Hot Sex stories एक अनोखा बंधन - Printable Version

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RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन - sexstories - 07-15-2017

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नेहा बड़े चाव से आइस-क्रीम खाने लगी, मेरा नेहा के प्रति प्यार देख भाभी ने मुझसे कहा:

"मानु.. मैं तुम्हें एक बात बताना चाहती हूँ|"

मैं: हाँ बोलो ...

भाभी: पता नहीं तुम विश्वास करोगे या नहीं.. तुम्हें तो याद ही होगा उस रात जब हम दोनों हंसी-मजाक कर रहे थे... (इतना कहते हुए भाभी रुक गईं|)

मैं: भौजी मैं आपकी कही हर बात का विश्वास करूँगा.... आप बोलो तो सही ... अपने अंदर कुछ मत छुपाओ....

भाभी: मैंने उस रात के बाद तुम्हारे भैया के साथ कभी भी शारीरिक सम्बन्ध स्थापित नहीं किये!!!

ये सुनते ही मैं दंग रह गया.... भाभी ने अपनी बात पूरी करते हुए आगे कहा ...

भाभी: यही कारन है की अब तुम्हारे भैया ओर मेरे बीच में पटती नहीं है| वे ना तो मुझे अब इस बारे में कुछ कहते हैं .. न ही मैं उनसे इस बारे में कुछ कहती हूँ| हमारे बीच केवल मौखिक रूप से ही बातचीत होती है| यही कारन है की वो अब मेरे साथ कहीं आते-जाते भी नहीं| जब मैंने दिल्ली आने की जिद्द की तो वे बिगड़ गए .. इसीलिए मैंने नेहा को पढ़ाया की वो ससुर जी से जिद्द करे तुम से मिलने की, तुम्हारे भैया ससुर जी का कहना हमेशा मानते हैं|

अब मेरी समझ में आया की आखिर भैया क्यों नहीं आये...

आगे मैं कुछ कह पता इतने में चन्दर भैया मुझे आते हुए नजर आये| भैया मुझसे गले मिले ओर हाल-चाल लिया, जब मैंने उनसे घर ना आने का रन पूछा तो उन्होंने बात टाल दी| भाभी की बात सुन के अब मुझे उनके लिए डर सताने लगा की कहीं भैया भाभी पर हाथ तो नहीं उठाते? मैं इसी उधेड़-बन में था की भैया ने विदा ली और मैं अपनी कश्मकश से बहार आया और कहा की मैं आपको बस में बिठा देता हूँ| बस खचा-खच भरी हुई थी मुझे दो औरतों के बीच एक जगह मिली और मैंने वहां भाभी को बैठा दिया, भैया अभी भी खड़े थे| मैंने भैया को बहार बुलाया और कंडक्टर से बात कराई की जैसे ही जगह मिले मेरे भैया को सीट सबसे पहले दें इसके लिए मैंने कंडक्टर को एक हरी पत्ती भी दे दी| कंडक्टर खुश हो गया और बोला:

" सहब आप चिंता मत करो भाईसाहब को मैं अपनी सीट पर बैठा देता हूँ|"

भैया ये सब देख के खुश थे उन्होंने टिकट के पैसे देने के लिए पैसे आगे बढ़ाये तो मैंने उन्हें मन कर दिया और कहा:

"भैया पिताजी ने कहा था की टिकट मैं ही खरीदूं| आप ये लो टिकट और अंदर कंडक्टर साहब की सीट पे बैठो|"

कंडक्टर से निपट के मैं अंदर आया और भैया से पूछा की आप कुछ खाने के लिए लोगे तो उन्होंने मना कर दिया... मैं भाभी की ओर बढ़ा ओर भाभी से पूछा तो उन्होंने भी मना कर दिया पर मैं मानने वाला कहाँ था मैं झट से नीचे उतरा और दो पैकेट चिप्स और दो ठंडी कोका कोला की बोतल ले आया और एक बोतल और चिप्स भैया को थम दिया और दूसरी बोतल और चिप्स भाभी को दे दी| भाभी न-नकुर करने लगी पर मैंने उन्हें अपनी कसम दे कर जबरदस्ती की| आखिर भाभी मान गईं फिर नेहा की एक पप्पी ले कर भाभी को इशारे में कहा की मैं जल्दी आऊंगा कहके मैं उतर गया|

समय का चक्का एक बार फिर घुमा! मेरी परीक्षा खत्म हुई और मैं पिताजी के पीछे पड़ गया की इस साल गांव जाना है और साथ ही साथ मंदिरों की यात्रा भी करनी है| मैं यूँ ही कभी पिताजी से मांग नहीं करता था और इस बार तो ग्यारहवीं के पेपर वैसे ही बहुत अच्छे हुए थे तो इनाम स्वरुप पिताजी भी तैयार हो गए और उन्होंने गांंव जाने की टिकट निकाल ली| गाँव जाने में अभी केवल दस दिन रह गए थे और मैं मन ही मन अपनी इच्छाओं की लिस्ट बना रहा था|अचानक खबर आई की मेरे दूर के रिश्तेदारी में एक भैया जो गुजरात रहते हैं और वो आज हमसे मिलने दिल्ली आ रहे हैं| मैं और भैया बचपन में एक साथ खेले थे, लड़े थे, झगडे थे... और हमारे बीच में दोस्तों और भाइयों जैसा प्यार था| उनके आने की खबर सुन के थोड़ा सा अचम्भा जर्रूर लगा की यूँ अचानक वो क्यों आ रहे हैं ... और एक डर सताने लगा की कहीं पिताजी इस चक्कर में गांव जाना रद्द न कर दें| मेरा मन एक अजीब सी दुविधा में फंस गया क्योंकि एक तरफ भैया हैं जिनसे मेरी अच्छी पटती है और दूसरी तरफ भाभी हैं जो शायद मेरा कौमार्य भांग कर दें| खेर मेरे हाथ में कुछ नहीं था, इसलिए उन्हें लेने स्वयं पिताजी स्टेशन पहुंचे और वे दोनों घर आ गए| मैंने उनका स्वागत किया और हम बैठके गप्पें मारने लगे| मैं बहुत ही सामान्य तरीके से बात कर रहा था और अपने अंदर उमड़ रहे तूफ़ान को थामे हुए था|

बातों ही बातों में पता चला की वे ज्यादा दिन नहीं रुकेंगे, उनका प्लान केवल 2-4 दिन का ही है| ये सुन के मेरी जान में जान आई की काम से काम गांव जाने का प्लान तो रद्द नहीं होगा| उनके जाने से ठीक एक दिन पहले की बात. मैं और भैया कमरे में बैठे पुराने दिन याद कर रहे थे और खाना खा रहे थे| तभी बातों ही बातों में भैया के मुख से कुछ ऐसा निकला जिससे सुन के मन सन्न रह गया|

भैया: मानु अब तुम बड़े हो गए हो ... मैं तुम्हें एक बात बताना चाहता हूँ| जिंदगी में ऐसे बहुत से क्षण आते हैं जब मनुष्य गलत फैसले लेता है| वो ऐसी रह चुनता है जिसके बारे में वो जानता है की उसे बुराई की और ले जायेगी| तुम ऐसी बुराई से दूर रहना क्योंकि बुराई एक ऐसा दलदल है जिस में जो भी गिरता है वो फंस के रह जाता है|

मैं: आपने बिलकुल सही कहा भैया और मैं ये ध्यान रखूँगा की मैं ऐसा कोई गलत फैसला न लूँ|

उस समय तो मैंने इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया, परन्तु रात्रि भोज के बाद जब मैं छत पर सैर कर रहा था तब उनकी कही बात के बारे में सोचने लगा| मन असमन्झस स्थिति में पड़ चूका था और दिमाग भैया की बात को सही मान कर मुझे भाभी के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने से रोक रहा था| मित्रों मन पे काबू करना इतना आसन होता तो मैं अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल कभी न करता| यही कारन था की मैंने मन की बात मानी और फिर से भाभी और अपने सुहाने सपने सजोने लग पड़ा|

आखिर वो दिन आ ही गया जिस दिन हम गांव पहुंचे|


RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन - sexstories - 07-15-2017

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अब आगे....

घर पहुँचते ही सब हमारी आव भगत में जुट गए और इस बार मेरी नजरें भाभी को और भी बेसब्री से ढूंढने लगीं| भाभी मेरे लिए अपने हाथों से बना लस्सी की गिलास लेकर आई और मेरे हाथों में थमते हुए अपनी कटीली मुस्कान से मुझे घायल कर गईं| जब वो वापस आई तो उनके हाथ में वही परत का बर्तन था जिसमें वो मेरे पैर धोना चाहती थीं| पर मैं भी अपनी आदत से मजबूर था, मैंने अपने पाँव मोड़ लिए और आलथी-पालथी मार के बैठ गया| भाभी के मुख पे बनावटी गुसा था पर वो बोलीं कुछ नहीं| कुछ देर बाद जब लोगों का मजमा खत्म हुआ तो वो मेरे पास आईं और अपने बनावटी गुस्से में बोलीं:

भाभी: मानु ... मैं तुम से नाराज हूँ|

मैं: पर क्यों? मैंने ऐसा क्या कर दिया?

भाभी: तुमने मुझे अपने पैर क्यों नहीं धोने दिए?

मैं: भाभी आपकी जगह मेरे दिल में है पैरों में नहीं!
(मेरा डायलाग सुन भाभी हंस दी)

भाभी: कौन सी पिक्चर का डायलाग है?

मैं: पता नहीं... पिक्चर देखे तो एक जमाना हो गया|

भाभी: अच्छा जी!

मैं: भाभी अप वचन याद है ना?

भाभी: हाँ बाबा सब याद है... आज ही तो आये हो थोड़ा आराम करो|

मैं: भाभी मेरी थकान तो आपको देखते ही काफूर हो गई और जो कुछ बची-कूची थी भी वो आपके लस्सी के गिलास ने मिटा दी|
हम ज्यादा बात कर पाते इससे पहले ही हमारे गाँव के ठाकुर मुझसे मिलने आ गए| उन्हें देख भाभी ने घूँघट किया और थोड़ी दूर जमीन पर बैठके कुछ काम करने लगीं| एक तो मैं उस ठाकुर को जानता नहीं था और न ही मेरा मन था उससे मिलने का| जब भी गाँव में वो किसी के घर जाता तो सब खड़े हो के उसे प्रणाम करते और पहले वो बैठता उसके बाद उसकी आव-भगत होती| पर यहाँ तो मेरा रवैया देख वो थोड़ा हैरान हुआ और आके सीधा मेरे पास बैठा और मेरे कंधे पे हाथ रखते हुए बोला:

ठाकुर: और बताओ मुन्ना क्या हाल चाल है| कैसी चल रही है पढ़ाई-लिखाई?

मैं: (मैंने उखड़े स्वर में जवाब दिया) ठीक चल रही है|

ठाकुर: अरे भई अब तो उम्र हो गई शादी ब्याह की और तुम पढ़ाई में जुटे हो| मेरी बात मानो झट से शादी कर लो|

उनका इतना कहना था की भाभी का मुँह बन गया|

ठाकुर: मेरी बेटी से शादी करोगे? ये देखो फोटो... जवान है, सुशील है, खाना बनाने में माहिर है और दसवीं तक पढ़ी भी है वो भी अंग्रेजी स्कूल से|

अब भाभी का मुँह देखने लायक था, उन्हें देख के ऐसा लग रहा था जैसे कोई उनकी सौत लाने का प्रस्ताव लेकर आया हो और वो भी उनके सामने|….. शायद अब भाभी को मेरे जवाब का इन्तेजार था...

मैं: देखिये ... आप ये तस्वीर अपने पास रखिये न तो मेरा आपकी बेटी में कोई इंटरेस्ट है और न ही शादी करने का अभी कोई विचार है| मैं अभी और पढ़ना चाहता हूँ.. कुछ बनना चाहता हूँ|

मैंने तस्वीर बिना देखे ही उन्हें लौटा दी थी और मेरा जवाब सुन भाभी को बड़ी तस्सल्ली हुई| ठाकुर अपनी बेइज्जती सुन तिलमिला गया और गुस्से में मेरे पिताजी से मेरी शिकायत करने चला गया|

सच कहूँ तो मैंने ये बात सिर्फ और सिर्फ भाभी को खुश करने को बोली थी... और शयद भाभी मेरी होशियारी समझ चुकी थी... क्योंकि उनका चेहरा मुस्कान से खिल उठा था| फिर भी उन्होंने मुझे छेड़ते हुए पूछा:

"क्यों मानु, तुम्हें लड़कियों में दिलचस्पी नहीं है?"

मैं: भौजी... मुझे तो आप में दिलचस्पी है|

ये बात बिलकुल सच थी... और भाभी मेरा जवाब सुन के खिल-खिला के हँस पड़ी|

सूरज अस्त हो रहा था और अब मेरा मन भाभी को पाने के लिए बेचैन था और मुझे केवल इन्तेजार था तो बस सही मौके का| मेरे भाई जिनकी शादियां हो चुकी थीं उनके बच्चे मेरा पीछा ही नहीं छोड़ रहे थे और मैं विवश हो उनको कुछ कह भी नहीं सकता था| आखिर भाभी ने उन्हें खाना खाने के बहाने बुला लिया और वे सभी मुझे खींचते हुए भाभी के पास रसोई में ले आये| ऐसा लगा जैसे सुहागरात के समय भाभियाँ अपने देवर को कमरे के अंदर धकेल देती हैं| भाभी ने मुझे भी खाना खाने के लिए कहा परन्तु मेरा मन तो कुछ और चाहता था.. मैंने ना में सर हिला दिया| भाभी दबाव डालने लगीं.. परन्तु मैंने उनसे कह दिया:

"भौजी मैं आपके साथ खाना खाऊंगा|" मेरा जवाब सुन भाभी थोड़ा सुन रह गईं.... क्योंकि मैंने इतना धड़ले से उन्हें जवाब दिया था और वो भी उन सभी बच्चों के सामने| वो तो गनीमत थी की बच्चे तब तक खाना खाने बैठ चुके थे और उन्होंने मेरी बात पर ज्यादा गौर नहीं किया| मैं भी भाभी के भाव देख हैरान था की मैंने कौन सा पाप कर दिया... सिर्फ उनके साथ खाना ही तो खाना चाहता हूँ| भाभी ने मुझे इशारे से कुऐं के पास बुलाया और मैं ख़ुशी-ख़ुशी वहां चला गया| अमावस की रात थी.... काफी अँधेरा था... और मेरे मन में मस्ती सूझ रही थी क्योंकि कुऐं के आस-पास रात होने के बाद कोई नहीं जाता था क्योंकि कुऐं में गिरना का खतरा था| जब मैं कुऐं के पास पहुंचा तो देखा भाभी खेतों की तरफ देख रही थी और मैंने पीछे से जाकर भाभी को अपनी बाँहों में जकड़ लिया| भाभी अचानक हुए इस हमले से सकपका गई और मेरी गिरफ्त से छूटती हुई दूर खड़ी हो गई| मैं तो उनका व्यवहार देख हैरान हो गया.. आखिर उन्हें हो क्या गया.. अब कोन सी मक्खी ने उन्हें लात मार दी|

इससे पहले की मैं उनसे कुछ पूछता, वे खुद ही बोलीं:

"मानु तुम्हें अपने ऊपर थोड़ा काबू रखना होगा| ये गावों है.. शहर नहीं.. यहाँ लोग हमें लेकर तरह-तरह की बातें करेंगे| "

मैं: पर भौजी हुआ क्या?

भाभी: अभी तुम ने जो कहा ...की तुम मेरे साथ खाना खाओगे| और अभी तुमने जो मुझे पीछे से पकड़ लिया उसके लिए...

मैं: पर भाभी....

भाभी: पर-वार कुछ नहीं...

मैं: ठीक है| मुझसे गलती हो गई.. मुझे माफ़ कर दो|

इतना कह के मैं वहाँ से चल दिया.. और भाभी मुझे देखती रह गई| शायद उन्हें अपने कहे गए शब्दों पे पछतावा था| मैं वापस आँगन में अपना मुंह लटकाये लौट आया... मन में जितने भी तितलियाँ उड़ रहीं थी उनपे भाभी ने मॉर्टिन स्प्रे मार दिया था| *(मॉर्टिन स्प्रे = कीड़े मारने के काम आता है|)

मैंने अपना बिस्ता स्वयं बिछाने लगा.. तभी चन्दर भैया ने पूछा:

"मानु भैया खाना खा लिया?"

मैं: नहीं भैया... भूख नहीं है|

चन्दर भैया: किसी ने कुछ कहा तुमसे?

मैं: नहीं तो.. पर क्यों?

चन्दर भैया: नहीं भैया कुछ तो बात है जो तुम खाना नहीं खा रहे| मैं अभी सबसे पूछता हूँ की किस ने तुम्हें दुःख दिया है|

मैं: भैया ऐसी कोई बात नहीं है... दरअसल दोपहर में मैंने थोड़ा डट के खाना खा लिया था... इसीलिए भूख नहीं है| ये देखो मैं हाजमोला खाने जा रहा हूँ...
ये कहते हु मैं हाजमोला की शीशी से गोलियां निकाली और खाने लगा| मैं मन ही मन में सोच रहा था की कहाँ तो आज मेरा कौमार्य भांग होना था और कहाँ मैं आज भूके पेट सो रहा हूँ वो भी हाजमोला खा के .... अब पेट में कुछ हो तब तो हाजमोला काम करे| मैंने अपनी चारपाई आँगन में एक कोने पर बिछाई.. बाकि सब से दूर क्योंकि मैं आज अकेला रहना चाहता था| अशोक और अजय भैया ने कहा:

"मानु भैया ... इतनी दूर क्यों सो रहे हो| अपनी चारपाई हमारे पास ले आओ..."

मैं: (बात बनाते जुए) भैया आप लोग बहत थके हुए हो... और थकावट में नींद बड़ी जबरदस्त आती है... और साथ-साथ खरांटे भी|

मेरी बात सुन दोनों खिल-खिला के हंसने लगे और मैं अपने सर पे हाथ रख के सोने की कोशिश करने लगा| पर दोस्तों जब पेट खाली होता है तो नींद नहीं आती... मन उधेड़-बन में लगा हुआ था की काम से काम भाभी मेरी बात तो सुन लेती| मैंने अगर उनके साथ खाना खाने की बात कही तो इसमें बुरा ही क्या था| पहले भी तो हम दोनों एक ही थाली में खाना खाते थे ... अभी मैं अपने मूल्यांकन से बहार ही नहीं आए था की मेरे कानों में खुस-फुसाहट सी आवाज सुनाई पड़ी....

"मानु.. चलो खाना खा लो|"

ये आवाज भाभी की थी.. और मैं अभी भी नाराज था.... इसीलिए मैं कोई जवाब नहीं दिया और ऐसा दिखाया जैसे मैं सो रहा हूँ" तभी उन्होंने मुझे थोड़ा हिलाया....

"मानु मैं जानती हूँ तुम सोये नहीं हो.. भूखे पेट कभी नींद नहीं आती..."

मैं अब भी कुछ नहीं बोला...

"मानु .. मुझे माफ़ कर दो... मेरा गुस्सा खाने पर मत निकालो| देखो कितने प्यार से मैंने तुम्हारे लिए खान बनाया है|"

मैं अब भी खामोश था...

"देखो अगर तुमने खाना नहीं खाया तो मैं भी नहीं खाऊँगी... मैं भी भूखे पेट सो जाउंगी|"

मेर गुस्सा शांत नहीं होने वाल था... मैं अब भी किसी निर्जीव शरीर की तरह पड़ा रहा| भाभी को दर था की कोई हमें इस तरह देख लेगा तो बातें बनाने लगेगा इसीलिए वो वहाँ से उठ के चली गईं| सच कहूँ तो मित्रों मैं उनके साथ जाना चाहता था परन्तु मैं अपने ही द्वारा बोले झूठ में फंस चूका था| अब यदि चन्दर भैया मुझे खाना खाते हुए देख लेता तो समझ लेता की मैंने झूठ बोला था की मेरा पेट भरा हुआ है| अब अगर मैं शहर में अपने घर में होता तो रसोई से कुछ न कुछ खा ही लेता पर गावों में ये काम करने से बहुत डर लग रहा था इसीलिए मैंने सोने की कोशिश की| इस कोशिश को कामयाबी मिलने में बहुत समय लगा .. और मुश्किल से तीन घंटे ही सो पाया की सुबह हो गई| 

गावों में तो सभी सुबह जल्दी ही उठ जाते हैं| मुझे भी मजबूरन उठना पड़ा... अशोक भैया लोटा लेके सोच के लिए जाते दिखाई दिए और मुझे भी साथ आने के लिए कहा| मैंने मन कर दिया... अब उन्हें कैसे कहूँ की पेट में कुछ है ही नहीं तो निकलेगा क्या ख़ाक?!!!

नहा-धो के एक दम टिप-टॉप होक तैयार हो गया की अब सुबह की चाय मिलेगी उससे रात की भूख कुछ शांत होगी| भाभी अपने हाथ में दो चाय ले के मेरा समक्ष प्रकट हो गईं ... मुझसे पूछने लगीं की नींद कैसी आई ? नाराजगी आप भी मन में दही की तरह जमी बैठी थी ... और मैंने उनके हाथ से चाय का कप लेते हुए कहा

"बहुत बढ़िया... इतनी बढ़िया की ... क्या बताऊँ... सोच रहा था की मैं यहाँ आया ही क्यों? इससे अच्छा तो शहर में रहता| "

इतना कहते हुए मैं कप अपने होठों तक लाया की तभी नेहा दौड़ती हुई आई और मेरी टांगों से लिपट गई.. इस अचानक हुई हरकत से मेरे हाथ से कप छूट गया और गर्म-गर्म चाय मेरे तथा नेहा के ऊपर गिर गई| मैं तो जलन सह गया पर नेहा एक दम रो पड़ी.. और भाभी एक दम से तमतमति हुई नेहा को देखने लगी और उसे डाटने लगी,

"ये क्या हरकत है?? .. देख तूने सारी चाय गिरा दी| तुझे पता भी है चाचा ने रात से कुछ नहीं खाया और सुबह की चाय भी तूने गिरा दी... तू ऐसे नहीं मैंने वाली"...

और मारने के लिए हाथ उठाया| नेहा अपनी माँ के मुख पे गुस्सा देख मेरे पीछे छुप गई और सुबक ने लगी| मैंने भाभी का हाथ हवा में ही रोक दिया और नेहा को उठा के मैं अंदर ले आया ताकि जहाँ-जहाँ चाय गिरी थी उस जगह पे दवाई लगा सकूँ| भाभी भी मेरे पीछे-पीछे आई और अपनी चाय मुझे देने लगी:

"इसे छोडो ... ये लो मानु तुम ये चाय पी लो... मैं इसे डआई लगा देती हूँ|"

मैं: नहीं रहने दो... जब मैं आपके साथ खाना नहीं खा सकता तो चाय कैसे पीऊं???

भाभी: अच्छा बाबा मैं दूसरी चाय ले आती हूँ|

ये कहते हुए भाभी मेरे लिए दूसरी चाय लेने चली गईं... और मैं नेहा को चुप करा उसके हाथ पोछें और दवाई लगा दी| नेहा अभी भी सुबक रही थी... मैंने उसे गले लगाया और वो अपनी सुबकती हुई जबान में बोली:

"सॉरी चाचू...."

मैंने उसे कहा की
"कोई बात नहीं.. मैं जब तुम्हारी उम्र का था तो मैं तुमसे भी ज्यादा शरारत करता था| चलो जाके खेलो...मैं तब तक ये कप के टुकड़े हटा देता हूँ नहीं तो किसी के पावों में चुभ जायेंगे|"


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अब आगे....

मैं कप के टुकड़े इकठ्ठा करने लगा... तभी भाभी आईं और वाही अपना कप मेरी तरफ बढ़ा दिया... मुझे शक हुआ तो मैंने पूछ लिया:

मैं: आपकी चाय कहाँ है?

भाभी: मैंने पी ली... तुम ये चाय पीओ मैं ये टुकड़े उठती हूँ|

ना जाने क्यों पर भाभी मुझसे नजरें चुरा रही थी...

मैं: खाओ मेरी कसम की आपने चाय पी ली?

भाभी: क्यों? मैं कोई कसम- वसम नहीं खाती .. तुम ये चाय पी लो|

मैं: भाभी जूठ मत बोलो ... मैं जानता हूँ तुमने चाय नहीं पी क्योंकि चाय खत्म हो चुकी है|

तभी वहाँ मेरा भाई गट्टू आ गया, वो मुझसे तकरीबन 1 साल बड़ा था|

गट्टू: अरे ये कप कैसे टुटा?

मैं: मुझसे छूट गया... और तुम सुनाओ क्या हाल-चाल है| (मैंने बात पलटते हुए कहा)

गट्टू: मनु चलो मेरे साथ.. तुम दोस्तों से मिलता हूँ|

मैं: हाँ चलो....

भाभी: अरे गट्टू कहाँ ले जा रहे हो मानु को... चाय तो पी लेने दो.. कल रात से कुछ नहीं खाया|

मैं: तू चल भाई... मैंने चाय पी ली है.. ये भाभी की चाय है|

इतना कहता हुए हम दोनों निकल पड़े| इसे कहते हैं मित्रों की होठों तक आती हुई चाय भी नसीब नहीं हुई|
गट्टू के मित्रों से मिलने की मेरी कोई इच्छा नहीं थी... पर अब भाभी का सामना करने की हिम्मत नहीं हो पा रही थी| दोपहर हुई और भोजन के लिए मैं गट्टू के साथ घर लौट आया.... भोजन हमेशा की तरह भाभी ने बनाया था... और न जाने क्यों पर खाने की इच्छा नहीं हुई| रह-रह कर भाभी की बातें दिल में सुई की तरह चुभ रही थी और मैं भाभी से नजरें चुरा रहा था| बहार सब लोग रसोई के पास बैठे भोजन कर रहे थे और इधर मैं अपने कमरे में आगया और चारपाई पर बैठ कुछ सोचने लगा| भूख तो अब जैसे महसूस ही नहीं हो रही थी... माँ मुझे ढूंढते हुए कामे में आ गई और भोजन के लिए जोर डालने लगी| माँ ये तो समझ चुकी थी की कुछ तो गड़बड़ है मेरे साथ... पर क्या इसका अंदाजा नहीं था उन्हें| माँ जानती थी की गाओं में केवल एक ही मेरा सच्चा दोस्त है और वो है "भाभी"! माँ भाभी को बुलाने गई और इतने में भाभी भोजन की दो थालियाँ ले आई|
मैं समझ चूका था की भाभी मेरे और मम्मी के लिए भोजन परोस के लाइ हैं| भाभी ने दोनों थालियाँ सामने मेज पर राखी और मेरे सामने आकर अपने घुटनों पे आइन और मेरा चेहरा जो नीचे झुका हुआ था उसे उठाते हुए मेरी आँखों में देखते हुए रुँवाँसी होके बोली....

"मानु .... मुझे माफ़ कर दो!"

मैं: आखिर मेरा कसूर ही क्या था??? सिर्फ आपके साथ भोजन ही तो करना चाहता था... जैसे हम पहले साथ-साथ भोजन किया करते थे.... इसके लिए भी आपको दुनिया दारी की चिंता है??? तो ठीक है आप सम्भालो दुनिया दारी को... मुझे तो लगा था की आप मुझसे प्यार करते हो पर आपने तो अपने और मेरे बीच में लकीर ही खींच दी ....

भाभी: मानु... मेरी बात तो एक बार सुन लो... उसके बाद तुम जो सजा दोगे मुझे मंजूर है|

मैं चुप हो गया और उन्हें अपनी बात कहने का मौका देने लगा...

भाभी: (भाभी ने अपना सीधा हाथ मेरे सर पे रख दिया और कहने लगीं) तुम्हारे भैया कल दोपहर को मेरे साथ सम्भोग करना चाहते थे... जब मैंने उन्हें मन किया तो वो भड़क गए और मेरी और उनकी तू-तू मैं-मैं हो गई! और उनका गुस्सा मैंने गलती से तुम पे निकाल दिया... इसके लिए मुझे माफ़ कर दो| कल रात से तुम्हारे साथ मैंने भी कुछ नहीं खाया... सुबह की चाय तक नहीं...

मैं: आपको कसम खाने की कोई जर्रूरत नहीं है... मैं आप पर आँख मुंड के विश्वास करता हूँ|

और मैंने अपने हाथ से भाभी के आंसूं पोंछें| तभी माँ भी आ गईं.. शुक्र था की माँ ने हमारी कोई बात नहीं सुनी थी.... भाभी ने एक थाली माँ को दे दी और दूसरी थाली ले कर मेरे सामने पलंग पे बैठ गईं| मैं थोड़ा हैरान था...

भाभी: चलो मानु शुरू करो...

मैं: आप मेरे साथ एक ही थाली में खाना खाओगी?

भाभी: क्यों? तुम मेरे झूठा नहीं खाओगे?

माँ: जब छोटा था तो भाभी का पीछा नहीं छोड़ता था... भाभी ही तुझे खाना खिलाती थी और अब ड्रामे तो देखो इसके...

माँ की बात सुन भाभी मुस्कुरा दीं.. और मैं ही मुस्कुरा दिया.... माँ ने खाना जल्दी खत्म किया और अपने बर्तन लेकर रसोई की तरफ चल दीं| कमरे में केवल मैं और भाभी ही रह गए थे.. मुझे शरारत सूझी और मैंने भाभी से कहा:

"भाभी खाना तो हो गया... पर मीठे में क्या है?" भाभी: मीठे में एक बड़ी ख़ास चीज है...

मैं: वो क्या?

भाभी: अपनी आँखें बंद करो!!!

मैं : लो कर ली

भाभी धीरे-धीरे आगे बढ़ीं और मेरे थर-थराते होंठों पे अपने होंठ रख दिए| भाभी की प्यास मैं साफ़ महसूस कर प् रहा था... मैं उनके लबों को अपने मुझ में भर के उनका रस पीना चाहता था परन्तु उन्होंने मेरे होठों को निचोड़ना शुरू कर दिया था और मैं इस मर्दन को रोकना नहीं चाहता था| भाभी सच में बहुत प्यासी थी... इतनी प्यासी की एक पल केलिए तो मुझे लगा की भाभी को अगर मौका मिल गया तो वो मुझे खा जाएँगी|भाभी ने तो मुझे सँभालने का मौका भी नहीं दिया था... और बारी-बारी मेरे होंठों को चूसने में लगीं थी| मैं मदहोश होता जा रहा था... मैंने तो अपने जीवन में ऐसे सुख की कल्पना भी नहीं की थी| नीचे मेरे लंड का हाल मुझसे भी बत्तर था... वो तो जैसे फटने को तैयार था| मैंने अपना हाथ भाभी के स्तन पे रखा और उन्हें धीरे-धीरे मसलने लगा| भाभी ने चुम्बन तोडा.... और उनके मुख से सिकरिया फुट पड़ीं...

" स्स्स्स्स....मानु...आअह्ह्ह्ह ! रुको......"

मेरा अपने ऊपर से काबू छूट रहा था और मैं मर्यादा लांघने के लिए तैयार था... शायद भाभी का भी यही हाल था|
उन्होंने अचानक ही मुझे झिंझोड़ के रोक दिया...

"मानु अभी नहीं... कोई आ जायेगा| आज रात जब सब सो जायेंगे तब जो चाहे कर लेना .. मैं नहीं रोकूँगी.."

मैं: भौजी मुँह मीठा कर के मजा आ गया|

भाभी: अच्छा??

मैं: भौजी इस बार तो कहीं आप अपने मायके तो नहीं भाग जाओगी?

भाभी: नहीं मानु...वादा करती हूँ ...और अगर गई भी तो तुम्हें साथ ले जाउंगी|

मैं: और अपने घर में सब से क्या कहोगी की मुझे अपने संग क्यों लाई हो?

भाभी: कह दूंगी की ससुराल से दहेज़ में तुम मिले हो....

और हम दोनों खिल-खिला के हंसने लगे|

मैं: अब शाम तक इन्तेजार कैसे करूँ?

भाभी: मानु सब्र का फल मीठा होता है!

इतना कह के भाभी मुस्कुराते हुए उठीं... मैंने जैसे-तैसे अपने आप को रोका ... अपनी इच्छाओं पे काबू पाना इतना आसान नहीं होता| खेर भाभी भी अपनी थाली ले कर रसोई की ओर चलीं गईं| मैं भी उनके पीछे-पीछे चल दिया...
शाम होने का इन्तेजार करना बहुत मुश्किल था.... एक-एक क्षण मानो साल जैसा प्रतीत हो रहा था| मैंने सोचा की अगर रात को जो होगा सो होगा काम से काम अभी तो भाभी के साथ थोड़ी मस्ती की जाए|भाभी बर्तन रसोई में रख अपने कमरे में थी.. और संदूक में कपडे रख रही थी| मैंने पीछे से भाभी को फिर से दबोच लिया और अपने हाथ उनके वक्ष पे रख उन्हें होल-होल दबाने लगा| भाभी मेरी बाँहों में कसमसा रही थी और छूटने की नाकाम कोशिश करने लगी|

"स्स्स्स्स ....उम्म्म्म्म ... छोड़ो...ना..!!!!"

मैंने बेदर्दी ना दिखाते हुए उन्हें जल्दी ही अपनी गिरफ्त से आजाद कर दिया... पर मुझे ये नहीं पता था की ये तो एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है जो हर स्त्री में होती है| अंदर ही अंदर तो भाभी चाहती होंगी की हम कभी अलग ही ना हों|

भाभी: मानु तुम से सब्र नहीं होता ना....

मैं: भाभी अपने ही तो आग लगाईं थी... अब आग इतनी जल्दी शांत कैसे होगी|

भाभी को दर था की कहीं कोई हमें एक कमरे में अकेले देख ले तो लोग बातें बनाएंगे.. इसलिए वो बहार चली आईं और मैं भी उनके पीछे-पीछे बहार आ गया|

अब मैं आपको जरा घर के बाकी सदस्यों के बारे में विस्तार में परिचित कराता हूँ:

१. अशोक भैया (चन्दर भैया से छोटे) उनकी शादी हो चुकी थी... उनकी पत्नी का नाम संगीता है और उनके पुत्र का नाम : श्याम और शहर में एक कंपनी में चपरासी हैं| वे गाँव केवल जून के महीने में ही आते हैं|
२. अजय भैया (अशोक भैया से छोटे) उनकी शादी भी हो चुकी है और उनकी पत्नी का नाम रसिका है और एक पुत्र जिसका नाम: वरुण है और वे खेती-बाड़ी सँभालते हैं|
३. अनिल भैया के रिश्ते की बात अभी चल रही है और वे चंडीगढ़ में होटल में बावर्ची हैं|
४. गट्टू और मेरी उम्र में ज्यादा अंतर नहीं है इसलिए उसकी अभी शादी नहीं हुई और अभी पढ़ रहा है|

मित्रों मैं आपको एक नक़्शे द्वारा समझाना चाहूंगा की हमारा गांव आखिर दीखता कैसा है:

चन्दर भैया की शादी सबसे पहले हुई थी और वे परिवार के सबसे बड़े लड़के थे इसीलिए उनका घर अलग है| उनके घर में केवल एक कमरा ..एक छोटा सा आँगन और नहाने के लिए एक स्नान गृह है|

बाकी भाई सब बड़े घर में ही रहते हैं| उस घर में बीच में एक आँगन है और पाँच कमरे हैं| हमसभी उसी घर में ठहरे हैं| सभी लोग घर के प्रमुख आँगन में ही सोते हैं परन्तु सब की चारपाई का कोई सिद्ध स्थान नहीं है.. कोई भी कहीं भी सो सकता है|

आप लोग भी सोचते होंगे की मैं कैसा भतीजा हूँ जो अपने मझिले दादा (बीच वाले चाचा जी) को भूल गया और उनके परिवार के बारे में कुछ नहीं बताया| तो मित्रों दरअसल जब मैंने लिखना शुरू किया था तब ये नहीं सोचा था की मैं अपनी आप बीती को पूरा कर पाउँगा... क्योंकि मुझे लगा था की आप सभी श्रोता ऊब जायेंगे.. क्योंकि मेरी आप बीती में कोई लम्बा इरोटिक सीन ही नहीं है... परन्तु आप सबके प्यार के कारन मैं अपनी आप बीती खत्म होने पर कुछ रोचक मोड़ अवश्य लाऊंगा की आप सभी श्रोता खुश हो जायेंगे|

अजय भैया और रसिका भाभी में बिलकुल नहीं बनती थी... और दोनों छोटी-छोटी बात पे लड़ते रहते थे| रसिका भाभी अपना गुस्सा अपने बच्चे वरुण पे उतारती| वो बिचारा दोनों के बीच में घुन की तरह पीस रहा था... पिताजी और माँ ने बहुत कोशिश की परन्तु कोई फायदा नहीं हुआ|
मैं जब से गावों आया था तब से मेरी रसिका भाभी से बात करने की हिम्मत नहीं होती... वो ज्यादातर अपने कमरे में ही रहती... घर का कोई काम नहीं करती| जब कोई काम करने को कहता तो अपनी बिमारी का बहन बना लेती| बाकी बच्चों की तरह वरुण भी मेरी ही गोद में खेलता रहता... मैं तो अपने गावों का जगत चाचा बन गया था.. हर बच्चा मेरे साथ ही रहना चाहता था इसी कारन मुझे भाभी के साथ अकेले रहने का समय नहीं मिल पता था|

शाम को फिर से अजय भैया और रसिका भाभी का झगड़ा हो गया... और बिचारा वरुण रोने लगा| भाभी ने मुझे वरुण को अपने पास ले आने को कहा.. और मैं फटा-फैट वरुण को अपने साथ बहार ले आया| वरुण का रोना चुप ही नहीं हो रहा था... बड़ी मुश्किल से मैंने उसे पुचकार के आधा किलोमीटर घुमाया और जब मुझे लगा की वो सो गया है तब मैंने उसे भाभी को सौंप दिया| जब भाभी मेरी गोद से वरुण को ले रही थी तो मैंने शरारत की.. और उनके निप्पलों को अपने अंगूठे में भर हल्का सा मसल दिया| भाभी विचलित हो उठी और मुस्कुराती हुई प्रमुख आँगन में पड़ी चारपाई इ वरुण को लिटा दिया|
रात हो चुकी थी और अँधेरा हो चूका था... भाभी जानती थी की मैं खाना उनके साथ ही खाऊंगा परन्तु सब के सामने??? उनकी चिंता का हल मैंने ही कर दिया:

मैं: भौजी मुझे भी खाना दे दो....

भाभी मेरा खाना परोस के लाई और खुस-फुसते हुए कहने लगी:

भाभी: मानु क्या नाराज हो मुझ से?

मैं: नहीं तो!

भाभी: तो आज मेरे साथ खाना नहीं खाओगे?

मैं: भाभी आप भी जानते हो की दोपहर की बात और थी ... अभी आप मेरे साथ खाना खाओगी तो चन्दर भैया नाराज होंगे| .....

भाभी मेरी ओर देखते हुए मुस्कुराई ओर मेरी ठुड्डी पकड़ी ओर प्यार से हिलाई!!!

भाभी: बहुत समझदार हो गए हो?

मैं: वो तो है.. सांगत ही ऐसी मिली है.. ओर वैसे भी आप मेरे हिस्से का खाना खा जाती हो|
(मैंने उन्हें छेड़ते हुए कहा|)

भाभी ने अपनी नाराज़गी ओर प्यार दिखाते हुए प्यार से मेरी पीठ पे थप-थपाया| मैंने जल्दी-जल्दी से खाना खाया और अपने बिस्तर पे लेट गया और ऐसे जताया जैसे मुझे नींद आ गई हो| असल मुझे बस इन्तेजार था की कब भाभी खाना खाएं और कब बाकी सब घर वाले अपने-अपने बिस्तर में घुस घोड़े बेच सो जाएं| और तब मैं और भाभी अपना काम पूरा कर लें| इसीलिए मैं आँखें बंद किये सोने का नाटक करने लगा ... पेट भरा होने के कारन नींद आने लगी थी... मैं बाथरूम जाने के बहाने उठा की देखूं की भाभी ने खाना खया है की नहीं... तभी भाभी और अम्मा मुझे खाना कहते हुए दिखाई दिए| मैं बाथरूम जाने के बाद जानबूझ के रसोई की तरफ से आया ताकि भाभी मुझे देख ले और उन्हें ये पक्का हो जाये की मैं सोया नहीं हूँ और साथ ही साथ मैंने मोआयने कर लिया था की कौन-कौन जाग रहा है और कौन-कौन सो गया है|


RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन - sexstories - 07-15-2017

10

अब आगे....

बच्चे तो सब सो चुके थे... बड़के दादा (बड़े चाचा) और पिताजी की चारपाई पास-पास थी और दोनों के खर्रांटें चालु थे| गट्टू भी गधे बचके सो रहा था...माँ अभी जाग रही थी और बड़की अम्मा (बड़ी चाची) जी से लेटे-लेटे बात कर रही थी मैंने अनुमान लगाया की ज्यादा से ज्यादा एक घंटे में दोनों अवश्य सो जाएँगी|| रसिका भाभी सो चुकी थीं और अजय भैया भी झपकी ले रहे थे….चन्दर भैया भी चारपाई पे पड़े ऊंघ रहे थे....| आखिर मैं अपने बिस्तर पे आके पुनः लेट गया... और भाभी की प्रतीक्षा करने लगा| अब बस इन्तेजार था की कब भाभी आये और अपनी प्यारी जुबान से मेरे कानों में फुसफुसाए की मानु चलो!!! इन्तेजार करते-करते डेढ़ घंटा हो गया... मैं आँखें मूंदें करवटें बदल रहा था.... तभी भाभी की फुसफुसाती आवाज मेरे कानों में पड़ी:

भाभी: मानु... सो गए क्या?

मैं: नहीं तो... आजकी रात सोने के लिए थोड़े ही है...

ये सुन भाभी ने एक कटीली मुस्कान दी|

मैं: बाकी सब सो गए ?

भाभी: हाँ ... शायद...

मैं: डर लग रहा है?

भाभी: हाँ...

मैं: घबराओ मत मैं हूँ ना...
इतना कहते हुए मैंने भाभी के हाथ को थोड़ा दबा दिया|

तभी अचानक किसी के झगड़ने की आवाज आने लगी| ये आवाज सुन हम दोनों चौंक गए.. भाभी को तो ये डर सताने लगा की कोई हम दोनों को साथ देख लेगा तो क्या सोचेगा और मैं मन ही मन कोस रहा था की मेरी योजना पे किस जादे ने ठंडा पानी डाल दिया?

शोर सुन सभी उठ चुके थे... बच्चे तक उठ के बैठ गए थे| मैं और भाभी भी अब शोर आने वाली जगह की तरफ चल दिए| वो शोर और किसी का नहीं बल्कि अजय भैया और रसिका भाभी का था| पता नहीं दोनों किस बात पे इतने जोर-जोर से झगड़ रह थे... अजय भैया बड़ी जोर-जोर से रसिका भाभी को गलियां दे रहे थे और लट्ठ से पीटने वाले थे की तभी मेरे पिताजी और बड़के दादा ने उन्हें रोक लिया... और समझने लगे| शोर सुन वरुण ने रोना चालु कर दिया था... मैंने तुरंत भाग के वरुण को गोद में उठाया और साथ ही बच्चों को अपने साथ रेल बनाते हुए दूर ले गया ताकि वो इतनी गन्दी गलियां न उन पाएँ| इशारे से मैंने भाभी को भी अपने पास बुला लिया...

मैंने सोहा शायद भाभी को पता होगा की आखिर दोनों क्यों लड़ रहे होंगे... पर उनके चेहरे के हाव-भाव कुछ अलग ही थे|

भाभी: मानु तुम यहाँ अकेले में इन बच्चों के साथ क्यों खड़े हो?

मैं: भौजी अपने नहीं देखा दोनों कितनी गन्दी-गन्दी गलियां दे रहे हैं... बच्चे क्या सीखेंगे इन से?

भाभी: मानु.. ये तो रोज की बात है| इनकी गलियां तो अब गांव का बच्चा-बच्चा रट चूका है|

मैं: हे भगवान... !!!

भाभी का मुंह बना हुआ था.. और मैं जनता था की वो क्यों उदास है| मैंने उन्हें सांत्वना देने के लिए अपने पास बुलाया और उनके कान में कहा:

भौजी आप चिंता क्यों करते हो... कल सारा दिन है अपने पास...और रात भी....

भाभी: मानु रात तो तुम भूल जाओ!!!

उनकी बात में जो गुस्सा था उसे सुन मैं हँस पड़ा... और मेरी हंसी से भाभी नाराज होक चली गई और मैं पीछे से उन्हें आवाज देता रह गया| सच बताऊँ मित्रों तो मुझे भी उतना ही दुःख था जितना भाभी को था बस मैं उस दुःख को जाहिर कर अपना और भाभी का मूड ख़राब नहीं करना चाहता था|

खेर मामला सुलझा.. सुबह हो गई... और एक नई मुसीबत मेरे सामने थी| पिताजी और माँ बाजार जाना चाहते थे.. और मजबूरी में मुझे भी जाना था|

मन मसोस कर मैं चल पड़ा... बाजार से माँ और पिताजी खरीदारी कर रहे थे... पर मेरी शकल पे तो बारह बजे थे| पिताजी को आखिर गुस्सा तो आना ही था..

पिताजी: मुँह क्यों उतरा हुआ है तेरा?

मैं: वो गर्मी बहुत है... थकावट हो रही है... घर चलते हैं|

पिताजी: घर? अभी तो कुछ खरीदा ही नहीं...??? और अगर तुझे घर पे ही रहना था तो आया क्यों साथ?

माँ: अरे छोडो न इसे... इसका मूड ही ऐसा है, एक पल में इतना खुश होता है की मनो हवा में उड़ रहा हो और कभी ऐसे मायूस हो जाता है जैसे किसी का मातम मन रहा हो|

मेरे पास माँ की बातों का कोई जवाब नहीं था... इसलिए मैं चुप रहा... माँ और पिताजी दूकान में साड़ियां देखने में व्यस्त थे... एक बार मन तो हुआ की क्यों न भाभी के लिए एक साडी ले लूँ... पर जब जेब का ख्याल आया तो ... मन उदास हो गया| जेब में एक ढेला तक नहीं था... पिताजी मुझे पैसे नहीं देते थे.. उनका मानना था की इससे से मैं बिगड़ जाऊंगा! मैं बैठे-बैठे ऊब रहा था.. इससे निकलने का एक रास्ता दिमाग में आया| मैंने सोचा क्यों न मैं अपने दिमाग के प्रोजेक्टर में अभी तक की सभी सुखद घटनाओं की रील को फिर से चलाऊँ? इसलिए मैं ध्यान लगते हुए सभी अनुभवों को फिर से जीने लगा... पता नहीं क्यों पर अचानक से दिमाग में कुछ पुरानी बातें आने लगीं|

मित्रों मैंने आपको अपने गुजरात वाले भैया के बारे में बताया था ना... अचानक उनकी बात फिर से दिमाग में गुजने लगी... "मानु अब तुम बड़े हो गए हो ... मैं तुम्हें एक बात बताना चाहता हूँ| जिंदगी में ऐसे बहुत से क्षण आते हैं जब मनुष्य गलत फैसले लेता है| वो ऐसी रह चुनता है जिसके बारे में वो जानता है की उसे बुराई की और ले जायेगी| तुम ऐसी बुराई से दूर रहना क्योंकि बुराई एक ऐसा दलदल है जिस में जो भी गिरता है वो फंस के रह जाता है|"

तो क्या अब तक जो भी कुछ हुआ वो अपराध है? परन्तु भाभी तो मुझ से प्यार करती है... क्या मैं भी उन्हें प्यार करता हूँ?

मित्रों इन बातों ने मुझे झिंझोङ के रख दिया... मुझे अपने आप से घृणा होने लगी.. की कैसे देवर हूँ मैं जो अपनी भाभी का गलत फायदा उठाना चाहता है| मुझे तो चुल्लू भर पानी में डूब जाना चाहिए... सच में मुझे इतनी घृणा कभी नहीं हुई जितना उस समय हो रही थी... अंदर से मैं टूट चूका था!!! मन कह रहा था की ये प्यार है और तुझे ये काबुल कर लेना चाहिए... तुझे भाभी से ये कहना होगा की तू उनसे बहुत प्यार करता hai

मैंने निर्णय किया की मैं भाभी से अपने प्यार का इजहार करूँगा....और अब कोई भी गलत बात या कोई गन्दी हरकत नहीं करूँगा भाभी के साथ| मेरा मुंह बिलकुल उत्तर गया था.. मन में मायूसी के बदल छाय हुए थे और मैं बस जल्दी से जल्दी भाभी से ये बात कहना चाहता था|

उधर पिताजी के सब्र का बांध टूट रहा था, उन्हें मेरा मायूस चेहरा देख के अत्यधिक क्रोध आ रहा था| उन्होंने माँ से कहा की जल्दी से साडी खरीदो मैं अब इस लड़के का उदास चेहरा नहीं देखना चाहता..

खेर हम घर के लिए निकल पड़े और रास्ते भर पिताजी मुझे डांटते रहे.. परन्तु मैंने उनकी बातों को अनसुनी कर दिया... और सारे रास्ते मैं भाभी से क्या कहना है उसके लिए सही शब्दों का चयन करने लगा| मुझे लगा की मैं भाभी से ये प्यार वाली बात कभी नहीं कह पाउँगा....

दोपहर के भोजन का समय था.... मैं. पिताजी और माँ बड़े घर पहुँच कर अपने-अपने कपडे बदल रहे थे| गर्मी के कारन पिताजी स्नान कर रसोई की ओर चल दिए ओर माँ को कह गए की इसे भी कह दो खाना खा ले| तभी भाभी मेरे ओर माँ के लिए खाना परोस के ले आई... भाभी को देखते ही मेरा गाला भर आया... ओर ना जाने क्यों मैं उनसे नजर नहीं मिला पा रहा था... भाभी ने माँ को खाना परोसा ओर मुझे भी खाना खाने के लिए कहा| मेरे मुख से शब्द नहीं निकले.. क्योंकि मैं जानता था की अगर मैंने कुछ भी बोलने की कोशिश की तो मैं आपने को काबू में नहीं रख पाउँगा ओर रो पड़ूँगा| मैंने केवल ना में गर्दन हिला दी... मेरा जवाब सुन भाभी के मुख पे चिंता के भाव थे... उन्होंने धीमी आवाज में कहा:

"मानु अगर तुम खाना नहीं खाओगे तो मैं भी नहीं खाऊँगी ..."

मैं उसी क्षण उनसे अपने दिल की बात कहना चाहता था परन्तु हिम्मत नहीं जुटा पाया और वहाँ से छत की ओर भाग गया| छत पे चिल-चिलाती हुई धुप थी... भाभी नीचे से ही आवाज देने लगी...और साथ-साथ माँ ने भी चिंता जताई और नीचे से ही मुझे बुलाने लगी| मैं छत पे एक कोने पे खड़ा हो के अपने अंदर उठ रहे तूफ़ान पर काबू पा रहा था... मेरी आँखों से कुछ आंसूं छलक आये| मैं अपनी आँख पोछते हुए पीछे घुमा तो भाभी कड़ी हुई मुझे देख रही थी... उन्होंने कुछ कहा नहीं और ना ही मैंने कुछ कहा.. मैं बस नीचे भाग आया| चुप चाप बैठ के भोजन करने लगा... माँ ने इस अजीब बर्ताव का कारन पूछा परनतु मैंने कोई जवाब नहीं दिया| भाभी भी नीचे आ चुकी थी.. और माँ का खाना खा चुकी थी और थाली ले कर रसोई की ओर जा रही थी तो भाभी ने उन्हें रोका और मेरे बर्ताव का कारन पूछने लगीं:

भाभी: चाची क्या हुआ मानु को? चाचा ने डांटा क्या?

माँ: अरे नहीं बहु.. पता नहीं क्या हुआ है इसे.. सारा रास्ता ऐसे ही मुंह लटका के बौठा था| जब पूछा तो कहने लगा की गर्मी बहुत है... सर दर्द हो रहा है .. ऐसा कहता है| भगवान जाने इसे क्या हुआ है?

भाभी: आप थाली मुझे दो मैं तेल लगा देती हूँ... सर का दर्द ठीक हो जायेगा|

उधर मेरा भी खाना खत्म हो चूका था और मैं अपनी थाली ले कर जा रहा था.. भाभी ने मुझे रोका और बिना कुछ कहे मेरी थाली ले कर चली गई| उधर माँ भी भोजन के बाद टहलने के लिए बहार चली गईं| अब केवल मैं ही उस घर में अकेला रह गया था ... मैंने सोचा मौका अच्छा है.. भाभी से अपने दिल की बात करने का... पर मैं ये बात कहूँ कैसे?

पांच मिनट के भीतर ही भाभी नवरतन तेल ले कर आगईं.. उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे चार पाई पर बैठाया और कहा:

भाभी: मानु मैं जानती हूँ की तुम क्यों उदास हो.. सच बताऊँ तो मेरा भी यही हाल है| तुम मायूस मत हो.. कल हम कैसे न कैसे कर के सब कुछ निपटा लेंगे|

मैं कुछ भी बोलने की हालत में नहीं था... गाला सुख गया था... आँखों में आंसूं छलक आये और तभी मैंने वो किया जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी....


RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन - sexstories - 07-15-2017

11

अब आगे....

मैं जानता था की भाभी की आँखों में आँखें डाल के मैं अपने प्यार का इजहार उनसे कभी नहीं कर पाउँगा| इसीलिए मैंने अपनी आँखें बंद की और एक झटके में भाभी से सब कह देना चाहता था... परन्तु शब्द ही नहीं मिल रहे थे.... मन अंदर से कचोट रहा था... एक अजीब सी तड़पन महसूस हो रही थी... मैं उन्हें कहना चाहता था की अभी तक जो भी हमारे बीच हुआ वो मेरे लिए सिर्फ और सिर्फ एक उत्साह था... परन्तु अब एक चुम्बकीये शक्ति मुझे भाभी की और खींच रही थी.. और वो शक्ति इतनी ताकतवर थी की वो हम दोनों को मिला देना चाहती थी| दो जिस्म एक जान में बदल देना चाहती थी....

भाभी ने मेरी हालत का कोई और ही अर्थ निकला... उन्हें लगा जैसे मैं वासना के आगे विवश होता जा रहा हूँ और वो मुझे हिम्मत बंधाने लगीं:

भाभी: मानु मैं जानती हूँ तुम्हें बहुत बुरा लग रहा है... पर अब किया भी गया जा सकता है? कैसे भी करके आज का दिन सब्र कर लो... कल……….


मैंने आँखें खोली…. मैं कुछ बोल तो नहीं पाया बस गर्दन ना में हिला के उन्हें बताने की कोशिश करने लगा की आप मुझे गलत समझ रहे हो... पता नहीं की भाभी समझीं भी या नहीं|

मैंने भाभी के होंठों पे अपना हाथ रख उन्हें आगे बोलने से रोक दिया... क्योंकि वो मेरी भावनाओं का गलत अर्थ निकाल रही थीं और मैं बहुत ही शर्मिंदा महसूस कर रहा था|मैं भाभी की ओर बढ़ा और उनके होंठों पे अपने होंठ रख दिए... मैं तो जैसे उन्हें बस चुप कराना चाहता था... परन्तु खुद पे काबू नहीं रख पाया और अपनी द्वारा तय की हुई सीमा तोड़ दी| मैंने अपने दोनों हाथों से उनके मुख को पकड़ लिया... और मैं बिना रुके उनके होंठों पे हमला करता रहा... मैं कभी उनके नीचले होंठ को अपने मुख में भर चूसता... तो कभी उनके ऊपर के होंठ को| आज नाजाने क्यों मुझे उनके होंठों से एक भीनी-भीनी सी खुशबु मुझे उनकी तरफ खींचे जा रही थी और मैं मदहोश होता जा रहा था... पहली बार मैं कोई काम बिना किसी रणनीति के कर रहा था... आज मैंने पहली बार अपनी जीभ उनके मुख में डाली... इस हमले से भाभी थोड़ा चकित रह गई पर इस बार उन्होंने भी पलट वार करते हुए मेरी जीभ अपने दातों के बीच जकड ली! और उसे चूसने लगीं.... मेरे मुंह से

"म्म्म्म...हम्म्म" की आवाज निकल पड़ी|

भाभी जिस तरह से मेरा साथ दे रही थी उससे लग रहा था की अब उनसे भी खुद पे काबू रखना मुश्किल हो रहा है| अचानक मेरे दिमाग ने मुझे सन्देश भेजा की मेरे पास ज्यादा समय नहीं है... मुझे जल्दी से जल्दी सब करना होगा| इसलिए मैंने भाभी के जीभ से मेरे मुख के भीतर हो रहे प्रहारों को रोक दिया और मैंने तुरंत ही दरवाजा बंद इया और वापस आ के भाभी को अशोक भैया के कमरे के पास कोने पे खड़ा किया और मैं नीचे अपने घुटनों के बल बैठ गया| मेरे अंदर भाभी की योनि देखने की तीव्र इच्छा होने लगी और मैंने भाभी की साडी उठा दी... मैं देख के हैरान था की भाभी ने नीचे पैंटी नहीं पहनी थी!!! मैंने आज पहली बार एक योनि देखि थी इसलिए मैं उत्साह से भर गया... और मैंने बिना देर किये उनकी योनि को अपनी जीभ से छुआ.. भाभी एक डैम से सिहर उठीं...

भाभी का योनि द्वार बंद था और जैसे ही मैंने अपनी जीभ से उससे कुरेदा वो तो जैसे उभर के मेरे समक्ष आ गया... उनका क्लीट (भगनासा) लाल रंग से चमकने लगा मैंने भाभी की योनि को थोड़ा और कुरेदा तो मुझे अंदर का गुलाबी हिस्सा दिखाई दिया.. उसे देख के तो जैसे मैं सम्मोहित हो गया| यदि आपने किसी कुत्ते को कटोरे में से पानी पीते देखा हो तो: ठीक उसी प्रकार मेरी जीभ भाभी की योनि से खेल रही थी ... उधर भाभी की सांसें पूरी तेजी से चलने लगीं.. भाभी कसमसा गई और मुझे अपने द्वारा किये प्रहार के लिए प्रोत्साहन देने लगीं.. भाभी की योनि (बुर) से एक तेज सुगंध उठने लगी.. जो मुझे दीवाना बनाने लगी.. अब मैं और देर नहीं करना चाहता था इसलिए मैं वापस खड़ा हो गया...

भाभी: मानु मजा आया?

मैंने केवल गर्दन हां में हिलाई... क्योंकी अब भी मैं बोलने की हालत में नहीं था| मैंने अपनी पेंट की चैन खोली और अपना लंड भाभी के समक्ष प्रस्तुत किया.. मेरा लंड बिलकुल तन चूका था .. ऐसा लगा मानो अभी फूट पड़ेगा| क्योंकि ये मेरा पहला अवसर था इसलिए मैंने भाभी से कहा:

मैं: भाभी इसे सही जगह लगाओ ना.. मुझे लगाना नहीं आता!!!

भाभी इस नादानी भरी बात सुन मुस्कुराई और उन्होंने मेरा लंड हाथ में लिया और मुझे अपने से चिपका लिया|जैसे ही उन्होंने मेरे लंड को अपनी बुर से स्पर्श कराया मेरे शरीर में करंट सा दौड़ गया... भाभी की तो सिसकारी छूट गई:

"स्स्स्स...सीईइइइइ म्म्म्म"

उनकी बुर अंदर से गीली थी और मुझे गर्माहट का एहसास होने लगा| काफी देर से खड़े लंड को जब भाभी के बुर की गरम दीवारों ने जकड़ा तो मेरे लंड को सकून मिला.... भाभी ने मुझे अपने आलिंगन में कैद कर लिया... और मैंने भी भाभी को कास के अपनी बाँहों में भर लिया|मैंने बिना सोचे समझे खड़े-खड़े ही नीचे से झटके मरने शुरू कर दिए... मेरे झटके बिना किसी लय के भाभी की बुर में हमला कर रहे थे... पर भाभी की मुख से सिस्कारियां जारी थी

"स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स "
और वे मेरे द्वारा दिए गए हर झटके को महसूस कर आनंदित हो रही थी.... अब मेरी भी आहें निकल पड़ीं

"अह्ह्हह्ह्ह्ह......म्म्म्म... अम्म्म्म"

मैंने नीचे से अपना आक्रमण जारी रखा और साथ ही साथ भाभी की गर्दन पे अपने होंठ रख उसे चूसने लगा... भाभी ने अपना एक हाथ मेरे सर पे रख मुझे अपनी गर्दन पे दबाने लगीं| उनका प्रोत्साहन पा मैंने उनकी गर्दन पे अपने दांत गड़ा दिए.. भाभी की चीख निकल पड़ी:

"आअह अह्ह्ह्ह्न्न.. मानु.....स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स"

मैं उनकी गर्दन किसी ड्रैकुला की तरह चूस और चाट रहा था... बस मेरी इच्छा उनका खून पीने की नहीं थी|

अभी केवल दस मिनट ही हुए थे और अब मैं इस सम्भोग को और आगे नहीं ले जा सकता था.. मेरा ज्वालामुखी भाभी के बुर के अंदर ही फूट पड़ा| भाभी को जैसे ही मेरा वीर्य उनकी बुर में महसूस हुआ उन्होंने मेरे लंड को एक झटके में अपने हाथ से पकड़ बहार निकाल दिया... जैसे ही मेरा लंड बहार आया भाभी की बुर से एक गाढ़ा पदार्थ नीचे गिरा और उसके गिरते ही आवाज आई:

"पाच... " ये पदार्थ कुछ और नहीं बल्कि मेरे और भाभी के रसों का मिश्रण था| भाभी निढाल होक मेरे ऊपर गिर पड़ीं| मैंने उन्हें संभाला और उनके होंठों पे चुम्बन किया और उन्हें दिवार दे सहारे खड़ा किया और अपनी जेब से रुमाल निकल के उनके बुर को पोंछा और फिर अपने लें को साफ़ किया| मैंने पास ही पड़े पोंछें से जमीन पे पड़ी उस "खीर" को साफ़ करने लगा जिस पे मक्खियाँ भीं-भिङने लगीं थी|

भाभी अब होश में आ गई थीं और वो स्वयं छलके चारपाई पे बैठ गईं| मैंने हाथ धोये और तुरंत दरवाजा खोल उनके पास खड़ा हो गया... भाभी मेरी ओर बड़े प्यार से देख रही थी .. पर मैं उनसे नजरें नहीं मिला पा रहा था|


RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन - sexstories - 07-15-2017

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अब आगे....

जैसे ही मेरा लंड बहार आया भाभी की बुर से एक गाढ़ा पदार्थ नीचे गिरा और उसके गिरते ही आवाज आई:

"पाच... " ये पदार्थ कुछ और नहीं बल्कि मेरे और भाभी के रसों का मिश्रण था| भाभी निढाल होक मेरे ऊपर गिर पड़ीं| मैंने उन्हें संभाला और उनके होंठों पे चुम्बन किया और उन्हें दिवार दे सहारे खड़ा किया और अपनी जेब से रुमाल निकल के उनके बुर को पोंछा और फिर अपने लें को साफ़ किया| मैंने पास ही पड़े पोंछें से जमीन पे पड़ी उस "खीर" को साफ़ करने लगा जिस पे मक्खियाँ भीं-भिङने लगीं थी|

भाभी अब होश में आ गई थीं और वो स्वयं छलके चारपाई पे बैठ गईं| मैंने हाथ धोये और तुरंत दरवाजा खोल उनके पास खड़ा हो गया... भाभी मेरी ओर बड़े प्यार से देख रही थी .. पर मैं उनसे नजरें नहीं मिला पा रहा था|



मेरी मनो दशा मुझे अंदर से झिंझोड़ रही थी... मुझे अपने ऊपर घिन्न आ रही थी... अपने द्वारा हुए इस पाप से मन भारी हो चूका था| मैं भाभी से माफ़ी मांगना चाहता था.. परन्तु इससे पहले मैं कुछ कह पाता, नेहा भाभी को ढूंढती हुई आ गई... जब उसने भाभी से पूछा की वो कहाँ थीं तो उन्होंने मेरी ओर देखते हुए झूठ बोल दिया:

"बेटा मैं ठकुराइन चाची के पास गई थी वहां से अभी- अभी तुम्हारे चाचा के पास आई तो उन्होंने बताया की उनके सर में दर्द हो रहा है.. तो मैं तेल लगाने वाली थी| (भाभी ने तेल की शीशी की ओर इशारा करते हुए कहा)

मैं: नहीं भाभी रहने दो.. मैं थोड़ी देर सो जाता हूँ... आप जाओ खाना खा लो|

भाभी उठीं और चल दी... मैं उन्हें जाते हुए पीछे से देखता रहा| मैं आँगन पमें पड़ी चारपाई पे लेट गया और सोचने लगा...

क्या अभी जो कुछ हुआ वो पाप था?

यदि भाभी गर्भवती हो गई तो? उनका क्या होगा ? और उस बच्चे का क्या होगा?

ये सब सोचते-सोचते सर दर्द करने लगा... मैं निर्णय नहीं ले पा रहा था की मैं क्या करूँ? सर दर्द और पेट भरा होने के कारन आँखें कब बोझिल हो गईं और कब नींद आ गई पता ही नहीं चला| जब आँख खुली तो शाम के सात बज रहे थे, मैं उठा और स्नान घर में जा के स्नान किया... स्नान करते हुए जब ध्यान अपने तने हुए लंड पे गया तो दोपहर की घटना फिर याद आ गई और अपने ऊपर शर्म आने लगी की कैसे देवर हूँ मैं जिसने अपनी ही भाभी को.... छी ..छी..छी... मुझे तो चुल्लू भर पानी में डूब मारना चाहिए| यही कारण था की मैं नहाने के बाद रसोई के आस पास भी नहीं जा रहा था... मैं छत पे आ गया और टहलने लगा... अंदर ही अंदर खुद को कोसते हुए.... मैं छत के एक किनारे खड़ा हो गया और चन्दर भैया के घर की ओर देखते हु सोचने लगा की क्या मुझे भाभी से माफ़ी मांगनी चाहिए?

अभी मैं अपनी इस असमंजस की स्थिति से बहार भी नहीं आया था की नेहा ने मुझे नीचे से आवाज दी:

"चाचू...माँ आपको बुला रही है|"

नेहा की बात सुन के मेरे कान लाल हो गए.. ह्रदय की गति बढ़ गई और दिमाग ने काम करना बंद कर दिया| मन कह रहा था की कहीं भाभी नाराज तो नहीं? या किसी ने भाभी और मुझे वो सब करते देख तो नहीं लिया? या भाभी ने खुद ही ये बात तो सब को नहीं बता दी? इन सवालों ने मेरे क़दमों को जकड लिया की तभी नेहा ने फिर से मुझे पुकारा:

"चाचू..."

मैं: हाँ... मैं आ रहा हूँ|

लड़खड़ाते हुए मैं सीढ़ियों से नीचे उतरा और रसोई की ओर चल पड़ा... मन में घबराहट थी ओर चेहरा साफ़ बयां कर रहा था की मेरी फ़ट चुकी है| रसोई के पास एक छप्पर था जहाँ घर की औरतें और कभी-कभी मर्द बैठ के बातें वगैरह किया करते थे| जैसे ही मैं छप्पर के नजदीक पहुंचा तो मुझे किसी के खिल-खिला के हंसने की आवाज आई.. ये तो नहीं पता था की वो कौन है पर इस हंसी के कारन मेरे बेकाबू दिल को थोड़ी सांत्वना मिली| बाल-बाल बचे !!!

मैं छप्पर में दाखिल हुआ तो एक चारपाई पर रसिका भाभी और हमारे गाँव का अकड़ू ठाकुर जिस के बारे में मैंने आपको बताया था उसकी बेटी (माधुरी) बैठी थीं और दूसरी चारपाई पर भाभी और नेहा बैठे थे| माहोल देख के लगा जैसे वे सब आपस में कुछ खेल रहे थे और हसीं ठिठोली कर रहे थे... भाभी ने मुझे अपने पास बैठने का इशारा किया .. और मैं उनके पास बैठ गया| दरअसल वे सब एक दूसरे से टीम बना के पहेली पूछने का खेल रहे थे... अब चूँकि भाभी अकेली पड़ रहीं थी इसलिए उन्होंने मुझे बुलाया था|

मैं काफी हैरान था की भाभी के चेहरे पर एक शिकन तक नहीं और कहाँ मैं शर्म के मारे गड़ा जा रहा था| अब भी मैं भाभी से कोई बात नहीं कर पा रहा था... भाभी ने सब से आँख बचा के मुझे इशारे से पूछा की क्या बात है? पर मैंने इशारे से कहा की कुछ नहीं.... भाभी मुझे सवालिया नजरों से देख रही थी और मैं उनसे नजरें चुरा रहा था| भाभी ने माहोल को थोड़ा हल्का करने के लिए मुझसे साधारण बात शुरू की :

भाभी: मानु.. अब सर दर्द कैसा है?

मैं: जी.. अब ठीक है|

(मेरे इस फॉर्मल तरीके से भाभी कुछ परेशान दिखी उहें लगा की मैं उनसे नाराज हूँ|)

भाभी: अच्छा मानु हम यहाँ पहेली बुझने वाला खेल खेल रहे हैं और तुम मेरे पक्ष में हो|

मैं: पर भाभी आपतो जानते ही हो की मुझे भोजपुरी नहीं आती .. तो मैं आपकी कोई मदद नहीं कर पाउँगा|
मेरे मुख से "भाभी" सुन भाभी ने मुझे अपना झूठा गुस्सा दिखाया क्योंकि भाभी को हमेशा "भौजी" ही कहता था और सिवाय उनके मैंने "भौजी" शब्द किसी और के लिए कभी भी इस्तेमाल नहीं किया था किसका उनको गर्व था|

भाभी: तो क्या हुआ??? तुम मेरे पास तो बैठ ही सकते हो ?

मैं: ठीक है...

दरअसल उत्तर प्रदेश का होने के बावजूद मुझे अभी तक भोजपुरी भाषा नहीं आती... मैंने आज तक किसी से भी भोजपुरी में बात नहीं की.. या तो अंग्रेजी अथवा हिंदी भाषा का ही प्रयोग किया| अब जब भोजपुरी ही नहीं आती तो भोजपुरी की पहेलियाँ कैसे बुझूंगा|
उनका खेल चल रहा था ... परन्तु मैंने एक बात गौर की... माधुरी मुझे देख के कुछ ज्यादा ही मुस्कुरा रही थी... और ये बात भाभी ने भी गौर की परन्तु मुझसे अभी इस बारे में कुछ नहीं कहा| खेल जल्द ही समाप्त हो गया और भाभी हार गईं... उनकी हार का अफ़सोस तो मुझे था ही पर साथ-साथ उनकी मदद न कर पाने का दुःख भी| जाते-जाते माधुरी मुझे "गुड नाईट" कह गई और मैंने भी उसकी बात का जवाब "गुड नाईट" से दिया... भाभी तो जैसे जल भून गई होगी... खेर उन्होंने मुझे कुछ नहीं कहा और इस कड़वी बात को पी के रह गई|

तकरीबन एक घंटे बाद बच्चे खाना खा के उठ चुके थे और अब घर के बड़े खाना खाने जा रहे थे... मैं भी खाना खाने जा ही रहा था की भाभी ने मुझे इशारे से रोक दिया, और कहा:

"मानु .. जरा मेरी मदद कर दो .. ये भूसा बैलों को डालने में ..."

चन्दर भैया: तू खुद नहीं दाल सकती.. मानु भैया को खाना खाने दे..

मैं: अरे कोई बात नहीं भैया... आज पहली बार तो भाभी ने मुझे कुछ काम बोला है...

मेरी बात सुन सब हंस पड़े और मैं भी झूठी हंसी हंस दिया…
भाभी और मैं भूसा रखने के कमरे की और चल दिए... अंदर पहुँच के भाभी ने मुझे कास के गले लगा लिया... उनकी इस प्रतिक्रिया से मैं पिघल गया और आखिर कार अपने चुप्पी तोड़ डाली:

मैं: आज दोपहर जो भी हुआ उसके लिए....आप मुझे माफ़ कर दो| साड़ी गलती मेरी है.. मुझे आपसे वो सब नहीं करना चाहिए था.. दरअसल मैं आपसे कुछ और कहना चाहता था.... मैं आपसे आई लव यू कहना चाहता था पर बोल नहीं पाया और आप मेरी चुप्पी का गलत मतलब समझ रहे थे... प्लीज मुझे माफ़ कर दो !!!

भाभी: अब मैं समझी की तुम मुझसे नजरें क्यों चुरा रहे थे.... पर तुम माफ़ी किस लिए मांग रहे हो.. जो कुछ भी हुआ उसमें मेरी रजामंदी भी शामिल थी... अगर कोई कसूरवार है तो वो मेरी हैं... मैं तुम्हें बता नहीं सकती की तुम ने जो आज मुझे शारीरिक सुख दिया है उसके लिए मैं कितने सालों से तड़प रही थी| तुमने मुझे आज तृप्त कर दिया...

उनकी बात सुन के मेरे पाँव तले जमीन खिसक गई...मुझे उनसे इस जवाब की उम्मीद कतई नहीं थी| मेरी आँखें आस्चर्य से फ़ट गई ...

मैं: सच भौजी ....

भाभी: तुम्हारी कसम मानु... मैंने तुम्हारे भैया को भी खुद को छूने का अधिकार नहीं दिया और न ही कभी दूँगी| तुम ही मेरे पति हो !!!

मैं: पर भौजी आप ऐसा क्यों कह रही हो? चन्दर भैया... नेहा .. ये ही आपका परिवार है| मुझ दुःख इस बात का था की मैं आपके पारिवारिक जिंदगी में दखलंदाजी कर रहा हूँ .... और न केवल दखलंदाजी बल्कि मैं आपकी पारिवारिक जिंदगी तबाह कर रहा हूँ| इसी बात पे मुझे शर्म आ रही थी... और मैं आपसे नज़र चुरा रहा था|

भाभी: मानु तुम अभी बहुत सी बातें नहीं जानते... अगर जानते तो मेरी बात समझ सकते|

मैं: तो बताओ मुझे?

भाभी: अभी नहीं ....

मैंने गोर किया की भाभी की आँखें नाम हो चलीं थी... इसलिए मैंने उन्हें अपने पास खींचा और उन्हें जोर से गले लगा लिया| जैसे मैं भाभी को अपने अंदर समां लेना चाहता था मेरी छाती स्पर्श पाते ही भाभी के अंदर उठा तूफान शांत हुआ|
हम दोनों शाहरुख़ खान की फिल्म के किसी सीने की तरह खड़े हुए थे | भाभी मेरी और देख रही थी.. और मैं उनकों सांत्वना देना चाहता था.. इसलिए मैंने भाभी के होंठों को अपने होंठों की गिरफ्त में ले लिया परन्तु इस बार मन में वासना नहीं थी.. मैं उनका दुःख कम करना चाहता था|

दिमाग ने मन को संदेसा भेजा की अब यहाँ ज्यादा देर रुकना खतरे से खाली नहीं! इसलिए मैंने भाभी से आखरी शब्द कहे:

मैं: भौजी अब हमें चलना चाहिए .. नहीं तो लोग शक करेंगे की ये दोनों इतनी देर से भूसे के कमरे में क्या कर रहे हैं?

भाभी ने बस हाँ में गर्दन हिला दी| मुझे कहीं न कहीं ऐसा लग रहा था की भाभी मुझ से नाराज है इसलिए मैंने अपने मन की तसल्ली के लिए उनसे पूछा:

मैं: भौजी आप मुझसे नाराज तो नहीं ?

भाभी: नहीं तो .. तुम्हें ऐसा क्यों लगा?
भाभी ने पास ही पड़ी भूसे से भरी टोकरी उठाने झुकीं... परन्तु मैंने उनके हाथ से टोकरी छीन ली|

मैं: क्योंकि आप एक डैम से चुप हो गए...

मेरी इस बात का जवाब उन्होंने अपने ही अंदाज में दिया जिसने मेरे लंड में तनाव पैदा कर दिया| भाभी मेरी ओर बढ़ीं और मेरे गलों को अपने होंठों में भर लिया और उन्हें धीरे-धीरे दांत से काटने लगीं| मेरे शरीर में जैसे करंट दौड़ गया पर करता क्या.. सर पे टोकरी थी जिसे मैंने अपने दोनों हाथों से पकड़ा हुआ था| भाभी ने मेरी इस हालत का भरपूर फायदा उठाया और दो मिनट बाद जब उनका मन भर गया तब वो हटीं और उनके मादक रास को मेरे गलों से पोंछने लगीं|

मैं: भाभी बहुत सही फायदा उठाया आपने मेरी इस हालत का?

भाभी: ही.. ही.. ही...

मैं वो टोकरी उठा के बैलों के पास आया और उन्हें चारा डाल दिया| अब मन पहले से शांत था पर लंड में तनाव था जिसे छुपाना मुश्किल हो रहा था इसलिए मैंने सोचा की क्यों न स्नान कर लिया जाए|

गर्मियों के दिनों में, चांदनी रात में ठन्डे पानी से खुले आसमान के तले नहाने में क्या मजा आता है, ये मैं आपको नहीं बता सकता| इस स्नान ने मेरे अंदर की वासना की ज्वाला को बुझा दिया था परन्तु मन ही मन भाभी की बातें मुझे तड़पाने लगीं थी| आखिर उन्होंने मुझे अपने पति का दर्ज क्यों दिया? कोई भी स्त्री यूँ ही किसी को अपने पति का दर्जा नहीं देती! कहीं ये उनका मेरे प्रति आकर्षण तो नहीं? क्या बात है जो भाभी मुझसे छुपा रही हैं? मैं इन सभी बातों का जवाब भाभी से चाहता था...

खेर मैं स्नान करके कुरता पजामा पहन के तैयार हो गया .. और रसोई की और चल दिया| अब तक घर के सभी पुरुष भोजन कर चुके थे केवल स्त्रियां ही रह गईं थी| जैसे ही भाभी ने मुझे देखा उन्होंने मुझे छापर में ही बैठने को कहा, उनकी बात भला मैं कैसे टाल सकता था| मैं छापर में बिछे तखत पे आलथी-पालथी मार के भोजन के लिए बैठ गया उस समय छप्पर में कोई नहीं था... बड़की अम्मा (बड़ी चाची), माँ और रसिका भाभी सब बहार हाथ-मुँह धो रहे थे| भाभी एक थाली में भोजन ले के आई:

भाभी: मानु तुम भोजन शुरू करो मैं अभी आती हूँ|

मैं: आप मेरे साथ ही भोजन करोगी?

भाभी: क्यों? मैं तुम्हारे हिस्से का भी खा जाती हूँ इसलिए पूछ रहे हो?

मैं: नहीं दरअसल अभी बड़की अम्मा (बड़ी चाची) और रसिका भाभी भी तो भोजन खाएंगे.. और उनके सामने आप मेरे साथ कैसे भोजन कर सकते हो?

भाभी: अरे वाह... बड़ी चिंता होने लगी तुम्हें मेरी? चिंता मत करो... फंसऊँगी तो मैं तुम्हे ही !!!

मैं: ठीक है भौजी आप आ जाओ फिर दोनों एक साथ शुरू करेंगे|

तभी माँ, बड़की अम्मा और रसिका भाभी आ गए और अपनी-अपनी जगह भोजन के लिए बैठ गए| भाभी ने सब को भोजन परोसा और फिर मेरे पास आके तखत पे बैठ गईं और हम दोनों ने भोजन आरम्भ किया| ना जाने क्यों पर रसिका भाभी से ये सब देखा नहीं गया और उन्होंने हमें टोका:

रसिका भाभी: क्या बात है देवर-भाभी एक साथ, एक ही थाली में भोजन कर रहे हैं?

मैं: भाभी आपके आने से पहले जब मैं छोटा था तब भी हम एक साथ ही खाना खाते थे आप बड़की अम्मा से पूछ लो|

रसिका भाभी: तब तो तुम छोटे थे, अब शादी लायक हो गए हो| अब तो भाभी का पल्लू छोडो... ही ही ही ही

रसिका भाभी की जलन साफ़ दिख रही थी| मं कुछ बोलने वाला था की भाभी ने मुझे रोक दिया और खुद बीच-बचाव के लिए कूद पड़ीं|

भाभी: अभी मानु की उम्र ही क्या है, अभी ये पढ़ रहा है.. और जब तक ये अपने पाँव पे खड़ा नहीं होता ये शादी नहीं करेगा, है ना चाची?

माँ: बिलकुल सही कहा बहु| ये यहाँ के बच्चों की तरह थोड़े ही है जो मूँछ के बाल आये नहीं और शादी कर दी! और जहाँ तक इन दोनों के साथ खाना खाने की बात है तो बहु तुम इन दोनों को नहीं जानती, इसने तो अपनी भाभी का दूध भी पिया है| तुम्हें आये तो अभी कुछ समय हुआ है पर इनकी ओस्टि तो बहुत पुरानी है|

माँ की बात सुन रसिका भाभी का मुँह खुला का खुला रह गया| माँ ने जब दूध पीने की बात की तब मैंने अपना मुख शर्म के मारे दूसरी तरफ घुमा लिया था ताकि किसी को शक ना हो|

माँ की बात सुन बड़की अम्मा (बड़ी चाची) ने भी हाँ में हाँ मिलायी और अपनी थाली ले कर उठ खड़ी हुईं और साथ ही साथ रसिका भाभी भी खड़ी हो के थाली रखने चल दीं| मैं और भाभी चुप-चाप, धीरे-धीरे भोजन कर रहे थे.... जब माँ अपनी थाली लेके उठीं तब मैंने भाभी से कहा:

मैं: भौजी मुझे आप से कुछ बात करनी है?

भाभी: हाँ बोलो?

मैं: यहाँ नहीं... अकेले में...

भाभी: ठीक है तुम हाथ-मुँह धोके अपनी चारपाई पर लेटो मैं अभी थाली रख के आती हूँ|

मैं: नहीं भाभी ... उसमें थोड़ा खतरा है| चन्दर भैया कहाँ सोये हैं?

भाभी: वो आज चाचा (मेरे पिताजी) के साथ छत पे सोये हैं और तुम्हें भी वहीँ सोने को कहा है|

मैं: पर मैं वहां नहीं सोनेवाला .. आप ऐसा करो की हाथ-मुँह धो के अपने कमरे में जाओ| जब आपको लगे की सब सो गए हैं तब मुझे उठाना| 


RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन - sexstories - 07-15-2017

13

अब आगे....

भाभी: सिर्फ बात ही करोगे ना ???

भाभी की इस बात में छिपी शरारत को मैं भांप गया था!!!

मैं: मुझे सिर्फ आपसे बात करनी है और कुछ नहीं ....

माँ ने मुझे छत पे सोने के लिए कहा पर मैंने मन कर दिया की मुझे बहुत जोर से नींद आ रही है| उन्हें संतुष्टि दिलाने के लिए आज मैंने भोजन के उपरांत टहला भी नहीं और सीधे चारपाई पे गिरते ही सो गया|
सभी औरतें छापर के तले लेट गईं और अब मैं बेसब्री से इन्तेजार करने लगा की कब भाभी मुझे उठाने आएँगी|
सच कहूँ तो मन में अजीब सी फीलिंग्स जाग रही थी.. एक अजब सी बेचैनी... मैं बस करवटें बदल रहा था और ये नहीं जानता था की भाभी मुझे अपने घर के दरवाजे पे खड़ी करवटें बदलते देख रही थी| वो मेरे सिराहने आईं और नीचे बैठ के मेरे कानों में खुस-फुसाई:

भाभी: मानु चलो.... बात करते हैं|

मैं चौंकते हुए उन्हें देखने लगा और उनके पीछे-पीछे घर की और चल पड़ा| अंदर पहुँच भाभी दरवाजा बंद काने लगीं तो मैंने उन्हें रोक दिया:

मैं: भौजी प्लीज दरवाजा बंद मत करो.... मैं आपसे सिर्फ और सिर्फ बात करने आया हूँ|

भाभी: मानु मैं तुम्हारी बैचनी समझ सकती हूँ… पूछो क्या पूछना है?

अंदर दो चारपाइयां बिछी थीं, एक पे नेहा सो रही थी और दूसरी भाभी की चारपाई थी| मैं भाभी वाली चारपाई पे बैठ गया और भाभी नेहा की चारपाई पे|

मैं: मुझे जानना है की आखिर क्यों आपने मुझे अपने पति होने का दर्जा दिया? ऐसी कौन सी बात है जो आप मुझसे छुपा रहे हो?

भाभी: मानु आज मैं तुम्हें अपनी सारी कहानी सुनाती हूँ :

"हमारी शादी होने के बाद से ही तुम्हारे भैया और मेरे बीच में कुछ भी ठीक नहीं हो रहा था| सुहागरात में तो उन्होंने इतनी पी हुई थी की उन्हें होश ही नहीं था की उनके सामने कौन है? उस रात मुझे पता चला की तुम्हारे भैया की नियत मेरी छोटी बहन पर पहले से ही बिगड़ी हुई थी... उन्होंने मेरी बहन के साथ सम्भोग भी किया है!"

मैं: ये आप क्या कह रहे हो?

भाभी: सुहागरात को वो नशे में धुत थे की जब वो मेरे साथ वो सब कर रहे थे तब उनके मुख से मेरी बहन सोनी का नाम निकल रहा था| अपनी बहन का नाम सुनके मेरे तो पाँव टेल जमीन ही सरक गई| मैं तुम्हारे भैया को इस अपराध के लिए कभी माफ़ नहीं कर सकती.. उन्होंने मेरे साथ जो धोका किया...

इतना कहते हुए भाभी फूट-फूट के रोने लगीं| मुझसे भाभी का रोना बर्दाश्त नहीं हुआ और मैं उठ के उनके पास जाके बैठ गया और उन्हें चुप करने लगा| भाभी ने सुबकते हुए अपनी बात जारी रखी....

भाभी: मानु तुम्हारे भैया ना मुझसे और ना ही नेहा से प्यार करते हैं| उन्हें तो लड़का चाहिए था और जब नेहा पैदा हुई तो उन्होंने अपना सर पीट लिया था| और सिर्फ वो ही नहीं .. घर का हर कोई मुझसे उम्मीद करता है की मैं लड़का पैदा करूँ| तुम ही बताओ इसमें मेरा क्या कसूर है?

मैंने भाभी को अपनी बाँहों में भर लिया... मुझे उनकी दुखभरी कहानी सुन अंदर ही अंदर हमारे इस सामाजिक मानसिकता पे क्रोध आने लगा| पर मैंने भाभी के समक्ष अपना क्रोध जाहिर नहीं किया ... बस धीरे-धीरे उनके कंधे को रगड़ने लगा ताकि भाभी शांत हो जाये|

भाभी को सांत्वना देते-देते मैं उनकी तरफ खींचता जा रहा था .. भाभी ने अपना मुख मेरे सीने में छुपा लिया और उनकी गरम-गरमा सांसें मेरे तन-बदन में आग लगा चुकी थीं| पर अब भी मेरा शरीर मेरे काबू में था और मैं कोई पहल नहीं करना चाहता था, क्योंकि मेरी पहल ऐसे होती जैसे मैं उनकी मजबूरी का फायदा उठा रहा हूँ| मैं बस उन्हें सांत्वना देना चाहता था.. और कुछ नहीं| भाभी की पकड़ मेरे शरीर में तेज होने लगी.. जैसे वो मुझसे पहल की उम्मीद रख रही थी... उन्होंने मेरी और देखा ... उनकी आँखों में मुझे अपने लिए प्यार साफ़ दिखाई दे रहा था| उनके बिना बोले ही उनकी आँखें सब बयान कर रही थी.... मैं उनकी उपेक्षा समझ चूका था पर मेरा मन मुझे पहल नहीं करने दे रहा था... शायद ये मेरे मन में उनके प्रति प्यार था|

मुझे पता था की यदि मैं और थोड़ी देर वहां रुका तो मुझसे वो पाप दुबारा अवश्य हो जायेगा| इसलिए मैं उठ खड़ा हुआ और दरवाजे के ओर बढ़ा ... परन्तु भाभी ने मेरे हाथ थाम के मुझे रोक लिया... मैंने पलट के उनकी ओर देखा तो उनकी आँखें फिर नम हो चलीं थी| मैं भाभी के नजदीक आया ओर अपने घटनों पे बैठ गया...

मैं: भौजी ... प्लीज !!!

प्लीज सुनते ही भाभी की आँखों से आंसूं छलक आये....

भाभी: मानु .. तुम भी मुझे अकेला छोड़ के जा रहे हो?

ये सुनते ही मेरे सब्र का बांध टूट गया… मैंने उन्हें अपने सीने से लगा लिया|

मैं: नहीं भौजी... मैं आपके बिना नहीं जी सकता| बस मैं अपने आप को ये सब करने से रोकना चाहता था| पर अगर आपको इस सब से ही ख़ुशी मिलती है तो मैं आपकी ख़ुशी के लिए सब कुछ करूँगा|

मैं फिर से खड़ा हुआ और जल्दी से दरवाजा बंद किया और कड़ी लगा दी| मैं भाभी के पास लौटा और उन्हें उठा के उनकी चारपाई पर लेटा दिया| भाभी ने अपनी बाहें मेरे गले में दाल दी थीं और मुझे छोड़ ही नहीं रही थी.. उन्हें लगा की कहीं मैं फिर से उन्हें छोड़ के चला ना जाऊँ| 

मुझे डर था की अगर मैंने कुछ शुरू किया और किसी ने फिर से रंग में भांग दाल दिया तो हम दोनों का मन ख़राब हो जायेगा इसलिए मैंने भाभी से स्वयं पूछा :

मैं: भाभी आज तो कोई नहीं पानी डालेगा ना?

भाभी: नहीं मानु... तुम्हारे अजय भैया भी छत पे सोये हैं|

मैं: आपका मतलब.. छत पे आज पिताजी, अशोक भैया और अजय भैया सो रहे हैं| आज तो किस्मत बहुत मेहरबान है!!!

भाभी: मेरी किस्मत को नजर मत लगाओ !!!

ये बात तो तय थी की आज अजय भैया और रसिका भाभी का झगड़ा नहीं होगा... मतलब आज सब कुछ अचानक मेरे पक्ष में था| मेरे मन में एक ख्याल आया ... क्यों न मैं भाभी को वो सुख दूँ जिसके लिए वो तड़प रही हैं| मैंने भाभी से कहा कुछ नहीं बस उनके होंठों को धीरे से चुम लिया... और मैंने दूर हटना चाहा पर भाभी की बाहें जो मेरी गर्दन के इर्द-गिर्द थीं उन्होंने मुझे दूर नहीं जाने दिया| मैं भाभी के ऊपर फिर से झुक गया और उनके होंठों को अपने होंटों की गिरफ्त में ले लिया... सबसे पहला आक्रमण भाभी ने किया... उन्होंने मेरे होंठों का रास पान करना शुरू कर दिया और मेरी गर्दन पर अपनी पकड़ और मजबूत कर दी| भाभी का ये आक्रमण करीब पांच मिनट चला... अब मुझे भी अपनी प्रतिक्रिया देनी थी.. की कहीं भाभी को बुरा न लगे| मैंने भाभी के गुलाबी होंठों को अपने दांतों टेल दबा लिया और उन्होंने चूसने लगा... मैंने अपनी जीभ भाभी के मुख में दाखिल करा दी और उनके मुख की गहराई को नापने लगा| रात की रानी की खुशबु कमरे को महका रही थी... और भाभी और मैं दोनों बहक ने लगे थे पर मेरे मन में आये उस ख्याल ने मुझे रोक लिया|

अब मुझे असहज (अनकम्फ़ोर्टब्ले) महसूस हो रहा था... क्योंकि इतनी देर झुके रहने से पीठ में दर्द होने लगा था|मैंने अपनी कमर सीढ़ी की और भाभी के ऊपर आ गया .. उनके माथे को चूमा .... फिर उनकी नाक से अपनी नाक रगड़ी.... उनके दायें गाल को अपने मुख में भर के चूसा और अपने दाँतों के निशान छोड़े.. फिर उनके बाएं गाल को चूसा और उसपे भी अपने दांतों के निशान छोड़े... और धीरे-धीरे नीचे बढ़ने लगा|

उनकी योनि के पास आके रुक गया... और फिर धीरे-धीरे उनकी साडी ऊपर करने लगा| मुझे इस बात की तसल्ली थी की आज हमें कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा …मुझे ये जान के बिलकुल भी आस्चर्य नहीं हुआ की आज भी भाभी ने पैंटी नहीं पहनी थी| मैंने भाभी के योनि द्वार को चूमा... फिर उन्हें धीरे से अपने होंठों से रगड़ ने लगा| भाभी किसी मछली की तरह मचलने लगीं... मैंने उन पतले-पतले द्वारा को अपने मुख में भर लिया और चूसने लगा... अभी तक मैंने अपनी जीभ उनकी योनि में प्रवेश नहीं कराई थी और भाभी की सिस्कारियां शुरू हो चुकी थीं...

स्स्स...अह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह ... स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स माआआआआउउउउउउउ उम्म्म्म्म्म्म्म ....

जैसे ही मैंने अपनी जीभ की नोक से भाभी के भगनसे को छेड़ा... भाभी मस्ती में उछाल पड़ीं और अपने सर को तकिये पे इधर-उधर पटकने लगी| भाभी की प्रतिक्रिया ने मुझे चौंका दिया और मैं रूक गया... भाभी ने अपनी उखड़ी हुई सांसें थामते हुए कहा:

"मानु रुको मत.... प्लीज !!!"

मैंने रहत की सांस ली और अपने काम में जुट गया| अब मैंने अपनी जीभ भाभी के गुलाबी योनि में प्रवेश करा दी| अंदर से भाभी की योनि धा-धक रही थी.. एक बार को तो मन हुआ की जल्दी से अपना पजामा उतारूँ और अपने लंड को भाभी की योनि में प्रवेश करा दूँ ! पर फिर वाही ख्याल मन में आया और मैंने अपने आप को जैसे-तैसे कर के रोक लिया| मैंने भाभी की योनि में अपनी जीभ लपलपानी शुरू कर दी... उनकी योनि से आ रही महक मुझे मदहोश कर रही थी और साथ ही साथ प्रोत्साहन भी दे रही थी| मैंने भाभी की योनि की खुदाई शुरू कर दी थी और भाभी की सीत्कारियां तेज होने लगीं थी....

स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स म्म्म्म्म्म्म्म्म्म ह्ह्ह्ह ... अन्न्न्न्न्न्न्ह्ह्ह्ह माआआंउ....

भाभी के अंदर का लावा बहार आने को उबाल चूका था| और एक तेज चीख से भाभी झड़ गईं...

आअह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह .....मानु.......

भाभी का रस ऐसे बहार आया जैसे किसी ने नदी पे बना बाँध तोड़ दिया हो.... कमरे में तो पहले से ही रात रानी के फूल की खुशबु फैली हुई थी उसपे भाभी के योनि की सुगंध ने कमरे को मादक खुशबु से भर दिया और उस मादक खुशभु ने मुझे इतना बहका दिया की मैंने भाभी के रस को चाटना शुरू कर दिया| उसका स्वाद आज भी मुझे याद है... जैसे किसी ने गुलाब के फूल की पंखुड़ियों को शहद में भिगो दिया हो...

मैं सारा रस तो नहीं पी पाया पर अब भी मैं भाभी की योनि को बहार-बहार से चाट के साफ़ कर रहा था... भाभी की सांसें समान्य हो गई और उनके चेहरे पे संतुष्टि के भाव थे.. उन्हें संतुष्ट देख के मेरे मन को शान्ति प्राप्त हुई| भाभी ने मुझे अपने ऊपर खींच लिया.... मैं भाभी के ऊपर था और मेरा लंड ठीक भाभी की योनि के ऊपर| बस फर्क ये था की मैंने अपने पजामे का नाड़ा नहीं खोला था इसलिए मेरा लंड तन चूका था परन्तु कैद में था|

मैं ठीक भाभी के ऊपर था ... भाभी की सांसें आगे होने वाले हमले के कारन तेज हो रहीं थीं... भाभी ने अपना हाथ मेरे लंड पे रख दिया... ये सोच के की मैं उनके साथ सम्भोग करूँगा| परन्तु वे मेरे मन में उठ रहे विचार के बारे में नहीं जानती थी| जैसे ही भाभी के हाथ ने मेरे लंड को छुआ मैंने भाभी की आँखों में देखते हुए ना में गर्दन हिला दी| भाभी मेरी इस प्रतिक्रिया से हैरान थी.. मित्रों जब कोई सामने से आपको सम्भोग के लिए प्रेरित करे तो ना करना बहुत मुश्किल होता है... परन्तु यदि आपके मन में उस व्यक्ति के प्रति आदर भाव व प्रेम है और उसकी ख़ुशी के लिए आप कुछ भी करने से पीछे नहीं हटोगे, ऐसी आपकी मानसिकता हो तो आप अपने आप पर काबू प् सकते हो अन्यथा आप सिर्फ और सिर्फ एक वासना के प्यासे जानवर हो!!! ऐसा जानवर जो अपनी वासना की तृप्ति के लिए किसी भी हद्द तक जा सकता है|

मैं: नहीं भाभी... आज नहीं

भाभी: क्यों?

मैं: भाभी मैंने कुछ सोचा है....

भाभी: क्या?

मैं: आपके जीवन में दुखों का आरम्भ आपकी सुहागरात से ही शुरू हुआ था ना? तो क्यों ना वाही रात आप और मैं फिर से मनाएं?

भाभी: मानु तुम मेरे लिए इतना सोचते हो... ?

मैं: हाँ क्योंकि मैं आपसे प्यार करता हूँ... और हमारी सुहागरात कल होगी| तब तक आपको और मुझे हम दोनों को सब्र करना होगा|

भाभी: परन्तु मानु .... तुम्हें वहाँ दर्द हो रहा होगा!

भाभी ने मेरे लंड की ओर इशारा करते हुए कहा|

मैं: आप उसकी चिंता मत करो... वो थोड़ी देर में शांत हो जायेगा| आप दिन भर के काम के बाद ओर अभी आई बाढ़ के बाढ़ तो थक गए होगे... तो आप आराम करो|

इतना कह के मैं चल दिया .. पर भाभी की आवाज सुन के मैं वहीँ रुक गया|

भाभी: मानु.. तुम सोने जा रहे हो?

मैं: हाँ

भाभी: मेरी एक बात मानोगे?

मैं: हुक्म करो!

भाभी: तुम मेरे पास कुछ और देर नहीं बैठ सकते... मुझे तुम से बातें करना अच्छा लगता है| दिन में तो हम बातें कर नहीं सकते|

मैं: ठीक है....

और मैं नेहा की चारपाई पर बैठ गया|

भाभी: वहाँ क्यों बैठे हो मेरे पास यहाँ बैठो... 

सच कहूँ मित्रों तो मैं भाभी से दूर इसलिए बैठा था की कहीं मैं अपना आपा फिर से ना खो दूँ| पर भाभी के इस प्यार भरे आग्रह ने मुझे उनके पास जाने के लिए विवश कर दिया|
मैं उठा और भाभी की चारपाई पर लेट गया... कुछ इस प्रकार की मेरी पीठ दिवार से लगी थी और टांगें सीधी थी| भाभी ठीक मेरे बगल में लेटी हुई थीं.. उन्होंने मेरी कमर में झप्पी डाल ली और बोलने लगीं:

भाभी: मानु ... तुम पूछ रहे थे ना की क्यों मैंने तुम्हें अपने पति का दर्जा दिया? क्योंकि तुम मुझे कितना प्यार करते हो... तुमने अभी जो मेरे लिए किया .. तुम्हारे भैया ने कभी मेरे साथ नहीं किया| तुम मेरी ख़ुशी के लिए कितना सोचते हो.. और मुझे यकीन है की मेरी ख़ुशी के लिए तुम कुछ भी करोगे... पर "उन्हें" तो केवल अपनी वासना मिटानी होती थी| तुम नेहा से भी कितना प्रेम करते हो... जब मैं शहर आई थी तब तुमने नेहा का कितना ख्याल रखा और उस दिन जब नेहा ने तुम्हारी चाय गिरा दी तब भी तुम उसी का पक्ष ले रहे थे| तुम्हारे मन में स्त्रियों के लिए जो स्नेह है वो आजकल कहाँ देखने को मिलता है.. तुम्हारी इन्ही अच्छाइयों ने मुझे सम्मोहित कर दिया... जब तुम छोटे थे तब हमेशा मेरे साथ खेलते थे और मैं खाना बना रही होती थी और तुम मेरी गोद में आके बैठ जाते थे और मेरा दूध पीते थे| सच कहूँ मानु तो तुम मेरी जिंदगी हो... मैं तुम्हारे बिना एक पल भी नहीं रह सकती|
तुम ये कभी मत सोचना की तुमने कोई पाप किया है .... क्योंकि आज जो भी कुछ हुआ हमारे बीच में वो पाप नहीं था... बल्कि तुमने एक अतृप्त आत्मा को सुख के कुछ पल दान किये हैं|

ये कहते-कहते भाभी का हाथ मेरे लंड पे आ गया ....वो अब भी सख्त था| मैं मन के आगे विवश था और मेरा सब्र टूट रहा था... मैंने अपना हाथ भाभी के हाथ पे रख दिया और उन्हें रोकने लगा.. दरअसल मैं कल रात के बारे में सोच रहा था और नहीं चाहता था की मैं भाभी के लिए जो सरप्राइज मैंने प्लान किया है उसे मैं ही ख़राब करूँ!

भाभी: मानु.... तुम मेरे लिए इतना कुछ सोच रहे हो.. मुझे खुश करने के लिए तुम जो प्लान कर रहे हो... मेरा भी तो फर्ज बनता है की मैं भी तुम्हारा ख्याल रखूँ| प्लीज मुझे मत रोको....

अब मेरे सब्र ने भी जवाब दे दिया और मैंने अपना हाथ भाभी के हाथ से हटा लिया.... भाभी ने मेरे पजामे का नाड़ा खोला और मेरे कच्छे में बने टेंट जो देखा .... फिर उन्होंने अपने हाथ से मेरे लंड को आजाद किया... अब समां कुछ इस प्रकार था की रात रानी की खुशबु में मेरे लंड की भीनी-भीनी सुगंध घुल-निल गई| भाभी ने पहले तो मेरे लंड को अपने होंठों से छुआ .. उनकी इस प्रतिक्रिया से मेरे शरीर में जहर-झूरी छूट गई और मैं काँप सा गया| भाभी ने आव देखा न ताव और झट से मेरे लंड को अपने होठों में भर लिया| भाभी ने अभी तक अपनी जीभ का प्रयोग नहीं किया था ... मेरे लंड को अंदर ले के भाभी ने उसे अपने थूक से नहला दिया और जैसे ही उन्होंने मेरे लंड से अपनी जीभ का संपर्क किया मुझे जैसे बिजली का झटका लगा... और ये तो केवल शुरुआत थी.. भाभी ने मेरे लंड को अपने मुख में भर के अंदर निगलना शुरू किया जिससे मेरे लंड के ऊपर की चमड़ी खुल गई और छिद्र सीधा भाभी के गले के अंत में लटके हुए उस मांस के टुकड़े से टकराया| मैं सहम के रह गया और भाभी को उबकाई आ गई.. उनकी आँखों में पानी था जैसा की उबकाई आने पर आ जाता है| परन्तु भाभी ने फिर भी मेरे लंड को नहीं छोड़ा और उसे धीरे-धीरे चूसने लगीं|

बीच-बीच में भाभी अपनी जीभ मेरे लंड के छिद्र पे रगड़ देती तो मैं तड़प उठता और मेरे मुख से मादक सिस्कारियां फुट पड़तीं|

"स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स" आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह ....

मुझे इतना मजा कभी नहीं आय जितना उस पल आ रहा था... भाभी मेरे लंड को किसी टॉफी की भाँती चूस रही थी.. मजे को और दुगना करने के लिए मैंने भाभी से कहा:

"भौजी ...अपने दांत से धीरे-धीरे काटो!"

भाभी ने अपने दांत मेरे लंड पे गड़ाना शुरू कर दिया... और मैं आनंद के सागर में गोते लगाने लगा.. मेरी आँखें बंद हो चुकी थी और भाभी का मुख इतना गीला प्रतीत हो रहा था की पूछो मत! भाभी ने अब मेरे लंड को आगे पीछे कर के चूसना शुरू कर दिया ... जब वो लंड को अंदर तक लेटिन तो सुपाड़ा खुल जाता और जब भाभी लंड बहार निकलती तो लंड की चमड़ी बिल्कुक बंद हो जाती... ये सब भाभी बिना किसी चिंता और दर के कर रही थी.. उनकी चूसने की गति इतनी धीमे थी की एक पल के लिए लगा जैसे ये कोई सुखदाई सपना हो... और मैं इस सपने को पूरा जीना चाहता था|

मैं अब चार्म पे पहुँच चूका था और अब बर्दाश्त करना मुश्किल था... मैंने भाभी से दबी हुई आवाज में अनुरोध किया:

मैं: भाभी ... प्लीज छोड़ दो ... मेरा निकलने वाला है... वार्ना सारे कपडे गंदे हो जायेंगे!!!

भाभी ने मेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया और अपने आक्रमण को जारी रखा.... मुझसे अब और कंट्रोल नहीं हुआ... और अंदर की वासना कुछ इस तरह बहार आई जैसे किसी ने कोका कोला की बोतल का मुंह बंद करके जोर से हिलाया हो और जब दबाव बढ़ गया तो बोतल का मुख खोल दिया... सारा वीर्य रस भाभी के मुख में भर गया... मुझे तो लगा की भाभी सब का सब मेरे ही पजामे के ऊपर उगल देंगी... परन्तु उन्होंने सारा का सारा रस पी लिया... मेरी सांसें कुछ सामान्य हुईं| और मैंने अपने लंड की और देखा वो बिलकुल चमक रहा था ... भाभी के मुख में रहने से उनके रस में लिप्त!!! मैंने भाभी की ओर देखा तो उनके चेहरे पे अनमोल सुख के भाव थे... मैंने उनके माथे पे चुम्बन किया और खड़ा होके अपना पजामा बंधा|

मैं: भौजी आपने तो जान ही निकाल दी थी....

भाभी: क्यों?

मैं: मुझे लगा था की आज तो मेरे नए कुर्ते-पजामे का बुरा हाल होना है पर आपने तो ... कमाल ही कर दिया|

बहभी: मुझसे काबू नहीं हुआ ... मैंने आजतक ऐसा कभी नहीं किया... बल्कि मुझे तो इससे घिन्न आती थी... पर तुमने आज ....

मैं: मैं आज क्या ?

भाभी: तुमने आज मेरी साड़ी जिझक निकाल दी .... पर ये सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए था... पर ये तो बताओ की तुम शुरू-शुरू में मुझे रोक क्यों रहे थे|

अब मैं अपना पजामे का नाड़ा बांध चूका था|

मैं: क्योंकि मैं ये सब कल के लिए बचाना चाहता था|

भाभी ने मुझे इशारे से अपने पास बुलाया.... उनके और मेरे मुख से हमारे काम-रस की सुगंध आ रही थी| हम दोनों ही मन्त्र मुग्ध थे... और फिर से भाभी और मैंने एक गहरा चुम्बन किया ... भाभी ने मुझे इशारे से कहा की लोटे में पानी है.. कुल्ला कर के सोना|
मैंने भाभी का हाथ पकड़ के उठाया और हम दोनों स्नान घर तक गए और साथ-साथ कुल्ला किया| करीबन ढाई बजे थे.. अब समय था सोने का... भाभी का तो पता नहीं पर मैं थका हुआ महसूस कर रहा था और नींद भी आ रही थी| मैं बिस्तर पे पड़ा और घोड़े बेच के सो गया| 


RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन - sexstories - 07-15-2017

14

अब आगे....

माँ ने मुझे उठाया.. समय देखा तो सुबह के छह बजे थे…. नया दिन... नया जोश और रात के प्लान के बारे में सोच के उत्साह से रोंगटे खड़े हो गए थे| मन में उल्लास था.... भाभी को देखा तो वो नेहा को तैयार कर रही थी... मैंने उनकी और देखा और मुस्कुरा के नहाने चला गया| पर मैं आनेवाले खतरे से अनजान था...

नहा धो के तैयार हो गया और शांत मन से रात के प्लान के लिए मन ही मन सोचने लगा... मन में तो ख्याल था की फूलों की सेज सजी हो पर ये भी डर था की ये फूल किसी से नहीं छुपेंगे... और कहीं इन्हीं फूलों का फायदा भैया ना उठा लें!!!! अभी मैं मन ही मन सोच रहा था की तभी पिताजी ने मेरे कान के पास एक ऐसा बम फोड़ा की मेरा सारा शरीर सुन हो गया.....

पिताजी: क्यों लाड-साहब रात को छत पे क्यों नहीं सोये?

मैं: बहुत थक गया था... इसीलिए कब नींद आ गई पता ही नहीं चला|

पिताजी: थक गया था? ऐसा कौन सा पहाड़ खोद दिया तुमने?

चन्दर भैया: चाचा मानु भैया कल रात को जानवरों को चारा डालने में भाभी की मदद कर रहे थे... इसीलिए थक गए!

भैया की बात सुनके दोनों चाचा-भतीजा हँसने लगे| मैं भी उनका साथ देने के लिए हँसा... असल में मुझे भाभी की बातें याद आ रही थी और मैं भैया से नफरत करने लगा था| पर यदि मैं अपनी नफरत जाहिर करता तो कोई भी भाभी और मुझपे शक करता| अभी तक भाभी और मेरे रिश्ते को सब दोस्तों जैसे रिश्ता ही समझते थे... और मैं नहीं चाहता था की वे सब इस ब्रह्म से बहार अायें|

पिताजी: तो लाड-साहब चलना नहीं है क्या?

मैं: (चौंकते हुए ) कहाँ?

पिताजी: जिस काम के लिए आये थे?

मैं: किस काम के लिए?

पिताजी: तुम तो यहाँ आके अपनी भाभी के साथ इतना घुल-मिल गए की यात्रा के बारे में भूल ही गए|

पिताजी की बात सुन मैं झेंप गया... और मुझे याद आय की दरअसल गाँव आने का प्लान बनाने के लिए मैंने पिताजी को काशी विश्वनाथ घूमने का लालच दिया था| यही कारन था की पिताजी गाँव आने के लिए माने थे| कहाँ तो मैं अपनी और भाभी के सुहागरात के सपने सजोने में लगा था और कहाँ पिताजी की बात सुन मेरे होश उड़ गए| दरअसल यात्रा का प्लान मैंने ही बनाया था और क्योंकि मुझे भाभी से मिलने की इतनी जल्दी थी इसलिए मैंने सबसे पहले गाँव आने का प्लान बनाया और उसके बाद हम यात्रा करके दिल्ली लौट जायेंगे| जबकि पिताजी का कहना था की हम पहले यात्रा करते हैं उसके बाद गाँव जायेंगे.. अब मुझे अपने ऊपर अधिक क्रोध आ रहा था... की आखिर क्यों मैंने थोड़ा सब्र नहीं किया|

पिताजी: क्या सोच रहे हो? मैंने तुमसे राय नहीं माँगी है... हम कल ही निकालेंगे और यात्रा कर के दिल्ली लौट जायेंगे|

चन्दर भैया ने पिताजी की बात सुनी और सब को सुनाने के लिए चल दिए| मेरा दिमाग अब कंप्यूटर की तरह काम करने लगा और मैं कोई न कोई तर्क निकालना चाहता था की हम कुछ और दिनों के लिए रुक जाएं और तभी मेरे दिमाग में एक शार्ट सर्किट हुआ और मुझे एक बात सूझी .....

आगे मेरे और पिताजी के बीच हुई बात को मैं अभी गोपनीय रख रहा हूँ.. इसका पता आपको अवश्य चलेगा... अभी ये बात आपको नहीं बताने का सिर्फ यही तर्क है की आपको इसका आनंद आगे मिले|

जब ये बात भाभी के कानों तक पहुँची भाभी भागी-भागी बड़े घर की ओर आईं... पिताजी मुझसे बात करके कल यात्रा पे जाने के लिए रिक्शे का इन्तेजाम करने के लिए निकल चुके थे| मैं घर के आँगन में अपने सर पे हाथ रखे बैठा हुआ था ... अचानक भाभी मेरे सामने ठिठक के खड़ी हो गईं... उनके आँखों में आँसूं थे.... चेहरे पे सवाल ... और जुबान पे मेरा नाम ....

भाभी: मानु.... क्या मैंने जो सुना वो सच है? तुम कल जा रहे हो?

मैं: हाँ....

भाभी: पर तुमने मुझे पहले बताया क्यों नहीं?

मैं: भूल गया था...

भाभी: अब मेरा क्या होगा? मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती... मैं मर जाऊँगी....

इतना कह के भाभी बहार चली गईं.. मुझे चिंता होने लगी की कहीं भाभी कुछ ऐसा-वैसा कदम न उठा लें| इसलिए मैं उनके पीछे भागा.... मुझे ये देख के राहत मिली की भाभी भूसे के करे के बहार कड़ी हो के रसिका भाभी से कुछ पूछ रही हैं| उनके इशारे से मैं समझ चूका था की भाभी यही पूछ रहीं थीं की क्या मैं सच में वापस जा रहा हूँ? और रसिका भाभी ने भी बात को ज्यादा तूल ना देते हुए हाँ में सर हिलाया और रसोई की और चल दीं| मैंने इशारे से भाभी को अपने पास बुलाया... और भाभी भारी क़दमों के साथ मेरी ओर बढ़ने लगीं|

इससे पहले की आप लोगों को शक हो की आखिर हर बार मुझे ओर भाभी को अकेले में बात करने का समय कैसे मिल जाता है, मैं आपको स्वयं बता देता हूँ| माँ, नेहा और बड़की अम्मा (बड़ी चाची) खेत में आलू खोद के निकाल रहीं थी| पिताजी तो पहले ही रिक्शे वाले से बात करने के लिए जा चुके थे| चन्दर भैया और अजय भैया खेतों में सिंचाई और जुताई में लगे थे और रसिका भाभी तो यूँ हैं इधर-उधर टहल रहीं थी.. जब से मैं आया था मैंने उन्हें कोई भी काम नहीं करते देखा था!!!

भाभी घर में दाखिल हुईं और मैंने उन्हें चारपाई पे बिठाया... उनके मुख पे हवाइयाँ उड़ रहीं थी... कोई भी भाव नहीं थे... जैसे की कोई लाश हो| मैं मन ही मन अपने आपको कोस रहा था... मैं अपने घुटनों पे उनके समक्ष बैठ गया:

मैं: भौजी... मुझे माफ़ कर दो... सब मेरी गलती है| मैंने आपको कुछ नहीं बताया... सच कहूँ तो इन चार दिनों में आपके प्यार में मैं खुद भूल गया था| गाँव आने का मेरे पास कोई बहाना नहीं था इसलिए मैंने पिताजी से काशी-विश्वनाथ की यात्रा का प्लान बनाया... पिताजी तो चाहते थे की हम पहले यात्रा करें और फिर गाँव जायेंगे और आखिर में दिल्ली लौट जायेंगे| पर मैं आपसे मिलने को इतना आतुर था की मैंने कहा की हम पहले गाँव जायेंगे.. और फिर वहां से यात्रा करने के लिए निकलेंगे और वहीँ से वहीँ दिल्ली निकल जायेंगे... इसीलिए ये सब हुआ| मुझे सच में नहीं पता था की आपका प्यार मुझे आपसे दूर नहीं जाने देगा|

भाभी मेरी आँखों में देख रही थी.. और उनकी आँखों में आँसूं छलक आये थे| जब-जब मैं भाभी को ऐसे देखता हूँ तो मेरे नस-नस में खून खौल उठता है... 

भाभी: मानु मेरा क्या होगा ?? तुम मुझे छोड़ के चले जाओगे???
भाभी के इस प्रश्न का मेरे पास कोई जवाब नहीं था... और भाभी के चेहरे पे छाई मायूसी का कारन भी तो मैं ही था| मेरी गर्दन नीचे झुक गई और मुझे अपने ऊपर कोफ़्त होने लगी!!! पर मैं भाभी को ढांढस बंधने लगा... मैंने उनके चेहरे को ऊपर किये और उनके आँसूं पोंछें ....

मैं: भाभी अभी भी हमारे पास 24 घंटे हैं|

भाभी मेरी और बड़ी उत्सुकता से देखने लगी ....

मैं: मैं ये पूरे 24 घंटे आपके साथ ही गुजारूँगा...

तभी पीछे से माँ आ गईं ... मुझे और भाभी को इस तरह देख के वो हैरान थी और इससे पहले की वो कुछ पूछतीं मैं खुद ही बोल पड़ा:

मैं: माँ देखो ना भौजी को... जब से इन्हें पता चला है की हम कल जा रहे हैं ये मुँह लटका के बैठीं हैं... आप ही कुछ समझाओ....

माँ: पर हम तो....

मैंने माँ की बात बीच में ही काट दी...

मैं: माँ पिताजी रिक्शे वाले से बात करने निकले हैं और वो कह रहे थे की आप उनका सफारी सूट मत भूल जाना|

मैं: हाँ अच्छा याद दिलाया तूने... मैं अभी रख लेती हूँ| और बहु तुम उदास मत हो ...

मैं: और हाँ माँ, पिताजी ने कहा था की सर और पेट दर्द की दवा भी रख लेना|

मैंने फिर से माँ की बात काट दी...

माँ: ये सब तू मुझे बताने के बजाये खुद नहीं रख सकता?

इससे पहले की माँ कुछ और बोलेन मैं भाभी को खींच के बहार ले गया... अभी दरवाजे तक पहुंचा ही था की नेहा भी आ गई और भाभी के उदास मुँह का कारन पूछने लगी| मैंने उसकी बात घूमते हुए कहा की चलो मेरे साथ बताता हूँ|

मैंने अपने दायें हाथ से भाभी का बायां हाथ पकड़ा था और अपने बाएँ हाथ की ऊँगली नेहा को पकड़ा रखी थी| मैं दोनों को रसोई के पास छप्पर में ले आया ... वहां पड़ी चारपाई पे भाभी को बैठाया और नेहा के प्रश्नों का उत्तर देने लगा:

मैं: आप पूछ रहे थे न की आपकी मम्मी उदास क्यों हैं?

नेहा ने हाँ में सर हिलाया...

मैं: आपकी मम्मी की उदासी का कारन मैं हूँ|

मेरी बात सुन के भाभी और नेहा दोनों मेरी और देखने लगे...

मैं: मैं कल वापस जा रहा हूँ ना इसलिए ...

नेहा: चाचू आप वापस नहीं आओगे ?

मैंने ना में सर हिला दिया... और ये देख भाभी अपने आप को रोक नहीं पाईं और रो पड़ीं| मैंने भाभी को गले से लगाया और उनकी पीठ पे हाथ फेरते हुए चुप कराने लगा...

मैं: भाभी प्लीज चुप हो जाओ वार्ना नेहा भी रोने लगेगी|

भाभी का रोना जारी था और नेहा भी सुबकने लगी थी...

मैं: भाभी आपको मेरी कसम ... प्लीज चुप हो जाओ...

मेरी कसम सुन के भाभी ने रोना बंद किया और आगे जो हुआ उसे देख के भाभी और मैं हम दोनों हँस पड़े... नेहा ने रोना शुरू कर दिया था और उसका रोना ऐसा था जैसे फैक्ट्री का किसी ने साईरन बजा दिया हो जो हर सेकंड तेज होता जा रहा था ... ये इतना मजाकिया था की मैं और भाभी अपना हँसना रोक ना पाये| चलो भाभी हंसी तो सही वार्ना मुझे भाभी को ..... (ये अभी नहीं बताऊँगा|) 

नेहा को चिप्स बहुत पसंद थे इसलिए मैंने उसे अपनी जेब में पड़ा आखरी नोट दिया और चिप्स खरीद के खाने के लिए कहा| भाभी मना करने लगीं पर मैंने फिर भी उसे जबरदस्ती भेज दिया... भाभी की आँखें नम थीं... मैंने बात को बदलना चाहा:

मैं: भौजी आप स्नान कर लो... तरो-ताजा महसूस करोगे| फिर आपको भोजन भी तो बनाना है, क्योंकि रसिका भाभी तो कुछ करने वाली नहीं|

भाभी बड़े बेमन से उठीं.. ऐसा लगा जैसे उनका मन ही ना हो मुझसे दूर जाने को| मैंने उन्हें छेड़ते हुए कहा:

मैं: भौजी वैसे मैंने आपको वादा किया था की मैं पूरे २४ घंटे आपके साथ रहूँगा... अभी तो आप स्नान करने जा रहे हो... अगर कहो तो मैं भी चलूँ आपके साथ?

भाभी: ठीक है.... चलो !!!

उनका जवाब सुन के मैं सन्न रह गया... मैंने तो मजाक में ही बोल दिया था| खेर मैं ख़ुशी-ख़ुशी उनके साथ चल दिया... भाभी ने अंदर से कमरा बंद किया और मैं उनके स्नान घर के सामने चारपाई खींच कर बैठ गया... जैसे मैं कोई मुजरा सुनने आया हूँ| टांगें चढ़ा कर जैसे कोई अंग्रेज आदमी कोई शो देखने आया हो!!!

भाभी ने आज हलके हरे रंग की साडी पहनी हुई थी... वो मेरे सामने कड़ी हुईं और अपना पल्लू नीचे गिरा दिया... उनके स्तन के बीचों बीच की दूधिया लकीर मुझे साफ़ दिखाई दे रही थी| हाथ बेकाबू होने लगे... और मन किया की भाभी को किसी शेर की भाँती दबोच लूँ| भाभी ने अपने ब्लाउज के बटन खोलने चालु कर दिए थे ....पर मैं उठ खड़ा हुआ ...

मैं: भौजी मैं जा रहा हूँ ....

भाभी: क्यों ?

मैं: भाभी आपको इस तरह देख के मेरा कंट्रोल छूट रहा है| मैं ये सब आज रात के लिए बचाना चाहता हूँ|

फिर भाभी ने ऐसी बात बोली की मैं एक पल के लिए सोच में पड़ गया|

भौजी: और अगर रात को मौका नहीं मिला तो?..... तुम तो कल चले जाओगे ... पता नहीं फिर कभी हम मिलें भी या नहीं...

बार-बार भाभी के कटीले प्रश्न मेरी आत्मा को चोटिल कर रहे थे... पर उनकी बातों में सच्चाई थी| भाभी की बात में दम तो था परन्तु मैं फिर भी खतरा उठाने को तैयार था... मैं भाभी की सुहागरात वाला तौफा ख़राब नहीं करना चाहता था|मैं भाभी की ओर बढ़ा ओर उन्हें अपनी बाँहों में भरा ... उनके बदन पे मेरा दबाव तीव्र था और उन्हें ये संकेत दे रहा था की आप चिंता मत करो... सब ठीक होगा और आपका सुहागरात वाला सरप्राइज मैं ख़राब नहीं होने दूँगा|
अपनी बात को पक्का करने के लिए मैंने उनके होंठों को चूम लिया... परन्तु ये चुम्बन बहुत ही छोटा था...
(जैसे छोटा रिचार्ज!!!)

मैं: भाभी मैं बहार जा रहा हूँ आप दरवाजा बंद कर लो|

भाभी: मानु मेरी एक बात मानोगे ?

मैं: हाँ बोलो...

भाभी: कल मत जाओ ... कोई भी बहाना बनाके रुक जाओ| मुझे भरोसे है की तुम ये कर सकते हो|

मैं: भौजी कल की वाराणसी की ट्रैन की टिकट बुक है| अगर मैं अपनी बीमारी का बहाना भी बना लूँ तो भी पिताजी मुझे ले जाए बिना नहीं मानेंगे ... फिर तो चाहे उन्हें यहाँ तक एम्बुलेंस ही क्यों न बुलानी पड़े!

मैं इस बारे में और बात कर के फिर से भाभी की आँखें नम नहीं करना चाहता था इसलिए मैं सीधा बहार की ओर निकल लिया और कमरे का दरवाजा सटा दिया| बहार आके मैंने चैन की साँस ली और वापस छापर के नीचे पहुंचा जहाँ नेहा चारपाई पे बैठी चिप्स खा रही थी| मैं नेहा के पास बैठ गया और उसने चिप्स वाला पैकेट मेरी ओर बढ़ा दिया ... मैंने भी उसमें से थोड़े चिप्स निकाले और खाने लगा| नेहा कहानी सुनने के लिए जिद्द करने लगी... वो हमेशा रात को सोने से पहले मुझसे कहानी सुन्ना पसंद करती थी| मैं उसे मना नहीं कर पाया.. और चूहे, कबूतरों और गिलहरी की कहनी बना के सुनाने लगा| कहानी सुनते-सुनते नेहा मेरी गोद में ही सर रख के सो गई और मैं उसके सर पे हाथ फेर ने लगा... तभी उस अकड़ू ठाकुर की बेटी माधुरी वहाँ आ गई| वो मेरे सामने पड़ी चारपाई पे बैठ गई और भाभी के बारे में पूछने लगी.. मैंने उसे बताया की भाभी स्नान करने गई हैं अभी आत होंगी ... पर ये तो उसका बहाना| अब उसने मेरे ऊपर अपने सवाल दागे ...:

माधुरी: तो आप दिल्ली में कहाँ रहते हो?

मैं: डिफेन्स कॉलोनी

माधुरी: आपके स्कूल का नाम क्या है?

मैं: मॉडर्न स्कूल

माधुरी: आपके विषय कौन-कौन से हैं?

मैं: जी एकाउंट्स और मैथ्स

माधुरी: आपकी कोई गर्लफ्रेंड है? उन्सका नाम तो बताओ...

मैं: मेरी कोई गर्लफ्रेंड नहीं है न ही मैं बनाना चाहता हूँ| आप अपने बारे में भी तो कुछ बताइये?

माधुरी: मैं राजकीय शिक्षा मंदिर में पढ़ती हूँ ... दसवीं में हूँ मेरा भी कोई बॉयफ्रेंड नहीं है|

जैसे मैं उसके बॉयफ्रेंड के बारे में जानने के लिए उत्सुक था....| माधुरी मुझसे घुलने-मिलने की कोशिश कर रही थी और कुछ ज्यादा ही मुस्कुरा रही थी| दिमाग कह रहा था की:

तुम जो इतना मुस्कुरा रही हो... क्या बात है जिसे छुपा रही हो???

मैं उसके सवालों का जवाब बहुत ही संक्षेप में दे रहा था क्योंकि मेरी उसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी.. वैसे भी मेरा व्यक्तित्व ही बड़े मौन स्वभाव का है.. मैं बहुत काम बोलता हूँ और उसका व्यक्तित्व ठीक मेरे उलट था| मुझे ऐसा लगा जैसे वो मेरी और आकर्शित महसूस कर रही हो ... तभी उसने सबसे विवादित प्रश्न छेड़ दिया:
माधुरी: तो मानु जी, आपके शादी के बारे में क्या विचार हैं|

मैं: शादी? अभी?

मेरा इतना बोलना था की भाभी भी अपने बाल पोंछते हुए आ गईं... वो हमें बातें करते हुए देख रही थी और जल भून के राख हो चुकीं थी| वो मेरे पास आई और कुछ इस तरह से खड़ी हुई की उनकी पीठ माधुरी की ओर थी... और मेरी ओर देखते हुए अपना गुस्सा प्रकट किया और नेहा को मेरी गोद में से उठा के अपने घर की ओर चल दीं| मैं समझ गया की बेटा आज तेरी शामत है !!! मैं भाभी के पीछे एक दम से तो नहीं जा सकता था वर्ना माधुरी को शक हो जाता| मैं मौके की तलाश में था की कैसे माधुरी को यहाँ से भगाऊँ? मन बड़ा बेचैन हो रहा था... मेरी हालत ऐसी थी जैसे मुझे सांप सूंघ गया हो, और माधुरी पटर-पटर बोले जा रही थी| 


RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन - sexstories - 07-15-2017

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अब आगे....

मेरी कोई भी प्रतिक्रिया ना पाते हुए उसने खुद ही बात खत्म की:

माधुरी: लगता है आपका बात करने का मन नहीं है|

मैं: नहीं ऐसी कोई बात नहीं... दरअसल मुझे कल वापस निकलना है.. उसकी पैकिंग भी करनी है|

माधुरी: ओह! मुझे लगा आप को मैं पसंद नहीं... मैं शाम को आती हूँ तब तक तो आपकी पैकिंग हो जाएगी ना?

मैं: हाँ

माधुरी उठ के चल दी पर एक पल के लिए मैं उसकी कही बात को सोचने लगा| आखिर उसका ये कहना की "मुझे लगा आप को मैं पसंद नहीं... " का मतलब क्या था? खेर अभी मैं इस बातको तवज्जो नहीं दे सकता था क्योंकि भाभी नाराज लग रहीं थी| मैं तुरंत भाभी के पीछे उनके घर की ओर भागा| वहाँ पहुँच के देखा तो भाभी अपनी चारपाई पर बैठी हैं ओर नेहा दूसरी चारपाई पे सो रही है|

मैं: भौजी?

भाभी: कैसी लगी माधुरी?

मैं: क्या?

भाभी: बड़ा हँस के बात कर रहे थे उससे?

मैं: भौजी ऐसा नहीं है... आपको ये लग रहा है की वो मुझे अच्छी लगती है ओर हमारे बीच में वो सब....!!!

भाभी: और नहीं तो|

मैं: भौजी आप पागल तो नहीं हो गए? मैं सिर्फ और सिर्फ आपसे प्यार करता हूँ| मैं वहाँ नेहा को कहानी सुना रहा था, जिसे सुनते हुए नेहा सो गई और तभी माधुरी वहाँ आ घमकी ... मैंने उसे नहीं बुलाया .... वो अपने आप आई थी| और हँस-हँस के वो बोल रही थी.. मैं तो बस संक्षेप में उसकी बातों का जवाब दे रहा था और कुछ नहीं... मेरे दिल में उसके लिए कुछ भी नहीं है|

भाभी: मैं नहीं मानती!!!

मैं: ठीक है... मैं ये साबित करता हूँ की मैं आपसे कितना प्यार करता हूँ|

भाभी के शब्द मुझे शूल की तरह चुभ रहे थे| मैं भाग के रसोई तक गया और वहाँ से हंसिया उठा लाया... और भाभी को दिखाते हुए बोला:

मैं: अपनी नस काट लूँ तब तो आपको यकीन हो जायेगा की मैं आपसे कितना प्यार करता हूँ?

भाभी भागती हुई मेरे पास आई और मेरे हाथ से हंसिया छुड़ा के दूर फैंक दिया:

भाभी: मानु मैं तो मजाक कर रही थी... मुझे पता है की तुम मेरे आलावा किसी से प्यार नहीं करते|

मैं: भौजी प्लीज दुबारा ऐसा मत करना वर्ना आप मुझे खो...

मैं अभी अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था की उन्होंने अपना हाथ मेरे होंठों पे रख दिया और मुझे गले लगा लिया...

मुझे खुद को होश नहीं था की मैं ऐसा कदम उठाने जा रहा था... अगर मुझे कुछ हो जाता तो मेरे माँ-बाप का क्या होता? मैंने ये सब सोचा क्यों नहीं? क्या इसी को प्यार कहते हैं!!!


खेर हम अलग हुए ... भोजन के लिए अब बहुत देर हो चुकी थी ... इसलिए भाभी ने जल्दी-जल्दी भोजन बनाना शुरू किया और मैं उनके सामने बैठा उन्हें निहारने में लगा था| भाभी भी मेरी और देख के मुस्कुरा रही थी... और मेरा दिमाग रात के उपहार के लिए योजना बना रहा था| मन में एक बात की तसल्ली थी तो एक बात का डर भी| तसल्ली इस बात की कि घर में लोग होने कि वजह से कम से कम चन्दर भैया तो भाभी के साथ नहीं सोयेंगे और डर इस बात का कि अगर रात को फिर से अजय भैया और रसिका भाभी का झगड़ा शुरू हो गया तो घर के सब लोग उठ जायेंगे और मेरे सरप्राइज कि धज्जियां उड़ जाएंगी|
दोपहर के भोजन के बाद घर के सब लोग खेत में काम करने जा चुके थे, केवल मैं, भाभी, नेहा और रसिका भाभी ही रह गए थे| रैक भाभी तो हमेशा कि तरह एक चारपाई पे फ़ैल के सो गईं... नेहा मेरे साथ चिड़िया उड़ खेल रही थी... देखते ही देखते भाभी भी हमारे साथ खेलने लगीं| जब हम ऊब गए तो नेहा मेरी गोद में सर रख के लेट गई और मैं भाभी कि गोद में| तकरीबन 1 घंटा ही बीता था कि माधुरी फिर से आ गई... उसे देख मैं भाभी से अलग होक बैठ गया कि कहीं वो शक न करने लगे|

देखने में माधुरी बुरी तो नहीं थी... ठीक थी .. पर मेरे लिए तो भाभी ही सबकुछ थी| उसे सामने देख के मैं और भाभी दोनों ही अनकम्फ़ोर्टब्ले थे... क्योंकि वो उस अकड़ू ठाकुर कि बेटी थी इसलिए भाभी उसे कुछ कह भी नहीं सकती थी|

भाभी उठ के स्वयं चली गई और साथ-साथ नेहा को भी ले गई| जैसा कि आप सभी ने देखा हो ग कि फिल्म में जब लड़के वाले लड़की देखने जाते हैं तो अधिकतर माँ बाप लड़का=लड़की को अकेला छोड़ देते हैं ताकि वो आपस में कुछ बात कर सकें| परन्तु मैं सबसे ज्यादा विचिलित था .. मुझे पता था कि भाभी का मूड फिर ख़राब हो गया होगा| माधुरी मेरे पास एके बैठ गई और पूछने लगी:

माधुरी: तो मानु जी पैकिंग तो हो गई आपकी, अब कब आओगे ?

मैं: पता नहीं.... शायद अगले साल

माधुरी: अगले साल?

उसे बड़ी चिंता थी मेरे अगले साल आने कि??? इस से पहले कि हम और बात करते ... नेहा भागती हुई आई और मुझे अपने साथ खींच के लेजाने लगी| माधुरी पूछ भी रही थी कि कहाँ ले जा रही है? परन्तु नेहा बस मुझे खींचने में लगी हुई थी... मैंने माधुरी से इन्तेजार करने को कहा और नेहा के पीछे चल दिया|नेहा मेरी ऊँगली पकड़ के खींच के मुझे भुट्टे के खेत में ले आई... मैं भी हैरान था कि भला उसे यहाँ क्या काम? जब देखा तो भाभी भुट्टे के खेत में बीचों-बीच बैठी है| उन्हें देख के पहले तो मैं थोड़ा परेशान हुआ... फिर नेहा ने इशारे से ऊपर लगी भुट्टे कि एक बाली मुझे तोड़ने के लिए कहा, मैंने उसे ये बाली तोड़ के दे दी| मैंने भाभी से पूछा कि आप यहाँ क्या कर रहे हो... तो वो मुस्कुराते हुए बोली:

"तुम्हारा इन्तेजार !!!"

मैं: भौजी धीरे बोलो कोई सुन लेगा?

भाभी: कोई भी नहीं है यहाँ... सभी तालाब के पास वाले खेत में काम कर रहे हैं| काका-काकी भी वहीँ हैं अब बोलो?

मैं: और वो जो वहाँ बैठी है?

भाभी: तुम्हारी वजह से उसे कुछ नहीं कहती वर्ना ...

मैं: मेरी वजह से? मैंने कब रोक आपको?

भाभी: मैं देख रही हूँ वो तुम्हें पसंद करने लगी है!!!

मैं: आपने फिर से शुरू कर दिया?

ये कहके मैं अपने पाँव पटकता हुआ वापस आ गया... पता नहीं मुझे भाभी कि इस बात पे हमेशा मिर्ची लग जाती थी| वापस आके मैं माधुरी के सामने वाली चारपाई पे बैठ गया|

माधुरी: कहाँ गए थे आप?

मैं: नेहा को भुट्टे कि बाली तोड़ के देने गया था|

माधुरी: वो उसका क्या करेगी?

मैं: पता नहीं.. शायद खेलेगी|

माधुरी: आपके बाल खुश्क लगते हैं... अगर कहो तो मैं तेल लगा दूँ?

मैं उसकी बात सुन के हैरानी से उसे देखने लगा... आखिर ये मेरे बालों में तेल क्यों लगाना चाहती है? क्या ये मुझसे प्यार करती है? या इसके बाप ने इसे सीखा-पढ़ा के मुझे फंसने भेजा है? मुझपे कब से सुर्खाब के पर लग गए कि ये मुझमें दिलचस्पी ले रही है?

मैं: नहीं शुक्रिया ... दरअसल मैं आज अपने सर में तेल लगाना भूल गया इसलिए इतने रूखे लग रहे हैं|

एक पल को तो लगा कि मैं उसे कह दूँ कि आप मुझ में इतनी दिलचस्पी न लो पर फिर मैंने सोचा कि अगर मैं गलत निकला तो खामखा बेइज्जती हो जाएगी| तभ भाभी आ गई...

भाभी: अरे माधुरी शाम हो रही है.. ठकुराइन तुझे ढूंढती होंगी|

माधुरी: मैं तो उन्हें बता के आई हूँ|

भाभी: तेरे पापा भी आ गए होंगे...

माधुरी: अरे बाप रे.... भाभी मैं बाद में आती हूँ|

ना जाने क्यों अपने बाप का नाम सुनते ही वो भाग खड़ी हुई... पर उसके जाते ही मैंने चैन कि सांस ली|

भाभी: अब तो खुश हो ना?

मैं: (एक लम्बी साँस लेते हुए) हाँ !!! 

अब मुझे सच में चिंता होने लगी थी... अगर रात का सरप्राइज फ्लॉप हो गया तो भाभी का दिल टूट जायेगा... और मैं किसी भी कीमत पे उनका दिल नहीं तोडना चाहता था|मन में बस एक ही ख़याल आ रहा था की किस्मत कभी भी किसी को दूसरा मौका नहीं देती... तो मुझे ही मौका पैदा करना होगा| मगर कैसे??? शाम होने को आई थी... सभी लोग घर लौट आये थे| पिताजी, चन्दर भैया और अजय भैया और बड़के दादा (बड़े चाचा) एक साथ बैठे कल कितने बजे निकलना है उसके बारे में बात कर रहे थे| इधर भाभी भोजन बनाने में व्यस्त थी... मैं ठीक उनके सामने बैठा था.... परन्तु अब समय था प्लान बनाने का ... इसलिए मैं चुप-चाप उठा और पिताजी के पास जाके बैठ गया| किसी भी प्लान को बनाने से पहले हालत का जायज़ा लेना जर्रोरी होता है ... इसलिए मैं उनकी बात सुनने के लिए वहीँ चुप-चाप बैठ गया| पिताजी ने अभी तक मेरे और उनके बीच हुई बात का जिक्र किसी से भी नहीं किया था!!!

पिताजी की बातों से ये तो साफ़ था की आज सब लोग छत पे नहीं बल्कि रसोई के पास वाली जगह पे ही सोने वाले हैं| अब मुझे सब से मुख्य बातों पे ध्यान देना था:

१. रसिका भाभी को अजय भैया से दूर रखना और
२. चन्दर भैया को भाभी से दूर रखना|

अगर इनमें से एक भी काम ठीक से नहीं हुआ तो भाभी का दिल टूट जायेगा| समय था मुझे अपनी पहली चाल चलने का... मैं तुरंत भाभी के पास पहुंचा और रसिका भाभी के बारे में पूछा... ये सुन के भाभी थोड़ा हैरान हुईं क्योंकि मैंने आज तक कभी भी किसी से भी रसिका भाभी के बारे में नहीं पूछा था| भाभी ने मुझे बताया की रसिका भाभी बड़े घर में अपने कमरे में सो रही हैं| मुझे ये निश्चित करना था की रसिका भाभी बड़े घर में ही रहे| मैं उनके पास पहुँचा और उन्हें जगाया, जब मैंने उनके सोने का कारन पूछा तो उन्होंने मुझे बताया कि उनका बदन टूट रहा है खेर मैंने बात को बदला और हम गप्पें हाँकने लगे... भाभी को लगा की शायद मैं कल जा रहा हूँ तो उनसे ऐसे ही आखरी बार बात करने आया हूँ| भोजन का समय हो चूका था और मुझे अपनी दूसरी चाल चलनी थी| सबसे पहले मैंने रसिका भाभी से जिद्द की कि आज हम एक साथ ही भोजन करेंगे... एक साथ भोजन का मतलब था कि आमने सामने बैठ के भोजन करना| साथ मैं तो मैं सिर्फ और सिर्फ अपनी प्यारी भाभी के साथ ही भोजन करता था| ये सुन के रसिका भाभी को थोड़ा अचरज तो हुआ पर मैंने उन्हें ज्यादा सोचने का मौका नहीं दिया और मैं हम दोनों का भोजन लेने रसोई पहुँच गया| इधर मेरी प्यारी भाभी मेरे इस बर्ताव से बड़ी अचंभित थी!!! मैं भोजन लेके रसिका भाभी के पास पहुँच गया... और मेरे पीछे-पीछे नेहा भी अपनी थाली ले के आ गई| भोजन करते समय भी रसिका भाभी और मैं गप्पें मारते रहे| भोजन समाप्त होने के बाद मैंने रसिका भाभी से उनकी थाली ले ली... भाभी मना कर रही थी पर मैं अपनी जिद्द पे अड़ा था|

मैं जल्दी से थाली रख के हाथ मुंह धोके वापस आया और अजय भैया को ढूंढने लगा.... भैया मुझे कुऐं के पास टहलते दिखाई दिए| मैं उनके पास पहुँचा और थोड़ा इधर-उधर कि बातें करने लगा... फिर मैंने रसिका भाभी कि बिमारी कि बात छेड़ दी| बात सुन के भैया को तो जैसे कोई फरक ही नहीं पड़ा... मुझे मेरा प्लान चौपट होता दिख रहा था| मुझे उम्मीद थी कि शायद ये बात जान के अजय भैया, रसिका भाभी के आस-पास ना भटकें| अब बारी थी चन्दर भैया को सेट करने की... मैं उनके पास पहुँचा... वो तो सोने की तैयारी कर रहे थे| उन्हें देख के लग रहा था की थकान उनके शरीर पे भारी हैं|घर के सभी पुरुष भोजन कर चुके थे... रसिका भाभी खाना खाते ही लेट चुकीं थी| मुझे छोड़के सभी पुरषों के बिस्तर आस-पास लगे हुए थे और वे सभी अपने-अपने बिस्तर पर लेट चुके थे... पिताजी, बड़के दादा (बड़े चाचा) सो चुके थे... अजय भैया की चारपाई चन्दर भैया के पास ही थी और वो भी लेट चुके थे|

अब केवल घर की स्त्रियां ही भोजन कर रहीं थी.... मुझे कैसे भी कर के भाभी तक ये बात पहुँचानी थी की वे आज रात के सरप्राइज के लिए तैयार रहे| इसलिए मैं टहलते-टहलते छापर के नीचे पहुँच गया... माँ भोजन समाप्त कर उठ रहीं थी| बड़की अम्मा (बड़ी चाची) भी लगभग उठने ही वालीं थी और भाभी बड़े आराम से भोजन कर रहीं थी| जब माँ और अब्द्की अम्मा (बड़ी चाची) भोजन कर के चले गए तब मैंने भाभी को आँख मारते हुए कहा:

मैं: भौजी आपका तौफा बिलकुल तैयार है|

भाभी: अच्छा?

मैं: मैं सोने जा रहा हूँ... जब आपको लगे सब सो गए हैं तब आप मुझे उठा देना|

भाभी: ठीक है!!!

भाभी के चेहरे से उनकी प्रसन्ता झलक रही थी...और उन्हें खुश देख के मैं भी खुश था| खेर मैं अपने बिस्तर पे आके लेट गया और ऐसा दिखाया की जैसे मैं घोड़े बेच के सोया हूँ पर असल में मैं उस क्षण की प्रतीक्षा कर रहा था जब भाभी मुझे उठाने आएं| करीब रात के ग्यारह बजे भाभी मुझे उठाने आईं... मैं चुप-चाप उठा और उनके पीछे-पीछे चल दिया| अंदर पहुँच के भाभी ने दरवाजा बंद किया .... जैसे ही वो पलटीं मैं उनके सामने खड़ा था| मैंने आगे बढ़के उन्हें अपने सीने से लगा लिया... भाभी मेरे इस आलिंगन से कसमसा गईं और मुझसे ऐसे चिपक गईं जैसे कोई जंगली बेल पेड़ से चिपक जाती है| आज मैं किसी भी जल्दी में नहीं था क्योंकि मैं चाहता था की भाभी हर एक सेकंड को महसूस करे और हमेशा याद रखे| मैं उन्हें इतनी खुशियाँ देना चाहता था की भाभी साड़ी उम्र इन पलों को याद रखे| करीब पाँच मिनट बाद जब हमारा आलिंगन टूटा तो मैंने भाभी से दरख्वास्त की:

मैं: भौजी... आप पलंग पे ठीक वैसे बैठ जाओ जैसे आप अपनी शादी वाली रात बैठे थे|

भाभी घुटने मोड़े ओए एक हाथ का घूँघट काढ़े पलंग पे बैठी थी... और सच बताऊँ मित्रों तो वो बिलकुल एक नई नवेली दुल्हन जैसी दिख रही थी| मैं किसी कुँवर की तरह उनकी ओर बढ़ा ओर उनकी तरफ मुँह करके ठीक सामने बैठ गया| मैंने अपने हाथ से उनका घूँघट बड़ी सहजता के साथ उठाया...भाभी की नजरें नीचे झुकीं थी... मैंने जब उनकी ठुड्डी पकड़ के ऊपर उठाई तब हमारी आँखें एक दूसरे से मिलीं और कुछ क्षण के लिए मैं उनकी आँखों में देखता ही रहा| ऐसा लगा जैसे चाँद बादलों से निकल आया हो... मैंने ध्यान दिया की भाभी ने थोड़ा बहुत साज श्रृंगार किया है... उनके होंठों पे लाली थी.... बाल सवरें और खुले हुए.... चेहरा दमक रहा था... उनके शरीर से मीठी-मीठी गुलाब जल की खुशबु आ रही थी... सच कहूँ तो मैंने भाभी को देखना कभी कल्पना भी नहीं की थी... और मैं खुद को भाभी की तारीफ करने से नहीं रोक पाया:

"आप खूबसूरत हैं इतने,
के हर शख्स की ज़ुबान पर आप ही का तराना है,
हम नाचीज़ तो कहाँ किसी के काबिल,
और आपका तो खुदा भी दीवाना है... |"

मैंने आगे बढ़ के उनके लाल होंठों को चूम लिया... मेरे दोनों हाथों ने भाभी के चेहरे को कैद कर रखा था और मैं अपने होंठों से उनके होंठों को चूस रहा था... भाभी भी जवाबी हमला कर रही थी .... कभी मैं तो कभी भाभी, हमारे थिरकते लबों को चूम और चूस रहे थे... ऐसा करीब पाँच मिनट तक चला.... जब मैं और भाभी अलग हुए तो भाभी ने कहा:

"मानु... तुम्हारे लिए कुछ है?"

मैं: क्या?

भाभी उठीं और खिड़की में रखा गिलास उठा लाईं|

मैं: दूध.... पर इसकी क्या जर्रूरत थी?

भाभी: ये एक रसम होती है की दुल्हन अपने दूल्हे को अपने हाथ से दूध पिलाये|

भाभी मेरे पास बैठ गईं और मुझे अपने हाथ से दूध पिलाया... मैंने केवल आधा गिलास ही दूध पिया और बाकी मैंने भाभी की और बढ़ा दिया....

भाभी: मानु मुझे दूध अच्छा नहीं लगता....

मैं: मेरे लिए पी लो !

और ये कह के मैंने भाभी के हाथ से गिलास ले लिया और उन्हें स्वयं पिलाने लगा... 


RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन - sexstories - 07-15-2017

16

अब आगे....

दूध पिने के बाद मैंने वो गिलास चारपाई के नीचे रख दिया और जैसे ही मैं गिलास रख के उठा, भाभी ने अपने दोनों हाथों से मेरा मुँह पकड़ा और एक जबरदस्त चुम्बन मेरे होठों पे जड़ दिया... ये मेरे लिए ऐसा प्रहार था जिसके लिए मैं बिलकुल भी तैयार नहीं था| उन्होंने अपने मुँह में मेरे होंठों को जकड़ लिया था... उनके मुँह से मुझे दूध की सुगंध आ रही थी ... और भाभी ने मेरे होंठों से खेलना शुरू कर दिया था|मेरा भी अपने ऊपर से काबू छूटने लगा था... मैंने भी भाभी के पुष्प जैसे होठों को अपने होठों के भीतर भर लिया और उनका रसपान करने लगा| सर्वप्रथम मैंने उनके ऊपर के होंठ को चूसना शुरू किया....दूध की सुगंध ने उनके होठों मैं मिठास घोल दी थी जिसे मैं हर हाल में पीना चाहता था... जब मैं भाभी का ऊपर का होंठ चूसने में व्यस्त था तब भाभी ने अपने नीचे वाले होंठ से मेरे नीचले होंठ का रसपान शुरू कर दिया| करीब पांच मिनट तक हम दोनों एकदूसरे के होंठों को बारी-बारी चूसते रहे.... और पूरे कमरे में "पुच .....पुच" की धवनि गूंजने लगी थी... बीच-बीच में भाभी और मेरे मुख से "म्म्म्म्म्म...हम्म्म्म " की आवाज भी निकलती थी| मैं अब वो चीज करना चाहता था जिसके लिए मैं बहुत तड़प रहा था... मैंने अपनी जीभ का प्रवेश भाभी के मुख में करा दिया.... मेरी जीभ का स्वागत भाभी ने अपने मोतियों से सफ़ेद दाँतों से किया| उन्होंने मेरी जीभ को अपने दाँतों में भर लिया... और अपनी जीभ से उसे स्पर्श किया| इस अनुभव ने मेरे शरीर का रोम-रोम खड़ा हो गया... वासना मेरे अंदर हिलोरे मारने लगी थी| भाभी ने मेरी जीभ को धीरे-धीरे चूसना शुरू कर दिया था.. मेरा मुख सिर्फ उनके बंद मुख के ऊपर किसी निर्जीव शरीर की तरह पड़ा था परन्तु गर्दन से नीचे मेरा शरीर हरकत में आ चूका था.... मेरे लंड में तनाव आ चूका था और ऐसा लगता था जैसे वो चॆख०चॆख के किसी को पुकार रहा हो!

भाभी कभी-कभी मेरी जीभ को अपने दाँतों से काटती तो मेरे मुख से "मम्म" की हलकी से सिसकारी छूट जाती| अगर ऊपर भाभी आक्रमण कर रही थीं तो नीचे से मेरे हाथ उनके स्तनों को बारी-बारी से गूंदने और रोंदने लगे थे.... जैसे ही भाभी ने सिसकारी के लिए अपने मुख को खोलो मैंने अपनी जीभ उनके चुंगल से छुड़ाई और कमान अपने हाथों में ले ली और ऊपर तथा नीचे दोनों तरफ से हमला करने लगा| सबसे पहले मैंने अपनी जीभ से भाभी के दाँतों को स्पर्श किया ... इसका उत्तर देने के लिए जैसे ही भाभी की जीभ मेरे मुख में दाखिल हुई मैंने उनकी जीभ को अपने दाँतों में भर के एक जोर दार सुड़का मारा....और उसे चूसने लगा ... भाभी के हाथ मेरे हाथों को अपने वक्ष पे दबाने लगे थे.... पर मुझे उनके मुख से आरही दूध की सुगंध इतना मोहित कर रही थी की मैं उन्हें चूमना-चूसना छोड़ ही नहीं रहा था| लग रहा था की मैं आज सारा रसपान कर ही लूँ... मेरा मस्तिष्क मुझे सूचित कर रहा था की बीटा अगर इसी में समय बर्बाद किया तो सुहागरात पूरी नहीं होगी!

मैंने अपने लबों को उनके लबों से जुदा किया... और उनकी गोरी-गोरी गर्दन पे अपने दांत गड़ा दिए| एक पल के लिए भाभी सिंहर उठी...

"स्स्स्स्स्स्स्स्स..... मानु ..... म्म्म्म्म "

उनके मुख से अपना नाम सुन मैं और जोर से उनके गर्दन पे काटा... प्यार की भाषा में इसे "लव बाईट" कहेंगे.... मैंने उनकी गर्दन को काट और चूस रहा था .... क्या सुखद एहसास था वो मेरे लिए...!!! मैं उनकी गर्दन को चूमते हुए नीचे आया.... और उनके वक्ष के पास आके रुक आया | मेरे हाथ अब भी भाभी के स्तनों को मसल रहे थे और भाभी के मुख पे पीड़ा और सुख के मिले-जुले भाव थे| जब उन्होंने देखा की मैं रुक गया हूँ तो उन्होंने आँखें खोली और स्वयं अपने ब्लाउज के बटन खोलने लगीं... ये समय मेरे लिए बड़ा ही उबाऊ था ... मैं सोच रहा था की कब भाभी के स्तन इस ब्लाउज की जेल से आजाद होंगे? जब भाभी ने सभी बटन खोले तो मैं देख के हैरान हो गया की भाभी ने आज ब्रा पहनी थी! अब मेरे मन में एक तीव्र इच्छा ने जन्म लिया... वो ये थी की मैं उनकी ब्रा खुद उतारना चाहता था| जैसे ही भाभी ने अपने हाथ ब्रा की ओर ले गेन मैंने भाभी को तुरंत चुम लिया.... अपने लबों में उनके लैब कैद कर के मैं अपने हाथ उनकी पीठ पे ले गया ओर भाभी को ब्रा के हुक खोलने से रोक दिया| भाभी अपने हाथ अब मेरी पीठ पर फेरने लगीं .. और उधर मैं अपनी उँगलियों से भाभी की ब्रा के हकों को महसूस करने लगा| वो गिनती में तीन थे... मुझे डर था की कहीं मैं उन्हें तोड़ ना दूँ इसलिए मैं एक-एक कर उनके हुक खोलने लगा| और इधर भाभी ने अपने होंठ मेरी पकड़ से छुड़ा लिए थे और अब वो मेरे होंठों को चूस और अपनी जीभ से चाट रहीं थी| मैंने एक-एक कर तीनों हुक बड़ी सावधानी से खोल दिए और अपने को भाभी के होंठों से जैसे ही दूर किया तो भाभी की ब्रा उचक इ सामने आ गई| मैंने ऊपर से भाभी की ब्रा को स्पर्श किया तो उस का मख्मली एहसास ने मेरी कामवासना को और भड़का दिया!

भाभी ने अभी तक अपनी ब्रा को अपने स्तनों पे दबा रखा था... जैसे की वो मुझसे कुछ छुपाना चाहती हों... तब मुझे एहसास हुआ की दरअसल वो मेरे सुहागरात वाले तोहफे को अच्छी तरह से महसूस करना और कराना चाहती थीं| इसीलिए वो बिलकुल एक नई नवेली दुल्हन जिसे मैं प्यार करता हूँ और ब्याह के लाया हूँ ऐसा बर्ताव कर रहीं थी| मैंने अपने हाथ उनके वक्ष की और बढ़ाये और बड़े प्यार से उनकी ब्रा को पकड़ा और धीरे-धीरे अपनी और खींच के उनके बदन से दूर करने लगा| जैसे ही ब्रा उनके बदन से दूर हुई उन्होंने अपनी नजरें झुका दीं और अपने हाथ से अपने स्तनों को छुपाने की कोशिश करने लगीं| मैंने अभी तक कपड़े पहने हुए थे.... इसलिए सर्वप्रथम मैंने अपना सफ़ेद कुरता उतार दिया और उसे नीचे फैंक दिया| अब मैं और भाभी दोनों ऊपर से नग्न अवस्था में थे|

मैंने भाभी के मुख को ऊपर उठाया ... भाभी की आँखें अब भी बंद थीं| मैंने आगे बढ़ कर उनकी आँखों पे अपने होंठ रखे और उन्हें खोलने की याचना व्यक्त की| भाभी ने अपनी आँखें खोली और मुझे अपने समक्ष पहली बार बिना कपड़ों के देख उन्होंने अपने स्तनों पर से हाथ हटाया और मुझे कास के अपने आलिंगन में जकड लिया| उनके स्तन आज पहली बार मेरी छाती से स्पर्श हुए तो मेरे बदन में आ लग गई| भाभी के निप्पल कड़े हो चुके थे और वो मेरे छाती में तीर की भाँती गड रहे थे| भाभी मेरी नंगी पीठ पर हाथ फेर रहीं थी और मैं उनकी पथ पर हाथ फेर रहा था| मैं उनकी हृदय की धड़कन सुन पा रहा था और वो मेरे हृदय की धड़कन को सुन पा रहीं थी... वो एक गति में तो नहीं परन्तु बड़े जोर से धड़क रहे थे| अब और समय गवाना व्यर्थ था .. इसलिए मैंने भाभी को आलिंगन किये हुए ही अपना वजन उनपे डालने लगा ताकि वो लेट जाएँ| जब वो लेट गईं तब उन्होंने मुझे अपनी गिरफ्त से आजाद किया... आज मैं पहली बार भाभी को अर्ध नग्न हालत में देख रहा था| उनके 36 D साइज के स्तन (मेरा अंदाजा गलत भी हो सकता है|) मुझे मूक आमंत्रण दे रहे थे... मैं भाभी के ऊपर आ गया ... भाभी का शरीर ठीक मेरी दोनों टांगों के बीच में था| मैंने सर्वप्रथम शिखर से शुरूरत की.. मैंने अपना मुख को ठीक उनके बाएं निप्पल के आकर से थोड़ा बड़ा खोला और उन्हें मुख में भर लिया| न मैंने उनके निप्पल को अपने जीभ से छेड़ा और न हीं उसे चूसा... केवल ऐसे ही स्थिर रहा| भाभी मचलने लगीं और अपने हाथ से मेरे सर को अपने स्तन पे दबाव डालने लगीं.. मैं उन्हें और नहीं तड़पना चाहता था इसलिए मैंने उनके निप्पल को अपने होंठन से थोड़ा भींचा ... उसके बा उसे मुख में भर के ऐसे चूसने लगा जैसे की अभी उसमें से दूध निकल जायेगा| भाभी अपने दोनों हाथों से मेरे सर को पकडे अपने बाएं स्तन पे दबाने लगीं... और मैं भी बड़े चाव से उनके निप्पल को चूसने लगा... और बीच-बीच में काट भी लेता| जब मैं काटता तो भभु चिहुक उठती :

"अह्ह्हह्ह ....स्स्स्सस्स्स्स "

करीब 5 मिनट तक उनके निप्पल को चूसने के बाद मैंने उनके स्तनों पे अपने लव बाईट की छप छोड़ दी थी और उनका बयां स्तन बिलकुल लाल हो चूका था| अब मैं और नीच बढ़ने लगा....

भाभी: मानु.... इसे भूल गए ? (अपने दायें स्तन की ओर इशारा करते हुए|)

मैं: नहीं तो.... इसकी बारी अभी नहीं आई|

मैं नीचे उनकी नाभि पर पहुँचा और उसमें से मुझे गुलाब जल की महक आने लगी... मैं अपने मुख को जितना खोल सकता था उतना खोला और उनके नाभि के ठीक ऊपर काट लिया... मेरे पूरे दातों ने अपने लव बाईट का काम कर दिया था| मेरी इस हरकत से भाभी बुरी तरह मचल रही थी.. जैसे की जल बिन मछली तड़पती है|

मैं और नीचे आय तो देखा की मैं भाभी की साडी तो उतारना ही भूल गया! मैं समय बर्बाद नहीं करना चाहता था क्योंकि मुझे पता था की अगर अजय भैया रसिका भाभी के पास सम्भोग करने के लिए पहुँच गए या कहीं चन्दर भैया ने दरवाजा खटखटा दिया तो बहुत बुरा होगा| इसलिए मैंने जल्दी जैसी भाभी की साडी खींचने लगा... भाभी मेरी मदद करना चाहती थी परन्तु मैं बहुत बेसब्र था| मुझे एक तरकीब सूझी... मैंने भाभी की साडी बिलकुल उठा दी और उनके पेटीकोट का नाड़ा खोल दिया.... और एक झटके में उसे नीचे खींच दिया| साडी काफी हद तक ढीली हो गई और फिर मैंने उसे भी खींच-खींच के पूरी तरह से खोल दिया| मैं ऐसे साडी खोल रहा था जैसे किसी बच्चे को उसके जन्मदिन पे किसी ने गिफ्ट दिया हो और उस गिफ्ट पे 2 मीटर कागज़ चढ़ा रखा हो| तब वो बच्चा बड़ी बेसब्री के साथ उस कागज़ को फाड़ना शुरू कर देता है... कुछ ऐसी ही हरकत मैंने की थी|

भाभी ने आज पैंटी भी पहनी है? खेर सबसे पहले मैंने भाभी की योनि को पैंटी के ऊपर से सूँघा और उसी अवस्था में एक चुम्बन लिया| मुझे उम्मीद नहीं थी की पैंटी के ऊपर से मुझे भाभी की योनि की सुगंध आएगी परन्तु मैं गलत था... भाभी की योनि से आ रही मादक महक मुझे मोहित करने लगी थी| मैंने धीरे-धीरे अपनी उँगलियाँ उनकी पैंटी की इलास्टिक में डाली और उसे पकड़ के नीचे खींच दिया और भाभी के शरीर से दूर कर दिया| अब मेरे समक्ष भाभी का पूरी तरह से नग्न शरीर था.... मैं टकटकी लगाये उन्हें निहारने लगा ... क्योंकि आज मैंने पहली बार भाभी को इस अवस्था में देखा था | भाभी ने शर्म के मारे अपने चेहरे को हाथों से छुपा लिया... मुझे मालुम था की भाभी का हाथ कैसे हटाना है ....मैं नीचे झुका और उनकी योनि पे अपने होंट रख दिए और आणि जीभ की नोक से उनके भगनासा को एक बार कुरेद दिया| भाभी मेरी इस प्रतिक्रिया से उचक गईं.....

"अह्ह्ह्हह्ह .... मानु प्लीज !!!!"

अब भाभी ने अपने मुख से हाथ हटा लिया और मुख पे यातना के भाव थे... मुझे उन पर दया आ गई और मैं पुनः उनकी योनि पे झुक गया और रसपान करना शुरू किया| सर्वप्रथम मैंने अपनी जीभ से भाभी की योनि नापी और जितना हो सकता था अपनी जीभ को भाभी की योनि में प्रवेश कराता गया| एक बार जीभ अंदर पहुँच गई तब मैंने भाभी की योनि के अंदर अपनी जीभ से उत्पात मचाना शुरू कर दिया| मैं अपनी जीभ को उनकी योनि के भीतर गोल-गोल घूमने लगा.... जैसे की मैं उनकी योनि में खुदाई कर रहा हूँ| भाभी के भाव बदल चुके थे... वो छटपटाने लगीं थी.... और रह रह के अपनीकमर उठा के पटकने लगीं थी| मैं भी ज्यादा देर तक ये खेल नहीं खेल सका क्योंकि मुंह दर्द होने लगा था... मैंने अपनी जीभ से भाभी के भगनासा को पुनः कुरेदना शुर कर दिया और बीच-बीच में मैं अपनी जीभ पूरी की पूरी उनकी योनि में दाल 4-5 बार गोल घुमा देता और भाभी फिर छटपटाने लगती| भाभी की योनि ने अपना रस छोड़ना शुरू कर दिया था... और वो तरल रह-रह के बहार निकलने लगा था... जैसे ही वो बहार आता तो मैं किसी भालू की भाँती अपना मुख भाभी की योनि से लाग उनके रस को चाटने लगता| मैंने भाभी की योनि के दोनों कपालों को अपने मुख में भर चूसने लगा.... और इधर भाभी का छटपटाने से बुरा हाल था..... वो कभी अपना सर बार-बार तकिये पे पटकती ... तो कभी अपने हाथ से मेरे सर को अपनी योनि पे दबाती, मनो कह रही हो की "मानु रुको मत !!!" मुझे भी उनकी योनि चूसने-चाटने में अजब आनंद आने लगा था| मैं कभी उनके बहगनासा को अपने मुख में भर लेता और उसे चुस्त... चाटता... और कभी-कभी तो उसे हलके से काट लेता| जब मेरे दांत भाभी के भगनासा को स्पर्श होते तो वो सिंहर उठती और कमान की तरह अपने शरीर को अकड़ा लेती|

धीरे-धीरे भाभी के शरीर में मच रहे तूफ़ान को भाभी के लिए सम्भालना मुश्किल होता जा रहा था... उन्होंने बड़ी जोरदार सिसकारी ली....

"स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स अह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह.... माआआआआआआआआआआआआआ"

मैं समझ चूका था की भाभी चरम पर पहुँच चुकीं हैं... भाभी का बदन कमान की तरह हवा में उठ गया... उनकी कमर हवा में थी और सर तकिये पे.... इसलिए मैंने भाभी की पूरी योनि अपने मुख में भर ली!!! 

जैसे ही भाभी के अंदर का तूफ़ान बहार आया उन्होंने बिना रोके उसे मेरे मुख के भीतर झोंक दिया| उनके रस की एक-एक बूँद मेरे मुख में समाती चली गई.... मैं भी बिना सोचे-समझे उनके मनमोहक रस को पीता चला गया|

भाभी निढाल होक वापस बिस्तर पे गिर चुकी थी... मुझे खुद पे यकीन नहीं हुआ की केवल दस मिनट में मेरी जीभ ने भाभी का ये हाल कर दिया था| भाभी की सांसें तेज चलने लगी थी ... या ये कहूँ की वो हांफने लगीं थी ..... मैं पीछे होक अपने पंजों पे बैठा था और उनका योनि रस जो थोड़ा बहुत मेरे होंठों पे लगा था उसे मैंने अपनी जीभ से साफ़ कर रहा था, की तभ भाभी ने मुझे इशारे से अपने ऊपर बुलाया| मैं उनके मुख के पास आया तो उन्होंने अपनी बाहें मेरे गले की इर्द-गिर्द डाली और मुझे चूम लिया!

भाभी: मानु... अब और देर मत करो!!! मेरे इस अधूरे शरीर को पूरा कर दो !!!

मैंने अभी भी पजामा पहन रखा था और इस अवस्था में मैं अपने नाड़े को नहीं खोल सकता था.... मेरी मजबूरी भाभी ने पढ़ ली और उन्होंने अपने हाथ नीचे ले जाके मेरे पजामे के नाड़े को खोल दिया.... मैं पीछे हुआ और चारपाई पे खड़ा हो गया.... मेरा पजामा एक दम से फिसल के नीचे गिरा और अब केवल मैं अपने फ्रेंची कच्छे में था| मेरे लंड का उभार भाभी साफ़ देख सकती थी और उसपे सोने पे सुहाग ये की मेरा कच्छा मेरे लंड के रस से भीग चूका था| मैंने अपने आप को कच्छे की गिरफ्त से आजाद किया तो मेरा लंड बिलकुल सीधा खड़ा था ... उसका तनाव इतना था की उसपे नसें उभर आईं थी| मैं वापस भाभी के ऊपर आया ... उनके योनि की दनों पाटलों को अपने दोनों हाथों के अंगूठे से खोला और अपने लंड को भाभी की योनि में धीरे-धीरे प्रवेश कराने लगा| जब मेरे लंड के सुपाड़े ने भाभी की योनि को छुआ तो एक करंट सा मेरे शरीर में दौड़ा ....और उधर भाभी मुझे अपने ऊपर बुला रहीं थी|

मित्रों अब भी सोच रहे होंगे की इस हालत में तो मुझे सब से ज्यादा जल्दी मचानी चाहिए थी.... परन्तु भाभी के प्रति प्यार ने मुझे अब तक थामे रखा था| मुझे डर था की भाभी को अधिक दर्द न हो ... इसलिए मैं सब कुछ बहुत धीरे-धीरे कर रहा था|

मैं धीरे-धीरे भाभी के ऊपर आ गया और मेरा लंड भाभी की योनि में लग भाग पूरा घुस चूका था.... भाभी के मुख पे आनंद और तड़प के मिले-जुले भाव दिख रहे थे| अभी तक मैंने धक्के लगाना शुरू नहीं किया था.... मैं पोजीशन ले चूका था और चाहता था की एक बार भाभी एडजस्ट हो जाएँ तब मैं हमला शुरू करूँ| भाभी ने अपने हाथ मेरी गर्दन के इर्द गिर्द लपेटे.... नीचे से उन्होंने अपने पाँव को मेरी कमर के इर्द-गिर्द लपेटा... मैंने जब भाभी के मुख पे देहा तो उनके मुख पे दर्द उमड़ आया था.... मुझे यकीन नहीं हुआ की भाभी को दर्द हो रहा है.... परन्तु ये समय प्रश्नों का नहीं था और वो भी ऐसे प्रश्न जो भाभी को फिर रुला देते| मैंने उनकी इन प्रतिक्रियाओं को उनका आश्वासन समझा और लय-बध तरीके से धक्के लगाना शुरू किया| भाभी की आँखें बाद थीं और मुख खुला....

"स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स ........ अह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह ........म्म्म्म्म्म्म्म्म्म ..... अह्ह्ह्ह्ह्न्न ......अम्म्म्म्म .... माआअ "

ये सिस्कारियां कमरे में गूंजने लगीं थी.... मेरी गति अभी बिलकुल धीरे थी! मुझे डर सताने लगा था की कहीं भाभी की सिसकारियाँ नेहा को ना जगा दें| इसलिए मैंने उनके लबों को अपने लबों की गिरफ्त में ले उनकी सिसकारियाँ मौन करा दी| मेरी धीमी गति में भाभी की मुख से सिसकारियाँ फुट पड़ीं थी... यदि मैं गति बढ़ता तो भाभी शायद चीख पड़ती| फिर मुझे ये भी अंदेशा था की यदि मैंने गति बढ़ा दी तो मैं ज्यादा देर टिक नहीं पाऊँगा... और जल्दी चार्म पे पहुँच जाऊंगा| जबकि मेरी इच्छा थी की काम से काम भाभी को दो बार चार्म तक पहुँचाऊँ!!! इसलिए जब मेरे अंदर का सैलाब उमड़ने को होता तो मैं एक अल्प विराम लेता और भाभी के जिस्म को बेतहाशा चूमता| जब सैलाब का उफान काम होता तब मैं वापस अपनी धीमी गति से झटके देता रहता| अब भाभी की कमर मेरे हर धक्के का जवाब देने लगी थी... और उनका डायन स्तन जिसे मैंने प्यार नहीं किया था उसे भी तो प्यार करना बाकी था| इसलिए मैंने एक पल के लिए अल्प विराम लिया और भाभी के दायें स्तन को अपने मुँह में भर चूसने लगा| मैंने उनके निप्पल को अपने दाँतों में ले के हल्का सा काटा तो भाभी छटपटाने लगीं| उन्हें और पीड़ा नहीं देना चाहता था इसलिए मैं उनके स्तन को चूस्ता रहा और बीच-बेच में उनके निप्पल को अपने होंठों से दबा देता... या उनके निप्पल को अपनी जीभ की नौक से छेड़ देता| 


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