Hot Sex stories एक अनोखा बंधन - Printable Version

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RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन - sexstories - 07-15-2017

17

अब आगे....

मुझे सच में नहीं पता था की भाभी के अंदर मेरे प्रति इतनी वासना भरी है!!! अब जब मैं उनके दायें स्तन को निचोड़ने में लगा था भाभी ने अचानक ही अपनी कमर से मेरे लंड पे झटके मारना शुरू कर दिया| मज़ा तो बहुत आ रहा था पर मेरे अंदर का सैलाब फिर से उफान पे था... और छलकने के लिए तैयार था!!! छलकने का मतलब था भाभी का गर्भवती होना!!! ये सोचके मैं अपने आपको रोकना चाहता था परन्तु भाभी के तीव्र आक्रमण ने मुझे ऐसा करने से रोक दिया| मैंने उन्हें रोकने में असमर्थ था परन्तु मैं ये गलती नहीं करना चाहता था, पिछली बार तो मैं बच गया था क्योंकि हमने सम्भोग खड़े-खड़े ही किया था जिसके कारन मेरी खुशकिस्मती से मेरा वीर्य भाभी की योनि से सीधा बहार आ गया और गर्भाशय तक नहीं पहुँचा| परन्तु इस स्थिति में वीर्य सीधा गर्भाशय तक जाता और परिणाम स्वरुप भाभी गर्भवती अवश्य होती| "भौजी.... प्लीज रुक जाओ!!! मैं झड़ने वाला हूँ!!!"

भाभी अभी भी नहीं रुकीं क्योंकि वो चरम पर लग-भग पहुँच ही गईं थी... इस कारन उनकी योनि मेरे लंड को निचोड़ ने में लगी थी| आइए लग रहा था की कोई दानव भाभी की योनि के भीतर मेरे लंड को चूस रहा हो!!!

"मानु.... प्लीज मत रोको खुद को !!! .... "

मैं: भाभी अगर मेरा आपके अंदर छूटा तो अब गर्भवती हो जाओगे|

भाभी: स्स्स्स्स्स्स्स्स्स ..... अह्ह्हह्ह्ह्ह .... मैं यही चाहती हूँ की मैं तुम्हारे बच्चे की माँ बनू!!!

भाभी की बात सुनते ही मेरे होश उड़ गए .... इससे पहले की मैं झड़ता भाभी की योनि ने ढेर सारा रस छोड़ दिया जिसने मेरे लंड को पूरी तरह गर्म-गर्म लावे में नहला दिया ... इसके बाद भी उनकी योनि ने मेरे लंड की इर्द-गिर्द अपनी पकड़ और कस ली थी| अब मेरा किसी भी समय छूटने वाला था ... मुझे अपने पूरे शरीर की शक्ति लगानी पड़ी .... अपने लंड को उनकी योनि से बहार निकलने में!!! जैसे ही मैंने अपना लंड बहार खींचा वो एक झटके से बहार आया और मैंने भाभी की योनि पे एक जोर दार धार के साथ अपना सारा वीर्य उनकी योनि के ऊपर गिरा दिया| उनकी पूरी योनि मेरे गाढ़े वीर्य में सन गई थी!!! वीर्य की धार बहती हुई भाभी की गांड तक जा रही थी.... भाभी निढाल हो चुकी थी और मैं भी पसीने से पस्त था और उनके बगल में गिर गया| सच में मैंने ऐसे सम्भोग की कभी भी कल्पना नहीं की थी| करीब पांच मिनट बाद भाभी के शरीर ने थोड़ी हरकत की वरना मैं तो डर ही गया था की उन्हें क्या हो गया| वो उठीं और नीचे पड़ी अपनी कच्छी से अपने ऊपर गिरे वीर्य को साफ़ किया और मेरी ओर मुख कर के लेट गईं|

भाभी:मानु... तुमने मेरी बात क्यों नहीं मानी?

मैं: भौजी... आपने ही कहा था की आपने कई सालों से भैया के साथ सम्भोग नहीं किया है.. ऐसे में अगर आप गर्भवती हो जाती तो क्या होता? भैया आपको पता नहीं कितने गंदे शब्दों से अपमानित करते ओर मैं ये सब बर्दाश्त नहीं कर सकता| यदि मैं कमाने लायक होता तो मैं आपको कल ही भगा के ले जाता और आपसे शादी कर लेता|

भाभी: और नेहा?

मैं: उसे भी आपके साथ ले जाता... वो आपके बिना कैसे रहती और भले ही वो भैया की बेटी है पर वो भी मुझे आपके जितना ही प्यारी है|

भाभी: सच मानु तुम इतना प्यार करते हो मुझसे? फिर तुम मुझे छोड़ के क्यों जा रहे हो?
(ये कहते हुए फिर से उनके आँखों में आंसूं छलक आये थे|)

मैं: भौजी काश मैं इस सब को बदल पाता.... पर .....
(एक पल के लिए तो लगा की मैं भाभी को सब बता दूँ ... पर जैसे-तैसे कर के खुद को रोक|)

मैं: आपके और मेरे पास याद करने के लिए बहुत से सखद पल हैं|

भाभी: तुम दुबारा कब आओगे?

मैं: अगले साल

भाभी: अगले साल? नहीं मानु... मैं तुम्हारे बिना इतने साल नहीं रह पाऊँगी| मैं मर जाऊंगी... वादा करो तुम जल्दी आओगे.... अगले महीने ही आओगे !!!

मैं: भाभी मैं अगले महीने कैसे आ सकता हूँ... तब तो मेरे स्कूल खुल जायेंगे|

भाभी: प्लीज मानु ...

इतना कहके भाभी सुबकने लगीं मुझसे उनका ये सुबकना नहीं देखा गया और मैंने उनके गले लगा लिया ... और उनकी नंगी पीठ को सहलाने लगा| जब मुझे लगा की भाभी थोड़ा शांत हो गईं तब मैंने उन्हें अपने से अलग किया और उठ के अपने कपडे पहनने चाहे|

भाभी: तुम जा रहे हो ....

मैं: हाँ भाभी रात बहुत हो चुकी है| मुझे वापस अपने बिस्तर पे जाना होगा नहीं तो अगर किसी ने मुझे बिस्तर पे नहीं देखा तो कहीं हंगामा खड़ा ना हो जाए|

भाभी: कल सुबह तो तुम चले ही जाओगे कम से कम कुछ समय मेरे पास भी तो बैठो...

मैं भाभी को मना नहीं कर सका और बिना कपडे पहने वापस भाभी के पास आके बैठ गया| मैं दिवार से सर लगा के बैठा था और भाभी मेरी कमर के पास सर कर के लेती हुई थीं... उन्होंने एक हाथ से मेरी कमर पे झप्पी डाल रखी थी| रात के करीब ढाई बज चुके थे... भाभी को नींद आने लगी थी ... और मैं उनके सर पे हाथ फेर रहा था| मुझे भी नींद का झौंका आने लगा था... जब मुझे लगा की भाभी गहरी नींद में हैं तब मैंने धीरे से उनका हाथ उठाया और चारपाई से उठ खड़ा हुआ| सब से पहले मैंने अपना कुरता पजामा पहना ... फिर भाभी की ओर देखा तो वो बिलकुल नग्न अवस्था में थी इसलिए मैंने पास ही पड़ी हुई चादर उठाई ओर उन्हें ओढ़ा दी| उनके माथे को चूमा और चुप चाप बहार चला आया| अपने बिस्तर में घुसते ही मुझे नींद आ गई .... जब होश आया तो सुबह के आठ बज रहे थे| मैं हड़बड़ा के उठा और बड़े घर की ओर भागा... देखा तो माँ ओर पिताजी दोनों तैयार हो चुके थे|

पिताजी: उठ गए लाड-साहब? थोड़ा और सो लो?

मैं: जी वो....

माँ: अब जल्दी कर थोड़ी देर में रिक्क्षे वाला आता ही होगा|

मैंने जल्दी-जल्दी ब्रश किया और नह धो के तैयार होगया.. मैं हैरान था की आखिर भाभी कहाँ है? अब तक तो वो मुझे मिलने आ जाती थीं? मैं सर में तेल लगाने का बहन करते हुए उनके कमरे की ओर चल दिया| वहां पहुँच के देखा की भाभी चारपाई पे मुँह लटकाये बैठी है...

मैं: भौजी? आप ऐसे मुँह लटकाये क्यों बैठे हो?

भाभी: तो क्या करूँ?

मैंने उनका हाथ पकड़ के उन्हें उठाया ... और उनका चेहरा ऊपर किया| मैं: आप मुझे रट हुए विदा करोगे?

भाभी टूट पड़ीं और मैंने उन्हें गले लगा लिया....

मैं: बस-बस भौजी... चुप हो जाओ| मैं.....

मैं कुछ कहना चाहता था परन्तु अपने आपको रोकते हुए अपने वाक्य को अधूरा छोड़ दिया|

भाभी: मानु आई लव यू !!!

मैं: आई लव यू टू भौजी!!! बस अब चुप हो जाओ ... आपको मेरी कसम!

ये सुनके भाभी ने रोना बंद किया ... मैंने उनके आँसू पोछे .... भाभी के चेहरे पे थोड़े आस्चर्य के भाव थे| मैं उनके इस आस्चर्य का कारन जानता था.. क्योंकि वो ये सोच रहीं थी की आखिर मेरे मुख पे उनसे अलग होने के भाव क्यों नहीं है? मैं इस समय उन्हें कोई सफाई नहीं दे सकता था... इसका केवल एक ही उत्तर था| मैंने उनके होंठों को चुम लिया| ये चुम्बन उतना गहरा नहीं था और ना ही इसमें जूनून था! मेरा उद्देश्य केवल और केवल भाभी को सांत्वना देने का था .... इस चुम्बन के पश्चात मैंने उनसे तेल की शीशी माँगी... भाभी अंदर से तेल की शीशी ले आईं:

भाभी: लाओ मैं लगा दूँ...

मैंने उनकी बात का कोई विरोध नहीं किया क्योंकि मैंने सोचा की चलो यार एक आखरी बार उनसे तेल लगवा ही लेता हूँ उनके दिल को भी तसल्ली होगी| मैं नीचे बैठ गया और भाभी चारपाई पर बैठ के मेरे सर पे तेल लगाने लगी|

मैं: भौजी.... एक वादा करो की आप मुझे याद करके कभी राओगे नहीं?

भाभी: तुम मुझसे मेरी जान माँग लो पर ऐसा नहीं हो सकता की मैं तुम्हें याद ना करूँ.. और याद करुँगी तो मैं अपने आपको रोने से नहीं रोक सकती|

मैं: प्लीज भौजी... ऐसे मत बोलो| आप खुद सोचो की अगर आप मेरी जगह होते तो आपको कितनी ठेस पहुँचती यूए जनके की मैं आपको याद करके रो रहा हूँ|

भाभी: मानु ... मैं वादा तो नहीं करती पर कोशिश अवश्य करुँगी|

मैं: ठीक है... अब मैं चलता हूँ जाने का समय हो रहा है|

इतना कह के मैं बड़े घर की ओर चल दिया.. अपने बाल बनाये और समान उठा के बहार रख दिया| तभी रिक्क्षे वाला भी आ गया... हमें विदा करने के लिए घर के सब लोग आ गए थे.... यहाँ तक की माधुरी भी आई थी परन्तु मैंने उसपे ज्यादा ध्यान नहीं दिया| नेहा ने मेरा हाथ पकड़ लिया था और वो बहुत उदास लग रही थी... मैंने उसके गालों को चूमा और विदाई ली| मैंने ध्यान दिया की भाभी ने अपने आपको किसी तरह से संभाला हुआ था.... यदि मैं उनकी जगह होता तो अब तक टूट चूका होता| सारे रास्ता मैं बस भाभी के बारे में सोचता रहा ... दिमाग में बस रात हुई घटना के सुखद सपने आ रहे थे| मैं ये सोच के रोमांच से भर उठा की जब भाभी को असल बात का पता चलेगा तो भाभी का क्या हाल होगा? खेर हमारी यात्रा का प्रोग्राम केवाल 2 दिन का था|

अब चलिए मैं अब उस राज पर से पर्दा उठाता हूँ.... मेरे और पिताजी के बीच में जो बात हुई थी उसे मैं आप सब के समक्ष पेश करता हूँ|

मैं: पिताजी मेरी आपसे एक दरख्वास्त है...

पिताजी: बोलो लाड-साहब!

मैं: पिताजी जब आपने और मैंने घूमने का प्रोग्राम बनाया था तब आपका कहना था की पहले हम यात्रा करेंगे और उसके बाद गाँवों जायेंगे| परन्तु मेरे जोर देने पे आपने प्रोग्राम बदल के पहले गाँव आने को रखा| ये मेरी सबसे बड़ी बेवकूफी थी!!! मैंने ये सोचा ही नहीं की बड़के दादा (बड़े चाचा) और बड़की अम्मा (बड़ी चाची) कभी ऐसी यात्रा पे नहीं गए और ना ही जा पाएंगे| अब अगर हमें ये मौका मिला है तो क्यों न हम उनके लिए कुछ नहीं तो कम से कम प्रसाद ही ला के दे सकते हैं| उनके लिए यही यात्रा होगी!!!

पिताजी: बात तो तुमने पते की कि है... चलो देर से ही सही तुम्हें अकल तो आई| मैं जा के सबको बता देते हूँ कि हम यात्रा करने के बाद सीधा गाँव आएंगे और कुछ दिन रूक कर ही दिल्ली वापस जायेंगे|

मैं: नहीं पिताजी ... आप किसी को ये बात मत बताना| ये बात सिर्फ आपके और मेरे बीच ही रहेगी|| मैं माँ को समझा दूँगा| जब हम अचानक लौट के आएंगे तो घर भर के सब लोग खुश हो जायेंगे|

पिताजी: अरे वाह!!! ठीक है मैं कल के लिए रिक्क्षे वाले को बोल आता हूँ|

इतना कह के पिता जी चले गए... मैं बस भाभी के मुख पे वो ख़ुशी देखने को बेकरार था जो उन्हें मुझे दुबारा देख के मिलती| यही कारन है कि मैंने ये बात उनसे छुपाय रखी|

तीसरे दिन हम वाराणसी से निकल चुके थे ..... कोई सवारी न मिलने के कारन पिताजी ने टेम्पो किया| दोपहर के एक बजे होंगे और हमारा टेम्पो गाँवों पहुँच गया| टेम्पो की आवाज से सभी परिवारवाले आकर्शित हो देखने आये की कौन आया है? जब टेम्पो के पीछे से पिताजी निकले तो सभी के चेहरे खिल गए| सभी ने ख़ुशी-ख़ुशी हमारा स्वागत किया... परन्तु मेर नज़रें भाभी को ढूंढ रहीं थी| मन व्याकुल हो रहा था... मैंने नेहा को इशारे से अपने पास बुलाया और उससे धीमी आवाज में पूछ्ने लगा:

मैं: नेहा... बेटा इधर आओ|

नेहा: जी चाचू...

मैं: बेटा आपकी मम्मी कहाँ हैं?

नेहा: मम्मी की तबियत ठीक नहीं है| उन्हें बुखार है.... उन्होंने दो दिन से कुछ खाया भी नहीं....

ये सुनते ही मेरे पाँव तले जमीन खिसक गई!!! मैं तुरंत भाभी के घर की और भागा... वहां पहुँच के देखा तो भाभी चारपाई पर सो रहीं थी| मैंने उनके पास पहुँचा और उनके माथे पे हाथ रखा, उनका माथा तप रहा था| मेरी घबराहट के मारे हालत ख़राब हो रही थी| मैंने भाभी को पुकारा:

"भौजी.... भौजी.... प्लीज आँखें खोलो?"

मेरी आवाज सुनते ही भाभी ने अपनी आँखें धीरे-धीरे खोलीं|

"मानु....तुम वापस आगये ??? मेरे लिए..."

मैं: भाभी ये अपना क्या हालत बना रखी है?

भाभी: कुछ नहीं... ये तो बस थोड़ा सा बुखार है.... और अब तुम आगये हो तो मैं ठीक हो जाऊंगी|

मैं: थोड़ा सा बुखार? आपने दो दिन से कुछ नहीं खाया ? सिर्फ मुझे याद कर-कर के आपने ये हाल बना लिया है| ये सब मेरी वजह से हो रहा है....

मेरी आँखों में आँसूं छलक आये थे ...

मैं: भौजी मैंने आपसे एक बात छुपाई थी... दरअसल उस दिन जब पिताजी ने यात्रा पे जाने की बात की थी तो मैंने पिताजी को गाँवों दुबारा आने को मना लिया था| मैं आपको सरप्राइज देना चाहता था ... पर मुझे नहीं पता था की मेरी गैरहाज़री में आप अपना ये हाल बना लगी|

भाभी का शरीर इतना कमजोर लग रहा था की उन्हें उठ के बैठने में भी बहुत ताकत लगनी पड़ रही थी| उन्होंने मुझे अपनी ओर बुलाया... ओर कस के गले लगा लिया| उनका शरीर की गर्माहट मुझे कपड़ों के ऊपर से महसूस हो रही थी और मैं मन ही मन अपने आप को कोस रहा था की मेरे पागलपन की सजा भाभी को मिली| अब मुझे सच में भाभी की चिंता होने लगी थी... मैं दो दिन के लिए क्या गया भाभी ने खाना-पीना छोड़ दिया अगर मैं साल भर के लिए गया होता तो भाभी का क्या हाल होता.....????

मैंने पलट के देखा तो नेहा गुम-सुम खड़ी हमें देख रही थी... मैंने उसे अपनी ओर बुलाया|

नेहा: चाचू...मम्मी को क्या हो गया है?

मैं: कुछ नहीं बेटा... अब मैं आ गया हूँ ना, आपकी मम्मी अब बिलकुल ठीक हो जाएँगी| आप मेरा एक काम करोगे?

नेहा: हाँ....

मैं: पहले आप अपनी मम्मी के लिए एक थाली में भोजन ले आओ मैं उन्हें अपने हाथ से खिलाऊँगा| फिर आप जा के दूकान से अपने लिए दस रुपये के चिप्स ले आना| 


RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन - sexstories - 07-15-2017

18

अब आगे....

मेरा आदेश सुन के नेहा भागती हुई गई और खाना ले आई ... जब मैंने उसे दस रुपये दिए तो वो लेने से जिझक रही थी| मैंने भाभी की ओर देखा तो वो उसे घूर रही थी|

मैं: नेहा आप मम्मी की ओर मत देखो... ये लो दस रुपये ओर जाओ चिप्स ले के आओ|

भाभी: मानु... देखो ये बिगड़ जाएगी और फिर मुझसे ये अपने पापा से पैसे माँगेगी| जब नहीं मिलेंगे तब रोयेगी...

मैं: नेहा ... वादा करो की आप कभी भी मम्मी को या पापा को तंग नहीं करोगे और कभी भी मेरे आलावा किसी से पैसे नहीं लोगे?

नेहा ने हाँ में मुंडी हिला दी और मैंने उसे पैसे थमते हुए भेज दिया|

मैं: अब तो आप खुश हो ना... चलो अब मैं आपको अपने हाथ से भोजन खिलाता हूँ|

भाभी: मैं खा लूंगीं... तुम जाओ कपडे बदल लो... नह धो लो... काफी थक गए होगे|

मैं: नहीं... जब तक आप मेरे हाथ से भोजन नहीं करोगे मैं यहाँ से हिलने वाला नहीं|

भोजन में अरहर की दाल, चावल साथ ही भिन्डी की सब्जी और दो रोटियाँ थीं| मैं अपने हाथ से भाभी को दाल चावल खिलाने लगा| जब भाभी ने अपने हाथ से मुझे रोटी सब्जी खिलाने लगीं तो मैंने मन कर दिया इस्पे भाभी ने अपना मुंह फुला लिया| उनकी ख़ुशी के लिए मैंने एक कौर खा लिया परन्तु उससे ज्यादा नहीं खाया!!! अभी मैं भाभी को अपने हाथ से भोजन करा ही रहा था की नेहा भी आ गई चिप्स का पैकेट ले के| वो भी वहीँ चारपाई पर बैठ खाने लगी... उसके चेहरा खिल गया था| जब मेरी उँगलियाँ भाभी के लबों को छूती तो मुझे एक अजीब सा आनंद आता और दाल चावल खिलते समय कई बार मेरी उँगलियाँ उनकी जीभ से भी स्पर्श होती तो आनंद ख़ुशी में बदल जाता| भाभी के चेहरे पर भी मुस्कान आ गई थी और एक पल के लिए मैं चिंता मुक्त हो गया था|

भोजन करीब आधा हो चूका था की माँ मुझे भोजन के लिए बुलाने आ गईं| उन्होंने मुझे भाभी को अपने हाथ से भोजन खिलाते देख लिया था!!!

माँ: क्या हुआ बहु? सब ठीक तो है ना?

भाभी: कुछ नहीं चाची.. सब ठीक है|

मैं: माँ भाभी का शरीर छू के देखो भट्टी की तरह टप रहा है और इनका कहना है की कुछ नहीं हुआ| दो दिन से कुछ काया भी नहीं तभी तो देखो कितनी कमजोरी आ गई है|

माँ: क्यों बहु, तुमने खाना-पीना क्यों छोड़ दिया?

नेहा: चाचू के लिए!!!

नेहा की बात सुन मेरे कान लाल हो गए, शरीर सुन्न हो गया| पर इसमें उस बच्ची की क्या गलती उसने जो महसूस किया और देखा उसने अबोध बन के सब कह दिया| ये तो शुक्र है की भाभी ने उसे आँखें दिखा के डरा दिया वार्ना वो और पता नहीं क्या-क्या बक देती| माँ ने बड़े प्रेम के साथ भाभी से कहा:

माँ: बहु.. मैं जानती हूँ की तुम दोनों बहुत अच्छे दोस्त हो... बचपन से ये तुम्हारे साथ खेल है बल्कि इसने तो तुम्हारी गोद में ही बैठ के दूध भी पिया है पर तुम्हारा इससे इतना "मोह" बढ़ाना ठीक नहीं| कल को हम चले जायेंगे तो तुम इसे याद कर-कर के अपना जीना दुर्भर कर लगी.. अभी तुम्हारी छोटी सी बच्ची भी है ... इसका ख्याल रखो| और तुम लाड-साहब अपनी बहूजी को खाना खिला के आ के भोजन कर लो... सुबह से अन्न का एक दाना भी नहीं गया इसके मुँह में|

माँ की बात थी तो कड़वी पर एक दम सच थी!!! पर माँ नहीं जानती थी की भाभी और मेरे बीच में एक अटूट प्रेम है .. ऐसा प्रेम जो सिर्फ सच्चे जीवन साथियों के बीच होता है|माँ की बातों ने भाभी के ऊपर कुछ गहरा प्रभाव डाला था| थोड़ी देर पहले भाभी का चेहरा सूर्य के सामान दमक रहा था और माँ की बात सुनने के बाद उनके मुख पे फिर से चिंता और दुःख के बदल छा गए थे|

भाभी: मानु... तुमने सुबह से कुछ क्यों नहीं खाया?

मैं: भौजी... दरअसल मैं आपके चेहरे पे वो ख़ुशी के भाव देखने के लिए बैचैन था जो आपको मुझे यहाँ अचानक देख के आते| पर ...

भाभी: पर वार कुछ नहीं ...मैं भोजन खा लूँगी... पहले तुम जा के भोजन करो!

मैं: नहीं भौजी... मेरी वजह से आपने दो दिन खाना नहीं खाया और अब ये मेरी जिम्मेदार है की मैं आपको भोजन अपने हाथ से कराऊँ.. और वैसे भी अब बस थोड़ा ही बचा है .. आप भोजन खत्म करो... फिर मैं आपको दवाई दूँगा और फिर मैं भोजन करूँगा| ये मेरी जिद्द है !!!

भाभी ने जल्दी-जल्दी भोजन खत्म किया और फिर मैंने भाभी को क्रोसिन की एक गोली ला के दी ... जब मुझे संतुष्टि हो गई की भाभी अब आराम से यहाँ लेटी रहेंगी तब मैं भोजन करने गया और साथ ही नेहा को भी अपने साथ ले गया| भोजन के पश्चात मैंने अपने कपडे बदले और वापस भाभी के पास आ गया... आ कर देखा तो नेहा सुबक रही थी और भाभी भी उदास थी|

मैं: क्या हुआ नेहा? आप रो क्यों रहे हो? किसी ने कुछ कहा आपसे?

नेहा कुछ नहीं बोली बस मेरे गले लग गई और भाभी की ओर इशारा करके उन्हें दोषी करार दे दिया| मैं समझ चूका था की आखिर उसे क्यों डाँट पड़ी है|

मैं: भौजी... आपसे मैं बाद में बात करता हूँ पहले मैं अपनी गुड़िया को सुला दूँ|

इतना कह के मैं नेहा को गोद में उठा के बहार चला गया और उसे चुप करा के थोड़ा घुमाया और फिर सुला दिया| मैं पुनः भाभी के पास लौटा ...

मैं: हाँ तो आपने क्यों डाँटा मेरी गुड़िया को? इसीलिए न की उसने बिना सोचे समझे माँ के सामने सब कह दिया... तो इसमें इस अबोध बच्ची का क्या दोष उसने वाही कहा जो उसने देखा..

भाभी: उसे अकाल होनी चाहिए की किस के सामने क्या कहना है|

मैं: भौजी वो सिर्फ *** साल की है! उसे अभी इतनी समझ नहीं है... और मैं जानता हूँ आप को गुस्से किसी और बात का है| आप माँ की बात सोच-सोच के चिंतित हो रहे हो और उसका गुस्सा "मेरी बेटी" पर क्यों निकाल रहे हो? गुस्सा निकलना है तो मुझ पे निकालो ना किसने रोक है आपको|

भाभी: चाची सही कहती हैं.. मुझे अपने आप पर काबू रखना सीखना होगा| पर मैं क्या करूँ .... मुझे तुम्हारे साथ बैठ कर बातें करना अच्छा लगता है... तुम्हारा स्पर्श करना .... तुम्हारा बातें करने का ढंग और आज जब तुमने नेहा को “अपनी बेटी” कहा तो मैं तुम्हें बता नहीं सकती की मुझे कितनी ख़ुशी मिली| तुम्हारे बिना ये दो दिन मैंने कैसे काटे हैं ये मैं ही जानती हूँ!!! अगर तुम आज नहीं आये होते तो शायद मैं मर ही जाती|

मैं: भौजी आप ये क्या कह रहे हो? आप अपनी जान क्यों देना चाहते हो? आपको नेहा का जरा भी ख्याल नहीं आया? अगर आपको आज कुछ भी हो जाता तो नेहा का क्या होता? भैया को तो उसकी फ़िक्र जरा भी नहीं है| मैं नेहा की जिम्मेदारी जरूरर उठा लेता.. कैसे न कैसे कर के माँ और पिताजी को समझा भी लेता और नेहा को अपने पास रखता... उसे अच्छी परवरिश देता पर उसकी इस हालत का जिम्मेदार तो मैं ही होता ...........और मैं... मैं अपने आप को कभी माफ़ नहीं कर पाता|

मेरी बातों ने भाभी को भावुक कर दिया था.... और किसी हद्द तक मैं भी अपने अंदर आये इस बदलाव से चकित था| कैसे मुझ में इतना बदलाव आ गया की मैं नेहा की जिम्मेदारी तक उठाने के लिए तैयार हो गया| खेर भाभी से बातें करते-करते समय कैसे बीता पता ही नहीं चला| शाम के करीब साढ़े तीन हुए थे ... भाभी ने मुझे बताया की उनके सर दर्द हो रहा है|

मैं: मैं आपका सर दबा देता हूँ|

मैं भाभी के सिराहने बैठ गया और उनका सर अपनी गोद में ले कर धीरे-धीरे दबाने लगा| भाभी को थोड़ा आराम मिला तो उन्हें नींद आने लगी... और भाभी मेरी गोद में ही सर रखे सो गई| यात्रा की थकान अब मुझ पे भी जोर दिखने लगी और मुझे कब नन्द आ गई पता ही नहीं चला| अभी आँख लगे करीबन घंटा भर ही हुआ हो ग की एक कड़क आवाज मेरे कानों में पड़ी:

चन्दर भैया: अरे वाह !!! मानु भैया को जरा सा भी चैन नहीं लेने देगी तू? अभी-अभी थके हारे आएं हैं और तूने अपनी तीमारदारी करनी शुरू कर दी| अरे मैं पूछता हूँ ऐसी कौन सी बिमारी हो गई है तुझे?

भैया की कड़कती हुई आवाज सुन के भाभी उठ के बैठ गईं.. हालां की उनके शरीर में उतनी ताकत तो नहीं थी फिर भी जैसे-तैसे वो उठ के बैठी|

मैं: भैया आप भाभी को क्यों डाँट रहे हो....उनकी तबियत ठीक नहीं है... भुखार से सारा बदन तप रहा है और आप हो कि आप उन्हें ही डाँट रहे हो| भाभी का कोई कसूर नहीं है, उनके सर दर्द हो रहा था तो मैंने जबरदस्त की कि मैं आपका सर दबा देता हूँ| सर दबाते हुए कब दोनों कि आँख लग गई पता ही नहीं चला|

मेरी बात का भैया के पास कोई जवाब नहीं था इसलिए वो अपना इतना सा मुँह लेके चले गए| चन्दर भैया के शब्दों ने भाभी के दिल को घायल कर दिया था .... भाभी किसी तरह लडखडाती हुई उठ खड़ी हुई, और बाहर जाने लगीं|

मैं: भौजी? आप कहाँ जा रहे हो?

भाभी: बाहर ... कुछ काम निपटा लूँ| दो दिन से कोई काम नहीं किया मैंने.....

मैंने भाग कर भाभी का हाथ थामते हुए उन्हें रोका...

मैं: भाभी आपको मेरी कसम प्लीज.... भैया कि बातों पे ध्यान मत दो| मैं जानता हूँ आपको उनकी बातों से आघात लगा है... उनको आपकी कोई फ़िक्र नहीं है ... आपको ख़ुशी मिलती है तो उन्हें जलन होती है| आपका शरीर बहुत कमजोर है.... और अगर आप काम करने कि जिद्द करोगे तो मैं आपको छोड़के चला जाऊँगा|

भाभी: नहीं मानु... ऐसा मत कहो| मैं वही करुँगी जो तुम कहोगे पर मुझे छोड़के कहीं मत जाना|

मैंने भाभी को सहारा दे के चारपाई तक लाया और उन्हें पुनः लेटा दिया| घडी में समय देखा तो शाम के पाँच बजे थे| मैं रसोई कि ओर गया और भाभी और अपने लिए चाय और बिस्कुट ले आया| भाभी को चाय पिलाई और उन्हें अपनी यात्रा के बारे में बताया ... मेरी कोशिश थी कि भाभी दुखद बातों के बारे में कम से कम सोचें| रात होने लगी थी और भाभी के घर के आँगन में लगे रात रानी के फूलों कि खुशबु उनके कमरे को महका रही थी... माहोल ररोमांटिक हो रहा था.... तभी मुझे एक बात याद आई जो मैं भाभी से पूछना चाहता था:

मैं: भौजी एक बात बताओ... मेरे जाने से एक दिन पहले जब मैं रसिका भाभी के साथ रात्रि में भोजन कर रहा था तब आपने नेहा को मेरे पीछे क्यों भेज दिया था?

भाभी: हा.. हा... हा... वो दरअसल मुझे डर था कि कहीं तुम्हारी भाभी तुम्हें बहला-फुसला न ले और....

मैं: क्या? आपको सच में ऐसा लगता है कि मैं और वो.... दरअसल अगर मैं उनके पास जा के इधर उधर कि बातें नहीं करता और उनका मन ना लगाता तो वो रसोई के पास वाले छप्पर के नीचे सोती और फिर रात को अजय भैया और उनका युद्ध शुरू होता.. और आपका सरप्राइज ख़राब हो जाता|

भाभी: ओह्ह !!! मानु सच में तुम्हारे पास हर समस्या का हल है.. वैसे तुमने कभी गोर नहीं किया पर माधुरी और तुम्हारी रसिका भाभी तुम्हें भूखे भेड़िये कि तरह घूरते हैं!!! अगर उन्हें मौका मिल गया तो तुम्हें नोच के खा जायेंगे... हा..हा....हा...

मैं: मुझ में ऐसे कौन से सुर्खाब के पर लगे हैं?

भाभी: यही तो तुम नहीं जानते.... तुम्हारा भोलापन ही सबको लुभाता है|

मैं: अच्छा जी!!!! पर भाभी यकीन मानो मेरी उन दोनों में बिलकुल ही दिलचस्पी नहीं है...

भाभी: मैं जानती हूँ... तुम सिर्फ मुझसे प्यार करते हो|

मैं: और करता रहूँगा....

भोजन का समय हो रहा था .. इसलिए मैं भाभी और अपने लिए भोजन ले आया| इस बार भाभी अपने हाथ से भोजन कर रही थी| उनके स्वास्थ्य में सुधार आने लगा और सबसे ज्यादा मैं खुश था... नेहा भी मेरे बगल में बैठी भोजन कर रही थी| वो थोड़ा डरी- डरी सी लग रही थी.... जब हमारा भोजन हो गया तब मैंने सोचा कि उसका डर थोड़ा कम किया जाए|


RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन - sexstories - 07-15-2017

19

अब आगे....

मैं: नेहा... बेटा मेरे पास आओ| आप मम्मी से घबरा क्यों रहे हो?

नेहा ने कुछ नहीं किया बस अपनी मम्मी से नजरें चुरा के मेरे गले लग गई| भाभी का दिल भी पसीज गया पर उनके बार-बार बुलाने पर भी वो डर के मारे उनके पास नहीं जा रही थी| बस मेरे से चिपकी हुई थी...

मैं: बेटा अच्छा मेरी बात सुनो... मम्मी ने आपको गलती से डाँटा था.. देखो अब वो माफ़ी भी मांग रहीं हैं .. देखो तो एक बार|

भाभी ने अपने कान पकडे हुए थे ... परन्तु नेहा उनकी ओर देखने से भी कतरा रही थी....

भाभी: अच्छा बेटा लो मैं उठक-बैठक करती हूँ|

मैं: नेहा.. देखो आपकी मम्मी अभी कितना कमजोर हैं फिर भी अपनी बेटी कि ख़ुशी के लिए उठक-बैठक करने के लिए तैयार हैं| आप यही चाहते हो???

नेहा थी तो छोटी पर इतना तो समझती थी कि उसकी मम्मी कि तबियत अभी पूरी तरह ठीक नहीं हुई है... और ऐसी हालत में वो उठक-बैठक नहीं कर सकती| इसीलिए उसने भाभी कि ओर देखा...

मैं: बेटा अगर मैं आपको कभी डाँट दूँगा तो आप मुझसे भी बात नहीं करोगे?

नेहा ने ना में सर हिलाया ....

मैं: चलो अब अपनी मम्मी को माफ़ कर दो.. आगे से वो आपको कभी नहीं डांटेंगी| अगर इन्होने कभी आपको डाँटा तो मुझे बताना मैं इनको डाँटूंगा... ठीक है?

बड़ी मुश्किल से नेहा भाभी कि गोद में गई और भाभी उसे लाड-दुलार करने लगीं| उसके माथे और गालों को चूमने लगीं... तब जा के कहीं नेहा मानी| सच मित्रों छोटे बच्चों को मानना आसान काम नहीं!!!

तकरीबन आठ बजे होंगे.. मैंने भाभी को क्रोसिन कि गोली दी... उनका माथा स्पर्श किया तो वो दोपहर जैसा तप नहीं रहा था परन्तु बुखार अवश्य था| मुझे एक चिंता हो रही थी कि रात में भाभी को अगर बाथरूम जाना होगा तो वो कैसे जाएँगी? बिना सहारे अगर वो गिर पड़ीं तो? मैं उनके पास ही सोना चाहता था ताकि जर्रूरत पड़ने पे उन्हें बाथरूम तक लेजा सकूँ परन्तु मेरा ऐसा करना सब कि आँखों में खटकता .... इसलिए मैंने भाभी से जिद्द कि की जब तक उन्हें नींद नहीं आ जाती मैं वहीँ बैठूंगा... जब की मेरा प्लान था की आज रात जाग के भाभी की पहरेदारी करनी है| ताकि जब भी भाभी को जरुरत पड़े मैं उनकी देख-भाल कर सकूँ| भाभी को लेटा के मैं पास पड़ी चारपाई पर बैठ गया... नेहा मेरी ही गोद में सर रख के सो गई| पर भाभी को अभी तक नींद नहीं आई थी...

मैं: क्या हुआ भाभी नींद नहीं आ रही?

भाभी: हाँ

मैं: रुको मुझे पता है की आपको नींद कैसे आएगी|

मैं धीरे से उठा और नेहा का सर उठा के तकिये पे रखा और भाभी के माथे पे झुक के उनके माथे को चूमा| जैसे ही मैंने उनके माथे को चूमा भाभी ने अपनी आँखें बंद कर लीं| एक पल के लिए तो मन किया की भाभी के गुलाबी होंठो को चुम लूँ पर ऐसा करना उस समय मुझे उचित नहीं लगा| मैं वापस अपनी जगह बैठ गया और नेहका सर अपने गोद में रख लिया और बैठे-बैठे मुझे भी नींद सताने लगी थी| भाभी को नींद आ चुकी थी... और आज मैं पहली बार उन्हें सोते हुए देख रहा था| उनके चेहरे पे एक अजीब सी मुस्कान और शान्ति के भाव थे| उन्हें इस तरह सोता हुआ देख के मन बहुत प्रसन्न हो रहा था| करीब दस बजे होंगे की अजय भैया मुझे ढूंढते हुए अन्दर आये... मैंने जान बुझ कर दरवाजा खुला छोड़ा था ताकि किसी को संदेह न हो| जैसे ही मैंने भैया को देखा मैंने उन्हें इशारे से अपने मुख पे ऊँगली रख के चुप कराया| वो मेरे पास आये और मेरे कान में खुसफुसाये:

अजय भैया: मनु भैया... आप सोये नहीं अभी तक?

मैं: भैया आपको तो पता हिअ की भौजी की तबियत ठीक नहीं है.. उनको बुखार अभी भी है! शरीर कमजोर है .. और अगर रात में उन्हें किसी चीज की जरुरत होगी तो वो किसे कहेंगी? इसलिए मैं आजरात पहरेदारी पे हूँ!!!

अजय भैया: आप कहो तो मैं बड़े भैया को कह देता हूँ वो यहाँ सो जायेंगे|

मैं: भैया आज दोपहर को ही भैया भौजी पे भड़क उठे थे.. अगर रात में भौजी ने उन्हें उठाया तो वो आग बबूला होक उनको और डांटेंगे|

अजय भैया: मैं आपकी भाभी को कह देता हूँ वो यहाँ ओ जाएगी|

मैं: नहीं भैया वो भी दिन भर के काम से थकी होंगी.. आप चिंता मत करो मुझे वैसे भी नींद नहीं आ रही| (मैंने उनसे झूठ बोला|) आप सो जाओ...

किसी तरह अजय भैया को समझा-बुझा के भेजा...कमरे की रौशनी बुझाई... शुक्र था की भाभी जाएगी नहीं थी वरना वो मुझे जगा हुआ देख के मुझपे भड़क जाती| जब भी भाभी करवट लेटी तो चारपाई की आवाज से मैं जाग जाता और अपनी तसल्ली करता की वो ठीक तो हैं| रात के डेढ़ बजे... मुझे नींद का झोंक आ रहा था की तभ मुझे हलचल होती हुई महसूस हुई| कमरे में चाँद को थोड़ा बहुत प्रकाश आ रहा था ... मैंने देखा की भाभी काँप रही हैं|

मैं तुरंत उनके पास लपका:
मैं: क्या हुआ भौजी?

भाभी: मानु.. तुम? यहाँ क्या कर रहे हो? सोये नहीं अभी तक?

मैं: मुझे लगा की आप को शायद किसी चीज की जरूररत पड़े इसलिए मैं यहीं बैठा था|

भाभी: तुम तब से यहीं बैठे हो? हे भगवान !!! जाओ जा के सो जाओ...

मैं: मेरी बात छोडो... आपका शरीर काँप रहा है|

जब मैंने उन्हें छुआ तो मैं दंग रह गया| उनका शरीर आग की तरह जल रहा था... बुखार फिर से बढ़ गया था|

मैं: भौजी आपको फिर से बुखार चढ़ गया है... रुको मई आपके लिए चादर लता हूँ|

मैंने पास पड़ी एक साफ़ चादर उठाई और भाभी को ओढ़ा दी... उनका शरीर अब भी काँप रहा था .. मैं बाहर गया और अपनी चारपाई पे बिछी हुई चादरें भी उठा लाया और सब भाभी को ओढ़ा दी| मुझे याद आय की भाभी को क्रोसिन दिए करीबन पाँच घंटे हो गए हैं.. और अब मुझे उन्हें दूसरा डोज देना है| मैं बड़े घर की ओर भागा पर वहां ताला लगा हुआ था.. मैं वापस बड़की अम्मा (बड़ी चाची) के पास आया और उन्हें धीरे से जगाया ...

"अम्मा... भौजी को बुखार चढ़ गया है... उनका बदन भट्टी की तरह तप रहा है| आप मुझे बड़े घर की चाबी दे दो मैं उन्हें क्रोसिन की गोली खिला देता हूँ तो भुखार काबू में आ जायेगा|"

मेरी बात सुन बड़की अम्मा जल्दी से उठीं और मुझे चाबी दी.. मैं बड़े घर की ओर भागा और जल्दी से क्रोसिन ले के भाभी के पास आया| अम्मा भाभी के सर सहला रहीं थी... भाभी को सहारा दे के उठाया और उन्हें गोली दी| भाभी के शरीर में बिलकुल जान नहीं लग रही थी| वो फिर से लेट गईं .. उनका शरीर अब भी थर-थरा रहा था| डर के मारे मेरी हालत खराब थी.. मन में बार-बार बुरे ख़याल आ रहे थे| अम्मा ने मुझे जा के सोने के लिए कहा:

अम्मा: मुन्ना तुम जा की सो जाओ.. दिन भर के थके हुए हो|

मैं: नहीं अम्मा ... मुझे नींद नहीं आ रही| आप सो जाओ मैं यहीं बैठता हूँ|

अम्मा: मुन्ना देखो मैं जानती हूँ की तुम्हें अपनी भाभी की बहुत चिंता है ... पर तुम आराम करो मैं हूँ ना|

मैं: अम्मा आप सो जाओ .. मेरी नींद तो उड़ गई| अगर जरूररत पड़ी तो मैं आपको उठा दूँगा|

मैं अपनी जिद्द पे अड़ा था ... मैंने बहुत जोर लगा के अम्मा को वापस सोने के लिए भेज ही दिया| भाभी अब भी कप-कपा रही थी... मुझे एक बात सूझी की क्यों न मैं भाभी को अपने शरीर से गर्मी दूँ| इससे पहले की आप कुछ गलत सोचें मैं आप सभी को कुछ बताना चाहता हूँ:

बात मेरे जन्म से पहले की है... दरअसल जब मैं माँ के पेट में था तब मेरी माँ को रक्तचाप अर्थात BP की समस्या थी| डॉक्टर ने मेरी माँ को नमक और चावल खाने से मन किया था और साथ ही कुछ दवाइंया भी लिखी| मेरे पिताजी की लापरवाही की वजह से माँ ने न तो समय पे दवाइयाँ ली और न ही डॉक्टर द्वारा बताये परहेजों पे ध्यान दिया था| जिसके परिणाम स्वरुप जब मैं पैदा हुआ तो शारीरिक रूप से कमजोर था तथा मेरे शरीर का तापमान सामान्य बच्चों के मुकाबले अधिक था| इस कारन मुझे गर्मी अधिक लगती है परन्तु सर्दियों में मेरा शरीर मुझे अंदर से गर्म रखता है|

जब भाभी की कंप-काँपी बंद नहीं हुई तो मुझे अपने शरीर से भाभी के शरीर को गर्मी देना ठीक लगा| मैंने ज्यादा देर न करते हुए अपना कुरता उतार और भाभी की बगल में लेट गया| मैंने भाभी की ओर करवट ली और अपना बायां हाथ सीधा फैला दिया| भाभी ने मेरे बाएं हाथ को अपना तकिया समझ उसपे अपना सर रख दिया| उनका बयाना हाथ मेरी बगल में आ गया था और मैंने भाभी को अपने आगोश में ले लिया| मैंने भाभी को अपने से कास के गले लगा लिया था... उनका शरीर का तापमान बहुत अधिक लग रहा था| मुझे ऐसा लग रहा था मानो किसी ने मुझे एक दम गर्म सॉना में लेटा दिया| इस प्रकार साथ चिपके होने के बावजूद भी मेरे अंदर वासना नहीं भड़की थी... रह-रह कर मुझे भाभी की चिंता हो रही थी| मैं कामना कर रहा था की अँधेरी काली रात जल दी ढल जाए और सुबह होते ही मैं भाभी को डॉक्टर के ले जाऊं| पर ये रात थी की खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी|

करीबन एक घंटा बीता हुए मुझे महसूस हुआ की भाभी की कंप-काँपी बंद हो चुकी थी... उनके शरीर का तापमान भी काम लग रहा था| लग रहा था की क्रोसिन ने अपना असर दिखा दिया था... मैं धीरे से भाभी से अलग हुआ और अपना कुरता वापस पहन के नेहा की चारपाई पे बैठ गया| घडी देखि तो सुबह के साढ़े तीन बजे थे.... मैं उठा और अपना मुंह धोया... नींद अब मुझ पे बहुत जोर से हावी होने लगी थे| आजतक कभी ऐसे नहीं हुआ था की मुझे किसी भी वजह से साड़ी रात जागना पड़े! जब मैं वापस आया तो देखा भाभी उठ के बैठी हुई थीं...मैं तुरंत उनके पास पहुंचा और उनसे तबियत के बारे में पूछने लगा| उन्होंने बताया की उन्हें अब कुछ आराम है पर उन्हें प्यास लगी थी... मैंने उन्हें अपने हाथ से पानी पिलाया|

भाभी: मानु तुम मेरी वजह से साड़ी रात नहीं सोये|

मैं: भौजी... आप ये सब बातें छोडो ... और आप लेट जाओ| सुबह मैं आपको डॉक्टर के ले जाऊँगा|

भाभी: मानु... मुझे बाथरूम जाना है|

मैं: ठीक है मैं आपको ले चलता हूँ....

और मैं उन्हें सहारा दे के स्नानघर तक ले गया.... उनका बुखार अवश्य कम था, परन्तु शरीर बहुत कमजोर हो गया था| अब दिक्कत ये थी की मैं भाभी को स्नान घर में ऐसे ही नहीं छोड़ सकता था, ना ही मैं किसी को बुला सकता था| मुझे एक तरकीब सूझी.... मैंने भाभी से कहा की आप मेरा हाथ पकड़ो और उसका सहारा लेते हुए बैठ जाओ| जैसे ही भाभी बैठी मैंने अपना मुंह दूसरी ओर घुमा लिया ... मैं सोच रहा था की अचानक मुझे में इतनी संवेदनशीलता कैसे आ गई| जब भाभी फ्री हुईं तो मैंने उन्हें सहारे से फिर खड़ा किया| उनके लिए चलना दूभर था इसलिए मैंने उन्हें अपनी गोद में उठा लिया जैसे किसी "रा वन" फिल्म में शाहरुख़ खान ने करीना को उठाया हुआ था| मैंने भाभी को वापस उनके बिस्तर पे लिटाया ओर चादरें ओढ़ा दीं|

मैं वहीँ बैठा सुबह होने का इन्तेजार कर रहा था... बबर-बार घडी देखता की कब सुबह के नौ बजे और कब मैं भाभी को डॉक्टर के पास ले जाऊँ| टिक-टॉक...टिक-टॉक...टिक-टॉक...टिक-टॉक....टिक-टॉक आखिर सुबह के सात बज गए| घर में सभी उठ चुके थे... नेहा भी आँख मलते-मलते उठी और मुझे गुड मॉर्निंग पप्पी देके बहार चली गई| माँ को जब रात की बात अम्मा से पता चलीं तो वो भी भाभी का हाल-चाल पूछने आईं| भाभी अब भी सो रहीं थीं और सच कहूँ तो बहुत प्यारी लग रही थी!!!

माँ ने इशारे से मुझे बहार बुलाया... मैं बहार आया और माँ को सारा हाल सुनाया| माँ का कहना था की बीटा तू मुझे उठा देता मैं यहाँ सो जाती और तेरी भौजी का ध्यान रख लेती| मैंने माँ को समझाया की आप और पिताजी सबसे ज्यादा थके थे ... मैं तो गर्म खून हूँ... इतनी जल्दी नहीं थकता और वैसे भी मैं दिन में सो लूंगा तो मेरी नींद पूरी हो जाएगी| खेर मैंने माँ को अंदर भाभी के पास बैठने को कहा और मैं पिताजी को ढूंढने लगा| पिताजी खेत से आ रहे थे... भाभी की बिमारी और मेरा साड़ी रात जागने की बात घर-भर में फ़ैल चुकी थी| पिताजी ने हाथ धोया और फिर मुझे आशीर्वाद देते हुए भाभी के बारे में पूछा, तभी वहां बड़के दादा भी आ गए|

मैं: पिताजी, भौजी की तबियत अभी तो ठीक लग रही है परन्तु रात में उन्हें बुखार फिर चढ़ गया था| मेरा सुझाव है की हमें भाभी को डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए|

बड़के दादा: मुन्ना पर चन्दर तो अभी-अभी अजय को साथ ले के शहर निकल गया वो तो शाम तक ही आएगा|

मैं: पिताजी आप ऐसा करो की बैलगाड़ी वाले को बुला लो मैं, भौजी और आप डॉक्टर के चले-चलते हैं| उनका डॉक्टर के पास जाना जर्रुरी है|

पिताजी: ठीक है बेटा मैं अभी जा के बैलगाड़ी वाले को बुलाता हूँ तब तक तुम तैयार हो जाओ|

इधर पिताजी बैलगाड़ी वाले को बुलाने गए और उधर मैंने भाग कर अपने बाल बनाये और रात वाले कपडे ही पहन के भाभी को जगाने आ गया|

मैं: भौजी.. उठो... बैलगाड़ी आने वाली है मैं आपको डॉक्टर के पास ले जा रहा हूँ|

भाभी उठ तो गईं पर उनके शरीर में ताकत नहीं थी.. और डॉक्टर का नाम सुन के वो ना-नुकुर करने लगीं| मेरे ज्यादा जोर देने पे भाभी मान गई ... बैलगाड़ी वाला आ चूका था परन्तु भाभी को चला के ले जाना बहुत मुश्किल काम था|मैंने एक बार फिर भाभी को अपनी गोद में उठाया और बैलगाड़ी में लाके बैठा दिया| जब मैं भाभी को गोद में बहार लाया तो सरे घर वाले हैरान थे... और खुसुर-पुसर कर रहे थे| मुझे उनकी रत्ती भर भी परवाह नहीं थी| भाभी बैलगाड़ी अपना एक हाथ का घूँघट पकडे जैसे-तैसे बैलगाड़ी में बैठ गईं| पिताजी आगे बैलगाड़ी वाले के साथ बैठ गए और मैं बीच में भाभी का हाथ पकडे हुए बैठ गया| शरीर में कमजोरी के कारन भाभी के लिए बैठना मुश्किल था ऐसे में मैंने भाभी को अपनी गोद में सर रख के लेटने को कहा| करीबन एक घंटे तक हिचकोले खाने के बाद हम डॉक्टर के पास पहुंचे|


RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन - sexstories - 07-15-2017

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अब आगे....

वहां पहुँचते ही मैं तुरंत नीचे उतरा और फिर से भाभी को अपनी गोद में लेके डॉक्टर की दूकान में घुस गया और सीधा उसके कमरे में रखे बिस्तर पे लेटा दिया| डॉक्टर भी हैरान था... भाभी को उनकंफर्टबल महसूस ना हो इसलिए मैंने पिता जी को कमरे के बहार ही रुकने को बोला| जब मैं भाभी को अंदर ला रहा था तब मैंने गोर किया की डॉक्टर का बोर्ड जो बहार लगा था वो अंग्रेजी तथा हिंदी दोनों भाषाओँ में था ... मैंने अंदाजा लगाया की ये डॉक्टर अंग्रेजी अवश्य जानता होगा|
दरअसल मुझे भय था की पिछले दिनों जो हमारे बीच में हुआ उससे कहीं भाभी गर्भवती तो नहीं हो गईं? मैं ये बात डॉक्टर से सीधे-सीधे तो नहीं पूछ सकता था, परन्तु मुझे भय इस बात का भी था की कहीं डॉक्टर पिताजी के सामने भाभी के गर्भवती होने की बात कर देता तो घर में कोहराम छिड़ जाता!!!

आगे जो मेरे और डॉक्टर के बीच अंग्रेजी में बातचीत हुई उसे मैं हिंदी में भी लिखता रहूँगा|

डॉक्टर: क्या हुआ इन्हें?

मैं: Actually Doctor for the pas two days she hasn’t eaten anything, moreover she had high fever yesterday. I was away with my parents on a trip to Varanasi, when I came ack yesterday afternoon I saw her like this… first we had lunch together and then I gave her Crocin tablet and after that her fever was somewhat in control. Atleast that’s what I thought!!! In the night we had dinner together and then again I gave her Crocin. At mid night around 1:30AM hse had a very high fever… since it was about 5 hours since the last dose, so I gave her another dose. After that somehow her fever is a bit mild.
(दरअसल डॉक्टर साहब इन्होने पिछले दो दिनों से अन्न का दाना तक नहीं खाया है और कल इन्हें बहुत तेज बुखार भी था| मैं अपने माता-पिता के साथ वाराणसी गया हुआ था, कल जब मैं लौटा तो इन्हें इस हालत में पाया| पहले मैंने इन्हें खाना खिलाया.. फिर क्रोसिन की गोली दी| उसके बाद इनका बुखार कुछ काबू में आया... काम से काम कुझे तो ऐसा लगा!!! रात में मैंने इन्हें खाना खाने के बाद एक गोली और दी| आधी रात को इनका शरीर फिर से तपने लगा और मुझे याद आया की क्रोसिन दिए हुए पांच घंटे बीत चुके हैं और एक डोज़ और बाकी है| उसे देने के बाद इनका बुखार कुछ कम हुआ| )

डॉक्टर: okay, did she eat anything in the morning?
(अच्छा.. क्या इन्होने सुबह से कुछ खाया है?)

डॉक्टर ने अपना अला लगाया, फिर उसने भाभी के शरीर का तापमान चेक करने के लिए थर्मामीटर लगाया|

मैं: I’m afraid no sir!!!
(जी नहीं डॉक्टर साहब|)

डॉक्टर: Okay from what you’ve told me I take it she’s feeling very weak… and because of your necessary precaution her fever is in control. It’s a good thing you brought her here otherwise the case sould have gone worse. I need to inject some fluids into her body so she could feel a bit normal also since you seem to be her husband, its your duty to take care of her.
(जैसे तुमने बताया उससे ये बात तो पक्की है की इनका शरीर कमजोर हो गया है| तुम्हारी समझदारी के कारन इनका बुखार अब काबू में है| अच्छा हुआ तुम इन्हें यहाँ ले आये वार्ना हालत और भी गंभीर हो सकती थी| मुझे इन्हें ग्लूकोस चढ़ाना होगा ताकि इनके शरीर को थोड़ी ताकत मिले| और चूँकि टीम इनके पति हो तुम्हें नका ख़याल ज्यादा रखना होगा|)


मैं: Actually sir, I’m not her husband… she’s my cousin’s wife.
(दरअसल डॉक्टर साहब मैं इनका पति नहीं हूँ| एमेरे चचेरे भाई की पत्नी हैं|)

डॉक्टर: Oh I see, so she’s your Bhabhi? Then where’s her husband? Isn’t he concerned about her wife’s health?
(ओह्ह .. तो ये आपकी भाभी हैं| तो इनके पति कहाँ हैं? और उन्हें इनकी ज़रा भी फ़िक्र नहीं|)

मैं: Sir he doesn’nt know anything about her health. He’s working in Delhi and I’ve sent a telegram to him.
(डॉक्टर साहब उन्हिएँ तो भाभी की तबियत के बारे में कुछ पता ही नहीं है.. दरअसल वो डेल्ही में काम करते हैं और मैंने उन्हें टेलीग्राम कर दिया है|)

डॉक्टर: Oh I see!! You seem to take good care of your bhabhi. Good!!!
(अच्छा!!! तुम अपनी भाभी का बहुत अच्छे से ख़याल रख रहे हो| शाबाश !!!)

भाभी हमारी अंग्रेजी में हो रही गुफ्तगू बड़े गोर से सुन रही थी... हालाँकि उन्हें समझ कुछ नहीं आया था| पर जब डॉक्टर ने सुई निकाली तो भाभी की सिटी-पिट्टी गुल हो गई| वो गर्दन हिला के ना-ना करने लगीं|

डॉक्टर ने मुझे इशारे से उन्हें समझाने को कहा:

मैं: भौजी ... ये आपको ग्लूकोस चढ़ा रहे हैं इसे आपके शरीर में ताकत आएगी और आप जल्दी अच्छे हो जाओगे|

पिताजी ने भ मेरी बात सुन ली थी और वो कमरे के बहार से ही भाभी को सांत्वना देने लगे||

पिताजी: कोई बात नहीं बहु .. ज्यादा दर्द नहीं होगा| अपने देवर की बात ही मान लो|

जैसे तैसे भाभी मानी... डॉक्टर जब उन्हें सुई लगा रहा था तो भाभी मुंह बना रहीं थीं जिसे देख के मुझे बड़ा मजा रा रहा था| जब डॉक्टर ने भाभी की नस में सुई लगा दी तो मुझे अपने साथ बहार आने को बोला| भाभी मुझे अपने हाथ के इशारे से अपने पास बुला रही थी| मैंने उन्हें कहा की मैं बस दो मिनट में आया| डॉक्टर मैं और पिताजी बहार के कमरे में बैठे थे.. डॉक्टर ने भाभी का हाल चाल सुनाया और उन्हें ज्यादा से ज्यादा आराम करने की सलाह दी| पिताजी और डॉक्टर के बीच में सहज रूप से बात-चीत चल रही थी और मेरा डर कम हो गया था की जो मैं सोच रहा था वो नहीं हुआ| डॉक्टर अब मेरी तारीफों के पल बाँध रहा था की कैसे उसे आज एक अरसे बाद अंग्रेजी बोलने वाला इंसान मिला| मैं भाभी के पास अंदर आ गया और घुटनों के बल बैठ के उनके कान में फुस-फसाया:

मैं: भौजी.. अब आप जल्द ही ठीक हो जाओगे|

भाभी: मानु तुम डॉक्टर से अंग्रेजी में क्या बात कर रहे थे?

मैं: अभी नहीं भौजी... घर चलो सब बताऊँगा|

टिप-टिप करते हुए ग्लूकोस की बोतल हुए खाली होने लगी और सारा ग्लूकोस भाभी के खून में मिलने लगा| इधर पिताजी और डॉक्टर की बातों की आवाज अंदर तक आ रही थी और भाभी मेरी बढ़ाई सुन के खुश हो रही थी| जब बोतल लगभग खाली हो गई तब मैंने डॉक्टर को अंदर बुलाया... उसने भाभी के हाथ से लुइ निकाली और वापस पट्टी का दी| अब उसने मुझे दो-तीन तरह की दवाइयाँ भाभी को नियमित रूप से खिलने के लिए बोला| मैंने बड़े ध्यान से सभी दवाइयों को समय के अनुसार याद कर लिया| मैंने भाभी को फिर से गोद में उठाया और बैलगाड़ी में बैठा दिया| पिताजी आगे बैठे थे और मैं मैं भाभी की बगल में| ग्लूकोस चढ़ने से भाभी की हालत में सुधार आया था| एक बार फिर हम हिचकोले कहते हुए घर पहुँच गए .. मैंने भाभी को एक बार फिर गोद में उठाया और उनके कमरे में ला के लेटा दिया|

मैं जब जाने लगा तो भाभी ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे रोका:

भाभी: मानु ..तुम कल सारी रात मेरी वजह से परेशान रहे हो... तुमने सारी रात जाग के मेरी देखभाल की ... तुम बहुत थके हुए लग रहे हो, अब थोड़ा आराम भी कर लो| तुम जा के सो जाओ.. मैं अब पहले से बेहतर महसूस कर रही हूँ|

मैं: नहीं... ये सब मेरी गलती है| ना मैं आपसे अपने वापस आने की बात छुपाता और ना ही आपका ये हाल होता| इसलिए अब जब तक आप पूरी तरह ठीक नहीं होते मैं आपकी देखभाल में लगा रहूँगा फिर चाहे मेरी ही तबियत क्यों न खराब हो जाए|

इतना कह के मैं वहां से चला गया.... बहार आके देखा तो घर के सभी लोग छप्पर के नीचे बैठे भाभी की सेहत के बारे में बात कर रहे थे| बड़की अम्मा ने तो मुझे गले लगा के दुलार भी किया, और कहने लगी:

"मुन्ना तुम्न्हें सच में अपनी भौजी की हमसब से ज्यादा फ़िक्र है| सारी रात ये लड़का जागता रहा .... मैंने मना भी किया तब भी नहीं माना|और एक चन्दर है... जिसे जरा भी फ़िक्र नहीं अपनी बीवी की.... "

सभी को इस बात का अफ़सोस था की चन्दर भैया और भाभी के रिश्ते में दरार आ चुकी है|
देखा जाए तो मैं उस तारीफ को पाने का हकदार नहीं था, मेरे ही कारन भाभी की जान पे बन आई थी|
दोपहर के भोजन के बाद मैंने भाभी को दवाई दी और मैं नेहा के साथ दूसरी चारपाई पे लेट गया| नेहा लेटे-लेटे मेरे साथ मस्ती कर रही थी.. कभी मेरे बाल खींचती तो कभी मेरी नाक.... भाभी गुम-सुम थी और मुझसे ये बर्दाश्त नहीं हुआ तो मैंने उनसे उनकी नाराजगी का कारन पूछा?

मैं: क्या हुआ? आप चुप-चाप क्यों हो?

भाभी: कुछ नहीं... बस ऐसे ही...

बातों से लग रहा था की भाभी कुछ छुपा रहीं हैं... या इस डर से कुछ नहीं बोल रहीं की कहीं नेहा ना सुन ले| मैं यूँ ही नेहा के साथ खेलता रहा.. कभी उसे गुड-गुड़ी करता तो कभी उसके सर पे हाथ फेरता ताकि वो जल्दी से सो जाये| करीब आधा घंटा लगा उसे सुलाने में.. आखिर अब मेरी बेचैनी मुझ पे हावी होने लगी थी|

मैं: नेहा सो गई है| अब बताओ की क्या बात है? क्यों उदास हो?

भाभी: तुम अब मेरी बात नहीं मानते... बड़े हो गए हो... जिम्मेदारियां उठाने लगे हो... क्यों सुनोगे मेरी?

मैं: ऐसा नहीं है... आपको पता है डॉक्टर से मेरी क्या बात है?

भाभी: क्या?

मैं: जब मैं आपको अपनी गोद में लिए डॉक्टर के पास पहुँचा और आपकी तबियत के बारे में उसे बताया तो उसे लगा की मैं आपका पति हूँ...

भाभी: तो उसमें गलत क्या है?

मैं: गलत तो कुछ नहीं है.. पर आप ही मुझे अपनी देख-भाल करने से रोक रहे हो| वैसे अगर उसने यही बात हिंदी में पिताजी से कही होती तो? ये तो शुक्र था की मैंने ही उससे अंग्रेजी में बात की वार्ना वो ये बात सच में कह देता|

भाभी: मैं तुम रोक नहीं रही पर में ये बर्दाश्त नहीं कर सकती की मेरी वजह से तुम बीमार पड़ जाओ|

मैं: जब आप ये बर्दाश्त नहीं कर सकते की मैं आपकी वजह से बीमार पड़ जाऊं...तो सोचो मेरे दिल पे क्या बीती होगी जब मैंने आपको बीमार देखा था| मेरे दिल की धड़कन रूक गई थी...

भाभी की आँखें भर आईं थी... मैं उन्हें और दुःख नहीं देना चाहता था| मैं उनके पास उन्हीं की चारपाई पर बैठा और झुक के उनके होंठों को चूम लिया और उनको गले लगा लिया| भाभी का मन भर आया था पर मेरे आलिंगन ने उन्हें रोने नहीं दिया|

भाभी: पहले तुम दुःख देते हो और फिर मरहम भी खुद ही लगाते हो| अच्छा ये बताओ की तुम डॉक्टर से अंग्रेजी में बात क्यों कर रहे थे?

मैं: वो मुझे डर था...

भाभी: कैसा डर?

मैं: मुझे डर था की कहीं पिछले कुछ दिनों में जो हुआ उससे आप प्रेग्नेंट तो नहीं हो गए?

भाभी: अगर हो भी जाती तो क्या होता?

मैं: आप मजाक कर रही हो ना?

भाभी: नहीं तो ... ज्यादा से ज्यादा तुम्हारे भैया मुझे मारते-पीटते ... घर से निकाल देते बस!

मैं: आपको ये इतना आसान लगता है, और मुझ पे क्या गुजरती ये सोचा आपने? और नेहा और हमारे बच्चे का क्या होता? ये सोचा आपने?

भाभी: मुझे तो लगा था की तुम मुझे अपने साथ रखोगे?

मैं: माँ और पिताजी से क्या कहता? और क्या वो आपको मेरे साथ रहने देते?

भाभी: तो तुम मुझे भगा के ले चलो?

मैं: हुंह... आपको ये सब मजाक लग रहा है| मैं आपको भगा के कहाँ ले जाता? क्या खिलाता? नेहा की परवरिश कैसे होती? मैंने तो अभी पढ़ रहा हूँ... जनौकरी मिलना इतना आसान नहीं होता|

भाभी: तुम्हारी बातों से लगता है की हमने "पाप" किया है? जो कुछ भी हुआ वो सब तुम्हारे लिये खेल था... तुम मुझसे प्यार-व्यार कुछ नहीं करते!!!

भाभी की बातें मुझे तीर की तरह चुभ रहीं थी... इसलिए मैंने उनकी किसी भी बात का जवाब नहीं दिया और उठ के चल दिया| भाभी मुझे गलत समझ रही थी... मैं उनसे प्यार करता था पर मैं अभी शादी और बच्चे की जजिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार नहीं था, उनके लिए कहना आसान था पर मेरे लिए सुनना आसान नहीं था| मैं भाभी को समझाना चाहता था की वो मुझे गलत समझ रहीं हैं| परन्तु इस समय मैं उनका सामना नहीं कर सकता था...
शाम आने को आई थी... और भाभी की दवाई का समय भी हो आया था| मैं भाभी को दवाई देने के लिए पहुँचा तो भाभी कमरे में एक किनारे जमीन पे बैठी थी... और अपने मुंह को अपने घुटनों में छुपाये रो रहीं थी| मुझसे देखा नहीं गया और मैं उनके पास घुटनों के बल बैठ गया.. उनका मुंह उठाया तो देखा रो-रो के उन्होंने अपना बुरा हाल कर लिया था|

मैं: आप क्यों रो रहे हो? प्लीज चुप हो जाओ ... मेरे लिए नहीं तो नेहा के लिए ही चुप हो जाओ| अच्छा ये बताओ की हुआ क्या? किसी ने आपसे कुछ कहा? या आप दोपहर की बात की वजह से परेशान हो?

भाभी मेरी किसी भी बात का जवाब नहीं दे रही थी ... नेहा की दुहाई दी तो भाभी ने रोना तो बंद कर दिया पर मुझसे बात नहीं कर रहीं थीं| मैंने उन्हें उठ के चारपाई पे बैठने को कहा तो तब भी नहीं उठीं.. मैंने दवाई खाने को कहा तब भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी ... साफ़ था की वो मुझसे नाराज हैं और शायद अब कभी भी बात ना करें| मैं बहार गया और नेहा को आवाज दी.. वो दौड़ी-दौड़ी मेरे पास आई| मैं उसे अपने साथ अंदर ले आया और उसके हाथ में दवाई दी और कहा की आप ये दवाई मम्मी को खिला दो| इस बार भाभी ने नेहा के हाथ से दवाई ली और चुप-चाप खा ली| फिर नेहा का सहारा ले के उठीं और चारपाई पर मुंह मोड़के लेट गईं| मैंने नेहा से कहा की बेटा आप यहीं मम्मी के पास रहना ... कहीं जाना मत मैं अभी आता हूँ| ये किस्सा तीन दिन तक चला.. भाभी ना तो मुझसे बात करती... ना मेरे हाथ से दवाई लेती| बस नेहा का ही सहारा था जो वो दवाइयाँ ले रहीं थी| चन्दर भैया की तो कोई दिलचस्पी थी ही नहीं.. उनकी बला से कोई जिए या मरे! मेरे साथ भी कोई बोल-चाल नहीं थी!!! ऐसा लगता था की गुस्से का गुबार उनके अंदर बढ़ता जा रहा है.. और अब वो जल्द ही फूटने को था|

इन तीन दिनों में मैं अंदर टूट चूका था.... कई बार मैंने भाभी से बात करने की कोशिश की, परन्तु भाभी या तो उठ के चली जाती या या मुंह मोड़ के लेट जाती|आज सुबह माँ और पिताजी को किसी रिश्तेदार से मिलने जाना था...उन्होंने मुझे साथ ले जाने का पर्यटन किया परन्तु मैंने यह कह के मना कर दिया की मुझे सोना है| उनके निकलने से पहले रसिका भाभी भी अपने मायके जाने वाली थीं... और जाएं भी क्यों ना ...तकरीबन एक हफ्ते से वाही तो चुलह-चूका संभाले हुए थी| यूँ तो वो कभी कोई काम करती नहीं थी... भौजी की बीमारी की मजबूरी में काम कर रहीं थी| अब जब भौजी की तबियत ठीक होने लगी थी तो वो कैसे न कैसे करके खिसकने की तैयारी में थी| कामचोर!!!


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21

अब आगे....

सुबह ग्यारह बजे तक सब चले गए... माँ पिताजी बैलगाड़ी से निकले और अजय भैया रसिका भाभी को छोड़ने निकल गए| अजय भैया को शाम तक आना था... बड़के दादा और बड़की अम्मा (बड़े चाचा और चाची) भी खेत निकल गए थे... और चन्दर भैया को खेत आने को कह गए| मैं तो घर पे था ही भौजी का ख्याल रखने के लिए, पर कोई नहीं जानता था की मेरे और भाभी के बीच में बोल-चाल बंद है| मैं बड़े घर में लेटा परेशान था.. अंदर ही अंदर मुझे भौजी की बातें खाए जा रही थी|मैंने दृढ़ निस्चय किया की मैं भौजी से आज अपने दिल की बात कर के ही रहूँगा... उनकी गलतफ़ैमी दूर करके ही रहूँगा| मुझे उन्हें समझाना था की मेरा प्यार झूठा नहीं था... हालाँकि शुरू-शुरू में मेरा उनकी तरफ आकर्षण का कारन सिर्फ उनका शरीर ही था परन्तु बाद में वो आकर्षण प्यार में बदल चूका था|

मैं उठा और उनके घर की और चल पड़ा... मुझे घर से शोर सुनाई दिया.. जैसे की कोई डाँट रहा हो| मैं उत्सुकता वश उनके उघार की तरफ दौड़ा... अंदर जा के देखा तो चन्दर भैया के हाथ में चंदे की बेल्ट थी... और वो भौजी को अपशब्द कह रहे थे|

(आप सब से क्षमा चाहता हूँ मित्रों, मैं वो शब्द यहाँ नहीं लिखना चाहता... ऐसी अपमान जनित भाषा स्त्रियों के लिए प्रयोग करना वाकई निंदनीय है|)

चन्दर भैया घर के आँगन में खड़े थे और भाभी स्नानघर के पास नीचे बैठीं थी... नेहा उनकी गोद में थी और रो रही थी.. भाभी और नेहा नीचे दिखाए चित्र की तरह बैठे थे|

जैसे ही चन्दर भैया ने मारने के लिए बेल्ट उठाई मैंने भागते हुए उन्हें रोकने की कोशिश की... जब मैं उनका हाथ पकड़ रहा था तब उनके मुख से देसी दारु की तेज दुर्गन्ध आ रही थी| साफ़ जाहिर था की वे नशे में धुत्त थे... उनके मस्तिष्क ने काम करना बंद कर दिया था... मदिरा उनके दिमाग पे कब्ज़ा कर चुकी थी और वो अपना गुस्सा आज भौजी पर निकालना चाहते थे| उनके बलिष्ठ शरीर के आगे मेरी एक ना चली.. उन्होंने मुझे धक्का देते हुए कहा:

"हट जा साले...वरना अगला नंबर तेरा है|"

मैं फिर भी नहीं माना और भाभी और उनके बीच खड़ा हो गया (मेरी पीठ भैया की तरफ थी और मुख भाभी की तरफ|).... शराब का नशा अब जोर मरने लगा था और उन्होंने बिना सोचे समझे अपनी बेल्ट से मेरी पीठ पे वार किया| उनके पहले वार से ही मेरी मुंह से जोर दार चीख निकली...

"आह!!! अह्ह्हह्ह!!!! उम्म्म!!!"
चन्दर भैया: अच्छा हुआ जो तू भी यहीं आगया... वरना मैं इससे निपट के तेरे पास ही आता| बड़ा शौक है तुझे इससे बचाने का न ये ले... और ले... बहुत बहूजी-भौजी कर के इसके आगे-पीछे घूमता है.. और ले ...

भैया बिना रुके अपनी बेल्ट से वार करते रहे... और मैं कराहता रहा| भाभी ने मुझे हटने की विनती की, पर मैंने केवल ना में सर हिलाया... वो मुझे हटाने के लिए उठीं पर मैंने उन्हें धक्का दे के दूर कर दिया... मेरी आँखों से पानी लगातार बह रहा था और कराहना भी चालु था !!! भाभी नीचे पड़ी सब देख रहीं थी और रो रही थी... उन्हें पता था की चाहे कुछ भी हो मैं हटने वाला नहीं... नेहा भागती hui भाभी की गोद में अपना मुंह छुपा के बैठी थी और रो रही थी| सच कहूँ तो मेरा खून खोल रहा था.. मन कर रहा था की चाक़ू से गोद-गोद कर चन्दर भैया का खून कर दूँ.. उन्होंने मेरी फूल जैसी बच्ची को रुलाया और मेरी भौजी.. जिन्हें मैं अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता हूँ उन्हें दुःख पहुँचाया| परन्तु मेरा ऐसा कदम उठाने का मतलब होता जेल!!!

भाभी: मानु को छोड़ दो.. इसने आपका क्या बिगाड़ा है... मारना है तो मुझे मारो!!!

मैं: नहीं..... आह!!!

चन्दर भैया: तेरा भी नंबर आएगा... पहले इससे तो निपट लूँ|

अब तक भैया बीस बार बेल्ट से वार कर चुके थे .. भौजी सहमी सी बैठी थीं और फुट-फुट के रो रहीं थी .. और नेहा का तो रो-रो के बुरा हाल था| अचानक ही अजय भैया आगये... जब उन्होंने मेरे करहाने की और चन्दर भैया के मुंह से अपशब्द सुने तो वो भागे-भागे अंदर आये और चन्दर भैया के हाथ से बेल्ट छीनने की कोशिश की.. जब वो भी नाकामयाब हुए तो वो उन्हें धकेलते हुए बहार ले गए|

मैं लड़खड़ाया और जमीन पे घुटनों के बल आ गिरा, भौजी मेरे पास भागती हुई आईं.. और अपने पल्लू से मेरे मुख पे आये पसीने को पोछा| जब उन्होंने ने मेरी पीठ की और देखा तो उनकी सांसें रूक गईं... मेरी पीठ पूरी लहू-लुहान हो गई थी.. टी शर्ट कई जगह से फ़ट गईं थी.. और मेरी हालत भी ख़राब होने लगी थी| मुझे ऐसा लग रह था की मेरी पीठ सुन्न हो गई है... बस जहाँ-जहाँ जख्म हुए थे वहाँ तड़पाने वाली जलन हो रही थी| मैंने आज तक इतना दर्द नहीं सहा था!!! भाभी ने मुझे सहारा दे के उठाया और चारपाई बिछा के लेटाया.. मैं तो सीधा लेट भी नहीं सकता था इसलिए मैं पेट के बल लेटा| भाभी अब भी रो रही थी और नेहा मेरे मुख के आगे खड़ी सुबक रही थी| मैंने लेटे-लेटे उसके आंसूं पोछे... तभी भाभी रुई ले के मेरे पास आई| मैं थोड़ा हैरान था क्योंकि मुझे नहीं पता था की मेरी पीठ इतनी लहू-लोहान हैं| भाभी ने एक-एक कर रुई के टुकड़ों से मेरी पीठ पे लगे खून को साफ़ करने लगी और नीचे खून लगी रुई का ढेर लगने लगा| अब सच में मुझे ये ढेर देख के डर लगने लगा था... पता नहीं मेरे शरीर में खून बचा भी है की नहीं?

मैं: भौजी... प्लीज चुप हो जाओ! आह...मैं आपको रोते हुए नहीं देख सकता....अंह !!!

भौजी: तुम बीच में क्यों आये ? देखो तुमने अपनी क्या हालत बना ली?

मैं: तो मैं खड़ा हुआ भैया को आपको पीटते हुए देखता रहता? अंम्म्म !!! वैसे भी पिछले दो दिन से मैंने जो आपको दुःख दिया है.. आह्ह!!! उसकी कुछ तो सजा मिलनी ही थी| स्स्स्स !!!

भौजी: तुमने मुझे कोई दुःख नहीं दिया| मैंने ही तुम्हारी बातों को गलत समझा ... तुम सही कह रहे थे| अपनी अलग दुनिया बसाना इतना आसान नहीं होता| मुझे माफ़ कर दो मानु... !!!

मैं: चलो देर आये-दुरुस्त आये पर मुझे भी आपसे कुछ कहना है, ये बात मैंने आपसे पहले भी कही थी....अह्ह्ह्ह!!!

इससे पहले मैं कुछ कह पाता, अजय भैया आ गए|

अजय भैया: भाभी बड़े भैया को क्या हुआ था? वो मानु भैया को क्यों मार रहे थे?

भौजी: वो मुझे मारना चाहते थे.... मानु बीच में आगया| बहुत पी रखी थी उन्होंने .... मुझसे आ के झगड़ा करने लगे और...

मैं: भैया आपको और भौजी को मुझसे एक वादा करना होगा...

अजय भैया: क्या बोलो?

मैं: ये बात हम तीनों के आलावा और किसी को पता नहीं होनी चाहिए... ख़ास तोर पे माँ और पिताजी को, वरना आफत आ जयगी!! अह्ह्ह !!! अन्न्ह्ह !!!

अजय भैया: आप ये क्या कह रहे हो?

मैं: भैया अगर पिताजी को मेरी पीठ पे बने ये निशान दिख गए तो पिताजी घर सर पे उठा लेंगे... उम्!!! घर में लड़ाई झगड़ा हो जायेगा इस बात पे|

भौजी: मानु तुम इन घावों को कब तक छुपाओगे... वैसे भी गलती तुम्हारे भैया की है... तुम तो बस...

मैंने फिर से भौजी की बात काटी, क्योंकि मैं नहीं हःता था की अजय भैया को हमारे रिश्ते पे कोई शक हो|

मैं: नहीं भौजी...अंह्!!!

अजय भैया: नहीं मानु भैया, मैं आपकी ये बात नहीं मानूँगा| पहले तो आप मेरे साथ डॉक्टर के चलो, और फिर शाम को मैं माँ-और पिताजी को ये बात बताता हूँ| वे ही बताएँगे की क्या करना उचित है| और हाँ चन्दर भैया साइकिल ले के निकल गए हैं...

मैं: कहाँ???

अजय भैया: मामा के घर... जब भी वो घर में लड़ाई-झगड़ा करते हैं तो वहीँ जाते हैं| जब उनका नशा उतरता है तब अगले दिन वापस आजाते हैं|

मैं: ठीक है... भैया आप प्लीज मुझे एक पैन (PAIN) किलर ला दो|

अजय भैया: अभी लाया|

अजय भैया PAIN किलर लेने गए और भाभी अंदर से मलहम ले आईं.... जो पीठ थोड़ी देर पहले सुन्न थी अब जैसे उसमें वापस खून दौड़ने लगा और मेरा दर्द दुगना हो गया| जब भाभी ने मेरी पीठ पे मलहम लगाया तो मैं तड़प उठा...

"आअह!!!"
अब तो उनके छूने से भी दर्द हो रहा था| तभी अजय भैया PAIN किलर लाये, मैंने झट से गोली ली और वापस उल्टा लेट गया| उसके बाद मुझे होश नहीं था की क्या हुआ.... जब मेरी आँख खुली तो भौजी मेरे सिरहाने बैठी पंखा कर रही थी|

ठंडी हवा जब मेरी पीठ को छूती तो दर्द कुछ काम होता| PAIN किलर का असर खत्म हो चूका था और रह-रह के दर्द हो रहा था|समय का ठीक से पता नहीं, पर रात हो चुकी थी ... जब मैं उठ के बैठा तो भौजी अपने आंसूं पोंछती हुई उठी और मुझे सहारा देने लगी...

"अब कैसा लगा रहा है? दर्द कुछ कम हुआ? "

मैं: नहीं... जब तक गोली का असर था तब तक तो कुछ पता नहीं था... वैसे ये कौन सी गोली दी थी भैया ने, जो मैं इतनी देर सोता रहा? ओह्ह्ह्ह !!! क्या समय हुआ है?

भौजी: नौ बजे हैं! मैंने तुम्हें दोपहर के भोजन के लिए उठाने की कोशिश की पर तुम उठे ही नहीं? चाचा-चाची का फ़ोन आया था... उन्होंने कहा की वे कल सुबह आएंगे|

मैं: आपने उन्हें इस सब के बारे में तो नहीं बताया? ओह्ह्ह !!

भौजी: नहीं.... मैंने अजय को मन कर दिया था.. नहीं तो वे चिंतित होते और आधी रात को ही यहाँ पहुँच जाते|

मैं: ठीक है.... अंह्ह्ह!!!

भौजी: पहले चलो हाथ मुंह धो लो और भोजन कर लो.... फिर मैं आयुर्वेदिक तेल से मालिश कर देती हूँ, शायद आराम मिले|
मैंने हाथ-मुँह धोया, और भोजन किया ... मेरे साथ ही भौजी ने भी भोजन किया| उन्होंने मेरे लिए सुबह से कुछ नहीं खाया था| उसके बाद भौजी ने वो आयुर्वेदिक तेल लगाया...

मैं: भौजी... अम्मा और बड़के दादा आअह!!! सो गए क्या?

भौजी: हाँ.. सब सो गए...सिर्फ तुम और मैं जगे हैं|

मैं: तो आप सब ने उनसे कुछ कहा?

भौजी: हाँ.. अजय ने उन्हें सारी बात बताई| माँ-पिताजी काफी शर्मिंदा थे..

मैं: मैं समझ सकता हूँ| उम्म्म!!! पर आपने कभी बताया नहीं की भैया इससे पहले भी आपको तंग कर चुके हैं? आपसे बदसलूकी कर चुके हैं.... अनन्नह !!!

भौजी: मैं जानती थी की तुम्हें जान के दुःख हो ग.. इसलिए नहीं बताया| उनके दिमाग में तो बस "एक" ही चीज चलती रहती है.. फर चाहे कोई जिए या मरे|

मैं: भौजी... अगर आप बुरा ना मनो तो मैं एक बात पूछूं? म्म्म्म!!!

भौजी: हाँ पूछो?

मैं: आपने बताया था की चन्दर भैया ने आपकी छोटी बहन के साथ....

मैंने जान-बुझ के बात पूरी नहीं की|

भौजी: हाँ... ये तबकी बात है जब मेरा रिश्ता तुम्हारे भैया के साथ तय हुआ था| तब वे हमारे घर दो दिन के लिए रुके थे.... उसी दौरान वो अनर्थ हुआ|

मैं: मुझे माफ़ करना भौजी मुझे आपसे वो सब नहीं पूछना चाहिए था|

भौजी: कोई बात नहीं मानु... तुम्हें ये बातें जानने का हक़ है| खेर छोडो इन बातों को... अब दर्द कुछ कम हुआ?

मैं: थोड़ा बहुत... पर अब भी पीठ जल रही है| ऐसा लग रहा है की जैसे किसी ने पीठ में अंगारे उड़ेल दिए| काश यहां बर्फ मिल जाती... अम्म्म्म !!!

भौजी से दवाई लेके मैं जैसे-तैसे करवट लेके लेट गया| पर चैन कँहा था.... ऊपर से करवट बदलने के लिए भी मुझे काफी मशक्त करनी पड़ रही थी|रात को गर्मी ज्यादा थी इसलिए मैं, भौजी और नेहा तीनों आँगन में ही सो रहे थे| रात के करीब साढ़े बारह बजे होंगे ... नींद मेरी आँखों से कोसों दूर थी| बार-बार करवट बदलने से चारपाई चूर-चूर कर रही थी.. भौजी को एहसास हो गया था की पीठ में हो रही जलन मुझे सोने नहीं देगी| मैं दुबारा बायीं करवट लेके लेट गया... तभी कुछ ऐसा हुआ जिसकी मैंने कभी कामना भी नहीं की थी|

भाभी मेरे बिस्तर पर आईं.. और मुझसे चिपक कर लेट गईं| मुझे कुछ ठंडा सा एहसास हुआ.. दरअसल भाभी ने ऊपर कुछ भी नहीं पहना हुआ था!!! उनके नंगे स्तन मेरी पीठ में धंसे हुए थे... मेरी पीठ को ठंडी रहत तो मिली|

मैं: भौजी आप ये क्या कर रही हो?

भौजी: क्यों, तुम अगर मुझे गर्माहट देने के लिए मुझसे चिपक के सो सकते हो तो क्या मैं तुम्हें अपने नंगे बदन से ठंडक भी नहीं दे सकती?

मैं कुछ नहीं बोला बस उनका हाथ जो मेरी छाती पे था उसे कास के दबा दिया| अब मैं और भौजी दोनों इस तरह चिपके लेटे रहे... मेरे अंदर वासना भड़कने लगी थी| मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे... और भौजी भी ये महसूस कर रही थी| मैं सच में वो सब नहीं करना चाहता था... इसलिए मैं उठ के बैठ गया और भौजी की और पीठ कर के खड़ा हो गया| मैं उनसे नजरें नहीं मिला पा रहा था.. खुद को रोक रहा था... अगर मेरे अंदर वासना की आग भड़की तो मैं फिर से..........................
भौजी को ये अटपटा सा लगा वो मेरे पीछे आके खड़ी हो गईं... और मुझे पीछे से जकड लिया| इस जकड़न ने मेरी आग में घी का काम किया|

भौजी: क्या हुआ मानु? तुम इस तरह यहाँ क्यों आ आगये?

मैं: बस अपने आपको रोकने की नाकाम कोशिश कर रहा था|

भौजी: रोकने की? पर क्यों? क्या तुम्हें मेरा साथ अच्छा नहीं लगता?

मैं: ऐसा नहीं है... मैं वो.....

भौजी: समझी... तुम मेरी बात को लेके अब भी नाराज हो?

मैंने कोई जवाब नहीं दिया.. परन्तु मैं जानता था की अगर मैंने कुछ नहीं किया तो भौजी का दिल टूट जायेगा और मैं ऐसा कतई नहीं चाहता था| मैंने बिना कुछ कहे भौजी के चेहरे को थाम… और उनके होंठों से अपने होठों को मिला दिया|


RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन - sexstories - 07-15-2017

22

अब आगे....

उस एक पल के लिए मेरे ऊपर वासना बेकाबू हो गई.. मैं सब दर्द भूल गया था| मैं बेतहाशा भौजी के होंटों को चूसता रहा... भौजी इसका विरोध बिलकुल नहीं कर रही थी... धीरे-धीरे वो भी मेरा सहयोग करने लॉगिन| उन्होंने अपना मुख हल्का सा खोला... बिना मौका गंवाए मैंने उनके मुख में अपनी जीभ प्रवेश करा दी! जब उन्होंने अपनी जीभ से जवाबी हमला किया तो मैंने उनकी जीभ को अपने दातों टेल दबा दिया और रसपान करने लगा| मैं काबू से बहार होगया था... मेरे हाथ अब फिसलते हुए भौजी के कंधो तक आगये थे.. मैंने झुक के भौजी के दायें स्तन को अपने होठों की गिरफ्त में ले लिए| अपने अंदर भड़की वासना के कारन मैंने बिना सोचे समझे भौजी के स्तन को काट लिया! दर्द इतना तीव्र था की एक पल के लिए तो भौजी कसमसा के रह गयीं.. परन्तु उन्होंने मुझे अपने से दूर नहीं किया... बल्कि अपनी ओर खींचने के लिए मेरे सर को अपने स्तन पे दबा दिया| मैं उनके स्तन को किसी शिशु की भाँती पीने लगा और अब मेरा हाथ उनके बाएं स्तन का मर्दन करने लगा था| उनका बयां निप्पल मेरी उँगलियों के बीच था और मैं उसे भी रह-रह के निचोड़ने लगा था.. जब मैं ऐसा करता तो भौजी की सिसकारी छूट रही थी....

"स्स्स्स्स्स्स्स्स्स ... अम्म्म्म ... हन्ंणणन् "

मैं भौजी के सिस्कारियों से उत्तेजित हो रहा था और उनके दायें निप्पल को दाँतों से दबाने लगा| मैं नहीं जानता था की मैं अनजाने में भौजी को पीड़ा दे रहा हूँ| जब मेरा मन उनके दायें स्तन से भर गया तब मैंने उनके बाएं स्तन को अपने मुख की चपेट में ले लिया| अब मैं उस स्तन का भी स्तनपान करने लगा और दायें स्तन का मर्दन अपने हाथों से करता रहा| कभी चूसता ... कभी काटता ... कभी निप्पल को निचोड़ देता| जब मेरा मन भर गया तब मैंने भौजी के स्तनों की हालत देखी| दोनों स्तन लाल हो चुके थे... और भौजी के मुख पे आंसूं की कुछ बूँदें छलक आईं थी| परन्तु उन्होंने मुझसे इसकी जरा भी शिकायत नहीं की.. वो चाहती तो मुझे रोक सकती थीं.. या बता सकती थीं की मानु मुझे दर्द हो रहा है| परन्तु उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.... मैं कुछ क्षण तक उन्हें देखता रहा ... निहारता रहा.... सोचने लगा की क्या एच में वो मुझे इतना प्यार करती हैं?

मैं: भौजी आपको दर्द हो रहा था न?

भौजी: नहीं तो... तुम मुझे प्यार कर रहे थे, मार थोड़े ही रहे थे जो दर्द होता| पर तुमने ऐसा क्यों पूछा??

मैं: आप झूठ बोल रही हो... आपके स्तन पे बने ये लाल निशान कुछ और ही कहानी बता रहे हैं|

भौजी: ये तो तुम्हारे प्यार की निशानी है... जब तुम नहीं होगे तब ये मुझे टुंगरे साथ बिठाये हर लम्हे को याद दिलाएंगे|

इतना कह के भौजी निचे घुटनों के बल बैठीं और मेरी पेंट खोल दी| मेरा लंड बहार निकला और उसे पहले तो चूमा| फिर अपनी जीभ के बीच वाले भाग से एक बार चाटा....

"स्स्स्स... अंह्ह्ह" मेरी सिसकारी छूटी|

अब उन्होंने अपना मुख पूरा खोला और जीभ बहार निकली और जितना हो सकता था मेरे लंड को अपने मुख में भर लिया| मेरा लंड उनकी जीभ और तालु के बीच में रगड़ा जा रहा था... इतना मज़ा आ रहा था की मैं अपने पंजों के बल खड़ा हो गया| शरीर का हर रोंगटे खड़ा हो चूका था| भाभी ने धीरे-धीरे लंड को मुख में भरे अपनी गर्दन को आएगे पीछे करना शुरू किया| ऐसा लगा जैसे भौजी आज मेरा सारा रास पी जाएँगी!!! मैं अब किसी भी समय छूटने वाला था... मैंने भौजी को बीच में ही रोक दिया| भौजी को खड़ा किया... बिना उनकी साडी उतारे उनकी बायीं टांग मैंने अपने हाथ में ले ली और भौजी ने अपने हाथ से मेरे लंड को सही दिशा दिखाई| जैसे ही मुझे दिशा का ज्ञात हुआ मैंने एक जोरदार धक्का मारा... धक्के की तीव्रता इतनी तेज थी की हमारा बैलेंस बिगड़ा और मैं और भौजी दिव्वार से जा टिके| अब भौजी की नंगी पीठ दिवार से लगी थी और सामने से उनके स्तन मेरी छाती में धंसे हुए थे| भौजी बड़ी जोर से छटपटाई.. मैं भी हैरान था की आखिर ऐसा कौन सा तगड़ा जोर लगा दिया मैंने की भौजी छटपटा गईं,

मैं: आप ठीक तो हो ना?

भौजी अपने आप को संभालते हुए बोलीं : "हाँ"

मैं: तो आप एक डैम से छटपटाने क्यों लगीं?

भौजी: वो बस ऐसे ही.. तुम प्लीज मत रुको!!!

मैंने सोचा शायद मैंने वासना के आवेश में आके कुछ ज्यादा ही जोर लगा दिया होगा| मैंने अपनी गति धीरे-धीरे राखी... हर झटके से भौजी के स्तन हिल जाते और भौजी की करहाने की आवाज आने लगती:

"स्स्स्स....अंंंंंंं ... मानु......अह्ह्ह्हह्ह"

उनके दोनों हाथ मेरे सर के बालों में फिर रहे थे... और मुझे बड़ा अच्छा महसूस हो रहा था| वासना बड़ी जोर-शोर से हिलोरे मार रही थी और भौजी भी अलगःभाग चरम सीमा तक पहुँच गयी थीं| उनकी आँखें बंद थीं और वो बस सिस्कारियां लिए जा रही थी....

"आआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह,ssssssssssssssssssss स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स "

अब मैं कोई और पोजीशन इख्तियार करना चाहता था तो मैंने अपना लंड बहार खींच लिया ... भौजी को पलटा और नीचे झुकाया जिससे वो घोड़ी के सामान झुक गयीं, मैंने अपना लंड पीछे से उनकी योनि में डाल दिया, और फिर से धक्के लगाना शुरू कर दिया| भौजी चार्म सीमा पर पहुँच गई और स्खलित हो गईं| उनका रास बहता हुआ बहार आया और मेरे लंड को पूरी तरह भिगो दिया| गर्शन काम हो चूका था और मैं अब भी झटके दिए जा रहा था|

भौजी की पीठ चाँद की रौशनी में चमक रही थी और मेरा मन किया की मैं उसे एक बार चुम लूँ| मैंने भौजी की पीठ से बाल हटाया और जो मैंने देखा उससे मैं सन्न रह गया| भौजी की पीठ बेल्ट की मार से बने दो निशान थे... ये देखते ही मेरी आँखों में खून उत्तर आया और मैं छिटक के भौजी से दूर हो गया| अब मुझे आभास हुआ की जब मैंने पहली बार झटका मारा था तो भौजी क्यों छटपटाई थीं| उनकी जख्मी नंगी पीठ दिवार से रगड़ गई थी जिससे उन्हें बहुत दर्द हुआ होगा| इधर भौजी को एहसास हुआ की मैं अचनका रुक क्यों गया तो वो पीछे मूड के मुझे देखने लगीं|

भौजी: क्या हुआ मानु?

मैं: आपकी पीठ पे वो निशान... आज सुबह के हैं ना?

भौजी: हाँ मानु... तुम्हारे आने से पहले उन्होंने मुझे...

मैं: और आपने मुझे ये बात बताना जर्रुरी नहीं समझा?

भौजी: नहीं मानु... ये घाव तो बहुत थोड़े हैं| तुमने तो मुझपे अपने आप को कुर्बान कर दिया था|

मैं अंदर कमरे में गया और भौजी की पथ पे लगाने के लिए मलहम ले आया|

भौजी: ये क्या कर रहे हो?

मैं: आपकी पीठ पे दवाई लगा रहा हूँ|

भौजी: पर तुम तो मुझे प्यार कर रहे थे, और तुम तो अभी झड़......

मैं: वो सब बाद में, पहले आपकी पीठ में दवाई लगाना जरुरी है| मेरी वजह से आपका जखम और उभर गया है|

मैंने भौजी को खींच के उनकी चारपाई पर पेट के बल लेटाया और उनका घाव साफ़ कर के उसपे मलहम लगाया| भौजी ने बड़ी कोशिश की कि मैं पहले सम्भोग पूरा करूँ पर मेरा मन उनकी दशा देख के फैट गया था| इतना दुःख तो मुझे तब भी नहीं हुआ था जब मैंने उन्हें बुखार से तपते हुए देखा था| अब मुझे समझ आ रहा था कि भौजी क्यों चाहती थी कि मैं उन्हें भगा के ले जाऊँ| इस समय भौजी को सच में बहुत दर्द हो रहा था ... और मैं बेवकूफ उन्हें और दर्द देने की सोच रहा था| दवाई लगाने के बाद मैं उन्हें पंखा करने लगा ताकि ठंडी हवा से उनके घाव को कुछ आराम मिले| मन ही मन मेरे अंदर गुस्सा भी उबलने लगा था और मैंने एक फैसला किया|

मैं: मैंने एक फैला किया है|

भौजी: क्या? स्स्स्स्स

मैं: कल मैं आपको और नेहा को भगा ले जाऊँगा|

भौजी: नहीं मानु.. तुम अभी गुस्से में हो| हम कल बात करते हैं|

मैं: नहीं कल ऑफर होने से पहले जब सभी घरवाले खेत में काम करने निकल जायेंगे तब हम तीनों यहाँ से भागेंगे|

भौजी: मानु, तुम्हें मेरी कसम .. ऐसी बात मत करो|

मैंने झल्लाते हुए कहा: "तो आपको यहाँ मरने के लिए छोड़ दूँ?"

बस इतना कहते हुए मैं उठा और अपनी चारपाई पे जाके पेट के बल लेट गया| अब भौजी ने मुझे अपनी कसम दी थी इसलिए मैं अभी तो चुप हो गया पर दिमाग में भौजी को भगाने का प्लान बना चूका था|

सुबह हुई, मैं फटा-फ़ट उठा... शायद पीठ के घाव कुछ भर गए थे, क्योंकि दर्द कुछ कम था| बहार आया तो बड़के दादा और बड़की अम्मा (बड़े चाचा और चाची) चाय पी रहे थे| उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया:

बड़के दादा: आओ मुन्ना... बैठो| कैसी तबियत है? घाव कुछ भरे लगते हैं.... दर्द कम हुआ? नहीं तो चलो डॉक्टर के ले चलें|

मैं: नहीं दादा... अब दर्द कम है|

बड़की अम्मा: लो चाय पियो|

मैं: नहीं अम्मा अभी मुंह नहीं धोया, पूजा भी नहीं की|

बड़के दादा: मुन्ना, हमें कल शाम को अजय ने बताया ...जो कुछ हुआ उसके लिए हम बहुत शर्मिंदा हैं|

मैं: नहीं दादा... ऐसा मत कहिये| मैं भौजी को दवाई देने जा रहा था जब मुझे चीखने-चिल्लाने की आवाज आई| मैं दौड़ा-दौड़ा वहां पहुँचा... आगे जो हुआ वो आपको पता ही है|

बड़के दादा: तुम ये बात छुपाने को क्यों कह रहे थे... गलती चन्दर की है| सजा तो उसे मिलेगी ही... चाहे वो सजा मेरा छोटा भाई दे या मैं| हम तुम्हारे पिताजी को सब सच बताएँगे...

मैं: जैसा आपको ठीक लगे| मैं तो बस यही चाहता था की इस बात पे ज्यादा बवाल न हो| वैसे अम्मा आपने भौजी का हाल तो पूछा ही नहीं?

बड़की अम्मा: क्यों? उसे क्या हुआ? चोट तो तुम्हें लगी थी|

मैं: दरअसल अम्मा, मेरे पहुँचने से पहले भैया ने भौजी पे हाथ उठा दिया था| उनकी पीठ पे भी बेल्ट के दो जख्म बने हैं|

बड़की अम्मा: हाय राम... बहु तुमने हमें क्यों नहीं बताया?

भौजी: नहीं अम्मा.... ज्यादा दर्द नहीं था|

मैं: तो आप रात में चीखे क्यों था? अम्मा भौजी करवट लेके लेटी थी, जैसे ही ये सीढ़ी लेटी एकदम से चीख पड़ीं और उठ के बैठ गईं|

बड़की अम्मा: चल बहु अंदर चल, मैं मलहम लगा दूँ|

मैं भी वहां से उठा बड़े घर की और चल दिया| समय था की मैं अपने बनाये प्लान को अंजाम दूँ... मैंने जल्दी-जल्दी अपने दो-चार कपडे पैक किये| अगला काम था पैसे का जुगाड़ करना, मेरे पास पर्स में करीब दो सौ रूपए थे| उस समय ATM कार्ड तो था नहीं.. हाँ परन्तु पिताजी के पास MULTI CITY चेक की किताब थी और मुझे पिताजी के दस्तखत करने की नक़ल बड़े अच्छे से आता था| मैंने किताब से एक चेक फायदा और उसमें एक लाख रुपये की राशि भर दी| जल्दी से नह धो के तैयार हुआ, पूजा की और भगवान से दुआ मांगी की मुझे मानसिक शक्ति देना की मैं अपनी नई जिम्मेदारी निभा सकूँ| जब मैं भौजी के पास पहुँचा तो अजय भैया खेत जाने के लिए निकलने वाले थे:

अजय भैया: मानु भैया, चाचा का फ़ोन आया था वे चार बजे तक आएंगे|

मैं: अच्छा.. और चन्दर भैया?

अजय भैया: उनका पता नहीं.. मैंने मां को फ़ोन किया था| उन्होंने बताया की वो वहीँ हैं और अभी तक सो रहे हैं.. मैंने उन्हें कल हुए हादसे के बारे में भी बताया| उन्हें भी जानके बहुत अफ़सोस हुआ....

मैं: भौजी चाय दे दो|

भैया हंसिया ले के खेत की ओर निकल गए| अब घर में केवल मैं, नेहा ओर भौजी ही थे|

मैं: चलो जल्दी से तैयार हो जाओ?

भौजी: क्यों?

मैं: भूल गए रात को मैंने क्या कहा था?

भौजी मेरा हाथ पकड़ के मुझे अपने घर की ओर खींचती हुई ले गई| मुझे चारपाई पे बैठाया ओर बोलीं:

"मानु तुम्हें क्या हो गया है? क्यों तुम ऐसी बातें बोल रहे हो? तुम भी जानते हो की नई जिंदगी शुरू करना इतना आसान नहीं होता? हम कहाँ रहेंगे? क्या खाएंगे? और कहाँ जायेंगे? नेहा की परवरिश का क्या? है तुम्हारे पास इन बातों का जवाब?"

मैं: भौजी मैंने सब सोच लिया है| हम यहाँ से सीधा दिल्ली जायेंगे, वहां मेरा एक भाई जैसा दोस्त है, वो हमारा कुछ दिनों के रहने का इन्तेजाम कर देगा| उसके मामा जी जयपुर में रहते हैं, वही मेरी नौकरी भी लगवा देंगे| आप, मैं और नेहा जयपुर में ही रहेंगे|

भौजी: और इसके लिए कुछ पैसे भी तो चाहिए होंगे? वो कहाँ से लाओगे... मेरे पास तो कुछ जेवर ही हैं जो मेरे माँ-बापू ने दिए थे|

मैं: उनकी जर्रूरत नहीं पड़ेगी... मेरे पास लाख रूपए का चेक है, जिसे हम भारत के किसी भी बैंक से कॅश करा सकते हैं| इतने पैसों से हमारा गुजारा हो जायेगा... धीरे-धीरे मैं कमाने लगूँगा ओर फिर सब कुछ ठीक हो जायेगा|

भौजी: और ये पैसे आये कहाँ से तुम्हारे पास?

मैं: पिताजी के बैंक से! पर आप चिंता मत करो मैं ये पैसे उन्हें लौटा दूँगा|

भौजी: मुझे तुम्हारी बात पे भरोसा है, पर मेरी एक बात का जवाब दो: जब हम यहाँ से भाग जायेंगे तो तुम्हारे माँ-पिताजी का क्या होगा? वो किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रहेंगे ... हमारी कितनी बदनामी होगी| अगर मैं ये मान भी लूँ की तुम्हें इस बात का कोई फर्क नहीं पड़ता तो मुझे एक बात बताओ, हम जहाँ भी रहेंगे वहां लोग तो होंगे ही| हम जंगल में तो रहने नहीं जा रहे, तुम्हारी उम्र सोलह्-सत्रह साल होगी और मेरी चौबीस साल| तुम जमाने से क्या कहोगे? ये सच तो तुम छुपा नहीं सकते? और इसका असर नेहा की जिंदगी पे भी पड़ेगा| क्या तुम यही चाहते हो? अगर हाँ तो मैं तुम्हारे साथ चलने के लिए अभी तैयार हूँ|

इतना कह के भौजी ने जल्दी-जल्दी अपने कपडे सूटकेस में फेंकने शुरू कर दिए|

मैं: नहीं... पर मैं आपको इस नर्क में अकेला भी तो नहीं छोड़ सकता| आज तो मैं था तो मैंने आपको बचा इया... कल जब मैं नहीं रहूँगा तब? तब आपकी रक्षा कौन करेगा?

भौजी: मानु मुझे हमारे प्यार पे पूरा भरोसा है... और भगवान पर भी| वही मेरी और नेहा की रक्षा करेगा|

अब बहंस करने का कोई फायदा नहीं था.... भौजी की बातों में सच्चाई थी| हमारे जैसे देश में जहाँ लोग पति-पत्नी के बीच के प्यार को नहीं बल्कि उनकी उम्र, कद, काठी इत्यादि को ज्यादा मानता देते हैं ऐसे देश में हमारे प्यार के लिए कोई जगह नहीं थी| मैं गुम-सुम सा बैठा रहा.. और भौजी दूसरी चारपाई पर बैठी मुझे देख रही थी|
जब मैं उठने को हुआ तो भौजी मेरे पास आइन और मुझे गले लगा लिया| वो खुद को रोने से नहीं रोक पाईं.. मैंने उन्हें चुप कराया:

मैं: अब आप चुप हो जाओ हम कहीं नहीं जा रहे! ये लो...

ये कहते हुए मैंने चेक फाड़ डाला और बात घुमा दी ...

मैं: कल जो आप ने मलहम लगाया था न उससे काफी आराम मिला| थोड़ा और लगा दो ....

भौजी ने पहले मुझे मलहम लगाया उसके बाद मैंने भौजी को मलहम लगाया| हाथ-मुँह धो के हम बाहर आ गए| भौजी खाना बना रही थी और मैं पास की चारपाई पर लेटा उन्हें निहार रहा था| अब तो मुझे भौजी और नेहा की और ज्यादा चिंता होने लगी थी.... मेरी अनुपस्थिति में भैया दोनों का क्या हाल करेंगे ये सोच के ही डर लगता था|

भौजी: क्या सोच रहे हो मानु?

मैं: कुछ नहीं|

भौजी: रात का अधूरा काम कब करोगे?

मैं: अभी मन नहीं कर रहा|

भौजी: तुम तो मन मार लेते हो, पर मेरे मन का क्या? वो तो तब ही खुश होता है जब तुम खुश रहते हो|

मैं: भौजी मैं....

इससे पहले की मैं और कुछ कहता पिताजी ने आके मुझे डरा दिया| भौजी हींहोने घूँघट हटा रखा था, पिताजी को देखते ही डेढ़ हाथ का घूँघट काड लिया|


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23

अब आगे....

पिताजी: और लाड़-साहब फैले पड़े हो? हो गया आराम या अभी बाकी है?

इतना कहते हुए पिताजी ने थपकी देने के लिए मेरी पीठ पे ज़ोरदार हाथ मार| हाथ लगते ही मेरी चीख निकल पड़ी:

"आअह्ह्ह"

भौजी भागती हुई मेरे पास आईं और पिताजी को सारा हाल सुनाया, इधर मैं दर्द से करहा रहा था| पूितजी ने मेरी टी-शर्ट उठाई और मेरी पीठ का हाल देख के माँ और पिताजी ने सर पीट लिया|

माँ: हाय राम!!! मेरे बेटे की क्या हालत कर दी| डॉक्टर के पास गया था?

मैं: नहीं... भौजी ने मलहम लगाया था| उससे कुछ आराम है.. PAIN किलर भी ली थी|

पिताजी: बड़े भैया कहाँ हैं?

भौजी: चाचा वो खेत गए हैं|

पिताजी: मैं वहीँ जाता हूँ... तब तक तुम दोनों इसका ख्याल रखो| इसे डॉक्टर के नहीं जाना तो ना सही, मैं डॉक्टर को यहीं ले आता हूँ|

माँ मेरे पास बैठी सर पे हाथ फेर रहीं थीं... और भौजी खाना बना रहीं थी| खाना लघभग तैयार था.. दाल में छौंका लगा और खाना तैयार| भौजी ने माँ से कहा की आप नह धो लो तब तक वो मेरे पास बैठेंगी| माँ स्नान करने चलीं गईं और भौजी मेरी पीठ पे फूंक मार रहीं थी| उनकी ठंडी-ठंडी फूंक से मुझे बहुत आराम मिला|

पिताजी डॉक्टर को ले आये, साथ-साथ बड़के दादा (बड़े चाचा), बड़की अम्मा (बड़ी चाची) और अजय भैया, सभी अपना काम काज छोड़के आ गए| डॉक्टर मेरे पास आया और मुझसे अंग्रेजी में बात करने लगा:

डॉक्टर: Hey Man! How are you? (दोस्त क्या हाल है तुम्हारा?)

मैं: In Pain…. AAH!!! (दर्द हो रहा है डॉक्टर साहब!)

डॉक्टर: oh yeah, your dad told me about your Bravery Stunt. You did a great job, you seem to care a lot about your Bhabhi! (हाँ, तुम्हारे पिताजी ने मुझे रास्ते में तुम्हारी वीरता के बारे में सब बताया| शाबाश!!! तुम अपनी भाभी का ज्यादा ही ध्यान रखते हो?)

मैं: Yeah, she’s my best friend. (जी, क्योंकि ये मेरी सबसे अच्छी दोस्त हैं|)

डॉक्टर: What I see, I can see a different bond between you two. Anyways your wound’s all messed up.. did you put any Gel on the affected area? (मुझे ना जाने क्यों ऐसा महसूस होता है की तुम दोनों के बीच में एक अटूट रिश्ता है| खेर, तुम्हारे पीठ के जख्मों की हालत अच्छी नहीं है, क्या तुमने इस्पे कोई मलहम लगाईं थी?)

मैं: That’s just some Ayurvedic Ointment. (हाँ, कोई आयुर्वेदिक मलहम लगाईं थी|)

डॉक्टर: You shouldn’t just apply anything without first consulting a qualified doctor. You could have phoned me? (बिना किसी डॉक्टर की राय लिए तुम्हें कोई भी दवाई नहीं लगानी चाहिए| फिर तुम मुझे फ़ोन भी तो कर सकते थे|)

मैं: Actually sir this all happened so fast, almost forgot that Ive your number. Extremely Sorry! (दरअसल ये सब इतनी अचानक हुआ की मुझे याद ही नहीं रहा की मेरे पास आपका नंबर भी है| मुझे माफ़ कर दीजिये|)

डॉक्टर: No Need to be sorry, I’ll have to first clean your wound with Spirit, after that I’ll have to do some dressing. No doubt that it’ll hurt a lot. (माफ़ी मांगने की कोई आवश्यकता नहीं है| अब मुझे पहले तुम्हारे घावों को स्पिरिट से धोना होगा उसके बाद मुझे इनकी पट्टी करने होगी| इसमें कोई दो राय नहीं की तुम्हें दर्द बहुत होगा| )

मैं: Okay, I think I can handle that much pain. (जी ठीक है, मैं दर्द बर्दाश्त कर लूँगा|)

जब मैं और डॉक्टर अंग्रेजी में बात कर रहे थे तो घर के सभी मुँह खोले हमें उत्सुकता से देख रहे थे| क्योंकि आज पहली बार डॉक्टर मरीज को चेक करने आया था, वरना हमेशा ही बीमार गाँव वालों को ही डॉक्टर के पास जाना पड़ता था ऊपर से डॉक्टर और मैं अंग्रेजी में गुफ्तगू कर रहे थे| इस से एक बात तो तय थी की पिताजी का सीना गर्व से चौड़ा हो गया था, आखिर उनके खानदान में मैं ही एक अकेला ऐसा लड़का था जो दसवीं से ज्यादा पढ़ा था और वो भी अंग्रेजी मीडियम स्कूल से! भौजी के चेहरे से लग रहा था की उन्हें भी मुझपे नाज था... गर्व था.. इसलिए वो भी हलके-हलके मुस्कुरा रहीं थी|

डॉक्टर बड़े संभाल-संभाल के अपने हाथ चला रहा था पर जब स्पिरिट घावों में लगती तो बहुत जलन होती| मैं बस दाँत पीस के रह जाता... डॉक्टर ने मेरी पट्टी कर दी और मुझे एक इंजेक्शन देने लगा:

डॉक्टर: I need to give you this injection, it’s got some morphine so you’ll feel a bit better. Its simply to lessen your pain. (मुझे तुम्हें ये इंजेक्शन लगाना होगा, इससे तुम्हारा दर्द कुछ काम होगा|)

मैं: okay Doc, but I’ve a request. Actually during that incident she was also hurt, there are two belt marks on her back but she won’t let you examine! So if you don’t mind can you gimme some pain killers for her and some spirit and bandages. I’ll ask my Chachi and she’ll do the dressing. Don’t worry we’ll pay you for that! Just add it in the bill and my Dad will pay it but please don’t tell him about what I just said.
(ठीक है डॉक्टर साहब, पर मेरी आपसे एक गुजारिश है| दरअसल जब वो हादसा हुआ तो भाभी को भी चोट आई थी| उनकी पीठ पे भी दो बेल्ट के निशान हैं, वो आपसे इसका इलाज किसी भी हालत में नहीं कराएंगी| क्या आप मुझे कुछ PAIN KILLER और थोड़ी स्पिरिट और पट्टी दे सकते हैं, मैं अपनी चाची से कह के उनकी पट्टी करवा दूँगा| आप फीस की चिंता ना करें वो हम दे देंगे, बस आप टोटल बिल में ही जोड़ देना मेरे पिताजी आपको पैसे दे देंगे| और हाँ ये बात आप प्लीज पिताजी से मत कहना|)

डॉक्टर: Usually I don’t do this but since you’ve asked me so politely I’ll give you the medicine. (मैं आम तौर पे ऐसा नहीं करता पर चुकी तुमने बड़े प्यार से कहा है तो इसलिए मैं दवाई दे देता हूँ|)

मैं: Thank You Doc. (शुक्रिया डॉक्टर साहब|)

डॉक्टर ने मुझे दवाई अलग से दी और अपने पैसे ले के चला गया| उसके जाने के बाद सभी जन मुझे घेर के बैठ गए और पूछने लगे की क्या बात हुई हम दोनों के बीच| मैंने सभी को सब बाताई सिवाय "मेरा भौजी का ख्याल रखने के"| सभी बहुत खुश थे, माँ पिताजी को भी तसल्ली थी की अब मैं जल्दी अच्छा हो जाऊँगा| तभी वहां माधुरी भी आ गई उसने जब मेरी ऐसी हालत देखी तो अपनी चिंता जाहिर करते हुए पूछने लगी की ये सब कैसे हुआ| माँ ने उसे साड़ी बात बताई, उसने कनखी नजर से भौजी को ताड़ा, जैसे उन पे गुस्सा हो और फिर चुप-चाप चली गई| मैंने उसे ज्यादा तवज्जो नहीं दी.... भोजन का समय हो गया था, सब ने भोजन किया| भोजन के उपरान्त बड़के दादा, बड़की अम्मा और अजय भैया वास खेत चले गए काम करने के लिए और माँ-पिताजी बड़े घर जा रहे थे सोने| उन्होंने मुझे अपने साथ चलने को कहा पर मैंने ये कह के टाल दिया की "मैं धुप में नहीं जा रहा" | पिताजी भौजी को ध्यान रखने के लिए बोल गए| आप भौजी के घर में सिर्फ मैं, नेहा और भौजी ही बचे थे| दरवाजा खुला था, भौजी अपनी चारपाई पर लेटी थीं और मैं अपनी चारपाई पे लेटा था बीच वाली चारपाई पे नेहा लेटी थी|

मैं: ये लो आपके लिए....

ये कहते हुए मैंने भौजी को डॉक्टर के द्वारा दी हुई स्पिरिट और पट्टी दी|

भौजी: ये किस लिए?

मैं: मैंने डॉक्टर से आपके लिए लिया था|

भौजी: तो क्या तुमने उसे बता दिया की ये क्यों चाहिए?

मैं: हाँ

भौजी: तो उसने चेक अप के लिए तो कहा नहीं?

मैं: मैंने उसे समझा दिया था की किसी भी हालत में आप उससे चेक अप नहीं करवाओगे| उसे रिक्वेस्ट करके आपके लिए ले लिया| अब इसे लो और बड़की अम्मा (बड़ी चाची) से लगवा लेना|

भौजी: तुम्हीं क्यों नहीं लगा देते?

मैं: मैं लगा तो दूँ पर अगर ईमान डोल गया तो?

भौजी: तो क्या? तुम्हारी पत्नी हूँ...

मैं: हाय!!! पर अगर अम्मा ने पूछा की किस ने दवाई लगाईं तो क्या कहोगी?

भौजी: कह दूँगी नेहा ने लगाईं|

मैं: बहुत होशियार होगये हो आप?

भौजी: अब तुम्हारे साथ रह-रह के कुछ तो सीखूंगी ही|

उनकी कही बात ने सच में मेरे अंदर एक नई जान फूंक दी थी| उनके इस प्यार भरे लहजे ने मेरी जान ले ली थी और मैं उनकी इन अदाओं का कायल हो चूका था| भौजी ने दरवाजा बंद किया, और मेरे सामने खड़े-खड़े अपने ब्लाउज के बटन खोलने लगीं| मैं बड़े प्यार से उन्हें देखता रहा... भौजी की आंखें मुझपे टिकीं थी और मेरी आँखें भौजी की अदाओं को निहार रहीं थी| हमेशा की तरह भौजी ने आज भी ब्रा नहीं पहनी थी... भौजी मेरी ओर पीठ करके खड़ी हो गईं| मैंने एक नजर नेहा की ओर देखा, वो सो रही थी| मैंने स्पिरिट में थोड़ी रुई डुबोई ओर भौजी के घाव पर रख दिया| भौजी के मुख से सिसकारी निकली:

"स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स... अह्ह्ह ... मानु बहुत जल रहा है|"

मैं: दर्द तो होगा.... पर पट्टी के बाद ठंडा-ठंडा लगेगा|

मैंने धीरे-धीरे भौजी के घावों को स्पिरिट से धोया उसके बाद, डॉक्टर के द्वारा दी गए पाउडर से भौजी की ड्रेसिंग की| जब मैं भौजी को पट्टी बांध रहा था तो बार बार उनके स्तन को अपने हाथों से सहला देता| जब पट्टी बांध गई तो भौजी मेरी ओर मुड़ी ओर सवालिया नज़रों से मुझे देखने लगी| मैंने उनके होठों को चूम लिया, मेरे चुम्बन से भौजी मदहोश हो रही थीं ओर इधर मैं उनकी बातों से मन्त्र मुग्ध हो चूका था| उनकी "पत्नी" वाली बात ने मुझे उनका दीवाना बना दिया था| मैं नीचे झुका ओर उनकी साडी पकड़ के ऊपर उठा के उनके हाथों में थम दी| अब हम लेट के तो सम्भोग नहीं कर सकते थे, क्योंकि या तो उन्हें नहीं तो मुझे बहुत दर्द होता| दिमाग में अलग ही स्टाइल ने दस्तक दी, मैंने अपना लंड निकला और उनकी योनि के ऊपर रगड़ने लगा| फिर अचानक मैंने हाथ हटा दिया और भौजी बायीं टांग पकड़ के चारपाई के ऊपर रख दी| भौजी ने मेरे लंड को पकड़ के अपनी योनि के भीतर प्रवेश कराया| अब मैंने एक झटके में भौजी को अपनी गोद में उठा लिया| इसे अकस्मात् झटके के कारन मेरा लंड उनकी पहले से गीली योनि में फिसलता हुआ उनकी बच्चे दानी से टकराया| भौजी एक डैम से चिहुक उठी:

"आह्ह...उम्म्म"

पर अगले ही पल उन्होंने अपनी टांगों से मेरी कमर को जकड लिया, अपने हाथों से मेरी गर्दन को अपनी गिरफ्त में ले लिया और मैंने उनको उनकी कमर से थाम लिया| मैं उन्हें इसी हालत में लिए स्नान घर में ले गया, क्योंकि मैं नहीं चाहता था की नेहा हमारी सिस्कारियां सुन उठ जाए और हमें सम्भोग करते हुए देखे| अंदर पहुँच मैंने होले-होले झटके मारता रहा, क्योंकि मुझे आभास था की इस अवस्था में मेरे लंड का उनकी बच्चे दानी से टकराना संभव है| मैं उन्हें दर्द नहीं देना चाहता था इसलिए पूरी कोशिश कर रहा था की पूरा लंड उनकी योनि में ना जाए! ग्रशण इतना अधिक था की हमारा सम्भोग ज्यादा देर नहीं चला| सर्वप्रथम मैं स्खलित हुआ पर फिर भी मैंने नीचे से झटके मारना बंद नहीं किया| अगले ही पल भौजी भी स्खलित हो गईं, उनकी योनि में हम दोनों के शरीर का रास भरने लगा था और जब भौजी ने अपने पाँव जम्मन पे रखे तब मैंने अपना लंड बहार निकला| तब जैसे एक पाँव खीर भौजी की योनि से निकल जमीन पे पचाक!!! कर गिरी| ना जाने क्यों पर भौजी नीचे पड़े मिश्रण को देखने लगीं... मैंने उनका मुख अपने हाथों से उठाया और उनके होठों को चूमा, भौजी की आँखें बंद थीं| उसके बाद भौजी ने लोटे से पानी डालके मेरे लंड को साफ़ किया, मेरे पजामे पर भी हमारे रस की कुछ बूँदें गिरी थीं| जिसे भौजी ने पानी से साफ़ किया और फिर मैं बहार आ गया|

मैंने जा के धीरे से दरवाजा खोला ताकि किसी को शक न हो| पाँच मिनट बाद भौजी भी आ गईं, और वो कुछ निराश लग रहीं थी| वो आपके सीधे अपनी चारपाई पर पेट के बल लेट गईं और मैं अपनी चारपाई पर लेट गया|


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24

अब आगे....



मैं: क्या हुआ आप इस तरह गुम-सुम क्यों हो गए?

भौजी: कुछ नहीं, बस ऐसे ही|

मैं: तो अब आप....

आगे पूरी बात होने से पहले ही माधुरी आ गई:

माधुरी: अरे मानु जी अब आप की तबियत कैसी है?

मैं: ठीक है|

भौजी: अच्छा हुआ तुम आ गई, अभी तुम्हारी ही बात हो रही थी|

माधुरी: सच? क्या बात हो रही थी?

मैं: मैं पूछ रहा था की आखिर आप कल क्यों नहीं दिखाई दीं?

माधुरी: वो दरअसल कल रसिका भाभी अपने मायके जाने वाली थीं तो मैंने सोचा क्यों न मैं कहीं घूम आऊँ| आज दोपहर को जब घर आई तब मुझे पता चला की कल क्या-क्या हुआ? वैसे आप दोस्ती बहुत अच्छी निभाते हो, दोस्त की खातिर अपनी जान की भी परवाह भी नहीं की?

मैं: दोस्तों के लिए तो अपनी जान हाजिर है!!! वैसे ये बात क्या पूरे गाँव को पता है?

माधुरी: अरे इस गाँव में कोई बात छुपी है क्या? ये ही नहीं आस पास के गाँव वाले भी आपका सम्मान करने लगे हैं|

बस इसी तरह माधुरी सवाल पूछती रही और मैं जवाब देता रहा| हमारी बातें सुन नेहा उठ गई| आँख मलते-मलते बैठी और फिर मेरे पास आई और मुझे पप्पी दी और फिर अपनी मम्मी को पप्पी दी| फिर बाहर खेलने चली गई, माधुरी का मुँह देखने लायक था| जैसे उसे भौजी से जलन होने लगी थी|

माधुरी: क्या बात है मानु जी, इन कुछ दिनों में ही आपका इतना लगाव हो गया नेहा से?

मैं कुछ नहीं बोला बस मुस्कुरा दिया और इससे पहले की वो और सवाल पूछती मैं उठ के बाहर निकलने लगा|

माधुरी: कहाँ चल दिए?

मैं: नेहा के साथ खेलने, आप बैठो और भौजी को कंपनी दो|

मैं बाहर आके नेहा को ढूंढने लगा, वो छापर के नीचे गुड़ियों के साथ खेल रही थी| मैं भी वहीँ उसके पास बैठ गया, और उसके साथ खेलने लगा| मेरे पीछे-पीछे माधुरी भी आ गई:

मैं: क्या हुआ भौजी के साथ मन नहीं लगा?

माधुरी: वो तो सो रहीं हैं|

अब वो भी हमारे साथ खेलने लगी, हंसी मजाक चल रहा था| वो बार-बार मेरे बारे में जानने की कोशिश करती और सवाल पूछती| मैं भी उसे जवाब देता और बदले में वो प्यार से मुस्कुरा देती| करीब दो घंटे बीत गए, समय हुआ था चार बज के बीस मिनट| मैं उठ के खड़ा हुआ और अंगड़ाई लेने लगा.. तभी मुझे भौजी के चीखने की आवाज आई|

भौजी रोती-बिलखती हुई, भागती हुई मेरी तरफ आ रही थी| मैं बड़ा हैरान था और उनकी ओर बढ़ने लगा| भौजी मुझसे कास के लिपट गई और रोती रही| मैं उन्हें चुप कराने की भर- पुर कोशिश करता रहा परन्तु भौजी चुप ही नहीं हो रही थी, बस फुट-फुट के रो रहीं थी| मैं उनके सर पे हाथ फेरते हुए उन्हें चुप कराने लगा, छप्पर के नीचे बिछी चारपाई पे नेहा के पास बैठाया| नेहा उनके आंसूं पोछने लगी पर उनका रोना बंद ही नहीं हो रहा था|माधुरी भी उनकी बगल में बैठ गई और पीठ सहलाने लगी|

मैं: क्या हुआ ये बताओ ?

भौजी कुछ नहीं बोल रही थी बस मेरा सीधा हाथ थामे हुए थी| मैंने माधुरी से पानी लाने को कहा:

मैं: प्लीज मत रोओ, आपको मेरी कसम!!!

मैं जानता था की उन्हें चुप कराने के यही तरीका है, अब ये सब मैं माधुरी के सामने तो नहीं कह सकता था| इतने में माधुरी पानी ले के आ गई, उसने गौर किया की भौजी ने रोना बंद कर दिया है और अब वे बस सुबक रहीं थी|

मैं: ये लो पानी पीओ| अब शांत हो जाओ...

भौजी ने सुबकते हुए पानी पिया.. उन्हें खांसी भी आई| माधुरी उनके पास ही बैठी थी, तो उसने उनकी पीठ को सहलाया| अब भौजी कुछ काबू में लग रहीं थी| उनका सुबकना बंद तो नहीं पर काम हो चूका था|

मैं: अच्छा अब बताओ की हुआ क्या? आपने कुछ डरावना देख लिया: भूत, प्रेत ?

भौजी कुछ नहीं बोलीं बस ना में गर्दन हिला दी|

मैं: तो क्या हुआ? आप तो सो रहे थे ना.... कोई सपना देखा आपने?

इस्पे भौजी की आँखों में फिर से आंसूं छलक आये| मैं इस बात को और न बढ़ाते हुए उन्हें चुप कराने लगा:

मैं: अच्छा आप से कोई बात नहीं पूछेगा| बस शांत हो जाओ!

देखने वाली बात ये थी की भौजी ने अब भी मेरा हाथ थामा हुआ था| नेहा भी परेशान हो गई थी और लग रहा था की उसका साईरन कभी भी बज जायेगा, तो मैंने बात बदलते हुए भौजी को चारपाई पे लेटने का परामर्श दिया और मैं उनके पास ही बैठ गया ताकि उन्हें संतुष्टि रहे| ये तो साफ़ था की भौजी ने मेरे बारे में ही कोई सपना देखा था, पर क्या? ये नहीं मालूम था|अब घर के सभी लोग काम से लौट आये थे, माँ पिताजी भी फ्रेश हो के आगये थे| माँ ने मुझे भौजी के साथ बैठे हुए देखा:

माँ: क्या हुआ बहु? अब क्या कर दिया इस नालायक ने?

भौजी: कुछ नहीं चाची|

माधुरी: जी इन्होने कोई डरावना सपना देखा था, इसलिए डर गईं|

उसकी बात पे मुझे गुस्सा तो बहुत आया पर मैं कह कुछ नहीं पाया| ये सुनने के बाद भौजी ने मेरा हाथ छोड़ा और उठ के मुंह धोने चलीं गई| मैं उनके पीछे जाना चाहता था परन्तु मेरा ऐसा करना उचित नहीं होता इसलिए मैं वहीँ बैठ रहा| कुछ समय बाद माधुरी भी चली गई|

रात के सात बजे होंगे, साईकिल की घंटी की आवाज आई| ये और कोई नहीं बल्कि चन्दर भैया और मामा थे|पिताजी और बड़के दादा (बड़े चाचा) गुस्से से लाल हो गए थे|

बड़के दादा: यहाँ क्या लेने आया है? निकल जा यहाँ से !!

उन्होंने चन्दर भैया को झिड़कते हुए कहा|

बड़की अम्मा (बड़ी चाची): तुझे जनम देके मैंने जीवन की सबसे बड़ी गलती की|

अब बड़के दादा ने मारने के लिए लट्ठ उठा लिया और चन्दर भैया की ओर दौड़े| ये नजारा मैं पीछे खड़ा देख रहा था| भौजी रसोई से निकली और मेरी बगल में आके खड़ी हो गईं| मुझे लगा की शायद डर से वो मेरा हाथ थामेंगी पर अचानक ही वो नेहा जो मेरे साथ मेरी ऊँगली पकड़ के खड़ी थी उसे ले के रसोई की ओर चल दीं| मैं पलट के उनके इस व्यवहार के लिए उन्हें आस्चर्यचकित नज़रों से देख रहा था|

बड़के दादा: तेरी हिम्मत कैसे हुई अपने छोटे भाई पे हाथ उठाने की| वो मुझे तुझसे ज्यादा प्यारा है..

उन्होंने चन्दर भैया को मारने के लिए लट्ठ उठाया.... मामा ने बीच बचाव करने की कोशिश की परन्तु बड़के दादा काबू में नहीं आ रहे थे| अंत में पिताजी ने उनको थामा और उनके हाथ से लट्ठ छीन के फेंक दिया|

पिताजी : भैया आप ये क्या कर रहे हो? अपने बेटे को मार डालोगे? वो नशे में था... होश नहीं था| सजा देनी है तो ऐसी दो की अगली बार शराब को हाथ लगाने से पहले दस बार सोचे|

चन्दर भैया रट हुए बड़के दादा के पैरों में गिर गए|

चन्दर भैया: पिताजी मुझे माफ़ कर दो, मैं नशे में था| मुझसे गलती हो गई, मैं आइन्दा कभी शराब को हाथ नहीं लगाउँगा|

बड़के दादा: माफ़ी मांगनी है तो अपने चाचा से मांग, मुझे तेरी सूरत भी नहीं देखनी|

ये कहते हुए बड़के दादा ने उन्हें झिड़क दिया|

चन्दर भैया: चाचा मुझे माफ़ कर दो| मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी!!!

पिताजी: ठीक है परन्तु कसम खाओ की आज के बाद कभी शराब को हाथ भी नहीं लगाओगे|

चन्दर भैया: मैं अपनी माँ की कसम खाता हूँ की आज के बाद शराब को कभी हाथ नहीं लगाउँगा|

अब चन्दर भैया मेरी ओर बढ़ने लगे, उन्हें देखते ही कल सुबह हुए दृश्य आँखों के सामने आ गए| खून खौलने लगा, मन तो किया की लट्ठ से उनकी हड्डियां तोड़ दूँ|

चन्दर भैया: मानु भैया, मुझे माफ़ करदो!!! मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई| आप जो सजा दो उसके लिए मैं तैयार हूँ|

ये कहते हुए वो मेरे पाँव छूने लगे| मैंने उन्हें रोक और कहा: "भैया चाहता तो मैं भी आप पर हाथ उठा सकता था| परन्तु सिर्फ भौजी की वजह से मैंने कुछ नहीं करा और चुप-चाप सहता रहा| मैं आपको केवल एक ही शर्त पे माफ़ करूँगा, अगर आप कसम खाओ को आगे से कभी भी आप नेहा या भौजी पर हाथ नहीं उठाओगे|"

मेरी बात सुनके सब स्तब्ध थे, पर फिर सबने इस बात का समर्थन किया|

चन्दर भैया: मैं अपनी माँ की कसम खता हूँ की आज के बाद कभी भी मैं अपनी पत्नी और बच्ची पर हाथ नहीं उठाऊँगा|

मामा: मुन्ना जरा देखें तो तुम्हारे घाव कैसे हैं?

मैं: जी अब काफी बेहतर हैं|

भौजी अब भी सहमी सी कड़ी थीं और नेहा तो बिलकुल भौजी के पीछे ही दुबक गई थी| भोजन का समय था इसलिए मामा, चन्दर भैया, अजय भैया, पिताजी और बड़के दादा सब हाथ-मुँह धो के भोजन के लिए बैठ गए| मैं कुऐं के पास घूम रहा था, तभी नेहा भागी-भागी मेरे पास आई:
"चाचू चलो खाना खा लो?"

मैं: अभी नहीं मैं बाद में खाऊँगा| तुम जाओ खाना खाओ और जल्दी सो जाओ|

नेहा: नहीं चाचू मम्मी ने कहा है की आप को साथ ले कर आऊँ|

मैंने सोचा की शायद भौजी को मुझ से कोई बात करनी होगी| इसलिए मैं नेहा के साथ चल दिया|
मैंने भौजी से खुसफुसा के कहा की मैं आपके साथ ही भोजन करूँगा तो उन्होंने ना में सर हिला दिया| अब मैं बहुत परेशान हो चूका था, पहले तो स्नानघर में भौजी का निराश होना और अब उनका मेरे साथ भोजन करने से मन कर देना| ये चिंता मुझे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी| मैंने उन्हें कुछ नहीं कहा परन्तु ये तो स्पष्ट था की मेरे चेहरे के भावों से वो समझ ही चुकीं थी की मेरा मूड ख़राब है|बेमन से खाना खाया और अपने बिस्तर पे लेता आसमान में तारे देखने लगा| शाम को जो भी हुआ उसका एक सुखद पहलु भी था, की भैया को मेरे और भौजी के रिश्ते के बारे में कुछ पता नहीं चला| क्योंकि अगर पता होता तो वो सब कुछ सच कह देते और फिर मेरी जो तोड़ाई होती उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती| मैं भौजी का इन्तेजार करता रहा..... और नींद कब आ गई पता ही नहीं चला|

उमीदों वाली सुबह हुई, मैंने सोच लिया था की मैं किसी भी हालत में भौजी से पूछ के रहूँगा की आपने मुझसे बोल-चाल क्यों बंद कर रखी है| परन्तु मौका मिले तब ना, सुबह-सुबह का समय था तो सब घरवाले रॉयस के आस-पास ही मंडरा रहे थे| मैं नहा-धो के तैयार हो गया और चाय पीने आ गया,

मैं: भौजी चाय देना?

भौजी: ये लो .. नेहा बेटा सुनो तुम भी चाय पी लो|

इतना कह के भौजी चलीं गईं, मुझे ऐसा लग रहा था की वो मुझसे नजर चुरा रहीं है| नौ बजे तक सभी खेत चले गए, अब घर पे केवल भौजी, मैं, नेहा, माँ और पिताजी थे| अब माँ-पिताजी को कैसे बीजी करूँ? मैं अकेला ही कुऐं के आस-पास घूमने लगा, अब माँ-पिताजी को तो बिजी करने का कोई उपाय सूझ नहीं रहा था| उधर बड़े घर में, माँ कपडे समेट रही थी और पिताजी बाहर किसी से बात कर रहे थे| भौजी मुझे रसोई से अकेला टहलता हुआ देख रही थीं और उहोने नेहा को मुझे बुलाने भेजा| मैं बहुत खुश हुआ की चलो कम से कम मुझे बुलाया तो सही|

भौजी: मानु.... नाराज हो?

मैं: नाराज होने का हक़ है मुझे?

भौजी: प्लीज ऐसा मत कहो?

मैं: तो बताओ की आपको कल क्या हो गया था? पहले स्नान घर में आप एक डैम से उदास हो गए| फिर कुश देर बाद आपने कोई भयानक सपना देखा, मुझसे लिपट के इतनी बुरी तरह रोये| और फिर आपका मेरे से ऐसे सलूक करना जैसे मैं कोई अजनबी हूँ?

भौजी: दरअसल मैं कोशिश कर रही थी की तुम से दूर रह सकूँ| कुछ घंटों के लिए ही सही परन्तु मैं तुम्हें बता नहीं सकती कल रात मैं कितना तड़पी हूँ, कितना रोइ हूँ!!!

मैं: मुझसे दूर रहने की कोशिश? ठीक है मैं खुद ही आपसे दूर चला जाता हूँ|

मैं उठ के जाने लगा तो भौजी ने मेरा हाथ थामा और मुझे रोका और रोने लगी|

भौजी: मानु प्लीज मुझे छोड़ के मत जाओ, कुछ घंटे तुम्हारे बिना .... मेरा बुरा हाल हो गया| मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती.. मैं मर जाऊँगी|

मैं: आपको पता है कल मुझे कैसा लगा? ऐसा लगा मानो मैं कोई अजनबी हूँ जिससे से बात करने से भी आप कतरा रहे हो|

भौजी: मानु कल मैंने एक बहुत ही भयानक सपना देखा|

मैं: कैसा सपना?

भौजी: की तुम मुझे छोड़के शहर चले गए और अब वापस कभी नहीं आओगे|

मैं: वो तो सिर्फ एक सपना था| मैंने आपसे अलग कैसे रह सकता हूँ, साल में एक बार ही सही पर आऊँगा जर्रूर|

भौजी: तुम नहीं आओगे!

मैं: आपको कैसे पता?

भौजी: तुम अब बड़ी क्लास में हो कल को तुम बोर्ड की परीक्षा दोगे| फिर तुम्हें कॉलेज में एडमिशन मिलेगा, अब कॉलेज में तो दो महीने की गर्मियों की छुटियाँ नहीं होती जिनमें तुम मुझे मिलने आओगे| और चलो आ भी गए तो कितने दिन? दो दिन या हद से हद तीन दिन रुकोगे और फिर पूरे एक साल बाद आओगे वो भी शायद!!! तुम्हारे नए दोस्त बनेंगे, नई लड़कियाँ मिलेंगी जो तुम्हें पसंद करेंगी और शायद तुम्हें उनसे प्यार भी हो जायेगा और तुम मुझे भूल जाओगे| फिर तुम्हारी शादी, बच्चे और धीरे-धीरे ये यादें तुम्हारे मन से भी मिट जाएँगी| पर मेरा क्या होगा? मैंने तुम्हें अपना पति माना है? अपने आप को तुम्हें समर्पित कर चुकी हूँ| मैं ये पहाड़ जैसी जिंदगी कैसे काटूंगी?

मैं: नहीं भौजी ऐसा नहीं हो सकता, मैं सिर्फ आपसे प्यार करता हूँ| आपको मेरे प्यार पे विश्वास नहीं?

भौजी: विश्वास है परन्तु चाचा-चाची कभी न कभी टी तुम्हारी शादी कराएँगे, तब क्या?

मैं: अगर मेरे बस में होता तो मैं कभी शादी नहीं करता| परन्तु मुझे दुःख है की माँ-पिताजी के ख़ुशी के लिए मुझे कभी न कभी शादी तो करनी पड़ेगी| पर आप यकीन मानो मैं अपनी पत्नी को कभी भी वो प्यार नहीं दे पाउँगा जो मैं आपको देना चाहता हूँ| वो कभी भी आपकी जगह नहीं ले सकती!!! इस समस्या का कोई उपाय नहीं है!!!

भौजी: उपाय तो है|

मैं: क्या?

भौजी: अगर मैं तुम से कुछ माँगू तो तुम मुझे दोगे?

मैं: हाँ बोलो?

कहानी जारी रहेगी....


RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन - sexstories - 07-15-2017

25

अब आगे....

भौजी: मैं तुम्हारे बच्चे की माँ बनना चाहती हूँ!!!

ये सुनते ही मेरे होश उड़ गए...मैंने अपना सर पकड़ लिया|

भौजी: तुम्हारे जाने के बाद वही मेरे जीने का सहारा होगा| उस बच्चे में मैं तुम्हारा प्यार ढूंढ़ लुंगी और उसे वही प्यार दूंगी जो मैं तुम्हें देना चाहती थी| तुम्हारी कमी अब सिर्फ वही पूरी कर सकता है!!!

मैं: आप ये क्या कह रहे हो? चन्दर भैया क्या कहेंगे? उन्होंने तो इतने सालों से आपको हाथ भी नहीं लगाया ... घर के सब लोग बातें करेंगे| एक तरफ तो आपको अपनी और मेरी इज्जत की चिंता है और दूसरी तरफ आप ऐसी बात कर रही हो| अगर भैया ने आप से पूछा की ये बच्चा किसका है तो आप क्या कहोगे? इसीलिए मैं आपको भगा के ले जाना चाहता था, अब भी देर नहीं हुई है.. सोच लो!!!

भौजी: मैं तुम्हारे साथ भाग के चाचा-चाची को दुःख नहीं देना चाहती, इसमें उनकी क्या गलती है? चाहे कुछ भी हो मुझे ये बच्चा चाहिए मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ती हूँ| नहीं तो मेरे पास सिवाए जान देने के और कोई रास्ता नहीं है|

मैं: आप को हो क्या गया है? अच्छा आप बताओ की आप भैया से क्या कहोगी की ये किसका बच्चा है?

भौजी: वो सब मैं संभाल लुंगी और मैं तुम्हें ये यकीन दिलाती हूँ की तुम्हारे ऊपर कोई लांछन नहीं लगने दूंगी|

मैं: लांछन?? वो मेरा भी नच्छा है.. तो लांछन किस बात का? और आप कैसे ये सब संभाल लगी? घर में सब जानते हैं की मैं और आप कितने नजदीक हैं, यहाँ तक की डॉक्टर को भी शक है हमारे रिश्ते पे! घर वालों की नजर में हम अच्छे दोस्त हैं पर जब उन्हें पता चलेगा की आप गर्भवती हो तो सबसे पहले मेरा ही नाम आएगा| जो गलत भी नहीं है!!! कहीं आप चन्दर भैया के साथ सम....

भौजी: छी-छी मानु तुम्हें अपनी पत्नी के बारे में ऐसा सोचते हुए भी शर्म नहीं आई| भले ही मेरी शादी उनसे हुई हो पर मैंने तुम्हें अपना पति माना है| सिर्फ तुम ही हो जिसे मैंने अपन तन-मन सौंपा है| मेरी आत्मा पे सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा अधिकार है और तुम ऐसा सोचते हो?

मैं: I'M SORRY !!! मैं आपको कभी भी किसी चीज के लिए मना नहीं कर सकता| पर जब तक आपके पीठ के जख्म नहीं भर जाते तब तक कुछ नहीं|

भौजी: नहीं मानु, आज रात .. मैं अब और इन्तेजार नहीं कर सकती|

मैं: अगर आप बुरा ना मनो तो मैं एक बात पूछूं?

भौजी: हाँ पूछो|

मैं: प्लीज मुझे गलत मत समझना पर आप कहीं लड़के की चाहत तो नहीं रखते?

भौजी: मतलब?

मैं: मतलब की आपको सिर्फ लड़का ही चाहिए?

भौजी: नहीं मानु ऐसा नहीं है| लड़का हो या लड़की मेरे लिए जर्रुरी ये है की मैं उस बच्चे में तुम्हारा अक्स चाहती हूँ|

मैं: देखो आप तो सीधा लेट भी नहीं पाते तो उस समय आपको बहुत पीड़ा होगी और मैं इस हालत में आपको प्यार नहीं कर सकता| आपको तड़पता देख के मैं टूट जाऊँगा, बस केवल दो दिन और फिर आपके जख्म भर जायेंगे और मैं आपकी साड़ी इच्छा पूरी कर दूँगा|

भौजी: ठीक है पर तुम ये सिर्फ मेरी इच्छा पूरी करने के लिए कर रहे हो या दिल से?

मैं: मैं आपको खुश देखना चाहता हूँ!!! अब चलो मुस्कुराओ...

भौजी मुस्कुरा दीं.. पर मुझे अब चिंता होने लगी थी| क्या होगा अगर ये बात सामने आ गई की भौजी की कोख में पल रहा बच्चा मेरा है| घरवाले अपनी इज्जत बचाने के लिए उस बच्चे को पैदा होने से पहले ही मार देंगे!!! पर मेरे पास इस समय कोई और चारा नहीं था, अगर मैं भौजी की बात नहीं मानता तो वो मेरी जुदाई का दुःख नहीं बर्दाश्त कर पातीं और खुद-ख़ुशी कर लेतीं और तब नेहा का क्या होता?

अब तो मैं जैसे हंसना ही भूल गया था... भौजी को भी मेरे अंदर आये इस बदलाव की भनक थी| मैं उनके आस-पास तो होता पर कुछ ना कुछ सोचता रहता| अचानक मेरे दिमाग ने काम करना क्यों बंद कर दिया था? दो दीं कैसे बीते पता ही नहीं चला, अब मेरे जिस्मानी घाव काफी हद तक भर चुके थे| उनपे एक पपड़ी बन चुकी थी, दर्द नहीं था| उधर भौजी के घाव बिलकुल भर चुके थे| दोपहर का समय था, घर के सभी लोग खेत में थे और आज तो माँ-पिताजी भी खेत में हाथ बंटा रहे थे मैं भी खेत में था परन्तु अकेले टहल रहा था| घर पे केवल भौजी अकेली थी उन्होंने मुझे बुलाने के लिए नेहा को भेजा था| नेहा मेरे पास भागती हुई आई और मेरा हाथ पकड़ के मुझे अपनी ओर खींचा और मेरे कान में खुस-फुसाई:
"चाचू मम्मी की तबियत ठीक नहीं है| उन्होंने आपको जल्दी बुलाया है|"

ये सुनते ही मैं भागता हुआ घर पहुँचा... आँगन, रसोई, बड़े घर में भी कोई नहीं था| मैं उनके घर घर में दाखिल हुआ और उनके कमरे में झाँका तो वहां भी कोई नहीं था तभी भौजी ने मुझे पीछे से आके जकड़ लिया| उनकी गर्म सांसें मेरी पीठ पे पड़ीं तो मैं सिंहर उठा|

मैं: आप की तो तबियत ख़राब थी ना?

भौजी: वो तो तुम्हें यहाँ बुलाने का बहाना था|

मैं: अब तक तो नेहा ने सबको बता दिया होगा, और सभी यहीं आते होंगे|

भौजी: मैंने उसे कहा था की मुझे तुमसे कुछ बात करनी है और तुम्हें बुलाने के लिए झूठ बोलने के लिए मैंने ही कहा था| वो ये बात किसी को नहीं कहेगी और मजे से चिप्स खा रही होगी|

मैं: आप बड़े शैतान हो!!! पर प्लीज आगे से नेहा को इस सब में मत डाला करो| मुझे अच्छा नहीं लगता, वो बिचारी अबोध बच्ची क्या जाने|

भौजी: ठीक है मैं उसे इस सब से पर रखूंगी पर पहले बताओ की आखिर ऐसी क्या बात है जो पिछले दो दिन से तुम कुछ अलग लग रहे हो? मेरे पास हो के भी मुझसे दूर हो? कौन सी बात है जो तुम्हें खाय जा रही हो?

मैं: नहीं तो .... कुछ भी तो नहीं|

भौजी: झूठ मत बोलो, अगर तुम्हारा मन नहीं है तो मत बताओ| पर मैं जानती हूँ की तुम क्यों परेशान हो? तुम मेरी उस बात से परेशान हो|

मैं: नहीं.... आपकी ख़ुशी में ही मेरी ख़ुशी है|वैसे क्या बात है आज तो बहुत सजे-सँवरे हो? ओह!!! याद आया ... तो इसलिए आपने मुझे बुलाया था|

मैंने भौजी को अपनी बाँहों में जकड लिया और उनके माथे को चूमा| भौजी ने आज लाल रंग की साडी पहनी थी| बालों का गोल जुड़ा, होठों पे लाली, माँग में सिन्दूर और पाँव में पायल| नाखूनों पे नेल पोलिश ... हाय आज तो सच में मेरा क़त्ल होने वाला था| मैंने जब भौजी को अपने आलिंगन से आजद किया तो वो गोल घूम के मुझे अपनी सुंदरता का दीदार कराने लगी| उनके शरीर से भीनी-भीनी इत्र की खुशबु आ रही थी जो मुझे उनकी और आकर्षित कर रही थी|मैं बहार की ओर जाने लगा...

भौजी: कहाँ जा रहे हो? मुझसे कोई गलती हो गई?

मैं: दरवाजा तो बंद कर दूँ|

भौजी अपने दाँतों टेल ऊँगली दबा के हंस दी| मैंने जल्दी से दरवाजा बंद किया और उनके पास आ गया|मैं बिना रुके उनके मुख को चूमता रहा, कभी माथे पे, कभी आँखों पे, कभी गाल पे कभी उनकी नाक पे और अंत में उनके होंठों को!!! वो नहीं चाहती थीं की मैं रुकूँ ... मैंने उनके ब्लाउज के बटन खोलने चाहे परन्तु खोल नहीं पाया.. उन्होंने स्वयं अपने ब्लाउज के बटन खोले| आग दोनों ओर लग चुकी थी... दोनों के जिस्म देहक रहे थे| जैसे ही भौजी के स्तन ब्लाउज की कैद से आजाद हुए मैंने उन्हें कास के गले लगा लिया| हालाँकि मैंने टी-शर्ट पहनी हुई थी पर फिर भी उनके निप्पल मुझे अपनी छाती पे महसूस हो रहे थे| इससे पहले की हम आगे बढ़ते दरवाजे पे दस्तक हुई| भौजी कस्मा के मुझसे लिपटी रहीं परन्तु बहार से दस्तक चालु थी| मैंने भौजी को अपने से अलग किया ओर उन्हें होश में लाने की कोशिश की| उन्हें झिंझोड़ा तब जाके वो होश में आईं| उनके मुख पे गुस्से के भाव थे... ऐसे भाव जो मैंने कभी नहीं देखे| अगर उनके हाथ में पिस्तौल होती तो आज दस्तक देने वाले का मारना तय था| भौजी ने ब्लाउज के बटन बंद किये ओर मुझे इशारे से रुकने को कहा और वो चिल्लाती हुई दरवाजा खोलने गईं| मुझे दर था की अगर किसी ने मुझे यहाँ देख लिया तो आफत हो जाएगी इसलिए मैं आँगन की ओर भागा, चारपाई खींच के खड़ी की और उसपे चढ़ गया. लपक के मैंने दिवार फांदी और बहार कूद गया| कूदते समय थोड़ा पाँव ऊँचा-नीचे होने के कारन मोच आ गई|

मैं लंगड़ाते हुए किसी तरह घूम के मुख्य द्वार पे आया, देखा वहां कोई नहीं था| जब मैं भौजी के घर में दाखिल हुआ तो देखा भौजी माधुरी पे बड़े जोर से चिल्ला रहीं है|

भौजी: क्या चाहिए तुझे? जब देखो मानु...मानु उसके पीछे क्यों पड़ी है?... क्या चाहिए तुझे उससे? वो तुझे पसंद नहीं करता क्यों उसके आगे-पीछे घूमती रहती है| वो वैसा लड़का नहीं है जैसा तू सोच रही| उससे दूर रह वार्ना मैं तेरे माँ-पिताजी से तेरी शिकायत कर दूँगी|

माधुरी: मैं तो....

भौजी: तेरी हिम्मत कैसे हुई यहाँ घुस आने की? बड़ी मुश्किल से आँख लगी थी और तूने मेरी नींद उड़ा दी|

आज तो भौजी का गुस्सा चरम पर था... मैंने सच में उन्हें इतना गुस्से में कभी नहीं देखा था| मैं लंगड़ाते हुए अंदर गया...

मैं: क्या हो रहा है?

मुझे लंगड़ाते हुए देख के दोनों एक आवाज में बोलीं:

"तुम्हें क्या हुआ?"

कोरस में दोनों की आवाज सुन के मैं हैरान हो गया...

मैं: कुछ नहीं पाँव-ऊँचा नीचे पद गया इसलिए मोच आ गई|

भौजी: हाय राम! इधर आओ देखूं तो|

माधुरी भी देखने के लिए नजदीक आई...

भौजी: तू क्या देख रही है| निकल यहाँ से और खबरदार जो "इनके" आस-पास भी भटकी| "ये" तुझे कुछ नहीं कहते तो तू सर पे चढ़ी जा रही है|

माधुरी बेचारी रोती-बिलखती बहार चली गई|

भौजी: मानु, मैं तेल लगा देती हूँ| तुम मेरी वजह से खुद को कितनी मुसीबत में डालते हो|

मैं: क्यों आपने उस "बेचारी" की क्लास लगा दी| वैसे मैंने आपको आज से पहले कभी भी इतना गुस्से में नहीं देखा|

भौजी: गुस्से वाली बात ही है, जब देखो तुम्हारे पास आने की कोशिश करती है| मैंने इसे अपना पति छीनने नहीं दे सकती| सोचो मुझे कैसा लगता होगा जब ये तुम से हंस-हंस के बातें करती है? मेरे दिल पे तो लाखों छुरियाँ चल जाती है| और आज कितने दिनों बाद तुम मुझे प्यार कर रहे थे और ये बीच में आ गई|मैं: देखो आप अपना गुस्सा शांत करो वार्ना इस आग में मैं जल जाऊँगा|

भौजी थोड़ा शांत हुईं.. उन्होंने मेरी एड़ी पर तेल की मालिश की और पट्टी बांद दी और मैं बहार आ गया और आँगन में चारपाई पे बैठ गया|| हमारे घर का एक नियम है जिसे रसोइये को हर हालत में मानना पड़ता है| वो नियम ये है की, रसोइया नह-धो के भोजन बनाने बैठता है| और एक बार वो रसोई में घुस गया तो वो बहुजन बना के सब को खिलाने के बाद ही बहार निकलता है| इस दौरान अगर उसे बाथरूम जाना पड़ा तो वो बिना नहाये-धोये रसोई में नहीं घुस सकता| ये नियम इतना कड़ा है की इसे हर हालत में इसका पालन जर्रुरी है, वरना घर के बड़े उस भोजन को हाथ तक नहीं लगाते|

अब मेरे और भौजी के बीच में जो शुरू हुआ था वो हालाँकि बीच में ही रह गया था परन्तु उनकी आत्मा अशुद्ध थी! अब रसोई में घुसने के लिए उन्हें नहाना आवश्यक था| तभी भौजी की घर के अंदर से आवाज आई:

"मानु... जरा सुनो तो?"

मैं: हाँ बोलो?

अंदर का दृश्य देख के मैं दंग रह गया| भौजी को आज मैं पहली बार सिर्फ ब्रा और पैंटी में देख रहा था| उनके होंठों की लाली और माँग का सिन्दूर उनकी सुंदरता पे चार चाँद लगा रहा था| मैंने भाग के दरवाजा बंद किया|

मैं: हाय!!!! आज तो आप गजब ढा रहे हो| अब अगर मेरा ईमान डोल गया तो इसमें क्या कसूर!!!

भौजी: अब ये औपचारिकता छोडो! अपनी "पत्नी" के पास आने के लिए तुम्हें बहाने की जर्रूरत नहीं|

मैं उनकी तरफ बढ़ा और उनके होठों पे अपने होंठ रख दिए| उनकी लिपस्टिक का मधुर स्वाद मुझे अपने मुँह में आने लगा था|मैं उनके होठों को बारी-बारी चूस रहा था, कभी-कभी भौजी अपनी जीभ मेरे मुख में प्रवेश करा देती और मेरी जीभ के साथ खेलती| मैं धीरे-धीरे भौजी को चारपाई तक ले गया और उन्हें लेटा दिया| सफ़ेद ब्रा और पैंटी में भौजी आज कयामत लग रही थी| उन्हें ऐसा देखने की मैंने कल्पना भी नहीं की थी|मैं उनके ऊपर आ गया और फिर उन्हें बेतहाशा चूमने लगा| भौजी मेरे हर एक चुम्बन का जवाब देने लगी थी| साफ़ था की वासना हम दोनों पे सवार थी.... मैंने अपने हाथ उनकी ब्रा का हुक खोलने के लिए उनकी पीठ के नीचे ले गया| तो भौजी ने अपनी पीठ उठा की सहयोग दिया| उनकी ब्रा का हुक खोल के मैंने उनकी ब्रा खींच के निकाली और सिराहने रख दी|मैं जानता था की मेरे पास FOREPLAY के लिए समय नहीं है, इसलिए मैं सीधा नीचे की ओर बढ़ा और भौजी की पैंटी निकाल दी| उनके योनि के पटल बंद थे और मुझे भीनी-भीनी सी मढोह करने वाली महक आने लगी थी| मैंने झुक के जैसे ही भौजी की योनि को अपनी जीभ की नोक से छुआ तो भौजी तड़प उठी| मैंने अपनी एक ऊँगली भौजी की योनि के अंदर डाली तो पता चल की उनकी योनि अंदर से गीली है| मैंने अपना पाजामा नीचे किया और लंड निकाल के तैयार हो गया| मैं उनके ऊपर पुनः झुक गया और अपनी लंड को उनकी योनि के ऊपर रख धीरे से उसे अंदर प्रवेश करा दिया|

अपने दोनों हाथों से मैंने भौजी के दोनों हाथ पकड़ लिए, इधर भौजी ने अपनी टांगों से मेरी कमर को लॉक कर लिया था| मैंने शुरुआत धीरे-धीरे की, घर्षण काम होने के कारन मुझे अपनी गति बढ़ानी पड़ी| समय बीतता जा रहा था और अगर इस समय हमें कोई डिस्टर्ब करता तो आज खून-खराबा तय था| मेरे हर धक्के के साथ भौजी के स्तन ऊपर नीचे हो रहे थे और भौजी के मुख के भावों ओ देख के लग रहा था की किसी भी समय वो स्खलित हो जाएँगी| उनके होठों की लाली फ़ैल चुकी थी और मुझे उन्हें इस तरह देख के बहुत आनंद आ रहा था| करीब बीस मिनट तक मैं बिना रुके लय बद्ध तरीके से धक्के देता रहा| मेरा पूरा शरीर पसीने से तरबातर हो चूका था.... चेहरे पे पसीना बह के भौजी के मुख पे गिरने लगा था| तब भौजी ने अपनी ब्रा से मेरे मुँह पोछा| अंदर से भौजी की योनि पनिया गई थी….. शायद इस बार भौजी ज्यादा ही उत्साहित थी.... पिछली बार जब हमने सम्भोग किया था तब उनकी योनि ने मेरे लंड को जकड रखा था| परन्तु इस बार तो लंड आसानी से फिसल रहा था.... अब समय आ चूका था जब मैं चरम पे पहुँचने वाला था| भौजी को ना जाने क्या हुआ उन्होंने अपने हाथ छुड़ाए और मेरे सर को अपने मुख पे झुकाया और मेरे होठों को चूसने लगीं| मैंने निर्णय कर लिया था की आज तो मैं भौजी की इच्छा पूरी कर के रहूँगा|

मैंने उनकी इस प्रतिक्रिया का कोई जवाब नहीं दिया और नीचे से अपना पूरा जोर लगता रहा| आखिर मैं स्खलित होने वाला था... आखिर के चार धक्के कुछ इस प्रकार थे की जैसे ही मैं अपने लंड को अंदर की ओर धकेलता उसमें से रस की धार निकल के भौजी की योनि में गिरती, फिर जैसे ही मैं उसे बहार खींचता वो चुप हो जाता| फिर दूसरे धक्के में जब मैं उसे अंदर धकेलता तो फिर उसमें से रस की लम्बी धार निकलती औरइसी प्रकार आखरी के चार धक्कों में मैंने उनकी योनि को अपने रस से भर दिया और हाँफते हुए उनके ऊपर गिर गया|


RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन - sexstories - 07-15-2017

26

अब आगे....

मैं: ARE YOU HAPPY NOW ?

भौजी: मतलब???

मैं: मतलब आप खुश तो हो ना?

मैं: हाँ... बहुत खुश!!!

ये कहते हुए उन्होंने मेरे होठों को चूम लिया, और मैंने भी उनके चुम्बन का जवाब उनके होंठों को आखरी बार चूस के दिया| मैं उठ के खड़ा हुआ और स्नान घर की ओर जाने लगा, ताकि अपने हाथ-मुँह ओर लंड धो सकूँ| भौजी ने मुझे पीछे से पुकारा:

"मानु, इधर आना ..."
मैं उनके पास आया तो उन्होंने मेरे लटके हुए लंड को हाथ से पकड़ा और हिलाते हुए अपने मुँह में भर लिया|

"स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स ....."

उन्होंने अपनी जीभ से मेरे लंड को चूसना और रगड़ना शुरू कर दिया| मानो वो हमारे रास को पोंछ के साफ़ कर यहीं हो| जब उन्होंने मेरे लंड को अच्छे से चूस लिया तब मैंने उनसे कहा: "आप बड़े शरारती हो?"

भौजी कुछ नहीं बोलीं और बस मुस्कुराके लेटी रहीं| मैं हाथ-मुँह धो के उनके पास आया:

मैं: अब आप जल्दी से नहा लो... घर के सब लोग अभी खेत से लौटते होंगे|

भौजी: ठीक है, तुम बहार ही बैठना|

मैं बहार चारपाई पर बैठ गया और कुछ सोचने लगा... तभ भौजी नहा के बहार आईं, उनके बाल भीगे हुए थे और चमक रहे थे| उनके बदन से खुशबूदार गुलाबी LUX साबुन की महक आ रही थी| बालों से शैम्पू की महक.... "ह्म्म्म्म्म"

भौजी सीधा मेरे पास आके बैठ गईं... और मेरा हाथ पकड़ लिया| तभी नेहा भागती हुई आई, भौजी छिटक के उठ खड़ी हुई| ये देख के मेरी हंसी छूट गई... "हा हा हा हा हा " भौजी भी हंस पड़ी और रसोई की ओर चल दीं| नेहा मेरी गोद में आके बैठ गई... तभी बाकी के घर वाले भी एक-एक कर आने लगे| सभी हैंडपंप पे हाथ-मुँह धोने लगे ओर चाय के लिए बैठ गए| माँ ने मेरे पाँव में पट्टी बंधी देखि:

माँ: हाय राम! अब क्या मार लिया तूने?

मैं: कुछ नहीं.. वो पैर ऊँचा-नीचा पद गया तो थोड़ी मोच आ गई|

माँ: बेटा देख के चला कर, ज्यादा दर्द तो नहीं हो रहा?

मैं: नहीं..

इतने में भौजी चाय ले के आ गईं|

भौजी: चाची मैंने तेल से मालिश करके पट्टी बांध दी थी| कल सुबह तक ठीक हो "जायेंगे"|

माँ: अच्छा किया बहु, एक तू ही है जो इसका इतना ध्यान रखती है वरना शहर में तो ये खुद ही कुछ न कुछ कर लेता था, मुझे बताता भी नहीं था|

माँ चाय का कप लिए खड़ी थी की तभी वहाँ बड़की अम्मा भी आ गईं और वो भी मेरे पाँव में पट्टी देख के हैरान थी| भौजी ने आगे बढ़ कर खुद उन्हें सारी बात बताई|

बड़की अम्मा: मानु की अम्मा, देख रही हो देवर-भाभी का प्यार? चोट मानु को लगती है तो दर्द बहु को होता है| बीमार बहु होती है तो दवा-दारु मानु करता है| बिलकुल ऐसा ही इसके पिताजी थे जब वो छोटे थे| हमेशा किसी न किसी काम में मेरी मदद करते रहते थे... जब भी चोट लगती तो भागे-भागे मेरे पास आते थे|

माँ कुछ नहीं बोलीं और मुस्कुरा दीं... भौजी भी मंद-मंद मुस्कुरा रहीं थी| अँधेरा हो रहा था... और एक मुसीबत अभी बाकी थी|गाँव का ठाकुर (माधुरी का बाप) बड़ी तेजी से चलता हुआ आया और मेरे पिताजी के पास आके बैठ गया और पिताजी से बोला:

ठाकुर: बाबूजी, आज मैं आपके पास एक शिकायत लेके आया हूँ|

पिताजी: शिकायत? क्यों क्या हुआ?

ठाकुर: आपके घर की बहु ने मेरी बेटी को बहुत बुरी तरह झाड़ा है!

पिताजी: बड़ी बहु ने?

ठाकुर: हाँ और जानते हैं क्यों?

पिताजी: क्यों?

ठाकुर: क्यों की वो आपके लड़के से मिलने आती है| ऐसा कौन सा पाप कर दिया उसने? सिर्फ बात ही तो करती है ना?

पिताजी ने भौजी को आवाज लगाईं, और भौजी के साथ मैं भी आया| माँ और बड़की अम्मा तो पहले ही वहाँ खड़े थे|

पिताजी: बहु क्या ये सच है, तुमने ठाकुर साहब की बेटी को डाँटा?

ठाकुर: बाबूजी, डाँटा नहीं झाड़ा !!! और ऐसा झाड़ा की रो-रो कर उसका बुरा हाल है|

भौजी: जी...

मैं: मेरे कहने पे!

भौजी और सभी लोग मेरी तरफ देखने लगी...

मैं: जी मैंने ही भौजी से कहा था की माधुरी बार-बार मुझसे बात करने की कोशिश करती है| जबकि मेरी उसमें कोई दिलचस्पी ही नहीं.... मैं उससे जितना दूर भागता हूँ वो उतना ही मेरे पास आने की कोशिश करती है| यहाँ तक की उसने तो मुझसे शादी के बारे में भी पूछा था| उस दीं जब हम वाराणसी के लिए निकल रहे थे तो शाम को मुझसे कह रही थी की "अब आप दुबारा कब आओगे?" और जब मैंने कहा की एक साल बाद तो कहने लगी "हाय राम!!! इतने देर लगाओगे?" अब आप ही बताइये पिताजी मैं और क्या करता? इसलिए मैंने भौजी से शिकायत की कि आप उसे समझा दो| पर आज दोपहर में जब मैं आप सबके साथ खेत पे था तब माधुरी घर आई और दरवाजा पीटने लगी.. बड़ी मुश्किल से भौजी कि आँख लगी थी उन्होंने गुस्से में उसे सुना दिया|

ठाकुर: मैं अपनी बेटी को अच्छी तरह से जानता हूँ, वो ऐसी बिलकुल भी नहीं है जैसा तुम कह रहे हो?

मैं: आप उसे यहाँ बुला क्यों नहीं लेते? दूध का दूध और पानी का पानी हो जायेगा|

पिताजी ने अजय भैया को माधुरी को बुलाने को भेजा... और इधर घरवाले सब मेरी तरफ हो गए थे| सब का मानना था कि मैं झूठ नहीं बोलूंगा| कुछ ही देर में माधुरी भी आ गई और गर्दन झुकाये खड़ी हो गई| पिताजी अब मुखिया कि तरह बात सुलझाने लग गए|

पिताजी: बेटा मानु का कहना है कि तुम जबरदस्ती उसे बातें करने कि कोशिश करती हो| और तुमने उससे शादी के लिए भी पूछा था?

माधुरी: जी.. पूछा था|

पिताजी: क्यों?

माधुरी: क्योंकि मैं "उनसे" प्यार करती हूँ!!!

ये सुनते ही मेरे होश उड़ गए!!! भौजी का मुँह खुला का खुला रह गया|

मैं: ARE YOU MAD !!! दिमाग ख़राब तो नहीं हो गया?

ठाकुर: ये तू क्या कह रही है बेटी?

पिताजी: मानु, तू शांत हो जा!!! बेटी ये कब से चल रहा है?

माधुरी: जी जब मैं पहली बार "इनसे" मिली थी| मैं इन्ही से शादी करना चाहती हूँ|

पिताजी: ये नहीं हो सकता बेटी, लड़का अभी पढ़ रहा है और...

माधुरी: मैं इन्तेजार करने के लिए तैयार हूँ!!!

मैं: YOU'RE OUT OF YOUR MIND !!! मैं तुम से प्यार नहीं करता, तो शादी कैसे ??? ठाकुर साहब आप अपनी बेटी को समझाओ या इसे डॉक्टर के पास ले जाओ|

भौजी कि आँखें भर आईं थी और वो मुँह फेर के चली गईं|

पिताजी: मैंने कहा ना तू चुप रह!!! मैं बात कर रहा हूँ ना???

माँ: तू जा यहाँ से... यहाँ सब बड़े बात कर रहे हैं|

मैं: पिताजी, आपको जो भी फैसला लेना है लो पर मैं इससे शादी नहीं करने वाला|

अजय भैया मुझे अपने साथ खींच के ले गए और दूर चारपाई पे बैठा दिया|मेरा दिमाग गरम हो गया था... आस पास नजर दौड़ाई पर भौजी कहीं नजर नहीं आई| मैं खुद तो उन्हें ढूंढने नहीं जा सकता था इसलिए मैंने नेहा को ढूंढने के लिए भेजा|नेहा भी जब नहीं लौटी तो मुझे खुद ही उन्हें ढूंढने जाना पड़ा... मेरे मन में बुरे-बुरे विचार आने लगे थे| कहीं भौजी ने कुछ गलत कदम न उठा लिया है... यही सोचता हुआ मैं उनके घर कि ओर चल दिया|

भौजी नेहा से लिपटी हुई रो रही थी... मैंने भौजी के कंधे पे हाथ रखा और उन्हें अपनी ओर घुमाया| भौजी मेरे सीने से लग के रोने लगी...

मैं: आप क्यों रो रहे हो? मैं उस से शादी थोड़े ही करने वाला हूँ| मैंने सबके सामने साफ़-साफ़ कह दिया कि मैं उससे शादी नहीं करूँगा| कभी नहीं करूँगा!!!

भौजी: ये सब मेरी वजह से हुआ...

मैं: किसने कहा आपसे, इसमें आपकी कोई गलती नहीं|

भौजी: पर चाचा नहीं मानेंगे ... वो तुम्हारी उसके साथ तय कर देंगे| मुझे इस बात कि चिंता है कि वो लड़की तुम्हारे लिए सही नहीं है|

मैं: पिताजी ऐसा कुछ नहीं करेंगे, और शादी तय कर भी दी तो करनी तो मुझे है| और जब मैं ही नहीं मानूंगा तो शादी कैसी? आप बस चुप हो जाओ, देखो किसी ने आपको मुझसे ऐसे लिपटे देख लिया तो क्या सोचेगा? मैं बहार जा रहा हूँ आप भी मुँह धो लो और बहार आ जाओ!!!

ये कहके मैं बहार आ गया और नेहा को साथ ले आया| मेरी नजर अब भी दूर हो रही बैठक पे थी... मन में सवाल उठ रहे थे कि पता नहीं क्या होगा? अगर पिताजी ने वाकई में मेरी शादी तय कर दी तो?
भौजी भी कुछ देर बाद बहार आ गईं और पास ही खड़ी हो गई .. उनका ध्यान भी बैठक कि ओर था| कुछ समय बाद बैठक खत्म हुई ओर ठाकुर, माधुरी और उसकी माँ अपने घर कि ओर चल दिए| मन में उत्सुकता बढ़ रही थी कि पता नहीं सब ने क्या फैसला किया है? मैं उठा और जहाँ बैठक हो रही थी वहाँ जाके हाथ मोड़के खड़ा हो गया| भौजी भी मेरे साथ वहीँ खड़ी हो गई|


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