही था तब भी लौन्डे, लौन्डियो से मिलने जाते थे...जब उन्हे कोई डर नही था तो फिर मुझे काहे का दर...दाई चोद दूँगा निशा के बाप की यदि साला बीच मे आया तो..."

"ओये रुक...."

"चूस..."

"अरमान रुक बे..."

"मन तो नही है तेरा मोबाइल लेने का लेकिन जब तू मुझसे इतनी मिन्नतें कर ही रहा है तो...ला दे मोबाइल,तू भी क्या याद रखेगा कि किस महान पुरुष से पाला पड़ा था..."

"मैने कब कहा कि मैं तुझे मोबाइल देने के लिए रोक रहा हूँ...और साले मैने मिन्नत कब की तेरे सामने...."कार से निकल कर वरुण मुझे धक्का देते हुए बोला....

"बेटा,मैं आसमान मे उड़ती हुई चिड़िया को देखकर ये बता सकता हूँ कि वो अब किस तरफ मुडेगी...फिर तू चीज़ ही क्या है...और यदि तुझे मुझे मोबाइल नही देना होता तो, मोबाइल तेरे जेब मे होता ना कि तेरे हाथ मे..."

मेरे इस वर्ड वॉर से वरुण ने अपना मोबाइल वाला हाथ पीछे करते मुझसे कहा कि उसने मोबाइल टाइम देखने के लिए निकाला था....

"ये ले...इसका मतलब तो यही हुआ कि तू न्यूटन को ग्रॅविटी और आइनस्टाइन महोदय को रेलेटिविटी पढ़ा रहा है,वो भी कॉमर्स का होकर....तेरे हाथ मे बँधी घड़ी क्या खराब हो गयी है जो तूने टाइम देखने के लिए मोबाइल निकालने का कष्ट किया....अब सीधे से मोबाइल मुझे दे और यहाँ से चलता बन...बोर मत कर..."
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इसके बाद वरुण की और कुच्छ बोलने की हिम्मत नही हुई, वो मेरे द्वारा अपनी इस घोर बेज़्जती पर गुस्सा तो बहुत था...लेकिन वो अब जान गया था कि आगे कुच्छ बोलने का मतलब, खुद की और भी बेज़्जती कराना था...इसलिए वरुण अपने सारे गुस्से को दारू की तरह पी गया और चुप चाप मोबाइल मुझे देकर कार के अंदर गया, कार स्टार्ट की और स्लोली-स्लोली वहाँ से जाने लगा.....तभिच मैने सोचा कि जब लपेटे मे इसे ले ही लिया है तो पूरा नंगा किया जाए...क्यूंकी क्या पता दोबारा ऐसा मौका कब आए, इसलिए मैने वरुण के अंदर की आग भड़काने के लिए ज़ोर से चिल्लाया....
"सुन बे, खाना बना कर रखना...वरना इस महीने की पगार नही दूँगा..."

मेरे इन शब्दो ने वरुण के तपते जिस्म मे घी का काम किया और वरुण तुरंत जल उठा...उसने अपनी कार रोकी और बाहर निकल कर दौड़ते हुए मेरे पास आया....

"गान्ड मे बॅमबू डालकर एक लाख आर.पी.एम. की स्पीड से घुमाउन्गा...."

"ऐसा क्या...ले फिर आर.पी.एम. का फुल फॉर्म बता, बेटा इंजिनियर के साथ रहकर कोई इंजिनियर नही बन जाता...इंजिनियर बनने के लिए चार साल तक टापना पड़ता है,तब ये काबिलियत आती है...तेरे जैसा कॉमर्स सब्जेक्ट का लौंडा ये नही समझ सकता"बोलते ही मैं वहाँ से भाग खड़ा हुआ,क्यूंकी मुझे मालूम था कि यदि एक पल और मैं वहाँ खड़ा रहता तो मेरा मर्डर हो जाता....
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वरुण के पास से खिसकने के बाद मैं निशा के घर से थोड़ी दूर पर आकर रुक गया और नंबर. डाइयल किया.....
मैने कयि बार कोशिश की, लेकिन निशा थी कि फोन उठाने का नाम ही नही ले रही थी,...

"इसकी तो...फिर इसे मोबाइल देने का फ़ायदा ही क्या हुआ,जब टाइम पे बात ही नही होनी है तो...."मोबाइल से बात करते हुए मैने कहा और कॉल लोग मे जाकर निशा के नंबर के नंबर पर मोबाइल की हरी बत्ती दबा दी....लेकिन नतीजा इस बार भी पहले वाला ही रहा...घंटी तो जा रही थी लेकिन मेरी घंटी(निशा ) कॉल रिसीव ही नही कर रही थी...इसके बाद मैने 5-6 बार और ट्राइ मारा और जब कोई कामयाबी नही मिली तो किसी थके -हारे हुए इंसान की तरह निशा के घर की तरफ देखा...तो मुझे निशा के घर के बाहर दो कार खड़ी दिखाई दी और जहाँ तक मैं जानता था, वो दोनो कार मेरे ससुराल वालो की नही थी...यानी कि निशा के घर मे कोई बाहरी आदमी आया हुआ था और कार देखकर ही लग रहा था कि साला बहुत रहीस होगा.....
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अब जब ये क्लियर हो गया की निशा के घर मे कयि बाहरी लोग है तो दिमाग़ ने ये भी थियरी बना डाली कि निशा, ज़रूर उन्ही लोगो के सामने होगी, इसीलिए वो मेरा कॉल रिसीव नही कर रही है....लेकिन अब सवाल ये पैदा हुआ कि निशा के घर आया कौन है....

शुरू मे सोचा कि चलकर निशा के घर की रखवाली करने वाले गार्ड से बातो ही बातो मे पुच्छ लिया जाए,लेकिन फिर जब ढंग का कुच्छ नही सूझा तो मैने अपना इरादा टाल दिया....

"कही साला डेविड और उसकी फॅमिली तो नही आई है..."एका-एक मेरे 1400 ग्राम के भेजे मे ये ख़याल कौधा और फिर ये ख़याल बीत रहे हर सेकेंड्स के साथ प्रबल होता गया...

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निशा के घर के बाहर खड़ा मैं, यही सोच रहा था कि यदि सच मे डेविड और उसके परिवार वाले ही अंदर होंगे तो फिर मुझे जल्द से जल्द कुच्छ सोचना पड़ेगा...वरना निशा हाथ से निकल जाएगी...

"हां बोल डायन...किस पर जादू टोना कर रही थी...जो मेरा फोन नही उठाया..."निशा ने कुच्छ समय बाद खुद मुझे कॉल किया, तब मैं उसपर भड़कते हुए बोला"कहाँ है..."

"बाथरूम मे हूँ...बड़ी मुश्किल से कॉल कर पाई हूँ..."

"बाथरूम मे क्या कर रेली है, ह्म्म"

"शट अप..."

"चल ठीक है,नही बताना तो मत बता, वो तेरा पर्सनल मॅटर है...लेकिन ये बता कि अभी कौन आया हुआ है तेरे घर मे..."

"तुम्हे कैसे पता चला कि मेरे घर मे कोई आया हुआ है..."अचानक चौुक्ते हुए उसने अपनी आवाज़ तेज़ करके पुछा..

"बस ऐसे ही अंदाज़ा लगाया...क्या सच मे कोई आया है क्या..."

"हां...डेविड आया हुआ है और लंच के बाद वो मुझे शॉपिंग के लिए ले जाने वाला है...."

"डेविड....इसकी माँ का फिल इन दा ब्लॅंक्स...."फोन रखते हुए मैने आख़िरी लफ्ज़ निशा से कहे"विशिंग यू आ हॅपी मॅरीड लाइफ..."
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मैने मोबाइल गुस्से से जेब मे घुसाया और सीधे अपने रूम की तरफ बढ़ा....मुझे गुस्सा इसलिए आ रहा था क्यूंकी जिस खुशी के साथ निशा ने डेविड के उसके घर आने और उसके साथ शॉपिंग पर जाने की बात कही थी...उससे मुझे यकीन नही हो रहा था कि ये वही निशा है,जो कुच्छ दिन पहले डेविड का नाम लेकर परेशान हो रही थी....उसकी आवाज़ मे ज़रा सा भी रूखापन नही था यानी कि डेविड के आने से वो बहुत ज़्यादा खुश थी....ऐसा मैने सोचा, लेकिन हक़ीक़त कुच्छ और हो सकती थी,यदि निशा ने मेरे कॉल डिसकनेक्ट करने के बाद मुझे रिटर्न कॉल किया होता तो लेकिन उसने ऐसा नही किया.... 

मैं पूरे रास्ते भर निशा के रिटर्न कॉल का वेट करते हुए अपने रूम की तरफ बढ़ रहा था और अपने रूम पर भी पहुच गया,लेकिन अभी तक निशा ने एक भी रिटर्न कॉल नही की थी....

वक़्त को बदलते हुए सबने देखा होगा लेकिन कभी-कभी वक़्त नही इंसान बदल जाते है,उनकी चाह बदल जाती है,जीने की वजह बदल जाती है....और ये सीधे हमारे लेफ्ट साइड यानी की दिल पर हमले के बराबर होता है और जब आपके दिल के सबसे करीबी शक्स ऐसा करे तो मानो दिल पर किसी ने परमाणु हमला कर दिया हो.....ऐसा लगता है.

एक बार तो ये परमाणु हमला मैं झेल चुका था और आगे भी झेल सकता था....लेकिन, साला अबकी बार चूतिया बनने का मूड नही है.
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रूम पर आया तो आज पिछले कुच्छ दिनो की तरह अरुण भी नही था, जो गाली देकर पुच्छे कि 'कहाँ गया था लवडे...दारू लाया या ऐसे ही मुँह उठाकर आ गया ' .

अकेला वरुण ही था और वो भी इस वक़्त अपना लॅप टॉप पकड़े मरवा रहा था इसलिए वरुण को डिस्टर्ब किए हुए बिना मैं सीधे बाल्कनी पर जा पहुचा.सिगरेट की पॅकेट उलट-पुलट की लेकिन पॅकेट खाली निकली...इसलिए अब चुप-चाप होकर बाल्कनी मे खड़े रहने के सिवा मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नही था....

जब कुच्छ ठंडा हुआ तो सोचा कि कही मैं निशा को परखने मे जल्दबाज़ी तो नही कर रहा हूँ....हो सकता है वो किसी और बात से उस वक़्त खुश रही होगी....

"लेकिन उसे कम से कम एक रिटर्न कॉल तो करना ही चाहिए....मैं होता तो एक नही डूस रिटर्न कॉल करता...."मोबाइल पर निशा का नंबर देखते हुए मैं झल्लाया....

"ये लौन्डियो वाली हरकत मत कर, बी आ मर्द...."मैने तुरंत अपना ही विरोध किया.....
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जब कुच्छ और समय गुज़रा तो मुझे खुद की ग़लती दिखने लगी और मुझे मेरे अंदर की वो बुराई नज़र आई, जो मुझमे नही होनी चाहिए थी.....मैं हमेशा से कबीर दास का फॅन था और उनके एक ऑल टाइम फेवोवरिट डाइलॉग"काल करे सो आज कर, आज करे सो अब" पर चलता था...और इसी कारण मेरे अंदर सब्र नाम की चीज़ नही थी...अपनी आदत के विपरीत मैने एक बार सब्र किया...वो भी एक दिन, दो दिन नही...एक हफ्ते, दो हफ्ते नही...एक महीने, दो महीने नही...यहाँ तक कि एक साल, दो साल भी मेरे उस सब्र के समय सीमा के आगे कम पड़ गये....मैने पूरे चार साल तक सब्र किया लेकिन उस सब्र ने ही मेरी अच्छी तरह से मार ली....तब से शब्र नाम की चिड़िया मेरे आस-पास भी नही उड़ती.....
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अपने हाथ मे मोबाइल पकड़े हुए मैं निशा के मोबाइल नंबर को देख रहा था और उस बात को आधा घंटा बीत जाने के बावजूद अभी तक इंतज़ार ही कर रहा था कि वो मुझे अब कॉल करेगी...अब कॉल करेगी...

दिल ने कहा कि वो नही करती तो तू खुद कर ले और मेरी बेचैनी को ख़तम कर्दे,लेकिन दिमाग़ ने कहा कि 'बेटा एक बार लौंडिया के चक्कर मे चुद चुके हो और अबकी बार वाला सीन भी कुच्छ वैसा ही बन रहा है...इसलिए ज़रा संभाल कर और उसे ही कॉल करने दो...."

ईच्छा तो बहुत हो रही थी कि अभिच मोबाइल की हरी बत्ती दो बार दबा दूं, लेकिन फिर सोचा"जाने दो,साला अपनी भी कोई औकात है...खुद कॉल करेगी तो करे...मैं तो अब कॉल ही नही करूँगा...."
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जैसे जैसे वक़्त बीत रहा था वैसे-वैसे मेरा दिमाग़ भी सटक रहा था और जब पूरे दो घंटे तक बाल्कनी मे खड़े रहकर निशा की कॉल का इंतज़ार करते रहने के बाद भी जब उधर से कोई कॉल नही आया तो मैने गुस्से मे वरुण के मोबाइल को ही स्विच ऑफ कर दिया.....

"अरमान सर, ज़रा मेरा मोबाइल देने की कृपा करेंगे क्या...."

"ओह तेरी...गुस्से मे तो मैं ये भी भूल गया कि ये मोबाइल मेरा नही बल्कि वरुण का मोबाइल है..."फटाफट मोबाइल ऑन करते हुए मैने वरुण से दो मिनिट रुकने के लिए कहा और फिर जाकर बिस्तर पर उसका मोबाइल पटक दिया.....

"बड़े क्रोधित लग रहे हो महाशय...निशा से कुच्छ बात हुई क्या..."मेरे इस रवैये पर वरुण ने चुटकी ली....

"बात ही तो नही हुई...."इतना बोलकर मैं चुप हो गया...

वरुण ने बिस्तर से अपना मोबाइल उठाया और किसी को कॉल करके कहा कि उसने फलाना आर्टिकल भेज दिया है...वो जाकर चेक कर ले.....उसके बाद वरुण कुच्छ देर तक अपनी आँख मलता रहा और फिर आँख खोलकर बोला"चल बता दीपिका के बारे मे..."

"मूड नही है उस आर.दीपिका के बारे मे बात करने का..."

"तो मूड बनाओ श्रीमान...वरना हम तुम्हारी खटिया खड़ी कर देंगे..."

"अबे...पहले तो तू ये बक्चोद लॅंग्वेज मे बोलना छोड़..."

"चल अब नही बोलता....लेकिन एक बात बता, तुझे कभी अंदर से फीलिंग नही आई कि तूने अपने बदले की खातिर दीपिका का करियर बर्बाद कर दिया...मतलब कि उसने जो किया वो ग़लत था,मैं मानता हूँ...लेकिन दीपिका को कॉलेज से निकालने के आलवा भी तो कोई दूसरा रास्ता निकाल सकता था...इस तरह उसे बदनाम करना और फिर उसकी रोज़ी-रोटी पर लात मारना, ये तो एक तरह से ग़लत हुआ ना...."

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वरुण का सवाल जायज़ था लेकिन मेरे अंदर से कभी ये ख़याल ही नही आया कि मैने दीपिका मॅम के साथ जो किया, वो ग़लत था....मैं बोला...

"तुझे पता है, फीमेल ब्लॅक स्पाइडर की एक ख़ासियत होती है कि वो संभोग के बाद मेल स्पाइडर को खा जाती है और दीपिका मॅम भी उसी ब्लॅक स्पाइडर की तरह थी, जो किसी भी लड़के से चुदने के बाद उसे निगल जाती थी....यानी कि उस लड़के का करियर बर्बाद कर देती थी, इसलिए मुझे कभी इस बात पर पछ्तावा नही हुआ कि मैने उसे बुरी तरह बदनाम करके कॉलेज से निकाला....मेरे बर्बाद होने की बेशक ही कयि वजह रही हो, लेकिन सबसे पहली वजह दीपिका मॅम खुद थी..."थोड़ी देर रुक कर मैं आगे बोला"और वैसे भी दीपिका मॅम को मेरी इस हरकत से फ़ायदा ही हुआ,क्यूंकी आज कल वो एक मॉडेल है...."

"मॉडेल कहाँ....."

मैने पास मे रखी हुई एक मेग्ज़ीन को उठाया और कयि पन्ने पलटने के बाद एक लड़की का फोटो वरुण को दिखाया, जो किसी बिकनी ब्रांड का अड्वरटाइज़ करने के लिए पोज़ दिए हुए थी.....

"यही है आर.दीपिका..."

"क्या..."मेरे हाथ से वो मेग्ज़ीन तुरंत छीन्कर वरुण ने अपने हाथ मे लिया और दीपिका मॅम की फोटो को उपर से लेकर नीचे तक अपनी आँखो से स्कॅन मारने के बाद बोला"बड़ी धाँसू आइटम है बे ये तो..."

"कॉलेज की नंबर. 1 माल ये पहले भी थी और अब भी है..."

"तब तो तू इसकी फ़ेसबुक आइडी भी जानता होगा..."

"जिस दिन इसने कॉलेज छोड़ा, उसी दिन इसने अपनी फ़ेसबुक आइडी डीक्टिवेट कर दी...."
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वरुण बहुत देर तक दीपिका मॅम की फोटो को ताकता रहा...और फिर लंबी साँस लेकर बोला"चल आगे बता..."

मैं अब वरुण को अपने कॉलेज की स्टोरी सुना-सुना कर बोर हुआ जा रहा था, इसलिए मैने डिसाइड किया कि...आज चाहे जो हो जाए.8थ सेमेस्टर की पूरी कहानी सुनाकर ही दम लूँगा...भले ही रात भर जागना क्यूँ ना पड़े और कल सुबह से अपने काम पर जाना शुरू कर दूँगा...क्यूंकी मुझे डर था कि कही इंडस्ट्री वाले मुझे निकाल ना दे...इसलिए मैने पहले ही वरुण से शर्त रखी कि जब तक 8थ सेमेस्टर ख़तम नही हो जाएगा, वो सोएगा नही और मेरी इस शर्त पर उसने हामी भरी .....
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"8थ सेमेस्टर की शुरुआत जैसे हुई, उसके दो-तीन दिन बाद ही हमे पता चला कि विभा जानेमन...कॉलेज छोड़ रही है...और ये मेरे विभा को चोदने के अरमानो पर जबर्जस्त प्रहार था....जिसे मैं बर्दाश्त नही कर सकता था...."

जब ये खबर मुझे मिली तब मैं अपने दोस्तो के साथ हॉस्टिल मे था और जैसे ही ये खबर सुनी तो दिल किया कि खबर सुनाने वाले को अपने हॉस्टिल की छत से उल्टा लटका दूं या फिर डाइरेक्ट नीचे फेक दूं....

कयि साल पहले मैने ये पढ़ा था कि किसी चीज़ को 11.2 किलोमेटेर पर सेकेंड की वेलोसिटी से उपर फेकने पर वो चीज़ अर्त से पलायन कर जाती है और फिर कभी अर्त पर लौट कर नही आती...इसलिए इस वक़्त दिल तो ये भी किया कि खबर सुनाने वाले उस लौन्डे को 11.2किमी पर सेकेंड की रफ़्तार से आसमान मे फेक दूं, जिससे वो अर्त से सीधे पलायन कर जाए और कभी लौटकर ना आ पाए....लेकिन मैं ऐसा नही कर पाया क्यूंकी ये खबर किसी और ने नही बल्कि हमारे पांडे जी ने सुनाई थी....

"खुद तो है ही मनहूस और खबर भी वैसी मनहूसो वाली लाता है...साले तू मर क्यूँ नही जाता और कितना जिएगा...."विभा से जुदाई के गम मे मैने कहा..

"क्या अरमान भाई...मैं तो सोचा था कि विभा के जाने से आप बहुत खुश होगे...लेकिन ये खबर सुनकर तो आप उल्टा मुझपर ही बरस पड़े..."

"इसे तू खुशख़बरी कहता है...साले पूरे कॉलेज मे ये एकलौती लड़की थी, जो मुझसे बात करती थी...वैसे तू खुश क्यूँ है विभा के जाने से, उसने तेरी गान्ड मारी थी क्या..."

"गान्ड ही तो मार रही है...साली सेक्षनल मे चोद देती है मेरे को..."

"अब उसके क्लास मे राजश्री खाकर बैठेगा तो यही होगा...और बता भी रहा है तो अब, पहले बताया होता तो कुच्छ जुगाड़ भी जमाता, अब तो वो जा रही है..."

"अरे हटाओ विभा को और आज रात के दारू प्रोग्राम के बारे मे बात करते है...."
Reply
12-15-2018, 12:24 AM,
RE: Porn Hindi Kahani दिल दोस्ती और दारू
दूसरे दिन मैं कॉलेज तो पहुचा लेकिन थर्ड पीरियड मे और तब तक विभा की क्लास जा चुकी थी और ये क्लास उसकी आख़िरी क्लास थी....जब कॉलेज पहुचा तो दोस्तो ने बताया कि आज विभा मॅम की क्लास मे कोई पढ़ाई नही हुई...वो लोग पूरे एक घंटे विभा मॅम से सिर्फ़ हँसी मज़ाक करते रहे और क्लास के एंड मे सभी लौन्डो-लौन्डियो ने विभा मॅम को उनकी आगे की लाइफ के लिए ऑल दा बेस्ट कहा, जिसके बाद विभा ने भी पूरी क्लास को ऑल दा बेस्ट कहा.....साला मैं ही इस मौके पे चौका मारने से रह गया, यदि कल रात दारू नही पी होती तो....खैर अब पछ्ताये हॉट क्या, जब चिड़िया चुग गयी खेत और वैसे भी आइ लव दारू मोर दॅन गर्ल्स....
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"क्या सोच रहा है बे अरमान...चल कॅंटीन से आते है..."लंच होने के बाद भी जब मैं अपनी जगह पर बैठा रहा तो अरुण बोला...
"कुच्छ नही,बस विभा जानेमन के बारे मे सोच रहा हूँ....मेरे पास फुल मौका था उसे पटाने का,लेकिन मैं तो लंड हिलाता रहा...कभी ट्राइ ही नही किया और आज जब वो जा रही है तो एक दम खराब लग रहा है...अब क्लास मे वही बदसूरत टीचर रहेंगे,जिनकी सूरत देखते ही पढ़ने का मन नही करता..."

"चल कॅंटीन मे फर्स्ट एअर की लौन्डियो को ताड़ते है...इस बार तो पूरी मिस इंडिया आ गयी है कॉलेज मे..."

"वो सब छोड़ और ये बता कि विभा इस वक़्त कहाँ होगी, तेरे हिसाब से..."

"इस वक़्त...."अंदाज़ा लगाते हुए अरुण बोला"मेकॅनिकल डिपार्टमेंट मे होगी और कहाँ होगी..."

"एक काम कर तू जा, मैं आज कॅंटीन नही जा रहा....विभा से मिलकर आता हूँ..."विभा से मिलने का इरादा करके मैं अपनी जगह से उठा, तो अरुण ने मेरा कंधा पकड़ कर मुझे वापस बैठा दिया...

"तुझे लगता है कि वो तुझसे मिलेगी...अबे लोडू, वो इस वक़्त मेकॅनिकल डिपार्टमेंट मे होगी...और वहाँ अपने सारे खड़ूस टीचर होंगे..."

"तो क्या हुआ..."

"तो क्या हुआ.....बेटा तू मेकॅनिक्लल डिपार्टमेंट मे तो उससे बात कर नही पाएगा इसलिए तू उसे बाहर आने के लिए ही कहेगा...ऐसे मे वो साले, म्सी टीचर्स पक्का कुच्छ ना कुच्छ ग़लत समझ लेंगे....जाते-जाते तो उसे बदनाम मत कर..."

"तू होशियारी मत छोड़ और जा अपना काम कर...मुझे मालूम है कि क्या करना है, बड़ा आया मुझे सलाह देने वाला..."

"मरवा फिर...मुझे क्या..."बोलकर अरुण तुरंत क्लास से बाहर निकल गया...और मैं मेकॅनिकल डिपार्टमेंट की तरफ बढ़ा....
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वैसे तो कुच्छ देर पहले मैने अरुण को गाली देकर भगा दिया था,लेकिन उसने सही ही कहा था कि डिपार्टमेंट मे जाकर विभा को सीधे बाहर बुलाना, ख़तरनाक साबित हो सकता था...इसलिए मैं अपने डिपार्टमेंट के बाहर जाकर रुक गया और विभा के मोबाइल पर एक मेस्सेज टपका दिया कि मुझे उससे मिलना है....

मेरे मेस्सेज करने के 10 मिनिट बाद तक जब विभा मेकॅनिकल डिपार्टमेंट से बाहर नही निकली तो मैने ये मान लिया कि अब वो बाहर नही आएगी, इसलिए मैं वापस जाने के लिए मुड़ा...लेकिन तभी पीछे से विभा जानेमन ने मुझे आवाज़ दी....
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"मुझे लगा नही कि आप आओगी...इसलिए वापस जा रहा था..."विभा को बाहर देख मैं उसकी तरफ बढ़ा...

"लंच मे बिज़ी थी...अब फ्री हूँ,बोलो क्या बात है..."

"आज बड़ी धाँसू लग रही हो....बोले तो यू आर लुकिंग ब्यूटिफुल..."

मेरी इस तारीफ भरे शब्दो का विभा ने कोई जवाब नही दिया जबकि आम तौर पर लड़किया अपने लिए ऐसे वर्ड सुनकर सामने वाले को स्माइल के साथ थॅंक्स कहती है...लेकिन विभा मॅम की अपनी ही एक खास आदत है, जो ये कि मैं जब भी उसे खूबसूरत कहता था तो उसका मुँह ऐसे बन जाता था जैसे मैने उसकी तारीफ नही बल्कि बेज़्जती की है...खैर ये हमारा पर्सनल मॅटर है...तुम लोगो को इन्वॉल्व होने की ज़रूरत नही 

"दिल से बोल रहा हूँ मॅम कि यू आर लुकिंग सो ब्यूटिफुल...अब तो जा रही हो, कम से कम जाते-जाते तो थॅंक्स बोल जाओ...."

"थॅंक्स...लेकिन तुमने अभी तक ये नही बताया कि मुझसे, तुम्हे ऐसी कौन सी बात करनी थी..."

विभा के ये कहते ही मैं सोच मे पड़ गया...क्यूंकी मैं ये सोच के ही नही आया था कि विभा से मुझे क्या बात करनी है...इसलिए मैं वहाँ खड़ा रहकर कुच्छ देर तक तो इधर-उधर झाँकता रहा और फिर बोला "यहाँ से कही दूर चले "

"चलो..."

"क्या..."मेरे साथ चलने के उसके जवाब से मैं थोड़ा नर्वस सा हो गया...क्यूंकी मुझे अभी तक समझ नही आया था कि विभा से आक्च्युयली मैं बात क्या करूँ ?

हम दोनो वहाँ से दूर आए और फिर एक जगह जाकर विभा रुक गयी और मेरी तरफ देखने लगी....जिससे मैं और भी नर्वस हो गया...मेरे अंदर इस वक़्त तूफान उठा हुआ था, जो शब्दो के रूप मे मेरे अंदर से बाहर निकलकर विभा के कानो तक जाना चाहता था....इस वक़्त मेरे अंदर काई ख़यालात आ रहे थे, जैसे कि विभा को 'आइ लव यू' कहना या फिर 'आइ वॉंट टू फक यू' कहना....लेकिन इन सभी के बीच मैने वो टॉपिक छेड़ा जिसकी उम्मीद ना तो विभा को थी और ना ही मुझे....वो तो बस एक सेकेंड के अंदर ही मेरे दिल मे आया और मैने कह दिया....
"सीडार को तो जानती ही होंगी...बोले तो वही अपने एमटीएल भाई..."बोलने के साथ ही मेरे अंदर एक दुख का अनुभव हुआ...और ऐसा ही कुच्छ-कुच्छ रिक्षन विभा का भी था...

"उसे कौन नही जानता...लेकिन सीडार के बारे मे मुझसे क्या बात करनी है...हम दोनो तो कभी दोस्त तक नही थे...."

"एग्ज़ॅक्ट्ली...इसी के बारे मे तो बात करनी है...."विभा की आँखो मे आँखे गढ़ाते हुए मैं बोला"उन्होने मुझसे कहा था कि वो आपसे...मतलब...वो, आपसे..."

"प्यार करता था...."मेरे आधूरे वाक्य को पूरा करते हुए विभा ने कहा"लेकिन मैने तो उससे कभी प्यार नही किया...."

"वही तो पुछने आया हूँ कि क्यूँ नही किया...कोई खास दुश्मनी थी क्या उनसे..."

"जिससे दुश्मनी ना हो, इसका मतलब ये तो नही होता कि उससे प्यार किया जाए....और वैसे भी अब वो नही है तो इस बारे मे बात करने का कोई फ़ायदा नही....मैं चलती हूँ..."
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"ये क्या कर दिया मैने... ये तो नाराज़ हो गयी..."विभा को वहाँ से जाते देख मैं खुद पर चीखा और तेज कदमो के साथ आगे बढ़ते हुए विभा के ठीक सामने खड़ा हो गया....

"सॉरी...वैसे मैं ये पुछने आया था कि यहाँ से जा कब रही हो...मेरा मतलब ट्रेन कितने बजे की है..."

"तुम्हे कैसे पता कि मैं ट्रेन से जाउन्गी.... "

"अब प्लेन से तो जाओगी नही और राजस्थान तक यहाँ से कोई बस जाती नही...इसलिए जाओगी तो ट्रेन से ही...अब बताओ कितने बजे की ट्रेन है..."

"11:30 पीएम....लेकिन ये क्यूँ पुच्छ रहे हो..."

"बस ऐसिच जनरल नालेज के लिए...क्या पता इंडियन इंजिनियरिंग सर्विस(आइस) के एग्ज़ॅम मे ये क्वेस्चन आ जाए "
"तो मैं चलूं..."

"जा ऐश कर..."

"सुधरोगे नही तुम..."

"कोई सुधारने वाली मिली नही...वरना बंदे हम उतने बिगड़े हुए भी नही थे...आप ट्राइ मार सकती हो "

"अपना ये जादू उसपर चलाया करो,जिसपर चलता हो....और हां, यदि रात को रेलवे स्टेशन आ रहे हो तो 11 बजे पहुच जाना....कुच्छ इंपॉर्टेंट काम है...मुझे आने मे थोड़ा बहुत लेट हो जाएगा तो वहाँ से भाग मत जाना,मेरा इंतज़ार करना....अब सामने से हटो..."

"जानेमन, इंतज़ार तो हम सिर्फ़ दो चीज़ का करते है...पहला 'पाइरेट्स ऑफ दा क्रिब्बीयन' के नेक्स्ट पार्ट का और दूसरा सचिन की बॅटिंग का...."गॉगल्स लगाते हुए मैने कहा"इसलिए टाइम पर पहुच जाना "
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विभा से मिलने के बाद मैने टाइम देखा तो मालूम हुआ कि रिसेस ख़तम होने मे अब भी 20 मिनिट बाकी थे और पेट मे भूख के मारे जो खलबली मची हुई थी उसके बाद तो सिर्फ़ कॅंटीन ही एकमात्र सहारा था...इसलिए मैं कॅंटीन की ओर चल पड़ा...पेट मे भूख के कारण मची खलबली के अलावा एक और कारण था,जिसकी वजह से मैं कॅंटीन जा रहा था...वो कारण ये था कि लास्ट सेमेस्टर से कॉलेज के कुच्छ लड़को ने अपना एक अलग ग्रूप बना लिया था...जो आए दिन किसी ना किसी को पेलते रहते थे...मुझे पांडे जी ने इसकी इन्फर्मेशन कुच्छ दिन पहले ही दी थी और ये भी कहा था कि वो रिसेस के वक़्त पूरा टाइम कॅंटीन मे रहते है....इसलिए कॅंटीन मे जाकर उस ग्रूप को ठीक करना था और वैसे भी जब से मैने अपने चारो प्लान को डीक्टिवेट किया है,तब से मैं जब चाहू,जिसे चाहू, जहाँ चाहू...ठोक सकता हूँ...

चॅप्टर-45:ए कॉर्नर ऑफ दा पास्ट

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मेरे चारो प्लॅन्स मेरे साथ लगभग एक साल तक रहे, जिसका नतीज़ा ये हुआ था कि मेरा सीपीआइ जो 4थ सेमेस्टर के बाद 7.6 था वो अब 7.9 तक आ पहुचा था और सेवेंत सेमेस्टर के रिज़ल्ट के बाद तो मुझे पूरी उम्मीद थी कि मेरा सीपीआइ 8.0 पायंटर टच कर जाएगा या फिर 8.ओ को क्रॉस कर जाएगा....5थ सेमेस्टर मे कॅंप के बाद मैने एक सिंपल, शरीफ लाइफ गुज़ारी थी...जिसमे ना तो कोई मार-धाड़ थी और ना ही कोई लौंडियबाज़ी....मेरी उस सिंपल आंड शरीफ सी लाइफ मे सिर्फ़ एक बुराई थी जिसे मैं दूर नही कर पाया था और वो थी मेरी दारू पीने की आदत, जो अब भी बरकरार है.....

5थ सेमेस्टर से जहाँ मेरे सीपीआइ उपर चढ़ने शुरू हुए, वही मेरे खास दोस्तो का हाल पहले जैसा ही रहा...अरुण ने थोड़ी, बहुत प्रोग्रेस तो की लेकिन वो 7.5 तक ही अटका हुआ था..सौरभ 7.2 मे था और इस बीच एक साल मे सुलभ के पायंट्स पर जोरदार गिरावट हुई...पहले जहाँ उसका सीपीआइ 8.3 के करीब था वो अब नीचे लुढ़क कर 7.7 पर आ पहुचा था....हम लोग कभी आपस मे पढ़ाई की बात नही करते थे, इसलिए मुझे सुलभ के इस घटिया परर्फमेन्स का एग्ज़ॅक्ट रीज़न तो नही मालूम...लेकिन जहाँ तक मेरी समझ जाती है,उसके अनुसार...मेघा से दिन ब दिन बढ़ता हुआ सुलभ का प्यार इसका रीज़न हो सकता था....जो भी हो अपने ग्रूप मे तो मैं ही टॉपर था 
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मेरे प्लॅन्स मुझमे अच्छी-ख़ासी प्रोग्रेस कर रहे थे, जिससे मेरी इमेज कॉलेज मे बहुत हद तक सुधर गयी थी...और तो और एक ही सेमेस्टर मे मेरे द्वारा 12 सब्जेक्ट्स क्लियर करने वाले कारनामे को कॉलेज के बिगड़े लड़के इन्स्पिरेशन के तौर पर लेते है . मेरे चारो प्लॅन्स के साथ मेरी बहुत अच्छी पट रही थी लेकिन कुच्छ दिनो पहले जब मैं सेवेंत सेमेस्टर की छुट्टी के बाद घर गया था तो मैने एक दिन, रात के वक़्त सोचा कि मुझे 8थ सेमेस्टर के बाद क्या करना है....अपने फ्यूचर के इसी झमेले मे मैं उस रात लगभग कयि घंटे तक उलझता रहा....मेरे साथ गूगल महाराज भी थे, लेकिन तब भी मुझे इस उलझन से निकलने मे कयि घंटे लग गये...जिसके बाद मैने अपना एक लक्ष्य डिसाइड किया, जिसकी तैयारी मुझे 8थ सेमेस्टर के बाद करनी थी....इसलिए मैने तुरंत अपने सभी प्लॅन्स को अलविदा कहा और अपने पुराने जोश के साथ कॉलेज मे एंट्री मारी....
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वरुण और गौतम, ये दो ऐसे लौन्डे थे...जो मेरे अतीत मे अपनी एक घटिया सी छाप छोड़ कर जा चुके थे...जब मैं फिफ्थ सेमेस्टर मे था तब वरुण कॉलेज से गया और मेरे सेवेंत सेमेस्टर मे आते-आते तक गौतम ने भी अपनी डिग्री पूरी कर ली और कॉलेज से चलता बना....वरुण और गौतम दोनो लोकल लौन्डे थे इसलिए महीने-दो महीने मे अपनी गान्ड मरवाने और रोला झाड़ने कॉलेज टपक ही पड़ते थे....इन दोनो के कॉलेज से जाने के बाद मुझे बहुत ही बेनेफिट हुआ..क्यूंकी कॉलेज मे अब मेरे सामने सर उठाने वाला कोई नही बचा था,सिवाय कुच्छ हफ्ते पहले बने एक नये ग्रूप को छोड़ कर....कुल-मिलाकर कहा जाए तो अब पूरे कॉलेज पर मेरी बादशाहत थी और फोर्त एअर मे आते ही मैने सबसे पहले रॅगिंग को रोका...शुरू मे प्लान तो था कि पूरे कॉलेज मे सीनियर लड़को को डरा-धमका कर रॅगिंग बंद करवा दूं...लेकिन बाद मे ये बड़ी आफ़त साबित हुई...इसलिए फिर मैने सिर्फ़ अपने मेकॅनिकल ब्रांच मे रॅगिंग रुकवाई....मैने सेकेंड एअर से लेकर फोर्त एअर तक के क्लास मे जाकर सबको सख़्त वॉर्निंग दी थी कि कोई भी लड़का या लड़की फर्स्ट एअर के स्टूडेंट्स को नही पकड़ेगा....और ऐसा हुआ भी....
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वरुण और गौतम के जाने के बाद सिर्फ़ एक काँटा ऐसा था जो मुझे चुभता था और वो काँटा थी आर.दिव्या...मुझे हमेशा से ही दिव्या को देखकर जाने क्यूँ ऐसा लगता था कि वो साली भूत्नि मेरे खिलाफ ज़रूर कोई ना कोई षड्यंत्र रच रही है....लेकिन 8थ सेमेस्टर के आते-आते तक अब मैं र.दिव्या को ज़्यादा सीरीयस नही लेता था...क्यूंकी यदि सच मे दिव्या मेरे खिलाफ कुच्छ सोच रही होती तो अब तक कोई ना कोई कांड हो ही जाता, जो कि नही हुआ था....
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यूँ तो दिव्या कभी मेरे सामने कुच्छ नही बोलती थी लेकिन मुझे हमेशा से यही लगता कि वो एश को मेरे खिलाफ भड़का रही है...क्यूंकी पिछले एक साल मे मैं और एश फेरवेल और वेलकम पार्टी के दौरान कितनी ही बार आमने-सामने आए...लेकिन हर बार वो चंडालीं दिव्या उसके साथ रहती और उसके कान मे कुच्छ कहती...जिसके बाद एसा मुझे ऐसे इग्नोर मारती जैसे के रेलवे स्टेशन मे दो अंजान आदमी एक-दूसरे को इग्नोर मारते है....एसा और मेरे बीच मेरे द्वारा गौतम की ठुकाई से जो चुप्पी थी, वो अब तक बनी हुई थी...रीज़न वही था कि...ना तो वो शुरुआत करती और मैं शुरुआत करूँ, ये हो नही सकता.......
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एक और बड़ा चेंजस हमारे इस फाइनल सेमेस्टर के पहले हुआ, वो ये कि हमारे हॉस्टिल का वॉर्डन बदल गया...और जो नया वॉर्डन हमारे हॉस्टिल मे आया वो अपनी तरह की फ़ितरत का था...मतलब कि वो पुराने वाले वॉर्डन की तरह हर वक़्त रूल्स आंड रेग्युलेशन्स की बात ना करके रूम और विस्की की बात करता था....कुल मिलाकर हमारी लाइफ मे पिछले एक साल से कुच्छ खास नही हुआ था...हमारे फ्रेंड्स सर्कल मे सिर्फ़ सुलभ ही ऐसा था जिसने माल पटा ली थी बाकी बचे हम चारो (मैं,अरुण,सौरभ और पांडे जी )
की रियल लाइफ और फ़ेसबुक प्रोफाइल पर अब भी सिंगल रिलेशन्षिप छपा हुआ था.....
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विभा से मिलकर मैं कॅंटीन की तरफ बढ़ा और वहाँ पहुचते ही मैने अरुण,सौरभ को ढूँढा लेकिन दोनो वहाँ से लापता थे...इसलिए मैं कॅंटीन मे जाकर एक टेबल पर चुप-चाप बैठ गया और भूख से तिलमिलाते अपने पेट को शांत करने के लिए कॅंटीन वाले को ऑर्डर दे दिया....

कॉलेज मे जिस नये गॅंग की बात राजश्री पांडे कर रहा था, यदि वो इस वक़्त कॅंटीन मे मौजूद होते तो उनसे मुलाक़ात करने का ये मेरा पहला मौका होता....मैं उन लौन्डो से इसलिए भी मिलना चाहता था क्यूंकी उन्होने पिछले हफ्ते ही सिटी मे रहने वाले फर्स्ट एअर के एक लड़के को मारा था,जिसकी इन्फर्मेशन मुझे पांडे जी ने ही दी थी....

मैं जब तक अपना पेट भरता रहा तब तक कॅंटीन मे सब कुच्छ नॉर्मल ही रहा लेकिन जब मैं अपना बिल पे करने काउंटर पर गया तो तभी पूरी कॅंटीन मे कुच्छ लड़के तालिया बजा-बजा कर ज़ोर से हँसने लगे....अब ये तो फॅक्ट है कि जब कोई ऐसी बक्चोदो वाली हरकत करेगा तो सबकी नज़र उसी पर जाएगी...इसलिए उस वक़्त मेरे साथ-साथ कॅंटीन मे मौज़ूद सभी स्टूडेंट्स की आँखे उन्ही लड़को पर टिक गयी...जो एक लड़की पर हंस रहे थे....बाद मे मुझे पता चला कि उन लौन्डो ने अपना झूठा पानी उस लड़की के ग्लास मे डाल दिया था और फिर उसका मज़ाक उड़ा रहे थे....
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"आप लोग कुच्छ बोलते क्यूँ नही इन्हे..."काउंटर पर बैठे हुए शाकस की तरफ अपने बिल के पैसे सरकाते हुए मैने कहा...

"अब एक दो बार की बात हो तो, हम कुच्छ करे भी...लेकिन ये तो हर दिन का नाटक है...दो दिन पहले यही लड़के कॅंटीन मे काम करने वाले एक लड़के से लड़ पड़े थे और उसे दो-तीन हाथ भी जमा दिए..."

"प्रिन्सिपल के पास शिकायत क्यूँ नही की आपने..."

"अरे भाई...अपने को खाना-कमाना भी है...कौन पंगा ले इन लड़को से...गरम खून है ना जाने हमारा क्या नुकसान कर बैठे..." 

"बिल भरते है वो लड़के या फिर ऐसे ही फ्री फोकट मे खाते है..."

"उनके बाप का राज़ है क्या...जो मुफ़्त मे खाएँगे..."काउंटर के पास कॅंटीन मे ही काम करने वाला एक आदमी खड़ा होते हुए झल्लाया...."तुमको तो चार साल से देख रहे है...कुच्छ बोलते क्यूँ नही इन्हे..."

"दुनिया बड़ी ज़ालिम है मेरे भाई...फ्री मे कोई कुच्छ नही करता...मेरे बिल के पैसे वापस करो तो मैं अभी एक मिनिट मे इन्हे ठीक कर दूं...."

"अब क्या पेट पे लात मारोगे भाई...चलो एक काम करना,कल पैसे मत देना...."

"ओके बेबी...."मैने गॉगल्स अपने आँखो मे लगाया और वही काउंटर के पास खड़ा होकर सोचने लगा कि मुझे क्या करना चाहिए....
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इस दौरान वहाँ उनके पास एक और लड़का आया, जिसने पास के एक लड़के को ज़मीन मे गिराकर उसकी चेयर खींच ली और शान से बैठ गया....जो लड़का ज़मीन पर गिरा था, उसपर सब हंस रहे थे,सिवाय उस लड़की के, जिसके ग्लास मे उन लौन्डो ने झूठा पानी डाला था....

.वो लड़का जो ज़मीन पर गिरा था वो दूसरे पल ही शर्मिंदगी के कारण अपना सर झुकाए हुए खड़ा हुआ और आँखो मे आँसू लिए कॅंटीन से बाहर गया...

गॉगल लगाए हुए मैं धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ा और जिस लड़के ने अभी एक लड़के को नीचे गिराया था उसके सर पर पीछे से एक जोरदार चाँटा मारा और जब गुस्से से वो पीछे मुड़ा तो कॉलर पकड़ कर उसे मैने ज़मीन पर गिरा दिया....

"सॉरी दोस्तो....मुझे एक चेयर चाहिए थी,इसलिए ऐसा करना पड़ा...एनीवे माइसेल्फ अरमान........नाम तो सुना ही होगा

मैं उनके ही टेबल पर उन्ही मे से एक को नीचे ज़मीन पर गिरा कर बैठा...उस गिरे हुए लौन्डे को मिलाकर वो पाँच थे और अब कॅंटीन मे मौज़ूद सभी लोग उनकी बात पर हँसने की बजाय उनपर हंस रहे थे....जिस लड़के को मैने नीचे गिराया था वो गुस्से से उबलते हुए मेरे बगल मे ही खड़ा हो गया....बाकी बचे चार लौन्डे अपने क्रोध को दबाए हुए चुप-चाप बैठे थे....

मैने उनलोगो को मुझे अंदर ही अंदर गालियाँ देते हुए सोचा कि सालो को पेलकर सीधे वहाँ से भगा दूं लेकिन फिर ख़याल आया कि अपने ही कॉलेज के लौन्डे है इसलिए इस बार जाने देता हूँ...
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"तुम लोगो के ग्रूप मे सिर्फ़ पाँच ही है या कोई और भी पहलवान है..."पाँचो की तरफ देखते हुए मैने कहा"एक फाइनल एअर का है,एक थर्ड एअर का है...दो लौन्डे सेकेंड एअर के लग रहे है...और इस लुल्लू को पहली बार देख रहा हूँ...तू फर्स्ट एअर से है क्या बे..."

"ह...हां..."

"ये तेरे सामने प्लेट मे जो समोसा और चटनी रखा है वो झूठा है क्या..."

"नही..."पहले की तरह इस बार भी उस फर्स्ट एअर वाले ने एक वर्ड मे ही जवाब दिया....

"तो एक काम कर बेटा, चुप चाप निकल और फिर कभी कॅंटीन मे दिखा तो तुझे समोसा और चटनी बनाकर पूरे कॅंटीन मे बाटुंगा...अब चल भाग यहाँ से.."

मेरे कहने के बावजूद भी वो फर्स्ट एअर वाला लौंडा वही बैठा रहा और अपने गॅंग के बाकी मेंबर्ज़ की तरफ इस आस से देखने लगा कि उसके सीनियर्स मुझे कुच्छ जवाब देंगे.....

"कोई बात नही...आराम से बैठकर आपस मे सलाह मशवरा कर लो कि आगे क्या करना है...तब तक मैं समोसा ख़ाता हूँ...और एक दम रिलॅक्स होकर सोचना, क्यूंकी समोसा डकारने के बाद मैं रिलॅक्स नही होने दूँगा...."बोलते हुए मैने सामने टेबल पर रखी प्लेट उठाकर अपने सामने रख ली.....
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कॅंटीन मे एका एक जबर्जस्त शांति छा गयी और सबकी नज़र हमारी तरफ आ टिकी...जिसके कारण यदि वो लड़के चुप चाप उठकर वहाँ से जाते तो उनकी घोर बेज़्जती होती...इसलिए उन्होने भी अपना थोड़ा दम दिखाना शुरू कर दिया....उनमे से फाइनल एअर मे जो था उसने मुझसे कहा कि मैं बात को आगे ना बढ़ाऊ और चुप चाप वहाँ से चला जाउ.....
Reply
12-15-2018, 12:28 AM,
RE: Porn Hindi Kahani दिल दोस्ती और दारू
मैं इस दौरान कुच्छ नही बोला और नाश्ता करने के बाद अपना मुँह सॉफ किया और फर्स्ट एअर का एक लड़का जो उनमे मौज़ूद था उसे घुमा के एक हाथ मारा....

"चल बेटा अब निकल...अभी तू फर्स्ट एअर मे है और अभी से इतने तेवर...चुप चाप काट ले इधर से वरना अगली बार सीधे जाइरोसकोप सर पर दे मारूँगा...."

अपनी इज़्ज़त सबके सामने नीलाम करवाकर फर्स्ट एअर का वो लौंडा उठा और वहाँ से चलते बना....उसके बाद मैने अपना गॉगल उतारकर टेबल पर रख दिया और बोला...

"मैने उसे वॉर्न किया था लेकिन उसने सोचा कि तुम अखंड चूतिए उसकी कोई हेल्प कर सकोगे.खैर कोई बात नही,होता है ऐसा...वैसे किसी महान आदमी ने कहा है कि सुअरो से लड़ने की बजाय उन्हे सीधे मार देना चाहिए क्यूंकी यदि आप उनसे लड़ोगे तो इसमे उसे मज़ा भी आएगा और आप बदनाम भी होंगे.....लेकिन मैं थोड़ा और महान हूँ इसलिए तुम सुअरो को एक और मौका देता हूँ, चुप चाप यहाँ से निकल जाओ और कॉलेज मे शांति का वातावरण बनाए रखो वरना आज के बाद जिस दिन भी तुम मे से कोई अपनी औकात से बाहर आया तो उसी दिन तुम लोग कॉलेज से घर नही बल्कि हमारे वर्ल्ड फेमस खूनी ग्राउंड पर जाओगे....आगे तुम लोगो की मर्ज़ी, क्यूंकी अगले 5 मिनिट मे हॉस्टिल से 100 लौन्डे यहाँ आने वाले है...."
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इसके बाद उनमे से कोई कुच्छ नही बोला और अपने जबड़ो के बीच फ्रिक्षन लाते हुए वहाँ से चले गये....उन लोगो के जाने के बाद मैं वापस उसी टेबल पर बैठा और जिस लड़की के ग्लास मे उन लौन्डो से झूठा पानी डाला था उसे अपने पास बुलाया....

वो लड़की फर्स्ट एअर की ही थी और जब मैने उसे अपने पास बुलाया तो उसके अंदर डर और झिझक का अद्भुत कॉंबिनेशन था....दिखने मे तो वो कोई आवरेज लड़की थी, लेकिन उसके अंदर की डर और झिझक ने मुझे स्माइल करने पर मज़बूर कर दिया....
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"चल बैठ और अपना इंट्रो दे..."उस लड़की को बैठने का इशारा करते हुए मैने कहा...

"थ...थ...थॅंक्स, सर...."बैठने के बाद वो बोली...

"ये शाहरुख वाली स्टाइल मुझे चिढ़ाने के लिए कर रही है या शाहरुख की फॅन है..."

"वो...वो तो बस..बस थोड़ा...थोड़ा..."

"रहने दे एक साल निकल जाएगा तेरे बोलते-बोलते तक...अपना इंट्रो दे..."

"इंट्रो...ओके...सर,माइसेल्फ आराधना शर्मा, सोन ऑफ मिस्टर. कृष्णबिहारी शर्मा आइ आम फ्रॉम सागर,एम.प. आअन्न्णन्द...."
"आराधना शर्मा..."उसे बीच मे ही मैने रोका और कहा"दोबारा यदि कभी कोई परेशान करे तो इस उम्मीद मे मत रहना कि अरमान सर,तुम्हे वापस बचाने आएँगे...गुड लक और ये तो सिर्फ़ शुरुआत है..."
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मिस. आराधना शर्मा पर अपना रौब झाड़ कर मैं वहाँ से उठा और कॅंटीन से बाहर जाने लगा कि तभी मैने देखा कि एश और दिव्या एक टेबल पर अपनी कुच्छ फ्रेंड्स के साथ बैठी हुई है...इसलिए मैने अपने कॉलर उपर किए और कॅंटीन वाले को हाथ दिखाकर ज़रा तेज़ आवाज़ मे बोला...

"कोई और प्राब्लम, छोटू...यदि होगी तो मुझे मैल कर देना मैं देख लूँगा...."
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कॅंटीन से बाहर आते ही मेरी टक्कर कल्लू कंघी चोर से हुई...

"साला अपनी तो किस्मत ही खराब है...जहाँ बाकी लौन्डे लड़कियो से टकराते है,वहाँ मैं टकराया भी तो उस कल्लू से. अपनी तो किस्मत मे ही जैसे ग्रहण लगा हुआ है..."

मैने कल्लू को दो तीन गालियाँ बाकी और वहाँ से क्लास की तरफ बढ़ा....
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अब मुझे फुल आज़ादी मिल गयी थी और अपना नया वॉर्डन भी अपने ही किस्म का था, इसलिए हमारा रूम हर रात बियर बार बन जाता था,जहाँ से शराब और बियर की नादिया..,सिगरेट के धुए के साथ बहती थी....जिसमे पूरा हॉस्टिल डुबकी लगाता था...उस रात बियर और शराब की नदी मे डुबकी मारने के चक्कर मे मैं ये भूल बैठा कि मुझे रात को 11 बजे रेलवे स्टेशन विभा माँ से मिलने जाना है...इसकी सुध मुझे तब हुई जब रात को 12 बजे विभा मॅम ने मुझे खुद फोन किया....अब जब मैं दारू पीकर टन था तो मेरे मुँह से अन्ट-शन्ट निकलना तो ज़रूरी ही था...लेकिन फिर भी मैने विभा की कॉल रिसीव की....

"मैं जानती थी कि तुम नही आओगे..."

"आइ लव यू, जानेमन...तू कह दे तो अभिच तेरे वास्ते अपना प्राइवेट प्लेन लेकर आ जाउ...बोल, क्या बोलती है...आउ..."

"फक यू..."

"मेरा भी कुच्छ यही इरादा है...डबल फक यू...अब फोन रख, नेक्स्ट पेग लेने का टाइम हो रेला है...साली बबूचड़ कही की,"

उस कॉल के दौरान मेरे और विभा के बीच जो बात-चीत हुई,वो हमारी आख़िरी बात-चीत थी...उसके बाद विभा राजस्थान गयी और मैने जब भी उसका नंबर ट्राइ किया तो उसका नंबर हर बार स्विच्ड ऑफ ही आया...
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उसके दूसरे दिन सुबह-सुबह मुझे एक और कॉल आया, जिसने मेरी रातो की नींद नही,बल्कि दिन की नींद हराम कर दी....

"सुनो मिसटर...यदि इस नंबर पर दोबारा कॉल किया तो वन ज़ीरो ज़ीरो डाइयल करके तुम्हारे खिलाफ फ.आइ.आर. करवा दूँगी..."मेरे कॉल उठाते ही दूसरी तरफ से किसी लड़की ने मेरे सर पर डंडा मारा....

"एफ.आइ.आर., ये क्या लफडा है यार..."कान से मोबाइल हटाकर मैने अपने आँखो के सामने किया, नंबर न्यू था...

"देखिए कहीं आपको कोई ग़लतफहमी तो नही हो रही...क्यूंकी मैने तो किसी को कॉल नही किया..."

"मुझे क्या अँधा समझ रखा है...कल रात से लेकर अभी तक मे दसियों कॉल आ चुके है तुम्हारे नंबर से....और हर बार तुमने रूबिश लॅंग्वेज का इस्तेमाल किया है..."दूसरी तरफ वाली लड़की मुझपर और भड़कते हुए बरसी....

"एक मिनिट....मैं ज़रा चेक करके बताता हूँ..."बोलते हुए मैने अपने मोबाइल की कॉल हिस्टरी चेक की,जिसके अनुसार मेरे मोबाइल से लास्ट कॉल कल का था, जब मैने अपने घर पर बात की थी....मैने वापस मोबाइल को अपने कान मे लगाया और एक दम प्यार से बोला"देखिए, मेरे मोबाइल की कॉल हिस्टरी मे तो आपका नंबर नही है...ज़रूर आपको ग़लतफहमी हुई होगी..."

"अरे मैने कहा ना...कि इस नंबर से डूस कॉल कल रात मेरे नंबर पर आए थे...मैं तो एफ.आइ.आर. करवाने जा रही हूँ...."

"एक...एक मिनिट...रुकिये तो ज़रा..."एफ.ई.आर. का नाम सुनकर मेरी पूरी तरह फट पड़ी....
क्यूंकी ऐसा ही एक केस मेरे एक दोस्त के साथ हुआ था..हुआ कुच्छ ये था कि एक बार वो अपने किसी दोस्त का मोबाइल नंबर सेव कर रहा था तो ग़लती से अपने दोस्त के मोबाइल नंबर के कुच्छ डिजिट उससे ग़लत टाइप हो गये और फाइनली जो नंबर सेव हुआ वो उसके दोस्त का ना होकर किसी अननोन लड़की का था....अब बात यहाँ से शुरू हुई. मेरा वो दोस्त, अपने मोबाइल पर सेव्ड उस नंबर पर अडल्ट मेसेज भेजा करता था,ये सोचकर कि ये मेसेज उसके दोस्त के पास जा रहे है...वो भी दिन मे तक़रीबन 10-12 मेसेज..और फिर एक दिन उसे पोलीस स्टेशन से फोन आया,जिसमे उसे पोलीस वालो ने धमकी दी कि वो पोलीस स्टेशन मे आए वरना उसके खिलाफ एफ.आइ.आर. दर्ज कर दी जाएगी....अब मेरे उस दोस्त की चारो तरफ से फटी, जैसे अभी मेरी फटी पड़ी थी और मेरा वो दोस्त जहाँ रहता था,वहाँ से 200 कीलोमेटेर दूर, दूसरे शहर के उस पोलीस स्टेशन मे गया...जहाँ उसके खिलाफ कंप्लेन हुई थी. जब मेरा दोस्त वहाँ पहुचा तो पोलीस वालो ने उस लड़की को भी बुलाया, जिसके नंबर पर मेरे मासूम से दोस्त ने अडल्ट मेसेज भेजे थे....और फिर बाद मे ये खुलासा हुआ कि मेरे दोस्त ने नंबर सेव करते वक़्त कुच्छ डिजिट को टाइप करने मे ग़लती कर दी थी....उसने ये बात पोलीस को बताई लेकिन पोलीस नही मानी और मेरे उस दोस्त को खम्खा 10,000 का जुर्माना भरना पड़ा....
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और अब यही डर मुझे भी सता रहा था कि कही यही सब मेरे साथ ना हो जाए,वरना खम्खा मुझे भी फाइन भरनी पड़ेगी..लेकिन जब मैने कॉल किया ही नही किसी को तो फिर ये लौंडिया मुझपर क्यूँ भड़क रही है....कही कल दारू के नशे मे अरुण लोगो ने तो ये बक्लोलि नही की और फिर मुझे पता ना चले इसलिए नंबर मिटा दिया होगा.....या फिर ये लौंडिया मुझे चोदु तो नही बना रही...
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"हेलो...तो मैं क्या करूँ..."वो लड़की फिर मुझपर चीखी...

"दो मिनिट आप,होल्ड कर सकती है क्या...मैं अपने दोस्त से पुच्छ लेता हूँ कि कहीं उसने तो कॉल नही किया...प्लीज़..."

"ओके...ओके, "

"थॅंक्स..."

बोलकर मैने कस्टमर केयर को कॉल किया और अपने लास्ट थ्री कॉल्स की डीटेल्स माँगी और जो बात मेरे सामने आई, वो ये कि मेरे नंबर से लास्ट कॉल कल का था...यानी ये लौंडिया जो बहुत देर से एफ.आइ.आर. -एफ.आइ.आर. कर रही थी...उसने या तो ग़लती से मेरा नंबर डाइयल कर दिया था,या फिर मेरे मज़े ले रही थी...इसकी माँ का 
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"ओह, हेलो...जानेमन..."

"ये क्या बदसलूकी है..."

"देखो बेब्स....आवाज़ नीचे करके बात कर,वरना मैं तेरे खिलाफ एफ.आइ.आर. दर्ज करवा दूँगा कि तू सुबह-सुबह एक रहीस, शरीफ और भावी इंजिनियर को कॉल करके धमका रही है...."

"ये तो उल्टी ही बात हुई की...पहले खुद रात भर कॉल करके रूबिश लॅंग्वेज मे बात करो और फिर सुबह उल्टा धमकिया दो..."

"मैने तुझे कॉल किया ? अबे मैं अपने बाप को कॉल नही करता तो फिर तुझे क्या खामखा कॉल करूँगा...चल फोन रख दे,वरना ऐसे बजाउन्गा कि ज़िंदगी भर बजती रहेगी...."अपना गला फाड़ते हुए मैने कॉल डिसकनेक्ट किया और मोबाइल दूर पटक दिया....
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"क्या हुआ, अरमान भाई....ये सुबह-सुबह किसे बजा रहे हो..."मेरे कानो मे राजश्री पांडे की आवाज़ पड़ी....

मैने रूम मे चारो तरफ देखा, लेकिन पांडे जी कहीं दिखाई नही दिए, 

"ये कही मेरे कान तो नही बज रहे...मुझे अभी ऐसा लगा कि राजश्री ने मुझसे बात की..."

"अरे इत्थे देखो,अरमान भाई...इत्थे..."

"लवडा फिर मेरा कान बजा...."

"अरे कान नही बज रहा, मैं बिस्तर के नीचे पड़ा हूँ..."पांडे जी ने एक बार फिर मुझे आवाज़ लगाई...

"तू साले, पांडे...यहाँ मेरे बेड के नीचे क्या कर रहा है...निकल बाहर, बोसे ड्के...."

बोलने के साथ ही मैने पांडे जी का पैर पकड़ा और घसीट कर बिस्तर के नीचे से बाहर किया...

मेरा पूरा रूम बिखरा पड़ा था, मेरे रूम की हालत ऐसे थी, जैसे कल रात यहाँ चोरी हो गयी हो...और तो और इस वक़्त अरुण, सौरभ का भी कहीं अता-पता नही था....

राजश्री पांडे को बेड के नीचे से घसीट कर बाहर निकालने के बाद मैं वही उसके पास बैठ गया और उससे अरुण और सौरभ के बारे मे पुछा....
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"जब आप सो गये थे तब वो दोनो माल चोदने गये थे...लगता है वापस नही आए...और सूनाओ क्या हाल है..."

"एक दम घटिया हाल है और ये बता ये रूबिश लॅंग्वेज का मतलब क्या होता है..."

"अगर इतना ही पता होता तो मैं आज यहाँ नही बल्कि एमआइटी या ऑक्स्फर्ड यूनिवर्सिटी मे होता...आप भी ना अरमान भाई,कमाल करते हो..."

"चल ठीक है और यहाँ से जाने के पहले पूरा रूम सॉफ करके जाना वरना बहुत चोदुन्गा..."
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वहाँ से उठकर मैं नहाने पहुचा और नाल खोलकर अपना सर ठंडे पानी के नीचे किया, जिसके कारण मेरा सर कुच्छ हल्का हुआ....

"ये लौंडी कौन थी,इसकी माँ का...साली ने तो एक पल के लिए डरा ही दिया था....यदि मेरे कॉलेज की होती तो चूत फड़कर पूरा कॉलेज उसके अंदर घुसा देता...साली म्सी बीकेएल"

दारू का असर कॉलेज जाते वक़्त भी था...कॉलेज जाते वक़्त मेरा थोबड़ा ऐसे मुरझाया हुआ था जैसे अभी कुच्छ देर पहले किसी ने मुझे पकड़ कर दो चार हाथ जमा दिए हो...

"आज से दारू बंद..."एक सौ एक्किसवि बार झूठ बोलते हुए मैने खुद से कहा और क्लास के अंदर घुसा...

अब जब दिन की शुरुआत ही इतनी कन्फ्यूषन भरी रही हो तो बाकी का दिन कैसे अच्छा जाने वाला था...उपर से हमारे मेकॅनिकल डिपार्टमेंट की लड़कियो की शकल देखकर तो नोबेल पुरस्कार जीतने वाले बंदे का भी खुशी से झूम उठा हुआ मूड खराब हो जाए...साली एक तो अखंड काली उपर से किसी खून पीने वाले जानवर की तरह दाँत और जब वो मुझे देखकर मुस्कुराती थी तो दिल करता कि अपना सर अपनी डेस्क पर दे पटकु कि क्यूँ मैने उसकी तरफ देखा..क्यूँ 
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शुरू के दो पीरियड मैने शांत गुज़रे और तीसरे पीरियड मे मेरे दोस्तो की एंट्री होने के बाद मैं कुच्छ रिलॅक्स हुआ....
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"क्यूँ बे अरुण, मुझे राजश्री पांडे ने बताया कि तुम लोग कल रात रंडी चोदने गये थे, साले कुत्तो..."चलती हुई क्लास के बीच मे मैने खीस-पिश की....

"तो इसमे क्या बुरा किया...लेकिन साली कोई चोदने को मिली नही..."

"क्यूँ...सब सुधर गयी क्या.."

"सुधरी नही...म्सी, सब दिन भर चूत मरवा-मरवा के थक कर सो गयी थी और जब रात के 1 बजे हम दोनो ने उनका दरवाजा खटखटाया तो सालियो ने माँ-बहन की गालियाँ देते हुए हमे वहाँ से भगा दिया..."

"इसीलिए....इसीलिए मैं रंडी चोदने नही जाता हूँ...सालो कुच्छ तो लेवेल रखो अपना..."

"काहे का लेवेल बे....सीधे-सीधे बोल ना कि तेरा लंड खड़ा नही होता है..."

"नो बेब्स...ऐसा नही है, मेरा लंड जब खड़ा होता है तो जितना बड़ा तू है,उतना बड़ा होता है...लेकिन वो क्या है ना कि ' आइ डॉन'ट लाइक दट चूत विच कनेक्ट वित माइ लंड ड्यू टू मनी'...."

"रहने दे...सब मालूम है मुझे, तभी दीपिका रंडी ने अच्छे से चूसाया था थर्ड सेमेस्टर मे...मुँह मत खुलवा मेरा,वरना..."
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"तुम दोनो खुद बाहर जाओगे या मैं धक्के मार कर बाहर निकालु..."हमारे पवर प्लांट इंजीनियरिंग. सब्जेक्ट के प्रोफेसर ने हमे देख कर बड़े ही शालीनता से कहा...जैसे वो हमे बाहर जाने के लिए नही बल्कि किसी बात पर हमे शाबाशी दे रहे हो.....खैर हम दोनो वहाँ से बाहर आए और 5थ, 6थ और 7थ सेमेस्टर के बाद ये पहला मौका था,जब मुझे क्लास से निकाल दिया गया था.....
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प्रोफेसर ने हम दोनो को क्लास से बाहर निकाल फेका और साथ मे ये भी कहा कि हम दोनो यही क्लास के बाहर ही खड़े रहे...फिर क्या था,हम दोनो पूरी पीरियड भर क्लास के सामने खड़े रहे...इस बीच जो भी वहाँ से गुज़रता उससे हम दोनो हाई..हेलो कहते और उसके पुछने पर कि हम दोनो यहाँ बाहर क्यूँ खड़े है,क्लास के अंदर क्यूँ नही जाते तो हमारा जवाब होता कि हम दोनो क्लास आने मे लेट हो गये थे, इसलिए नेक्स्ट क्लास से अंदर जाएँगे...
Reply
12-15-2018, 12:29 AM,
RE: Porn Hindi Kahani दिल दोस्ती और दारू
क्लास ख़तम होने के बाद वो प्रोफेसर बाहर निकला और हम दोनो से बोला कि रिसेस मे पूरी क्लास को लेकर ऑडिटोरियम मे हम लोग आ जाए, प्रिन्सिपल सर को कुच्छ कहना है.....

"क्या कहना है सर, प्रिन्सिपल सर को..."अरुण ने प्रोफेसर से पुछा...

"जितना बोला हूँ उतना करो...ज़्यादा चपड-चपड ज़ुबान मत चलाओ,वरना जीभ काट लूँगा...टाइम से पहुच जाना..."

"तेरी *** की चूत, तेरी *** का भोसड़ा...तेरी *** का लंड..."साइलेंट मोड मे अपनी आदत अनुसार अरुण ने अपना मुँह चलाया और क्लास के अंदर दाखिल हुआ.....
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रिसेस के वक़्त जैसा कि पवर प्लांट वाले सर ने कहा था उसका पालन करते हुए हम सब ऑडिटोरियम पहुँचे और जैसे ही ऑडिटोरियम मे पहुँचे तो...वहाँ कॉलेज के सभी ब्रांच के फाइनल एअर वाले स्टूडेंट्स मौज़ूद थे....बोले तो फुल महॉल. 

"ब्रांच वाइज़ बैठने की कोई ज़रूरत नही है...सब लोग जहाँ चाहे,वहाँ बैठ सकते है...."स्टेज पर खड़ा हुआ एक आदमी बोला...

"चल बे अरुण, दूसरी साइड चलते है,वहाँ सीएस की लड़किया बैठी हुई है...उन्ही के पीछे बैठेंगे...."

सीएस की लौंडिया का नाम लेना तो सिर्फ़ मेरे लिए एक बहाना था, मेरा मूड तो एश के ठीक पीछे वाली सीट मे बैठने का था...ताकि हम दोनो के बीच की केमिस्ट्री मे कम से कम कोई रिक्षन तो हो....

एश के लिए मेरे धड़कते दिल मे हमेशा वही अहसास,वही खुमार बना रहा, जो उसे पहली बार देखने से शुरू हुआ था...और हर दिन वो बढ़ता ही जा रहा था. जी तो करता की अपना दिल चीर कर उसे दिखा दूँ और उसे अपने प्यार का नज़राना पेश करू,लेकिन फिर सोचा की ज़्यादा शान-पट्टी नही झाड़ना चाहिए...वरना यदि अपना दिल चीर-फाड़ भी दिया तो क्या फ़ायदा...मरना तो मुझे ही होगा, इसलिए फिलहाल मैने ये दिल की चीरा-फाडी करने का प्रोग्राम कॅन्सल कर दिया .....

लड़कियो से कनेक्षन के मामले मे मैं एसा के सिवा अब तक र.दीपिका, विभा और आंजेलीना डार्लिंग के ही संपर्क मे रहा था....लेकिन जैसा उत्साह मेरे दिल मे एश को देखकर आता था, वैसा उत्साह बाकी की तीनो हसीनाओ को देखकर नही आता था....जिसका कारण था कि बाकी तीनो लड़किया बहुत चालू थी लेकिन एश भोली-भाली प्यारी सी,सुंदर सी, परी जैसे दिखने वाली एक बिना दिमाग़ की लड़की थी....जिसे कोई भी, कभी भी बेवकूफ़ बना सकता था...वो तो शुक्र हो एश के बाप का जिसके रौब के कारण पूरे कॉलेज मे किसी लड़के के अंदर हिम्मत नही हुई कि वो कभी एश से जाकर बदतमीज़ी करे.....वरना कॉलेज तो वो 10 दिन मे ही छोड़ कर भाग जाती...
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मैं और मेरी मंडली ने एश और उसके फ्रेंड्स के ठीक पीछे वाली रो पर अपना तशरीफ़ रखा और फिर हमारे हेरलेस प्रिन्सिपल सर ने अंदर एंट्री मारी....

"मुझे बहुत खुशी हुई कि आप सब यहाँ आए...उसके लिए सभी को धन्यवाद...."

"कोई बात नही सर...ये आप पर एहसान रहा..."प्रिन्सिपल के भाषण का एक्स-रे करते हुए अरुण ऐसे ही कुच्छ भी बके जा रहा था.(और इस एक्स-रे का रिज़ल्ट नीचे रेड कलर मे शो होगा)

"आप सब यही सोच रहे होंगे कि मैने आपको यहाँ क्यूँ बुलाया,दरअसल बात ये है कि इस वर्ष हमारे कॉलेज के पचास वर्ष पूरे होने के उपलक्ष मे समिति ने स्वर्ण जयंती मनाने का फ़ैसला किया है.."

"ये सला बूढऊ, स्वर्ण जयंती मे सोने के सिक्के बाँटेगा क्या बे अरमान..."

अरुण को इस वक़्त मैने फुल्ली इग्नोर मारा क्यूंकी क्या पता प्रिन्सिपल सर सबके सामने खड़ा करके इन्सल्ट कर दे...इसलिए मैं बड़े ध्यान से उनकी बातें सुनने मे लगा हुआ था.....

"मेरे ख़याल से स्वर्ण जयंती शब्द से यहाँ सभी परिचित ही होंगे कि यह स्वर्ण जयंती समारोह किसी विद्यालय या महाविद्यालय या फिर किसी विश्वविद्यालय मे क्यूँ आयोजित किया जाता है....खैर ये सब तो हम सबके लिए पहली खुशी का विषय है कि लेकिन दूसरी खुशी का विषय जो है वो ये कि स्वर्ण जयंती समारोह का उद्घातटन और कोई नही बल्कि इस राज्य के मुख्यमंत्री महोदय करेंगे और वही हमारे स्वर्ण जयंती समारोह के मुख्य अतिथि भी रहेंगे...."

"ये एमसी टकला संस्कृत मे बात कर रहा है क्या बे, बीसी..."

"अभी कुच्छ देर पहले ही हमारी मुख्यमंत्री महोदय से बात हुई थी और तीसरी खुशख़बरी जो मैं आपको देने वाला हूँ वो ये है कि अगले वर्ष से हमारा ये इंजिनियरिंग कॉलेज, अटॉनमस बनने जा रहा है...."
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'अटॉनमस' वर्ड सुनते ही वहाँ ऑडिटोरियम मे बैठे सभी लौन्डो ने जोरदार तालिया बजानी शुरू कर दी और इधर ये वर्ड मैं पहली बार सुन रहा था, इसलिए मुझे कुच्छ पता ही नही चला कि आख़िर लौन्डे इतनी तालिया क्यूँ बजा रहे है...लेकिन जब सब बजा ही रहे थे, तो हमने भी बजा दी ताकि किसी को शक़ ना हो कि हमे कुच्छ समझ नही आया है मैने अरुण की तरफ देखा और अरुण ने सौरभ की तरफ देखा...इस आस मे कि हम तीनो मे से किसी एक को तो उस 'अटॉनमस' बॉम्ब का मतलब मालूम ही होगा...

"तुम तीनो ठहरे बक्चोद लेकिन अभी चुप रहो, बाहर सब कुच्छ समझा दूँगा..."सुलभ ने अपना सीना थोड़ा चौड़ा करके कहा....
"रहण दे...कोई ज़रूरत नही है, मेरे पास गूगल महाराज है, मैं अभी चेक कर लेता हूँ..."

इधर एक तरफ मैं गूगल बाबा की छत्र-छाया मे पहुचा तो वही दूसरी तरफ प्रिन्सिपल सर ने अपना प्रवचन चालू रखा......

"तो मैने आप सबको यहाँ इसलिए बुलाया है क्यूंकी स्वर्ण जयंती के उपलक्ष्य मे हम एक बहुत बड़ा कार्यक्रम रखेंगे, जिसकी जानकारी आप सभी को छत्रपाल जी देंगे....यहाँ आने के लिए सबका बहुत-बहुत धन्यवाद...आप सभी का दिन मंगलमय हो..."
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मंगलमय का आशीर्वाद देने के बाद हमारे प्रिन्सिपल सर वहाँ से हटे तो छत्रपाल सर ने माइक का टेटुआ पकड़ लिया...प्रिन्सिपल सर के ऑडिटोरियम से जाने के बाद सभी स्टूडेंट्स रिलॅक्स हुए, वरना अभी तक अपनी कमर ऐसे सीधी किए हुए थे, जैसे पीछे कोई हंटर लेकर खड़ा हो और उसने वॉर्निंग दे के रखी हो कि यदि ज़रा सा भी पीछे टिके तो रगड़ के रख दूँगा...खैर ये सब तो चलता रहता है.
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एश, दिव्या और उसके पास बैठी हुई बाकी लौन्डियो को ये पता चल गया था कि इस कॉलेज का सबसे स्मार्ट बंदा उनके पीछे बैठा हुआ है और जब से उन्हे ये बात मालूम पड़ी उनमे से कोई ना कोई बीच-बीच मे पीछे पलट कर ये कन्फर्म करती कि, मैं सच मे वहाँ बैठा हूँ या मेरा कोई प्रतिबिंब वहाँ है, मेरी आगे रो वाली लगभग सभी लड़कियो ने पीछे पलट कर हमे देखा और उस वक़्त हम सबको ऐसे अहसास हुआ जैसे इस दुनिया के सबसे खूबसूरत बंदे हमी लोग है लेकिन उनका बार-बार यूँ पीछे मुड़कर हमे देखना, हमारे गाल पर तमाचे की तरह तब लगा...जब प्रिन्सिपल सर के जाने के बाद आगे वाली रो की सभी लड़किया वहाँ से उठकर पीछे चली गयी.....

"इनका माँ का..."अरुण आगे कुच्छ बोलता उससे पहले ही मैने उसका मुँह बंद कर दिया....

कुच्छ देर बाद वहाँ और भी कयि टीचर्स आ गये,जिसमे हमारे कॉलेज की बॅस्केटबॉल टीम का कोच भी था....जब सब आ गये तो छत्रपाल सर, ने बोलना शुरू किया....
छत्रपाल सर हमारे कॉलेज के सबसे चहेते टीचर्स मे से एक थे, मतलब कि वो ऐसे टीचर थे,जिनकी लौन्डे थोड़ी बहुत इज़्ज़त करते थे.....छत्रपाल जी ने हमे बताया की गोलडेन जुबिली के इस सुनहरे मौके पर कुल 7 दिन का फंक्षन होगा...जिसमे प्रॉजेक्ट्स, मॉडेल्स, सिंगिंग,डॅन्सिंग,स्पोर्ट्स एट्सेटरा. कॉंटेस्ट आयोजित किए जाएँगे और जिस स्टूडेंट को जिस फील्ड मे इंटेरेस्ट हो,वो उस फील्ड से रिलेटेड टीचर के पास जाए और तैयारी शुरू कर दे....इस बीच एक सवाल मेरे अंदर उठा वो ये कि अभी तक ऐसी कोई बात नही हुई थी,जिसमे कॉलेज के सिर्फ़ फाइनल एअर के स्टूडेंट्स को ही बुलाया जाए...लेकिन छत्रपाल सिंग ने मेरा डाउट कुच्छ देर मे ही दूर कर दिया....और जो बात हमे पता चली वो ये कि हम फाइनल एअर वालो को ऑडिटोरियम मे इसलिए बुलाया गया था ताकि हम गोलडेन जुबिली फंक्षन को सही ढंग से चलाए,बोले तो सारी ज़िम्मेदारी हम पर ही थी....जैसे कि कॉलेज के जूनियर्स के क्लास मे जाना और उनसे पुछ्ना कि क्या वो गोलडेन जुबिली फंक्षन मे पार्टिसिपेट करेंगे....

"मैं तो बिल्कुल भी ये चूतियापा नही करने वाला...साला नौकर समझ रखा है क्या..."अरुण फिर भड़क उठा...

"चिंता मत कर हम लोग ये सब नही करेंगे बोले तो हम लोग किसी चीज़ मे पार्टिसिपेट ही नही करेंगे...दे ताली"
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अब जब मैने और मेरे दोस्तो ने ये डिसाइड कर लिया कि हम लोग इस पूरे चका-चौंध से दूर रहेंगे तो तभी बॅस्केटबॉल का कोच सामने आया और उसने कहा कि जिस-जिस को भी बॅस्केटबॉल खेलना आता है,वो यहाँ आ जाए....और ये सुनते ही मेरे अंदर घंटी बजी...लेकिन मैं फिर भी नही उठा...

"अरमान जा बे, इंप्रेशन जमाने का सॉलिड मौका है..."अरुण ने मुझे कोहनी मारते हुए कहा...

"अबे कहा यार, अब तो बॅस्केटबॉल पकड़ना भी भूल गया हूँ....खम्खा फील्ड मे बेज़्जती हो जाएगी..."

"अबे,यदि शेर शिकार करना छोड़ दे तो इसका मतलब ये नही होता कि वो शिकार करना भूल गया है...इसलिए जा मेरे शेर जा....और अब तो गौतम भी नही है..."

"नो बेब्स...अब मेरे बस की नही रही..और वैसे भी बॅस्केटबॉल का खेल कोई चुदाई करने का खेल नही है,जहाँ तीन साल बाद भी चूत से दूर रहने के बाद जब अपना लंड चूत मे डालोगे तो परर्फमेन्स वही रहेगी.... "
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धीरे-धीरे जिन्हे गोलडेन जुबिली के फंक्षन मे पार्टिसिपेट करना था, वो सब अपने-अपने ग्रूप मे बँट गये....लेकिन हम चारो मे से अभी तक कोई नही उठा था और फिर छत्रपाल सिंग ने आंकरिंग के लिए इंट्रेस्टेड स्टूडेंट्स को स्टेज पर बुलाया....

"वो देख तेरे सपनो की रानी, आंकरिंग के लिए जा रही है..."एश को स्टेज की तरफ जाते देख सौरभ ने मेरी चुटकी ली...
और एक बार फिर मेरे अंदर घंटी बजी और इस बार वो घंटी रुकने के बजाय लगातार बजती ही रही....और मेरे दिल मे ख़याल आया कि मैं जाउ या नही.....
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"अरुण, मैं आंकरिंग करने जाउ क्या....एश भी जा रेली है..."

"तू और आंकरिंग... अबे बक्चोद, वहाँ स्टेज पर जाकर गालियाँ नही देनी है...तू रहने दे कक्के..."

"ऐसा क्या फिर तो पक्का मैं जाउन्गा...."बोलते हुए मैं अपनी जगह पर खड़ा हुआ लेकिन अरुण ने मुझे वापस बैठा दिया....

"चुदेगा बेटा...बैठ जा चुप चाप..."

"एक असली मर्द की पहचान उसकी बातो से नही बल्कि उसके कारनामो से होती है और मैं ये कारनामा करके के ही रहूँगा....छोड़ मुझे..."

"मुझे मालूम है कि तू अपनी उस आइटम को देखकर जा रहा है,लेकिन कुच्छ देर बाद जब तेरा जोश ठंडा होगा ना तब सबके सामने कुच्छ बोलने मे तेरी फटेगी...."

"एश मिल जाए तो मैं अपनी इंजिनियरिंग छोड़ दूं,फिर ये आंकरिंग क्या चीज़ है..."

आंकरिंग वाले मसले पर अरुण को मुझसे आर्ग्युमेंट करते देख सौरभ ने अरुण को चुप कराया और मुझसे बोला"जाइए, यहाँ बैठे क्यूँ हो...अपना शौक पूरा करो..."

"य्स्स...तू ही मेरा सच्चा दोस्त है, आइ लव यू..."

मैं अपनी जगह से उठा और स्लोली-स्लोली चारो तरफ का महॉल देखते हुए चलने लगा....मेरे स्टेज पर पहुचते तक वहाँ छत्रपाल सिंग के साथ एश को छोड़ कर दो लोग और थे, जिनमे से एक लड़की थी और एक लड़का.....

मैं जब छत्रपाल सिंग के सामने जाकर खड़ा हुआ तो उन्होने मुझसे पुछा" क्या बात है अरमान..."

"मैं सोच रहा था कि मैं आंकरिंग अच्छा कर सकता हूँ...."

"क्या..."मेरे मुँह से आंकरिंग करने की बात सुनकर छत्रपाल जैसे बेहोश होकर गिरने ही वाला था, लेकिन फिर बाद मे उन्होने खुद को संभाल लिया....जो हाल इस वक़्त छत्रपाल सर का था, वैसा ही कुच्छ हाल वहाँ मौज़ूद उन स्टूडेंट्स का भी था,जिन्होने मेरे आंकरिंग करने की बात सुनी थी....
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"आर यू श्योर !, क्यूंकी मुझे नही लगता कि तुम कर पाओगे...."

"यहाँ आते वक़्त तो श्योर ही था और अब भी श्योर ही हूँ...इसलिए जल्दी से प्रॅक्टीस शुरू करते है..."

"एक मिनिट, ज़रा रुकिये तो....पहले टेस्ट तो कर ले कि तुमसे कुच्छ बोला भी जाता है या ऐसे ही यहाँ स्टेज पर आ गये...."मेरे हाथ मे माइक पकड़ते हुए सिंग सर ने ऑडिटोरियम मे बैठे सभी स्टूडेंट्स को सामने देखने के लिए कहा और फिर मुझे देखकर बोले"एक-दो लाइन ज़रा बोलकर दिखाना तो..."

"बोलना क्या है...ये तो बताओ पहले..."दिल की तेज़ होती हुई धड़कनो को नॉर्मल करते हुए मैने पुछा....

"कुच्छ भी बोल दो, चाहे तो अपना इंट्रोडक्षन ही दे दो, सबको...."

"ठीक है...फिर..."मैने माइक पर अपना एक हाथ मज़बूत किया और सिंग सर के पास से दो कदम आगे आकर अपना दूसरा हाथ उठाते हुए बोला"आर यू थिंकिंग अबाउट मी..."

इतना बोलकर मैं चुप हो गया और 'यस' के जवाब का इंतज़ार करता रहा,लेकिन ऑडिटोरियम मे बैठे हुए लोगो मे से किसी एक ने भी जवाब नही दिया....

"सर, इन लोगो को इंग्लीश नही आती..."सिंग सर की तरफ पलटकर मैने मज़े लेते हुए कहा...जिसके बात पूरा ऑडिटोरियम हँसने लगा...और मैं खुद से पुछने लगा कि 'मैने अभी कोई जोक मारा क्या ?'

"आर यू थिंकिंग अबाउट मी...."

"यस...."अबकी बार पूरा ऑडिटोरियम गूंजा...

"इफ़ यू आर थिंकिंग अबाउट मी देन इट'स एनफ टू शो माइ पॉप्युलॅरिटी...लव यू ऑल..."बोलने के बाद मैने सिंग सर को माइक थमाया और उनसे पुछा"कैसा लगा सर..."

"कल सुबह 10 बजे यही पर आ जाना...."

"पहुच जाउन्गा सर..."
.
स्टेज से अपने दोस्तो की तरफ आते हुए मैने अपना कॉलर खड़ा किया और अरुण के कंधे पर अपनी कोहनी रख कर बोला"अब बोल, क्या बोलता है..."

"दिव्या की जल कर राख हो गयी थी, साली तुझे देखकर ऐसे मुँह बना रही थी जैसे दुनिया भर का गोबर उसके मुँह मे पेल दिया गया हो...साली छिनार"

"दिव्या... दिव्या से याद आया, सुलभ तू अपना मोबाइल दे तो एक मिनट. "

मैने सुलभ से मोबाइल लिया और आज सुबह जिस नंबर. से मुझे कॉल आया था, उसे डाइयल करने लगा...क्यूंकी मैं चेक करना चाहता था कि कही वो कॉल दिव्या का तो नही था...और अपने मोबाइल से कॉल ना करके सुलभ के मोबाइल से कॉल करने का भी एक लॉजिक था क्यूंकी यदि वो कॉल दिव्या की ही करामात थी तो उसके पास ज़रूर मेरा नंबर. होगा और वो इस वक़्त कॉल नही उठाएगी और अरुण का नंबर. तो उसके पास थर्ड सेमिस्टर. से ही है इसलिए मैने सुलभ का मोबाइल माँग कर उस नंबर. पर कॉल किया....

कॉल करते वक़्त मैं अपनी जगह पर खड़ा हुआ और पीछे की तरफ बैठी हुई दिव्या को देखने लगा....घंटी जाती रही लेकिन ना तो ऑडिटोरियम मे कोई रिंगटोन सुनाई नही दी और ना ही किसी ने कॉल रिसीव किया...

"कॉलेज मे तो सबका मोबाइल तो साइलेंट मे रहता है...ऐसे तो पता नही चलने वाला...लेकिन कोई बात नही नेक्स्ट टाइम देख लूँगा इसे...."

"क्या हुआ बे ये खड़ा होकर पीछे क्या देख रहा है,वो देख सामने माल है..."मुझे सामने स्टेज की तरफ मोडते हुए अरुण बोला...

लेकिन मेरा ध्यान अभी सामने वाली उस लड़की पर ना होकर पूरी तरह दिव्या पर था....मैने एक बार और वो नंबर, सुलभ के मोबाइल से ट्राइ किया....लेकिन इस बार भी सिर्फ़ रिंग जाती रही...लेकिन किसी ने कॉल रिसीव नही किया...
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कोई कॉल रिसीव नही कर रहा था जिससे मुझे और भी शक़ होने लगा था कि सवेरे-सवेरे मुझे कॉल करने वाली लड़की ज़रूर यहाँ मौज़ूद है....इसलिए मैने तीसरी बार ट्राइ किया और पीछे मुड़कर दिव्या पर अपनी आँखे गढ़ाए रखा...

"अबे तू ये बार-बार चूतियो की तरह किसे फोन कर रहा है...वो सामने वाली माल देख..."

"चुप रहेगा दो मिनिट...कुच्छ काम कर रहा हूँ ना..."अरुण पर झल्लाते हुए मैं बरस पड़ा...इस बीच रिंग बराबर जा रही थी.....

"तू कही एश को तो फोन नही कर रहा,....वो देख उसके मोबाइल का स्क्रीन हर थोड़ी देर बाद लॅप-लप्प, लॅप-लप्प हो रहा है...."
" क्या बोला बे..."

"सामने देख तो...."

"एक सेकेंड...."मैने कॉल डिसकनेक्ट करके फिर से उस अननोन नंबर पर घंटी मारी और एश के स्क्रीन की लाइट मेरे मोबाइल से जाते हुए रिंग के साथ, लॅप-लप्प होना शुरू हो गयी....इसके बाद मैने बॅक टू बॅक 2-3 कॉल किए और जो नतीज़ा मेरे सामने आया उसे देखकर मैं चक्कर भी खा गया और बहुत खुश भी हुआ...

मैं चक्कर क्यूँ खा गया, ये तो सभी जानते है और मैं बहुत खुश क्यूँ हुआ, मेरे ख़याल से ये भी बताने की ज़रूरत नही है

,लेकिन जैसा कि लड़कियो पर मेरा भरोशा नाम-मात्र का भी नही था, इसलिए मेरे शक़ की उंगली सबसे पहले दिव्या की तरफ गयी.....

"ज़रूर ये उस बबूचड़ र.दिव्या की करामात होगी...वरना मेरी एशू जानेमन ऐसा कैसे करेगी..., दिव्या...साली, डायन...लेकिन यदि ये काम दिव्या का ना हुआ तो....फिर ? "

"बेटा, ज़रूर कुच्छ लफडा होने वाला है...मैं तो शुरू से ही कहता था कि ये लड़की कुच्छ ठीक नही...पहले तो तूने मेरी बात नही मानी, अब भुगत..."

"तू ये बोल तो ऐसे रहा है, जैसे तू बड़ा समझता है लड़कियो को...तभी दिव्या ने गान्ड दिखा दी..."

"अरे हो जाता है कभी-कभी...इट'स ओके बेबी....और वैसे भी मैने कम से कम दिव्या का दूध तो दबाया तूने क्या दबाया...."

"मैने....मैने...."सोचते हुए मैने कहा"मैं ऐसा -वैसा लड़का नही हूँ..."

"मेरा लंड है तू...अब भी मान जा, वरना तू एक दिन ऐसा ठुकेगा, ऐसा ठुकेगा कि फिर दोबारा कभी थूकने के लायक नही रहेगा...."

"जानेमन यही तो तुम जैसे छोटे आदमी और मुझ जैसे बड़े आदमी मे फ़र्क है कि तुम ख़तरो से घबराते हो और मैं ख़तरो से खेलता हूँ..."

"तुम दोनो अब शांत हो जाओ,वरना यही पर जूता मारूँगा...लवडे के बालो...जब देखो लौन्डियो की तरह एक-दूसरे से भिडते रहते हो..."मुझे और अरुण को एक-एक घुसा जमाकर सौरभ ने शांत कराया....
.
जबसे मुझे पता चला था कि सवेरे-सवेरे मेरे मोबाइल पर कॉल एश के हाथ मे पकड़े मोबाइल से आया था तभी से मैं उस कॉल के आने की वजह को लेकर अपनी थियरी बना रहा था...जिसमे एक थियरी ये भी शामिल थी कि 'एश को मुझसे प्यार हो गया है....' 

वैसे तो मेरे बहुत सारे अनुमान थे लेकिन सही कौन सा अनुमान था इसका जवाब सिर्फ़ एश दे सकती थी...लेकिन ऑडिटोरियम मे सबके सामने उससे इस बारे मे बात करना मुझे कुच्छ जँचा नही इसलिए मैं वहाँ से अपने दोस्तो के साथ बाहर आया और वैसे भी अब तो आंकरिंग की प्रॅक्टीस मे साथ ही रहना है, इसलिए मैं जल्दबाज़ी क्यूँ करूँ.....
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12-15-2018, 12:29 AM,
RE: Porn Hindi Kahani दिल दोस्ती और दारू
हमारे रिसेस यानी लंच का पूरा टाइम प्रिन्सिपल सर और छत्रपाल जी खा गये थे और इधर हम लोग बिना कुच्छ खाए-पिए वापस क्लास मे पहुँचे....हमारे क्लास मे कुच्छ लोग ऐसे थे जो अपने घर से टिफिन लाते थे, जिनमे लड़के-लड़किया दोनो शामिल थे....अब कॅंटीन जाने का टाइम नही था और नेक्स्ट क्लास बड़ी इंपॉर्टेंट भी थी, इसलिए मैने उन्ही कुच्छ लोगो पर हमला करने का सोचा,जो रोजाना अपने साथ अपना लंच बॉक्स लाते थे...लेकिन यहाँ भी एक दिक्कत थी, वो ये कि लौन्डो की टिफिन हमारे क्लास मे आते तक सॉफ हो चुकी थी, इसलिए मैने लड़कियो पर अपना जाल फेका...
लड़किया सच मे बड़ी भोली होती है,उनसे मैने दो-चार अच्छी बाते क्या कर ली, उन्होने मुझे अपना टिफिन दे दिया, ये सोचकर कि अरमान से उनकी दोस्ती हो गयी है .लेकिन उन्हे ये पता नही कि कल से मैं फिर उन्हे बत्ती देने लगूंगा.....
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हर हफ्ते हमारी स्पोकन इंग्लीश जैसे ही एक, दो घंटे की क्लास लगा करती थी, जिसका टाइटल था'वॅल्यू एजुकेशन...' लास्ट वीक वीई के क्लास के टाइम मैं घर मे बैठा रोटिया तोड़ रहा था इसलिए आज की वीई की क्लास मेरी फर्स्ट क्लास थी... 
वीई के टीचर छत्रपाल जी थे और लौन्डो ने बताया था कि वीई की क्लास वो एक दम फ्रेंड्ली मूड मे लेते है....बोले तो छत्रपाल सिंग हमारे लिए एक टीचर कम फ्रेंड थे.
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"यार मुझे ऐसा क्यूँ लग रहा है कि छत्रपाल गुरुदेव ने हमे कुच्छ होमवर्क दिया था..."अपना सर पर ज़ोर डालते हुए अरुण बोला...

"होम वर्क नही हॉस्टिल वर्क बोल..."

"हां...वही समझ...."एक बार फिर अपने दिमाग़ पर ज़ोर डालते हुए अरुण ने कहा"मेरे ख़याल से कोई 2-3 टॉपिक दिया था उन्होने और कहा था कि नेक्स्ट क्लास मे प्रेज़ेंटेशन देना है..."

"तब तो आज मस्त बेज़्जती होगी...मैने तो बुक खोल कर भी नही देखा...."सौरभ थोड़ा घबराते हुए बोला और गेट की तरफ अपनी नज़र दौड़ाई की छत्रपाल सर आए या नही....

"डर मत...कोई ऐसा घिसा-पिटा टॉपिक ही मिलेगा...कुच्छ भी बक देना..."अपनी बाँहे उठाते हुए मैंने ताव मे कहा और इसी के साथ छत्रपाल जी ने क्लास मे एंट्री मारी....
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"मैने कल कुच्छ टॉपिक दिया था...सॉरी मेरा मतलब लास्ट क्लास मे मैने कुच्छ टॉपिक दिया था, जिसपर सबको एक-एक करके यहाँ सामने आकर प्रेज़ेंटेशन देना है और जो-जो फर्स्ट, सेकेंड, थर्ड आएगा...उसे मेरी तरफ से स्पेशल प्राइज़ मिलेगा....तो शुरू करते है...."पूरी क्लास की तरफ एक बार देखकर उन्होने अपनी उंगली सुलभ पर अटकाई और बोले"सुलभ आ जाओ और इसके बाद सौरभ तुम तैयार रहना..."
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सुलभ ने एक दम भड़कते हुए फुल इंग्लीश मे प्रेज़ेंटेशन दिया और वापस लौटते वक़्त एक शेर भी मार दिया और यहाँ साला मुझे यही समझ नही आया कि टॉपिक क्या था 

सुलभ के प्रेज़ेंटेशन के बाद सौरभ सामने गया लेकिन बिना कुच्छ बोले...जैसे गया था,वैसे ही वापस आ गया और यही कुच्छ हाल अरुण का भी हुआ और अब अगली बारी मेरी थी.....
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"शुरू हो जाओ...5 मिनिट है तुम्हारे पास...."छत्रपाल ने मेरी तरफ देखकर मुझे अपना प्रेज़ेंटेशन शुरू करने के लिए कहा....
"किस टॉपिक पर प्रेज़ेंटेशन देना है सर..."

"किस टॉपिक पर प्रेज़ेंटेशन दे सकते हो..."उन्होने पुछा...

"कोई सा भी टॉपिक दे दो..."जबर्जस्त कॉन्फिडेन्स के साथ मैने कहा...

"'एतिक्स इन बिज़्नेस आर जस्ट आ पासिंग फड़ ?'...इस पर शुरू हो जाओ..."
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"ये कैसा भयंकर टॉपिक है जिसका एक वर्ड भी फेमिलियर नही लगता...साले ने पूरा कॉन्फिडेन्स ही डाउन कर दिया..."क्लास मे चल रहे फॅन की तरफ देखते हुए मैने बहुत सोचा, इंग्लीश के वर्ड्स को तोड़-मरोड़ कर कुच्छ समझना चाहा लेकिन मेरा दिमाग़ हर बार आउट ऑफ सिलबस चिल्ला रहा था...

"सर कोई दूसरा टॉपिक नही मिल सकता क्या..."रहम भरी आँखो से मैं छत्रपाल की तरफ देखा....

"कोई बात नही...दूसरा टॉपिक चूज़ कर लो..."

"दूसरा टॉपिक बोलिए..."

"'कॅपिटलिज़म ईज़ वेरी फ्लॉड सिस्टम बट दा अदर्स आर मच वर्स ?'....इस पर शुरू हो जाओ..."

प्रेज़ेंटेशन का दूसरा टॉपिक सुनकर अबकी मेरा हाल पहले से भी बदतर हो गया क्यूंकी छत्रपाल सिंग द्वारा पूरा टॉपिक बोलने से पहले ही मेरे 1400 ग्राम के दिमाग़ ने 'आउट ऑफ सिलबस' की बेल बजा दी और मैने तुरंत ना मे अपनी गर्दन हिलाई....

"क्या हुआ, तीसरा टॉपिक चाहिए..."

"यस सर..."

"फिर ये लो तीसरा टॉपिक 'शुड दा पब्लिक सेक्टर बी प्राइवेटाइज़्ड ' "

"सर, दरअसल बात ये है कि मैं लास्ट वीक की क्लास मे आब्सेंट था..."तीसरे टॉपिक को सुनकर मैने तुरंत कहा"नेक्स्ट क्लास मे पक्का "

"वेरी गुड...ऐसे करोगे आंकरिंग..."

"आपके टॉपिक्स ही कुच्छ ज़्यादा ख़तरनाक थे...मुझे लगा कि कोई जनरल सा टॉपिक मिलेगा...वरना मैं प्रिपेर्ड होकर आता..."

"तुम्हे क्या लगा कि मैं यहाँ फ़ेसबुक वनाम. ट्विटर...अड्वॅंटेज आंड डिसड्वॅंटेज ऑफ फ़ेसबुक....जैसे बेहद ही बकवास टॉपिक पे डिस्कशन करवाउन्गा...बड़े भाई, इट'स वॅल्यू ईडक्षन विच ईज़ रिलेटेड टू और एकनॉमिक्स....इस सब्जेक्ट को ध्यान से पढ़ लो बेटा, ज़िंदगी सुधर जाएगी...चलो जाओ "
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छत्रपाल जी के शब्दो के तीर से घायल हुआ मैं अपनी जगह पर पहुचा और उदास होकर बैठ गया, लेकिन जैसे-जैसे कार्यक्रम आगे बढ़ता गया वहाँ मेरे जैसे 10-12 लड़के और निकल गये...इसलिए क्लास के ख़त्म होते तक छत्रपाल सिंग के शब्द रूपी बानो के ज़ख़्म भर गये और मैं खुशी-खुशी छुट्टी होने के बाद बाहर निकला.....
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"यार ये अटॉनमस का मतलब तो अभी तक पता नही चला....."कॉलेज से निकलते वक़्त सौरभ ने नोटीस बोर्ड मे नज़र मारते हुए कहा और वही रुक कर अटॉनमस का मतलब देखने लगा...

" अटॉनमस का मतलब अब एग्ज़ॅम के पेपर हमारे ही कॉलेज मे बनेंगे, आन्सर शीट भी यही चेक होगी हमारे बकलंड टीचर के हाथो...अब चल..."सौरभ का कॉलर पकड़ कर मैने उसे खीचते हुए कहा"तू एक काम कर सौरभ...अरुण को लेकर चुप चाप हॉस्टिल निकल...मैं तेरी भाभी से बात करके आता हूँ...."

"तो जाना, अरुण से क्यूँ डर रहा है..."

"अबे वो एक नंबर का झाटु है,यदि मैने उसे ये बात बताई तो बोलेगा कि वो भी मेरे साथ जाएगा...इसलिए उसको लेकर तुम जाओ, हम थोड़ी देर मे आओ...."
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सौरभ एक दम गऊ था और ऐसे मौको पर वो मेरे बहुत काम आता था...उस दिन सौरभ,अरुण को बहला-फुसलाकर मेरे बिना हॉस्टिल ले गया...लेकिन मुझे मालूम है कि अरुण ने कम से कम चार बार तो ज़रूर पुछा होगा कि 'अरमान कहाँ मरवा रहा है' 

क्या याराना है हमारा 
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सौरभ को अरुण के साथ भेजकर मैं सीधे पार्किंग मे पहुचा, जहाँ इस वक़्त बहुत भीड़ थी . उस भीड़ मे मेरे क्लास के कयि लौन्डे थे और उन्ही मे से मैने एक का मोबाइल लेकर एश के आने का इंतज़ार करने लगा....

एश पार्किंग प्लेस मे अकेले आई क्यूंकी दिव्या के ड्राइवर ने उसे पार्किंग से बाहर ही पिक अप कर लिया था और यही मेरे लिए एसा से बात करने का एक सुनहरा मौका था....एसा को कार की तरफ बढ़ते देख मैने एक बार फिर उस अननोन नंबर को अपने दोस्त के मोबाइल से डाइयल किया...

"हेलो...कौन..."कार से थोड़ी दूर रुक कर एश ने अपने ड्राइवर को 5 मिनिट रुकने का इशारा किया और मुझे बोली"हू आर यू..."

"कभी सोचा नही था कि आप जैसी इज़्ज़तदार लड़की मुझे सवेरे-सवेरे कॉल करके परेशान करेगी..."

"आप कौन..."

"आज सुबह ही की बात है...याददाश्त अच्छी हो तो फ्लॅशबॅक मे जाकर याद करो कि आज सुबह किसे फोन किया था..."

"अरमान..."घबराते हुए एश पार्किंग की भीड़ मे इधर-उधर देखने लगी और तभिच मैने हवा मे अपना हाथ उठकर उसका ध्यान अपनी तरफ खींचा.....

मुझे वहाँ पार्किंग मे दूर खड़ा देख एश की साँसे रुक गयी...उसके चेहरे का रंग अपनी चोरी पकड़े जाने का कारण और मुझे वहाँ देख कर अपना रंग बदल रहा था...किसी पल वो मुझे देखकर हँसने की कोशिश करती तो किसी पल वो एक दम सिन्सियर बनने की आक्टिंग करती थी, इस बीच उसका मोबाइल उसके कान पर और उसकी आँखे मुझ पर कॉन्स्टेंट थी...
एश को ऐसे महा विलक्षद स्थिति मे देखकर मैने हल्की सी मुस्कान देकर उसे रिलॅक्स दिलाया कि वो इतना ना डरे...मैं उसकी जान नही लेने वाला हूँ और कमाल की बात है कि वो मेरे उस मुस्कान के पीछे के अर्थ को समझ गयी....
.
"मैं वहाँ आउ..."मोबाइल के ज़रिए एश से बात करते हुए मैने पुछा....

"नही...मतलब क्यूँ..हां, आ जाओ..."हड़बड़ाते हुए, शब्दो को तोड़-मरोड़ कर वो बोली"आ जाओ..."

"येस्स्स..."अंदर ही अंदर मैं खुशी के मारे 5 फीट उपर कूद गया और मोबाइल जिसका था,उसे देकर एश की तरफ हँसते-मुस्कुराते हुए चल दिया....
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मुझे मेरे नेचर के हिसाब से इस वक़्त बिल्कुल भी नर्वस या हिचकिचाना नही चाहिए था, लेकिन मेरे कदम जैसे-जैसे एश की तरफ बढ़ रहे थे...वैसे-वैसे एश की तरह मुझपर भी शर्म की एक परत बैठती जा रही थी...जबकि इस वक़्त कही से भी मेरी ग़लती नही थी.

सुबह कॉल एश के मोबाइल से आया था,लेकिन चोरो की तरह शरमा मैं रहा था....उस वक़्त मेरी वैसी हालत का एग्ज़ॅक्ट रीज़न तो मुझे नही मालूम लेकिन मुझे जितना पल्ले पड़ा उसके हिसाब से एश और मेरी मुलाक़ात आज तक तकरार, लड़ाई,झगड़े के कारण हुई थी...लेकिन आज पहली बार मैं एश से बिना किसी तकरार, बिना किसी लड़ाई-झगड़े के मिलने जा रहा था...इसीलिए आज, जब कॉलेज मे मेरे कुच्छ ही दिन बाकी थे, तब मैं थोड़ा शरमा रहा था.
.
एश के पास जाकर मैं कुच्छ देर तक चुप खड़ा रहा और वो भी मेरे पास आने से अपने होंठ भीच रही थी....

"हाई...आइ आम अरमान..."

"आइ नो दट हू आर यू..."

"तो...मैं ये कहना चाहता था कि.....क्या कहना चाहता था "एश को देखकर मैं बोला"एक मिनिट रुकना...मैं सोचकर बताता हूँ..."

मुझे बहुत अच्छे से मालूम था कि मुझे, एश से क्या बात करनी है..लेकिन मैं इस वक़्त घबरा रहा था कि कही एश बुरा ना मान जाए...क्यूंकी एश के अपने लिए ऐसी सिचुयेशन का इंतज़ार मैं पिछले चार सालो से कर रहा था और अब जाकर जब मेरे वो अरमान पूरे हो रहे है तो मैं नही चाहता था कि मेरा एक सवाल मेरे अरमानो को बिखेर दे....लेकिन वो कॉल वाली बात करनी तो ज़रूरी थी,वरना हमारी आगे बात ही नही होती...इसलिए थोड़ा लजाते हुए, थोड़ा घबराते हुए कि वो मेरे इस सवाल पर नाराज़ या उदास ना हो जाए मैने उससे कहा....

"सुबह, तुम्हारे मोबाइल से एक कॉल आया था...जिसमे मेरे खिलाफ एफ.आइ.आर. करने की बात की जा रही थी..."

"हां...उसके लिए सॉरी..."

"सॉरी बोलने की कोई ज़रूरत नही है...ये सब हँसी मज़ाक तो चलता रहता है, मैं बुरा नही मानता...तुम चाहो तो रात को 1 बजे भी मुझे ऐसे धमकी भरे कॉल कर सकती हो...लेकिन मैं कुच्छ और ही पुच्छना चाहता हूँ..."

"पुछो..."

"मैं ये पुच्छना चाहता हूँ कि आज अचानक...इस तरह मुझे कॉल कैसे कर दिया...मतलब कि....ऐसे मुझे कॉल करके धमकी देने का खुरापाति ख़याल कैसे आया..."

"वो आक्च्युयली मेरी मामी की लड़की आई हुई है और आज सुबह उसी ने ऐसे ही मज़ाक मे तुम्हे कॉल कर दिया, फिर जब मैं कॉलेज आ रही थी तो उसने बताया कि उसने सुबह तुम्हे कॉल करके धमकी दी है...सॉरी अरमान..."

"तभी मैं सोचु कि तुम्हारी आवाज़ को क्या हो गया है...और सूनाओ, ज़िंदगी कैसे कट रही है..."मैने हमारे बीच चल रही बातचीत को सुबह वाले कॉल से आगे बढ़ते हुए कहा, इस आस मे कि एश की लाइफ के कुच्छ रीसेंट अपडेट्स मुझे जानने को मिल जाएँगे...लेकिन एश लेट होने का बहाना करके कार मे बैठ गयी...
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एश के वहाँ से जाने के बाद भी मैं बहुत देर तक वहाँ किसी भटकती आत्मा की तरह खड़ा होकर एश के साथ वाले पल को रिमाइंड करके मुस्कुराता रहा....लेकिन तभिच मेरे 1400 ग्राम के ब्रेन ने मुझसे पुछा कि"यदि वो कॉल एश की मामी की लड़की ने किया था, तो फिर उसे मेरे बारे मे कैसे मालूम चला...क्यूंकी कोई भी इंसान किसी दूसरे इंसान का मोबाइल उठाकर यूँ ही कोई नंबर डाइयल करके मज़ाक नही करता....इसका मतलब मुझे कॉल करने वाली लड़की को मेरे बारे मे मालूम था .एक और सवाल जो मेरे अंदर उठा वो ये कि इतने भयंकर कांड हो जाने के बाद भी एश के मोबाइल पर मेरा नंबर कैसे सेव था और उसने मेरा नंबर सवे करके क्यूँ रखा था...."

"कोई बात नही बीड़ू...अब तो हर दिन एक घंटे एश के साथ रिहर्सल करना है,वही पुच्छ लिया जाएगा...अरमान, यू आर सो स्मार्ट "खुद की तारीफ करते हुए मैं हॉस्टिल के अंदर घुसा और सीधे वॉर्डन के रूम मे जाकर आज रात के प्रोग्राम के बारे मे डिसकस करने गया....
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वॉर्डन के रूम मे इस वक़्त 2-3 लड़के घुसे हुए थे, जो पीसी मे फ़ेसबुक चला रहा था...

"क्या कर रहे हो बे लवडो और सर कहाँ है..."

"प्रिन्सिपल सर राउंड पर आए थे अरमान भैया...उन्ही को बाहर तक छोड़ने गये है..."

"एक बात बताओ..."वहाँ बैठे लड़को मे से एक को उठाकर मैं उसकी चेयर पर बैठा और बोला"तुम लोगो को कोई काम-धंधा नही है क्या, जो जब देखो तब फ़ेसबुक मे भिड़े रहते हो...लास्ट सेमेस्टर क्लियर है क्या..."

"अरे आप भी बैठो...चाइनीस लड़की से चॅट कर रहा हूँ..."

"चाइनीस लड़की से "

"ह्म, कल ही मेरी फ्रेंड बनी है...एकतरफ़ा माल है..."

"फोटो दिखा उसकी..."अपनी चेयर पीसी की तरफ सरकते हुए मैने स्क्रीन पर नज़र मारी...
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12-15-2018, 12:29 AM,
RE: Porn Hindi Kahani दिल दोस्ती और दारू
मैने उस लड़की की प्रोफाइल पिक देखी, लौंडिया एक दम करेंट थी और ऑनलाइन भी थी.उस वक़्त जब मैं उस चाइनीस लड़की की फोटो देख रहा था तभी मेरे जूनियर्स मे से एक ने उसकी प्रोफाइल पिक मे चाइनीस लॅंग्वेज मे कुच्छ लिखा...जिसे कुच्छ देर बाद ही उस चाइनीस लड़की ने लाइक भी किया...

"तुझे चाइनीस आती है क्या बे "

"अरे खाक चाइनीस आएगी मुझे...मैं तो ढंग से हिन्दी भी नही लिख पाता..वो तो मैं उस लड़की के उपर वाले कॉमेंट को कॉपी किया और लास्ट मे मादरचोद लिख कर पोस्ट कर दिया..."

"धत्त तेरी की "हँसते हुए मैने कहा"मतलब तूने उस लड़की को गाली दी और उसने तेरे कॉमेंट को लाइक भी किया "

"इतना ही नही...कल मैने उसे कहा कि..क्या वो मेरा लंड चुसेगी...रिप्लाइ इन यस ऑर नो', और जानते हो उसका क्या जवाब था..."

"क्या..."

"वो बोली 'यस..' इसके बाद उसने भी मेरा मेस्सेज कॉपी करके मुझसे पुछा कि..'क्या मैं उसका लंड चुसूंगा'...साली बक्चोद "
"लगे रह..."हँसते हुए मैं खड़ा हुआ और बोला"जब सर आ जाए तो मुझे आवाज़ दे देना...."
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उस रात किसी कारण वश हमारा दारू प्रोग्राम जमा नही,इसलिए अगले दिन मैं एक दम करेक्ट टाइम पर कॉलेज पहुचा और बॅग क्लास मे पटक कर सीधे ऑडिटोरियम की तरफ भागा.....

ऑडिटोरियम मे इस वक़्त कुच्छ 5 लड़किया और इतने ही लड़के थे...अब जब मुझे अपने कॉलेज की गोल्डन जुबिली मे आंकरिंग करनी थी तो ये ज़रूरी था कि इन बक्चोदो को लात मारकर बाहर करना पड़ेगा...साथ मे ये डर भी था कि कही ये ही मुझे डिसक्वालिफाइ ना कर दे...उन स्टूडेंट्स मे से जो मेरे जूनियर थे उन्होने मुझे 'गुड मॉरिंग' विश किया और जो स्टूडेंट्स मेरे ही बॅच के थे उन्होने मेरी तरफ देखा तक नही, सिवाय एश के .

ऑडिटोरियम मे इस वक़्त छत्रपाल सर को छोड़ कर हम सिर्फ़ 11 ही थे,इसलिए जिसका जहाँ मन हो रहा था...वो वही बैठ रहा था, मैने भी कुच्छ देर इधर-उधर देखा और आख़िर मे हिम्मत करके अकेली बैठी एश के पास जाकर चुप-चाप बैठ गया...

"सब आ गये...तो फिर शुरू करते है"स्टेज से नीचे उतरकर छत्रपाल सर ने सबको एक साथ,एक तरफ बैठने के लिए कहा और फिर बोले"आंकरिंग किसी भी फंक्षन या शो की जान होती है, इसलिए आप मे से मैं जिन्हे भी सेलेक्ट करूँगा,उन्हे अपनी जान लगा देनी है...क्यूंकी ऐसा बड़ा फंक्षन अब इस कॉलेज मे या तो 25 साल बाद होगा या 50 साल बाद...हमे तो खुश होना चाहिए कि हम सब इसका हिस्सा बने,इसलिए इस साल को यादगार बनाने का एक बेहतरीन अवसर आंकरिंग के थ्रू तुम लोगो के पास है...."

छत्रपाल जी कुच्छ देर के लिए रुके और तब तक हम सब एक तरफ, एक साथ बैठ गये थे....अपनी कुच्छ देर पहले वाली जगह छोड़ते वक़्त मुझे छत्रपाल सर पर बहुत गुस्सा आया था क्यूंकी मैं अच्छा-ख़ासा एश के पास बैठा था और उन्होने मुझे वहाँ से उठा दिया था...
.
"मैं 6 स्टूडेंट्स को सेलेक्ट करूँगा,जिसमे तीन लड़के और तीन लड़किया रहेंगे...और उन 6 स्टूडेंट्स को लेकर 2-2 के 3 ग्रूप बनेंगे.हर ग्रूप मे एक लड़का और एक लड़की रहेगी...अभी आज मैं सबको एक पेज दूँगा, जिसमे अब्राहम लिंकन की लाइफ के कुच्छ पहलू है...उन्हे आप सब यहाँ स्टेज पर आकर एक-एक करके बोलेंगे...और एक बात जो आप सबको अपने दिमाग़ मे बोलते वक़्त बिठानी है कि ये ऑडिटोरियम खाली नही, पूरा भरा हुआ और जितने भी लोग यहाँ मौज़ूद है...वो सिर्फ़ और सिर्फ़ आपको सुनने आए है...सो लेट'स स्टार्ट वित अरमान...अरमान स्टेज पर जाओ..."

"इसकी माँ का...मैं ही पहला लड़का दिखा था इसे "
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अपनी जगह से उठकर मैने छत्रपाल के हाथ से वो पेज लिया और स्टेज पर चढ़ गया और एक दम नॉर्मल फ्लो मे जैसा कि मेरा स्टाइल था, अपनी नॉर्मल आवाज़ मे बोला....और छत्रपाल सर के दिए गये पूरे के पूरे टेक्स्ट को मैने वाय्स मे कॉनवर्ट करके अपनी जगह पर वापस बैठ गया....
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12-15-2018, 12:29 AM,
RE: Porn Hindi Kahani दिल दोस्ती और दारू
अपना काम करने के बाद मैं ये मानने लगा था कि मेरा सेलेक्षन तो पक्का है,लेकिन जब सबने उस पेज को पढ़ा तब उस एक घंटे के ख़तम होते-होते तक मेरी ये धारणा ग़लत साबित हुई क्यूंकी वहाँ एक से बढ़कर एक थे...
.
"अब आप सब अपनी क्लास मे जाओ, कल फिर से मिलेंगे...और एक बात, जब गोल्डन जुबिली का फंक्षन होगा तो उसके स्टार्टिंग मे किसी को बहुत ही लंबी स्पीच देनी पड़ेगी,वो भी बिना देखे...जिसका टॉपिक मैं तुम लोगो को दे दूँगा....तो कोई तैयार है उसके लिए..."

वहाँ भले ही मुझसे काबिल लौन्डे बैठे थे, जो स्टेज पर जाकर मुझसे अच्छा बोल लेते थे...लेकिन उनमे वक़्त-बेवक़्त डाइलॉग ठोकने की काबिलियत ज़रा सी भी नही थी और जब छत्रपाल के उस स्पीच वाले प्लान पर किसी ने अपना हाथ खड़ा नही किया तो मैने इस मौके को भुनाना चाहा क्यूंकी ये छत्रपाल पर अपना इंप्रेशन डालने का एक सॉलिड मौका था...
.
"मैं तैयार हूँ, सर..."बोलते हुए मैने पहले अपना हाथ खड़ा किया और फिर खुद खड़ा हो गया...

"श्योर...क्यूंकी कॉलेज के दिनो मे ऐसा ही कुच्छ करते वक़्त मैं बीच मे अटक गया था...सोच लो.."

"101 % श्योर हूँ...और आप बेफिकर रहिए मैं बीच मे कही भी नही रुकुंगा..."

"यही कॉन्फिडेन्स मैने तुम्हारा कल वीई की क्लास मे देखा था...लेकिन बाद मे हुआ क्या तुम बखूबी जानते है. मैने तुम्हारे बारे मे बहुत-कुच्छ सुना है जिससे मैं इस निष्कर्स पर पहुचता हूँ कि आप खुद को बहुत स्पेशल मानते हो..."

"ये छेत्रू, हर वक़्त मेरी लेने मे क्यूँ लगा रहता है..."छत्रपाल सर की बाते जब मुझे काँटे की तरह चुभी तो मैने खुद से कहा और फिर वो काँटा निकालकर सीधे छत्रपाल के सीने मे घुसाते हुए बोला"सर, दरअसल बात ये है कि लोग आपको स्पेशल तभी मानते है, जब आप कोई ऐसा काम कर देते हो..जो वो नही कर पाते...चलता हूँ सर, टॉपिक आपसे क्लास मे ले लूँगा, हॅव आ नाइस डे "

छत्रपाल को अपना आटिट्यूड दिखा कर मैं ऑडिटोरियम से निकला और क्लास की तरफ बढ़ा....

मैने छत्रपाल को आख़िर मे जो जवाब दिया, उसे सुनकर छत्रपाल जी मुस्कुराए तो ज़रूर लेकिन खुन्नस मे....छत्रपाल के प्रति मेरे इस रवैये से वहाँ मौज़ूद सभी स्टूडेंट्स मुझे ऐसे देखने लगे जैसे वो बहुत दिनो से भूखे हो और मैं उनका खाना हूँ....लेकिन किसी ने एक लफ्ज़ भी मुझसे नही कहा, क्यूंकी वो जानते थे कि अरमान को छेड़ने का मतलब खुद को घायल करना है....

ऑडिटोरियम से बाहर निकल कर जब मैं अपनी क्लास की तरफ आ रहा था तभी मुझे इसका अंदाज़ा हो गया था छेत्रू से मैने ऑडी. मे अकड़ कर जो बात की उसकी खबर बहुत जल्द पूरे कॉलेज मे फैल जाएगी और उस खबर को सुनने के बाद ये भी हो सकता था कि मुझसे जलने वालो की लिस्ट मे छत्रपाल के कयि दिए हार्ड फॅन भी जुड़ जाएँगे....क्यूंकी छत्रपाल सर, हमारे कॉलेज के मोस्ट लविंग टीचर थे और मेरी तरह उनकी भी एक लंबी-चौड़ी फॅन फॉलोयिंग थी 
.
जब मैं क्लास पहुचा तब तक दूसरा पीरियड चालू हो चुका था इसलिए मैने अंदर आने की पर्मिशन माँगी....

"कहाँ गये थे..."

"आंकरिंग की प्रॅक्टीस करने ऑडिटोरियम मे गया था..."

"सच, झूठ तो नही बोल रहे..."पवर प्लांट सब्जेक्ट के टीचर ने मुझपर अपना ख़ौफ्फ प्लांट करने की कोशिश करते हुए बोले"मैं छत्रपाल जी से क्लास के बाद पुछुन्गा और यदि उन्होने मना किया तो तुम्हारी खैर नही...कम इन..."

"बक्चोद, म्सी...लवडे का बाल..."बड़बड़ाते हुए मैं क्लास के अंदर आया ही था कि पवर प्लांट एंगग. वाले सर ने मुझे फिर रोका...

"क्या कहा तुमने...हुह"

"कुच्छ नही...थॅंक्स कहा आपको...थॅंक यू सर..."

"ओके..ओके..जाओ अपनी जगह पर बैठो..."
.
मैं जाकर अपनी जगह पर विराजमान हो गया और हमेशा की तरह आज भी अरुण मेरे साइड,सौरभ...अरुण के साइड मे और सुलभ...सौरभ के साइड मे बैठा हुआ था....इस वक़्त मेरी इज़्ज़त मेरे दोस्तो की नज़र मे अचानक ही बढ़ गयी थी और वो चारो मुझे ऐसे देख रहे थे जैसे मैं बॉर्डर पर बड़ी ही घमासान लड़ाई लड़कर आया हूँ....

"क्या हुआ आज..."पी के सर,जब कुच्छ लिखने के लिए दीवार की तरफ मुड़े तो अरुण ने पुछा...

"कहाँ क्या हुआ..."

"अबे वही...ऑडिटोरियम मे क्या हुआ..."

"कुच्छ खास नही हुआ...जब वहाँ पहुचा तो छेत्रु ने एक पन्ना हाथ मे थमा दिया और बोला कि स्टेज मे जाकर बको....उसने ये भी कहा कि ऑडिटोरियम पूरा भरा पड़ा है हमे ऐसा इमॅजिनेशन करना होगा...साला क्या बकवास ट्रिक है...एक दम फ्लॉप :"
"फिर..."
"फिर क्या...बक दिया सब कुच्छ. "
.
पीपीई वाले सर बोर्ड मे एक लंबा-चौड़ा डाइयग्रॅम बना रहे थे,जिसके चलते उनका अग्वाडा बोर्ड की तरफ था और इधर हम दोनो पूरे वक़्त बात करते रहे .

रिसेस के वक़्त हम लोग क्लास से बाहर आ रहे थे कि कल जिस लड़की का टिफिन मैने खाया था उसने मुझे आवाज़ देकर कहा कि "मैं, उसके साथ उसका टिफिन शेयर कर सकता हूँ" लेकिन उस लड़की का चेहरा देखकर मेरा पेट बिना खाए ही भर गया....कल की बात कुच्छ और थी,जो मैने उसके साथ उसी की जगह पर बैठकर उसका लंच शेयर किया था.

"मुझे भूख नही है और मेरी तबीयत भी कुच्छ ठीक नही लग रही...इसलिए तुम अकेले ठूंस लो,मेरा मतलब अकेले खा लो..."

"क्या हुआ...बुखार है क्या.."

"नही कॅन्सर है..."(अपने काम से काम रख बे )

उस लड़की से भूख ना होने का बहाना करके मैं क्लास से बाहर निकला तो पाया कि मेरे दोस्त मुझे अकेले छोड़ कर कॅंटीन चले गये थे...बक्चोद कही के .खैर कोई बात नही, होता है कभी-कभी...इसमे बुरा मानने वाली कौन सी बात है...

खुद को कंट्रोल करते हुए मैं भी कॅंटीन की तरफ बढ़ा ये सोचकर कि आज तो पेल के खाउन्गा क्यूंकी आज तो कॅंटीन का सारा समान मेरे लिए फ्री था....

कॅंटीन के अंदर घुसकर मैने अरुण और बाकी सब कहाँ बैठे है, ये देखने के लिए सबसे पहले आँखो से पूरी कॅंटीन छान मारी...लेकिन वो सब कही नही दिखे...

"ये लोग किधर कट लिए, आए तो इधर ही थे..."हैरान-परेशान होते हुए मैने सोचा और जाकर एक ऐसी टेबल की तरफ बढ़ा...जो एक दम खाली था .वहाँ बैठकर मैने कॅंटीन वाले को चार समोसे, एक फुल प्लेट चोव में, एक एग रोल के साथ आधा लीटेर वाला एक कोल्ड ड्रिंक माँगाया और ये सोचते हुए मैं खुशी-खुशी खाने लगा कि इन सबका बिल मुझे नही देना पड़ेगा....

इस बीच वहाँ एश भी अपने फ्रेंड्स के साथ आई.एश को देखकर मेरा दिल किया कि मैं अभिच आधे लीटेर वाले कोल्ड ड्रिंक की बॉटल लेकर अपनी जगह से उठु और उसकी फ्रेंड्स को वहाँ से भगाकर एश के सामने वाली चेयर पर बैठ जाउ और हम दोनो एक ही कोल्ड ड्रिंक मे दो स्ट्रॉ डालकर एक साथ पूरी बॉटल खाली कर दे....हाउ रोमॅंटिक : लेकिन मैं ये नही कर पाया क्यूंकी वहाँ एश के साथ आर.दिव्या भी विराजमान थी....कुल मिलकर कहे तो मेरी लव स्टोरी से गौतम के चले जाने के बाद ये र.दिव्या ही एकमात्र काँटा था जो मुझे एसा के करीब आने से रोक रहा था....

जब मैने सब कुच्छ खा-पीकर ख़तम कर दिया तो मैने एक डकार ली और कॅंटीन के काउंटर पर बैठे हुए आदमी को हाथ दिखाया, जिसके जवाब मे काउंटर वाले ने भी हाथ दिखाया.जिसका मतलब था कि मेरा बिल पे हो गया है....इसके बाद मैने टाइम देखा.

"लंच ख़तम होने मे अभी भी आधा घंटा बाकी है, तब तक क्या पकड़ कर हिलाऊ...साले ये लोग भी कहाँ मर गये..."कॅंटीन के गेट की तरफ देखते हुए मैने कहा...

वहाँ खाली बैठकर मैने 10 मिनिट और खुद को बोर किया और मौका मिलते ही आँखे चुराकर एश को देख लेता था....मेरी इसी लूका-छिपि के खेल मे मेरी नज़र कल वाली लड़की पर पड़ी,जिसका नाम आराधना था.....

"क्यूँ ना 20 मिनिट इसी के साथ बिताया जाए..."आराधना को देखकर मैने एक पल के लिए सोचा और फिर दूसरे ही पल आराधना के पास गया. वहाँ आराधना के साथ दो लड़किया और भी थी...जो मेरे इस तरह अचानक से वहाँ आ जाने पर थोड़ा घबरा गयी....

"आप लोगो को बुरा ना लगे तो क्या मैं इनसे 2 मिनिट बात कर सकता हूँ..."शरीफो वाली स्टाइल मे मैने आराधना की दोनो फ्रेंड्स से कहा...

"हू आर यू, हुउऊउ...और क्या बात करनी है तुम्हे...हुउऊ"वहाँ आराधना के साथ बैठी दोनो लड़कियो मे से एक ने मुझसे ऐसे पुछा जैसे उनका सीनियर मैं नही, बल्कि वो मेरी सीनियर है....

"तुम मुझे नही जानती... "

"वही तो पुछा, हू आर यू...हुउऊ...और तुम क्या कोई सूपरस्टार हो जो मैं तुम्हे जानूँगी...हुउऊ"

" तू पहले अपना ये हूउ-पुउ बंद कर वरना यह्िच पर तेरा सारा हूउ-पुउ निकाल दूँगा...चश्मिश कही की..."

"अरे अजीब गुंडा गर्दि है...."

"ओये चल उठ यहाँ, दिमाग़ खराब मत कर...बहुत हो गया ये तेरा हूउ-पुउ...अब यदि तूने एक शब्द भी आगे कहा तो....."

"तुम दोनो जाओ ना यहाँ से, क्यूँ सीनियर से ज़ुबान लड़ा रही हो...मैं इन्हे जानती हूँ ये बहुत अच्छे है..."मैं अपनी बात पूरी करता उससे पहले ही आराधना बोल पड़ी....

"ऊओह, तो ये हमारे सीनियर है...तुझे पहले बताना था ना ये...बेवकूफ़ कही की..."आराधना पर भड़कते हुए उस चश्मिश ने मुझे सॉरी कहा और फिर अपनी दूसरी चश्मिश दोस्त को लेकर वहाँ से उठकर दूसरे टेबल पर चली गयी....
.
"हाई, सर..."मेरे वहाँ बैठते ही आराधना ने बड़े प्यार से कहा....

और सच कहूँ तो ये सुनकर मुझे एक पल के लिए रोना आ गया क्यूंकी ये पहली बार था,जब किसी लड़की ने मुझसे इतने प्यार से बात की थी वरना आज तक मेरे कॉलेज की लगभग सभी लड़कियो ने मुझे फ़ेसबुक मे ब्लॉक मार के रखा हुआ है....

"एनी प्राब्लम सर..."मुझे अपनी तरफ एकटक देखता हुआ पाकर आराधना ने पुछा...

"कोई प्राब्लम नही है और ये तू मुझे सर मत बोला कर..."

"क्यूँ सर..."

"क्यूंकी सर, वर्ड सुनकर मुझे ऐसा लगता है जैसे मेरी उम्र 35 + हो..."

"ओके सर..."

"बोला ना, सर मत बोल..."

"ठीक है सर..."

"फिर बोली तू...एक बार मे समझ नही आता क्या..."

"ठीक है, अब नही बोलती...तो फिर आपको भैया बोलू..."

"भैया...., एक बात बताओ, तुम लड़कियो को भैया बोलने की इतनी जल्दी क्या रहती है और खबरदार जो मुझे भैया बोला तो...."

"तो फिर क्या आपको, आपका नाम लेकर पुकारू..."

"बिल्कुल नही....और सुन..."उसकी तरफ थोड़ा झुकते हुए मैने कहा, लेकिन वो मेरी तरफ झुकने के बजाय वापस और पीछे हो गयी...

"ये आप क्या कर रहे हो..."

"इसकी माँ का....अबे मैं तुझे किस नही कर रहा,बल्कि कुच्छ कहना चाहता हूँ...इसलिए अपना कान इधर ला..."

"पर क्यूँ..."

"अरे आना पास..."मैने ज़ोर देते हुए कहा.

मेरे इतना अधिक ज़ोर देने पर आराधना थोड़ा सा मेरे नज़दीक आई तब मैने उससे कहा...

"वो मेरे पीछे एक लड़की ग्रीन कलर की ड्रेस पहने हुए बैठी है... दिखी तुझे.."

"कौन...एश मॅम.."

"हां वही...तू कैसी जानती है उसे..."

"कल मुलाक़ात हुई थी उनसे...तभी उनसे जान-पहचान हुई थी..."

"चल ठीक है,अब ये बता कि वो किधर देख रही है..."

"वो तो अपने मोबाइल मे देख रही है..."

", चल कोई बात नही..चलता हूँ...थॅंक्स"उदास होते हुए मैने उससे कहा और वहाँ से उठने के लिए तैयार ही हुआ था कि आराधना ने मुझे पकड़ कर वापस बैठा लिया....
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