Hot Sex stories एक अनोखा बंधन - Printable Version

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RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन - sexstories - 07-16-2017

बदलाव के बीज--46

अब आगे...

मैं: अम्मा मैंने जो कहना था वो बड़के दादा से कह दिया| मैं जानता हूँ की इसका कोई असर नहीं पड़ेगा पर हाँ कम से कम मेरी अंतर-आत्मा तो मुझे नहीं कचोटेगी| खेर यहाँ कोई लेडी डॉक्टर है... मेरा मतलब महिला डॉक्टर जो भौजी का एक बार चेक-अप कर ले?

बड़की अम्मा: हाँ है शर्मीला जी|

मैं: ठीक है आप तैयारी करो मैं पिताजी से कह के बैल गाडी मँगवाता हूँ|

मैं वापस बहार आया और देखा तो बड़के दादा नहीं थे .. वो खेत जा चुके थे सिर्फ पिताजी थे जो चारपाई पे लेते सोच रहे थे;

मैं: पिताजी मैं बैलगाड़ी वाले को बोल आता हूँ| भौजी का चेक-अप होना जर्रुरी है|

पिताजी: एक बात बता, मैं तुझे डाँट नहीं रहा बस कुछ पूछना चाहता हूँ| तुझमें इतनी हिम्मत कैसे आ गई? कुछ दीं पहले तू कभी किसी बात का विरोध नहीं करता था... जो कह दो चुप-चाप करता था| पर पिछले कुछ दिनों से देख रहा हूँ तू ने जवाब देना शुरू कर दिया है| सही-गलत माइन अंतर करना सीख लिया है... ये अच्छी बात है पर मुझे इनकी आदत नहीं है| तूने अभी जो भी कहा वो बिलकुल ठीक कहा पर अभी भी बहुत सी बातें हैं जो तू नहीं जानता क्योंकि तू छोटा है| खेर मैं बड़े भैया को समझा लूंगा पर उनका बर्ताव मैं नहीं सुधार सकता|

मैं: पिताजी आपने मुझे शिक्षा ही ऐसी दी है की मैं कुछ भी गलत होता नहीं देख सकता| उस दिन जब माधुरी ने शादी की बात कही तो पहली बार मैंने आपका विरोध किया परन्तु विरोध के पीछे जो कारन था वो आपको समझा अवश्य दिया| आज भी जो हुआ वो मैं सह नहीं पाया और अंदर का आक्रोश इस तरह बहार आ गया| खेर मैं बड़के दादा से अपने इस रोह व्यवहार के लिए माफ़ी अवश्य मांग लूंगा पर मैंने कोई गलत बात नहीं की और उसके लिए मैं माफ़ी नहीं माँगूँगा|

पिताजी: ठीक है बीटा ये सब हम बाद में सोचेंगे की तू कहाँ गलत है और कहा सही, फिलहाल तू जाके बैलगाड़ी वाले को बोल आ| मैं बड़े भैया के पास जा रहा हूँ|

मैं तुरंत बैलगाड़ी के पास भाग और रास्ते में मैंने जो कहा उसके बारे में सोचने लगा| मुझे नहीं लगता की मैं कहीं गलत था पर ऐसी कुछ बातें जर्रूर थीं जिनके बारे मैं मैं नहीं जनता था| ये बातें मुझे सिर्फ भौजी से ही पता लग सकती थीं| पर ये सही समय नहीं था उनसे पूछने का| और सबसे बड़ी बात की पिताजी आज मुझसे इतने प्यार से क्यों बात कर रहे थे? उनका मेरे प्रति रवैया हमेशा से ही सख्त मिजाज रहा है! हो सकता है की मैं अब बड़ा हो चूका हूँ इसलिए वो अब मुझ पे उतना दबाव नहीं डालते जितना पहले डालते थे|

खेर मैं बैलगाड़ी वाले को बोल आया और वापस आके भौजी और माँ को बताया की बैलगाड़ी वाला 15 मिनट में आ रहा है|

भौजी: आप भी चलोगे ना?

माँ: (बीच में बात काटते हुए) बहु ये वहाँ क्या करेगा? तू यहीं रुक और अगर हमें देर हो गई तो नेहा का ध्यान रखिओ|

मैं: जी|

मैं जानता था की भौजी चाहती थीं की मैं उनके साथ आऊँ पर माँ और बड़की अम्मा तो जा ही रहे थे और ऐसे में मेरा जोर देना गलत बात पे ध्यान आकर्षित करता| मैं और माँ बहार आ गए और जैसे ही बैलगाड़ी वाला आया मैं भौजी को बुलाने अंदर गया| भौजी मेरे से लिपट गईं और रूवांसी हो गई| मैंने उन्हें प्यार से चुप कराया और डॉक्टर के भेजा| अब मैं अकेला घर पे था और कुछ ही देर में रसिका भाभी भी उठ के आ गईं|

रसिका भाभी: मानु जी, सब लोग कहाँ हैं? यहाँ तो कोई भी नहीं दिख रहा?

मैंने उन्हें सारी बात बताई और ये खुश खबरी सुन के वो कुछ ख़ास खुश नजर नहीं आईं| कारन क्या था ये मुझे बाद में पता चला| (ये बात उनके बेटे वरुण के बारे में थी|)
वाकई में भौजी, अम्मा और माँ को काफी देर लगी और अब तो नेहा के स्कूल से आने का समय हो गया था| इधर रसिका भाभी बेमन से खाना पका रहीं थीं और मैं नेहा को स्कूल लेने निकल पड़ा| घर आके नेहा ने अपनी मम्मी के बारे में पूछा;

नेहा: पापा मम्मी कहाँ है?

मैं: बेटा आपका छोटा भाई या बहन आने वाला है उसके लिए उन्हें डॉक्टर के पास जाना पड़ा|

नेहा की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था और वो ख़ुशी से उछल पड़ी| खुश तो मैं भी था परन्तु एक दर सता रहा था| चन्दर भैया की प्रतिक्रिया मैंने देखि थी और वो अब तक शांत थे| जाहिर था की ये चुप्पी तूफ़ान से पहले का सन्नाटा है| मैं मन ही मन इस तूफ़ान को झेलने की ताकत बटोर रहा था और तैयारी कर चूका था की अगर मौका आया तो मैं सब के सामने ये कबूल कर लूंगा की ये बच्चा मेरा है! खेर मैंने नेहा के कपडे बदले और उसे खाना खिलाया और वो मेरी ही गोद में सो गई| करीब आधे घंटे बाद सब उसी बैलगाड़ी में लौट आये| भौजी सीधा अपने घर में घुस गईं, बैलगाड़ी वाले को पैसे मैं पहले ही दे चूका था तो अम्मा और माँ सीधा रसोई के पास वाले छप्पर के नीचे बैठ गए| मैंने उन्हें पानी पिलाया और फिर पूछने लगा की डॉक्टर शर्मीला ने क्या कहा, तो अम्मा ने बताया; "बेटा चिंता की कोई बात नहीं है, तुम्हारी भौजी माँ बनने वाली हैं| बस कुछ ख़ास बातों का ध्यान रखने को बोला है बस| ब्लड प्रेशर, खून वगैरह चेक कर रहे थे इसलिए इतना टाइम लगा| तुम जाके अपनी भौजी से मिल लो|" मैं भौजी से मिलने घर में पहुँचा तो भौजी को देख के जो ख़ुशी हुई उसे मैं बयान नहीं कर सकता| अब जाके हमें कुछ टाइम मिला था साथ बैठने का|

भौजी: आइये मेरे पास बैठिये, जब से ये खबर आपको पता चली है तबसे आपको मेरे पास बैठने का टाइम ही नहीं मिला! चलिए अब मुँह मीठा करिये|

भौजी ने एक बर्फी का टुकड़ा मुझे खिलाया और मैंने वही टुकड़ा उन्हें भी खिलाया|

मैं: मुझे पूछने की जर्रूरत तो नहीं क्योंकि आपके चेहरे से ख़ुशी साफ़ झलक रही है|

भौजी: हाँ आज मैं बहुत खुश हूँ!!!

मैं: तो डॉक्टर ने क्या कहा?

भौजी: बस कुछ सवाल पूछे, की आखरी बार सम्भोग कब किया था?

मैं: और आपने क्या बताया?

भौजी: करीब 15-20 दिन पहले| (जो बिलकुल सच था)

मैं: और आपको कुछ हिदायतें भी दी होंगी?

भौजी: हाँ... की ठीक से खाना खाना है, अपना ज्यादा ध्यान रखना है और उसके लिए आप तो हो ही|

मैं: (मैं जानता था की मैं हमेशा यहाँ नहीं रहूँगा पर मैं ये कह के उनका दिल नहीं तोडना चाहता था|) बस? मैंने तो फिल्मों में देखा है की डॉक्टर कहता है की आप को खुश रहना है, कोई मेहनत वाला काम नहीं करना, ज्यादा से ज्यादा आराम करना है, पौष्टिक खाना खाना है, कोई स्ट्रेस या टेंशन नहीं लेनी|

भौजी: हाँ यही सब कहा उन्होंने| पर आपको बड़ा इंट्रेस्ट है इन चीजों में|

मैं: अब भई पहली बार बाप बनने जा रहा हूँ तो अपनी पत्नी का ख्याल तो रखें ही होगा! और हाँ एक और बात डॉक्टर कहते हैं की इन दिनों पति-पत्नी को थोड़ा सैयाम बरतना होता है|

भौजी: ना बाबा ना ...ये मुझसे नहीं होगा| मैं आपको अपने से दूर नहीं रहने दूंगी और वैसे भी ये बात अभी लागू नहीं होती| ये तो तब के लिए है जब चार-पांच महीने हो जाते हैं| अभी के लिए कोई रोक टोकनहीं है|

मैं: पर प्रिकॉशन (Precaution) लेने में क्या हर्ज है?

भौजी: ना बाबा ना.... मैं आपके बिना नहीं रह सकती| और मुझे खुश रखना है तो ....

मैं: ठीक है बाबा समझ गया| पर हमें सब के सामने तो थोड़ी दूरी बनानी होगी| वरना सब को शक होगा!

भौजी: कैसा शक?

मैं: मैं आपको बताना तो नहीं चाहता था पर जब अम्मा ने ये खबर चन्दर भैया को दी तो उनके मुख पे कोई भाव नहीं थे| जैसे उन्हें कोई फरक ही नहीं पड़ा| पर अगले ही पल वो कुछ सोचने लगे और खेतों की ओर चले गए| मुझे पूरा यकीन है की वो आपसे सवाल पूछनेगे की ये बच्चा किस का है| और अगर उन्होंने आपसे कोई बदसलूकी की तो मैं सब सच कह दूंगा की ये बच्चा मेरा है!

भौजी: नहीं!!! आप ऐसा कुछ भी नहीं कहेंगे!!! आपकी जिंदगी तबाह हो जाएगी... आप पे उम्र भर का लांछन लग जायेगा| आप मुझपे भरोसा रखो, मैं सब संभाल लुंगी|

मैं: कैसे संभाल लोगे? सालों से भैया ने आपको नहीं छुआ और अब ये बच्चा ... वो आपसे पूछेंगे नहीं की ये कैसे हुआ?

आगे की बात पूरी होने से पहले ही चन्दर भैया आ गए और उबके चेहरे से साफ़ लग रहा था की वो बहुत गुस्से में हैं| मैंने फैसला किया की मैं यहीं रहूँगा क्योंकि मुझे अब भी चिंता थी की कहीं वो भौजी पे हाथ न उठा दें| हालाँकि उन्होंने अपनी माँ की कसम खाई थी की वो कभी भौजी पे हाथ नहीं उठाएंगे पर मैं उन पे भरोसा कैसे करता|

चन्दर भैया: (कड़क आवाज में) कुछ बात करनी है|

भौजी कुछ बोली नहीं बस मेरी ओर देखने लगीं... मैं समझ गया था पर फिर भी हिला नहीं|

चन्दर भैया: मानु भैया आप बहार जाओ मुझे आपकी भौजी से कुछ बात करनी है|

मैं हैरान था की आखिर वो मुझसे इतनी हलिमि से बात क्यों कर रहे हैं| मजबूरन मैं बहार चला गया और कुऐं की मुंडेर पे भौजी के घर के दरवाजे की ओर मुँह करके बैठ गया| घर से मुझे कुछ वाजें तो आ रहीं थीं पर ज्यादा ऊँची नहीं थी... इधर मेरा मन बेकाबू होने लगा और मैं आखिर उठ के दरवाजे की ओर चल पड़ा| मेरे अंदर घुसने से पहले ही चन्दर भैया बहार निकले ओर अब उनके मुख पे कुछ संतोष जनक भाव थे| मैं अंदर घुसा तो देखा भौजी चारपाई पर बैठीं है, जिज्ञासा वष मैंने उनसे पूछा;

मैं: आपकी तरकीब काम कर गई| पर क्या हुआ अभी? उन्होंने आप को छुआ तो नहीं?

भौजी: नहीं... आप चिंता ना करो मैंने उन्हें समझा दिया|

मैं: क्या समझा दिया और वो मान कैसे गए?

भौजी: मैंने उन्हें कह दिया की जिस दिन उन्होंने नशे मैं धुत्त होके हाथापाई की थी उसी दिन उन्होंने मेरे साथ वो सब जबरदस्ती किया| (ये कहते हुए भौजी बहुत गंभीर हो गईं जैसे वो मन ही मन अपने आप की इस जूठ के लिए कोस रहीं हों|)

मैं: मैं समझ सकता हूँ आप पे क्या बीत रही है|

बस मेरा इतना कहना था की भौजी टूट गईं और मुझसे लिपट के रोने लगीं| उन्हें अफ़सोस इस बात का था की वो मेरे बच्चे को चाह कर भी मेरा नाम नहीं दे सकती थीं| पर फिर भी मैं जानना चाहता था की आखिर दोनों में बात क्या हुई|

मैं: बस..बस... चुप हो जाओ| आप जानते हो ये मेरा बच्चा है... मैं जानता हूँ ये मेरा बच्चा है, बस हमें दुनिया में ढिंढोरा पीटने की कोई जर्रूरत नहीं है| बस अब आप चुप हो जाओ ... आपको मेरी कसम!

तब जाके भौजी का रोना बंद हुआ.... मैं उनके लिए भोजन लाया और उनके साथ बैठ के ही भोजन किया| उनका मन अब कुछ शांत था पर मेरे मन में जो कल से सवाल उठ रहे थे उनका निवारण जर्रुरी था|


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अब आगे...

इसलिए मैंने एक-एक कर उनसे सवाल पूछना शुरू किये;

मैं: अच्छा मैं आपसे कुछ बात करना चाहता था|

भौजी: हांजी बोलिए, कल रात से मैं भी बेचैन हूँ की आखिर आपको कौन सी बात करनी है?

मैं: कल शाम जब हम सिनेमा से लौटे थे और माधुरी आपको दिखी तो आप उस पे बरस पड़ीं| राशन-पानी लेके चढ़ गईं... मुझे इस बात का बुरा नहीं लगा पर लगा की आप मुझ पे हक़ जाता रहे हो और मुझे अच्छा लगा पर कभी-कभी आप ये भूल जाते हो की हमारे रिश्ते की कुछ सीमाएं हैं जो दुनिया वालों के लिए बंधी गईं हैं और आप गुस्से में उन्हें (सीमाओं को) भी लांघ जाते हो| नतीजन आपके आस-पास हैरान हो जाते हैं और ख़ास कर नेहा वो बेचारी तो सहम गई थी इतना सहम गई की मेरे पीछे छुप गई|

भौजी: जब भी मैं उसे देखती हूँ तो मेरे तन-बदन में आग लग जाती है| पता नहीां क्यों पर वो मुझे अपनी "सौत" लगती है!

मैं: क्या?

भौजी: हाँ ... उसे देख के मेरा खून खौल उठता है| और जब वो आप पे हक़ जताने की कोशिश करती है तो मन करता है उसका खून कर दूँ! आपको नहीं पता क्या-क्या गुल खिलाये हैं इस लड़की ने!

मैं: बताओ तो सही क्या गुल खिलाये इसने?

भौजी: आपको याद है नहा के हेड मास्टर साहब ने बताया था की उनकी हाल ही में बदली हुई है|

मैं: हाँ

भौजी: उनका लड़का शहर में पड़ता था और यहाँ अपने पिताजी के पास आया था मिलने| अब ये लड़की उसके पीछे भी पद गई... उसे अपनी मीठी-मीठी बातों से बरगला लिया और दोनों की इतनी हिम्मत बढ़ गई की दोनों घर से भाग निकले! और ये भी कोई ज्यादा पुरानी बात नहीं है, यही कोई साल भर पहले की बात होगी| अब ना जाने उस लड़के ने इसके साथ क्या-क्या किया होगा, कोई तीन दिन बाद हेडमास्टर साहब दोनों को पकड़ के गाँव वापस लाये... और माधुरी के बाप ने सारी आत हेडमास्टर साहब के लड़के पर डाल दी, की वही उनकी लड़की को भगा ले गया| बेचारे इतना बदनाम हुए की गाँव छोड़के चले गए!

मैं: वैसे आप को इतनी विस्तार में जानकारी किसने दी?

भौजी: छोटी ने (रसिका भाभी)| उसके पेट में कोई बात नहीं पचती... उसका चेहरा देख के मैं सब समझ जाती हूँ|

मैं कहना तो चाहता था की माधुरी नीचे से बिलकुल कोरी थी ! और उसका उद्घाटन मैंने ही किया था पर फिर मैं चुप रहा वरना उनका मूड ख़राब हो जाता|

भौजी: पता नहीं उसे क्या हुआ जो इस तरह आपके पीछे पड़ गई और आपको इतना परेशान किया और आपका नाजायज फायदा उठाया| इसीलिए उसे देखते ही मुझे बहुत गुस्सा आता है और मैं ये भी भूल जाती हूँ की मैं कहाँ हूँ और किस्से बात कर रही हूँ| आसान शब्दों में कहूँ तो मैं आपको लेके बहुत POSSESSIVE हूँ!

मैं: अच्छा आज आप क्योंकि बहुत कुछ बताने के मूड में हो तो मैं एक और बात आपसे जानना चाहता हूँ|

भौजी: पूछिये

मैं: मैंने देखा है की घर में कोई भी रसिका भाभी पर ध्यान नहीं देता| वो देर तक सोती रहती हैं ... काम में हाथ नहीं बटाती... सुस्त हैं... और तो और उनका लड़का वरुण, उसे तो ननिहाल भेजे इतना समय हो गया| मैं जब आया था उसके अगले दिन वो ननिहाल चला गया था और उसी दिन गट्टू भी लुधियाना चला गया?

भौजी: गट्टू लुधियाना में पढता है ... ऐसा घरवाले सोचते हैं| असल में वो वहां एक फैक्ट्री में काम करता है|

मैं: तो उसेन ये बात घर में क्यों नहीं बताई?

भौजी: दरअसल आपको पढता देख बड़के दादा की इच्छा हुई की गट्टू भी पढ़े और आप की तरह बने पर उसके दिमाग में पढ़ाई घुसती ही नहीं|

मैं: आपको ये बात कैसे पता?

भौजी: ये बात आपके चन्दर भैया और अजय भैया को पता है और बड़के दादा के डर से कोई उन्हें नहीं बताता|

मैं: और ये रसिका भाभी का क्या पंगा है?

भौजी: दरअसल शादी के पाँच महीने में ही उसे लड़का हो गया था!

मैं: क्या? पर ये कैसे हो सकता है? क्या अजय भैया और रसिका भाभी पहले से एक साथ थे... मेरा मतलब क्या उनकी लव मैरिज थी?

भौजी: नहीं Arrange मैरिज थी... आपकी रसिका भाभी का शादी के पहले किसी के साथ चक्कर था! उनके परिवारवाले ये बात जानते थे इसलिए उन्होंने जल्दीबाजी में ये शादी कर दी| जब ये पेट से हुई तो ये बात खुली.. बड़ा हंगामा हुआ| पर क्योंकि लड़का हुआ था तो बात को धीरे-धीरे दबा दिया| पर आपके बड़के दादा ने वरुण को कभी अपना पोता नहीं माना| उसे बिचारे बच्चे को यहाँ उतना प्यार सिर्फ आप से ही मिला, उसकी अपनी माँ उसे दुत्कार देती थी| दूध तक नहीं पिलाती थी, तब मैं उसे बोतल का दूध पिलाया करती थी| अजय को तो जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता और वो बार-बार उससे (रसियक भाभी से) लड़ता रहता है| अब चूँकि आप शहर से आय थे और इन बातों से अनजान थे इसलिए वरुण को ननिहाल भेज दिया ताकि आपको इस बात की जरा भी भनक ना लगे|

अब मेरी समझ में सारी बात आ गई| चूँकि बड़के दादा चन्दर भैया से ज्यादा प्यार करते हैं इसलिए उनसे एक पोते की उम्मीद रखते हैं| पर मैंने उन्हें कभी नेहा के साथ वो प्यार देते नहीं देखा जो वो अपने पोते को देना चाहते थे, जो की गलत बात थी|

भौजी: अब आप एक बात बताओ, आप क्यों बड़के दादा और बड़की अम्मा से लड़ पड़े?

मैं: मैंने कोई लड़ाई नहीं की, मैंने बस वो कहा जो मेरी अंतर-आत्मा ने मुझसे कहा| हाँ मैं मानता हूँ की मेरा बात करने का लहजा सही नहीं था और उसके लिए मैं उनसे माफ़ी मांग लूंगा पर मैंने कुछ भी गलत नहीं कहा|

पता ही नहीं चला की हमें बातें करते-करते शाम हो गई| घडी देखि तो पाँच बज रहे थे|

मैं बहार आया तो देखा अम्मा और दादा कुऐं के पास चारपाई डाले बैठे थे और उन्हीं के पास बिछी चारपाई पर माँ और पिताजी बैठे थे| मैं चुप-चाप सर झुकाये उनके पास आया और हाथ बंधे खड़ा हो गया| पीछे-पीछे भौजी भी घूँघट काढ़े खड़ी हो गईं|

मैं: दादा.. अम्मा ... मैंने जिस लहजे में आप दोनों से सुबह बात की उसके लिए मैं आपसे माफ़ी मांगना चाहता हूँ| मुझे इस लहजे में आपसे बात नही करनी चाहिए थी|

बड़के दादा: आओ मुन्ना बैठो यहाँ| देखो तुम शहर में रहे हो .. पढ़े लिखे हो ... वो भी अंग्रेजी में.... तुम्हारी सोच नए जमाने की है.... और हम ठहरे बुजुर्ग और पुरानी सोच वाले| तुम्हारी और हमारी सोच में जमीन आसमान का अंतर है| जो हमारे लिए सही है वो तुम्हारे लिए गलत पर खेर तुम्हारे पिताजी ने हमें बताया ई तुम अपने बर्ताव के लिए क्षमा मांगना चाहते हो पर जो तुमने कहा उसके लिए नहीं| ठीक है... तुम भी अपनी जगह सही हो और हम भी| तो इसमें अब कोई गिला-शिकवा नहीं बचा|

जवाब बहुत रुखा था और सब कुछ जानने के बाद मैं सीधे जवाब की उम्मीद भी नहीं कर रहा था| खेर मैं उठा और छप्पर के नीचे तख़्त पे बैठ गया| भौजी भी मेरी बगल में बैठ गईं, इतने मैं वहां नेहा आ गई और मेरे पास आके बोली;

नेहा: पापा मेरा छोटे भाई-बहन कहाँ है?

मैं और भौजी उसकी बात सुनके ठहाका मार के हँस पड़े| हमारी हँसी सुन रसिका भाभी रसोई से निकली और हँसी का कारन पूछने लगी| जब उन्हें पता चला तो वो भी हँसी पर वो हँसी बनावटी लग रही थी|

मैं बहार आया तो देखा अम्मा और दादा कुऐं के पास चारपाई डाले बैठे थे और उन्हीं के पास बिछी चारपाई पर माँ और पिताजी बैठे थे| मैं चुप-चाप सर झुकाये उनके पास आया और हाथ बंधे खड़ा हो गया| पीछे-पीछे भौजी भी घूँघट काढ़े खड़ी हो गईं|

मैं: दादा.. अम्मा ... मैंने जिस लहजे में आप दोनों से सुबह बात की उसके लिए मैं आपसे माफ़ी मांगना चाहता हूँ| मुझे इस लहजे में आपसे बात नही करनी चाहिए थी|

बड़के दादा: आओ मुन्ना बैठो यहाँ| देखो तुम शहर में रहे हो .. पढ़े लिखे हो ... वो भी अंग्रेजी में.... तुम्हारी सोच नए जमाने की है.... और हम ठहरे बुजुर्ग और पुरानी सोच वाले| तुम्हारी और हमारी सोच में जमीन आसमान का अंतर है| जो हमारे लिए सही है वो तुम्हारे लिए गलत पर खेर तुम्हारे पिताजी ने हमें बताया ई तुम अपने बर्ताव के लिए क्षमा मांगना चाहते हो पर जो तुमने कहा उसके लिए नहीं| ठीक है... तुम भी अपनी जगह सही हो और हम भी| तो इसमें अब कोई गिला-शिकवा नहीं बचा|

जवाब बहुत रुखा था और सब कुछ जानने के बाद मैं सीधे जवाब की उम्मीद भी नहीं कर रहा था| खेर मैं उठा और छप्पर के नीचे तख़्त पे बैठ गया| भौजी भी मेरी बगल में बैठ गईं, इतने मैं वहां नेहा आ गई और मेरे पास आके बोली;

नेहा: पापा मेरा छोटे भाई-बहन कहाँ है?

मैं और भौजी उसकी बात सुनके ठहाका मार के हँस पड़े| हमारी हँसी सुन रसिका भाभी रसोई से निकली और हँसी का कारन पूछने लगी| जब उन्हें पता चला तो वो भी हँसी पर वो हँसी बनावटी लग रही थी|

बस तभी नेहा आ गई और हम अलग हो गए| वो रात बस ऐसी ही हँसी-मजाक करते हुए बीती और अगली सुबह एक नई समस्या को साथ ले आई| सुबह चाय पीने के बाद अम्मा ने मुझसे कहा की मैं उनके साथ चक्की तक चलूँ क्योंकि वहाँ से आटा लाना है| अब घर में कोई पुरुष नहीं था तो मैं उनके साथ ख़ुशी-ख़ुशी चल दिया| रास्ते में कल को हुआ उसके बारे में हमारी बात चल राय थी| अम्मा मेरी बातों से प्रभावित थीं पर संतुष्ट नहीं, क्योंकि उनके विचार अब भी बड़के दादा के जैसे थे| मैंने भी इस बात को ज्यादा तूल नहीं दी और बात बदल दी| जब महम वापस घर पहुँचे तो वहाँ मुझे एक लड़का जो लगभग मेरी उम्र का था वो भौजी से बात करता हुआ दिखा| मैं उसे नहीं जानता था, मैं आटा रसोई में रख के वापस आया तो नेहा उछलती हुई मेरे पास आई| उसने अब भी स्कूल ड्रेस पहना हुआ था, यानी वो अभी-अभी स्कूल से आई थी| मैंने नेहा को गोद में ले लिया और भौजी की ओर देखा तो वो अपने घर में घुस गईं| अब मुझे समझ नहीं आया की ये बाँदा है कौन और इसने भौजी से ऐसा क्या कह दिया की वो अंदर चलीं गई| इतने में वो लड़का चन्दर भैया की ओर चल दिया जो कुऐं की मुंडेर पे बैठे थे| वो हाथ जोड़ के उनसे कुछ कहने लगा और तभी चन्दर भैया ने मेरी ओर इशारा करते हुए ऊँची आवाज में कहा; "भैया जो कहना है हमारे मानु भैया से कहो| वो सिर्फ इन्हीं की बात मानती हैं|" अब ये टोंट था या सच इसमें फर्क करना बहुत मुश्किल था| पर मैं फिर भी चुप रहा और वो लड़का मेरे पास अाया और बोला; "भाई साहब प्लीज जीजी को समझाइये की वो मेरे साथ चरण काका की बेटी की शादी में चलें|" अब उसके मुंह से "जीजी" शब्द सुनके ये साफ़ था की वो मेरा "साला" ही होगा| मैंने उससे कहा; आप यहीं रुको और नेहा को समभालो मैं बात करता हूँ"| पर नेहा थी की अपने मामा की गोद में जा ही नहीं रही थी| वो गोद से उत्तर गई और भागती हुई मेरे पिताजी के पास चली गई| खेर मैं भौजी को समझाने के मूड से घर में घुसा तो अंदर भौजी चारपाई पे बैठी थीं और उनका सर झुका हुआ था|

मेरे कुछ बोलने से पहले ही उन्होंने अपनी बात सामने रख दी;

भौजी: अगर आप मुझे शादी अटेंड करने के लिए कहने आय हो तो मैं आपको छोड़के कहीं नहीं जा रही!!!

अब जवाब तो साफ़ था इसलिए मैं चुप-चाप दिवार का सहारा लेके खड़ा रहा| घर में एक दम सन्नाटा था! कुछ देर होने के बाद भौजी कु मुंह से बोल फूटे;

भौजी: I’m Sorry!

मैं: It’s okay. उस दिन रात को आपने बताया था की चरण काका की वजह से "ससुरजी" ने आपको दसवीं तक पढ़ने के लिए शहर भेजा और आज उनकी लड़की की शायद है और आपको स्पेशल बुलावा आया है और आप जाने से मना कर रहे हो?

भौजी: मैं आपके बिना नहीं रह सकती|

मैं: यार आप कौनसा हमेशा के लिए जा रहे हो? कल शादी है, परसों विदाई तरसों आप आजाना| सिर्फ तीन दिन की ही तो बात है|

भौजी: नहीं... आप मुझे छोड़के चले जाओगे?

मैं: नहीं जाऊँगा

भौजी: नहीं मैं आपके बिना एक दिन भी नहीं रह सकती!

मैं: अच्छा मेरे लिए चले जाओ ! प्लीज !!! and I Promise मैं कहीं नहीं जाऊँगा| और इसी बहाने आप "ससुरजी" को खुशखबरी दे देना की वो नाना बनने वाले हैं!!!
भौजी: ठीक है पर अगर मेरे आने पर आप मुझे यहाँ नहीं मिले तो आप मेरा मारा मुंह देखोगे!

मैं: उसकी नौबत ही नहीं आएगी| चलो अब ख़ुशी-ख़ुशी अपना सामान पैक करो मैं "साले साहब" को बुलाता हूँ|

मैंने बहार जाके अनिल (साले साहब) को आवाज दी और उसे अंदर आने को कहा| अंदर आके उसने भौजी को सामान पैक करते देखा तो खुश हो गया| इतने में कूदती हुई नेहा भी आ गई और मेरी गोद में बैठ गई;

मैं: बेटा तैयार हो जाओ आप नानू के घर जा रहे हो!

नेहा खुश हो गई और भौजी उसे कमरे में ले जाकर तैयार करने लगीं| तैयार होक नेहा मेरी गोद में फिर चढ़ गई और अब भी मामा के पास नहीं जा रही थी|

भौजी: अनिल तुमने "इनको" थैंक्स बोला?

अनिल: ओह सॉरी जीजी, थैंक यू भाई साहब!

भौजी: भाई साहब? ये तेरे भाई साहब थोड़े ही हैं.... (अब मैंने भोएं सिकोड़ के भौजी को देखा और उन्हें आगे बोलने से रोकने लगा, पर वो कहाँ सुनने वाली थीं तू अजय को क्या कहके बुलाता है?

अनिल: जीजा जी

भौजी: तो ये तेरे अजय भैया के भाई ही तो हैं, इस नाते ये तेरे क्या हुए?

अनिल: जीजा जी... ओह! थैंक यू जीजा जी|

अनिल के मुंह से जीजा जी सुन के मुझे कुछ ख़ास फर्क नहीं पड़ा पर भौजी के मुख पे जो संतोष था वो देख मैं मन ही मन हँस पड़ा| ऐसा लगा जैसे उन्हें ये छोटी-छोटी खुशियां बहुत सुख देती हैं| शायद वो मन ही मन अपनी जीत पे बहुत अकड़ रही होंगी की उन्होंने आखिर अपने भाई से "जीजा जी" बुलवा ही लिया| मैं भी मुस्कुरा दिया!


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अब आगे...

अनिल: वैसे जीजा जी, कुछ तो बात है आप में| आपने तो जैसे जीजी पर जादू कर दिया है| पिछली बार जब मैं आया था तब आप नहीं थे ... बाजार गए थे| जीजी ने आपकी ख़ुशी के लिए शादी अटेंड करने से मना कर दिया| और आज मैंने कितनी मिन्नत की... जीजा जी (चन्दर भैया) ने भी कहा, पिताजी ने भी स्पेशल बुलावा भेजा पर ना ... जीजी ने साफ़ मना कर दिया आने से| पर पता नहीं आपने पाँच मिनट में ऐसा क्या कहा की जीजी झट से तैयार हो गईं? यहाँ तक की नेहा भी ... पहले मेरे पास आ जाती थी पर आज जब से आया हूँ मेरे पास भटकती भी नहीं| तबसे देख रहा हूँ आपसे चिपकी हुई है| बताइये ना क्या जादू किया आपने?

मैं: यार... कोई जादू नहीं है बस "प्यार है" ... (अब ये मेरे मुंह से अनायास ही निकल गया, अब बात संभालने के लिए मैंने आगे नेहा का नाम जोड़ दिया|) नेहा का मुझसे जो वो मेरे बिना नहीं रहती| मेरे साथ खेलती है, मेरे साथ खाती है, मेरे साथ सोती है और आजकल तो होमवर्क भी मेरे साथ करती है| और रही बात आपकी जीजी की तो हमारी अंडरस्टैंडिंग बहुत अच्छी है| ये मेरी बात झट से समझ जाती हैं|

भौजी ये सुन के मुस्कुरा दीं और मेरी बातों में और बात जोड़ दी;

भौजी: हाँ, इनका समझाने का तरीका जरा हटके है!!! बड़े प्यार से समझते हैं....

मैं जानता था की अनिल इतना बेवकूफ नहीं है जो हमारे बीच में क्या चल रहा है वो समझ ना पाये इसलिए मैंने भौजी की आत को अलग ही अर्थ दे दिया;

मैं: यार अब आप मेरी टांग मत खींचो! अनिल यार तुम नहीं जानते ये मुझे इतना तंग करती हैं... मेरी हर बात पे टांग खींचती हैं और जो तुम कह रहे हो ना की ये मेरी हर बात मानती हैं, ऐसा कुछ भी नहीं है| सौ में से निन्यानवे बातें तो ये कभी नहीं मानती! पिछली बार इन्होने मेरे जिससे के डर से मना कर दिया था| आज से कुछ साल पहले की बात है, तब मैं amature था, तब ऐसे ही एक दीं सुबह तुम आये थे इन्हें लेने, तब आपके घर में हवन था| ये मुझे कह गईं की मैं जल्दी वापस आउंगी| अब इनके अलावा तो मेरा कोई दोस्त है नहीं| मैं इनका इन्तेजार करता रहा की ये आज आएँगी.. कल आएँगी.. पर ना जी ना इन्होने तो वापस ना आने की कसम खा ली| इसी गुस्से में मैं तब वापस चला गया था, अब आज तुम फिर आये तो इन्हें डर लगा की मैं फिर से रूठ के वापस ना चला जाऊँ इसलिए मना कर रहीं थी| जब मैंने इन्हें भरोसा दिलाया की मैं नहीं जाऊँगा तब जा के मानी हैं|

अनिल: अच्छा तो ये बात है!

मैं: (भौजी को छेड़ते हुए) वैसे मैंने कोई गारंटी नहीं दी की मैं इनके वापस आने तक रहूँगा?

भौजी का मुंह उतर गया...

मैं: बाबा मैं मजाक कर रहा था, I Promise मैं कहीं नहीं जाऊँगा|

ये सुन के उनका मूड कुछ ठीक हुआ पर ऐसा लगा जैसे उन्हें तसल्ली नहीं हुई... भौजी ने सामान पैक कर लिया था और वो निकलने के लिए तैयार थीं| मैं खड़ा हुआ और अनिल भी, अचानक भौजी मेरे पास आईं और उन्होंने मुझे गले लगा लिया|

मैं: यार कुछ दिनों की ही तो बात है... क्यों भई अनिल ज्यादा से ज्यादा तीन दिन ना?

अनिल: जी जीजा जी| जीजी आप चिंता ना करो मैं आपको तीन दिन बाद छोड़ जाऊँगा|

भौजी: तीन दिन बाद नहीं तीसरे दिन ही वापस आना है मुझे|

अनिल: हाँ वही मतलब मेरा|

हम कुछ इस प्रकार खड़े थे की भौजी की पीठ अनिल की ओर थी ओर वो मुझसे अब तक गले लगी हुईं थी| भौजी ने अचानक मेरा दाहिना हाथ पकड़के अपने पेट पे रखा ओर मेरे कान में खुसफुसाई;

भौजी: खाओ अपने बच्चे की कसम की आप मुझे बिना मिले नहीं जाओगे?

मैं: कसम खाता हूँ की जब तक आप नहीं आओगे मैं कहीं नहीं जाऊँगा|

तबजाके भौजी को तसल्ली हुई और हम अलग हुए| हम बहार निकले, आगे-आगे अनिल था ओर उसके हाथ में एक छोटा सा बैग था, उसके पीछे भौजी और पीछे मैं और मेरी गोद में नेहा| घरवाले भौजी को तैयार देख हैरान हुए और सब की नजर एक साथ मेरी ओर ठहर गई|

बड़के दादा: अच्छा हुआ भौ जो तुम जाने के लिए मान गई|

अनिल: जी ये सब तो जीजा जी (मेरी ओर इशारा करते हुए) का कमाल है!

बड़के दादा: मैं जानता था की मानु ही तुम्हें मना सकता है| खेर समधी जो को मेरा राम-राम कहना|

मैं भौजी और अनिल को छोड़ने के लिए चौक तक चल दिया| जब हम चौक पहुंचे तो नेहा मेरी गोद से उतरने का नाम नहीं ले रही थी| वो तो मुझसे लिपट गई और ना ही भौजी की गोद में जा रही थी और ना ही अपने मामा की गोद में|

मैं: क्या हुआ बेटा? नानू के घर नहीं जाना?

नेहा: नहीं

मैं: बेटा ऐसा नहीं कहते| देखो नानू आपका इन्तेजार कर रहे हैं, उनके पास बहुत अच्छी-अच्छी मिठाइयां है, खिलोने हैं ... (मैं अपनी तरफ से नेहा को हर प्रलोभन दे रहा था की वो मान जाए पर ना|)

नेहा: आप भी चलो !

मैं: बेटा मैं नहीं आ सकता ... मुझे घर में काफी काम है|

नेहा: नहीं पा...

इससे पहले की वो आगे कुछ बोले मैं नेहा को गोद में लिए पाँच कदम दूर हुआ और उसके कान में बोला;

मैं: बेटा जिद्द नहीं करते ... देखो तीन दिन बाद हम फिर मिलेंगे और मैं आपको आपकी मनपसंद चीज खिलाऊँगा|

नेहा: नहीं पापा मैं नहीं जाऊँगी|

मैं वापस भौजी और अनिल के पास आया;

भौजी: आप भी चलो न हमारे साथ|

अनिल: हाँ जीजा जी आप भी चलो मज़ा आएगा!

मैं: यार (भौजी से) आप तो जानते ही हो मेरा मन शादी-ब्याह के फंक्शन में जरा भी नहीं लगता|

भौजी: तो मेरा कौन सा लगता है, मुझे तो जबरदस्ती भेज ही रहे हो|

मैं: यार मैं वहां किसी को नहीं जानता... बोर हो जाऊँगा|

भौजी: आप मेरे साथ रहना! मैं आपको बोर नहीं होने दूंगी!

मैं: मतलब लेडीज के साथ... बाप रे बाप उससे तो अच्छा है मैं यहीं रहूँ|

हमें वहां खड़े-खड़े पंद्रह मिनट हो गए और पिताजी हमें दूर से देख रहे थे और वो स्वयं आ गए और उन्हें देख भौजी ने तुरंत घूँघट काढ लिया ;

पिताजी: क्या हुआ बेटा?

मैं: नेहा मेरी गोद से उतर ही नहीं रही|

पिताजी: क्यों गुड़िया क्या हुआ?

नेहा कुछ नहीं बोली पर मैं बात जल्दी खत्म करना चाहता था क्योंकि मैं शादी अटेंड नहीं करना चाहता था| दरअसल मैं पार्टी और शादी-ब्याह के फंक्शनो से दूर ही रहता हूँ, और अगर पिताजी को ये पता लग जाता की नेहा जिद्द कर रही है की मैं भी उनके साथ चलूँ तो वो जबरदस्ती मुझे भेज देते|

मैं: देखो बेटा अगर आप नहीं गए तो मैं आपसे कभी बात नहीं करूँगा!

अब हार के नेहा मान गई और भौजी की गोद में चली गई| मैंने उन्हें बाय-बाय किया और फिर मैं और पिताजी वापस आ गए| मेरा दिल तो भौजी के साथ ही चल गया था! मैं बस आके चारपाई पे पसर गया इतने में रसिका भाभी मेरे पास आ गईं और मेरी ही चारपाई पे बैठ गईं|

रसिका भाभी: अब तो आप अकेले हो गए मानु जी?

मैं: क्यों ... आप हो ना?

रसिका भाभी: अब भैया हम में वो बात कहाँ जो आपकी भौजी में हैं!!!

इसके आगे बोलने का कोई मौका ही नहीं मिला, क्योंकि अजय भैया ने आके घमासान युद्ध का बिगुल बजा दिया|

अजय भैया: तू किसी भी काम की है? ###**#*#*#*#*#*##*#*#*#*

आगे भैया ने अचानक से ही भाभी को गालियां देनी शुरू कर दीं| ऐसी गालियां जो मैं लिखने के बारे में सोच भी नहीं सकता| रसिका भाभी एक दम से उठ खड़ी हुई और मैं भी सकपका के खड़ा हो गया...

मैं: भैया शांत हो जाओ! आप क्यों भड़क रहे हो भाभी पे? क्या कर दिया इन्होने?

अजय भैया: कुछ किया ही तो नहीं इस ##*** ने! साली हमेशा सोती रहती है... काम करने को कहो तो बीमार पड़ जाती है|

मैं: आप ऐसे गालियां क्यों दे रहे हो ... आराम से बात करते हैं|

अजय भैया: तुम हट जाओ मानु भैया मैं अभी इस ##** की अक्ल ठिकाने लगाता हूँ|

इतना कह के वो छड़ी उठाने लपके| अब घर में कोई नहीं था.. पिताजी, बड़के दादा, माँ, चन्दर भैया और बड़की अम्मा सब के सब खेत जा चुके थे| अब कौन रोकेगा इन्हें! जैसे-तैसे मैंने भैया के हाथ से छड़ी छीन ली और दूर फेंक दी| किसी तरह उन्हें समझा-बुझा के वापस खेत में भेजा, और इधर रसिका भाभी रोये जा रही थी| मैंने उनके आँसूं पोछे और उन्हिएँ चुप कराया| भौजी मुझसे लिपट गई और सुबकने लगी और अंत में शांत हुई| मुझे उनका मुझे गले लगाना कुछ अजीब सा लगा पर फिर मैने सोचा की भाभी थोड़ा भावुक हो गईं है इसलिए मैंने कुछ नहीं कहा| जब भाभी शांत हुई तब मैंने उनसे ये सोच के बात उठाई की शायद मैं उनके विवाहित जीवन में वापस खुशयीयाँ ला सकूँ|

मैं: (उनको खुद से अलग करते हुए) भाभी अब बताओ की आखिर बात क्या है? क्यों आपका और भैया का हमेशा झगड़ा होता है? क्यों भैया को आप और आपको भैया एक भी आँकक नही भाते?

रसिका भाभी: मानु जी.... अब आपसे क्या छुपाना, आपके भैया मुझे खुश नहीं कर पाते! हमेशा मुझे प्यासा छोड़ देते हैं|

मैं भौजी का जवाब सुन के अवाक रह गया, मैं उनकी बात तो समझ गया था पर फिर भी ऐसा दिखाया जैसे मैं कुछ नहीं समझा| क्योंकि मुझे अपनी टाक बचानी थी और अगर रसिका भाभी को जरा सा भी शक हो जाता या पता चल जाता की मैं सेक्स के बारे में सब जानता हूँ तो वो ये बकवास सब के सामने कर देती|

मैं: भाभी मैं कुछ समझा नहीं? वो आपको खुश नहीं कर पाते... आप प्यासे रह जाते हो... मतलब?

रसिका भाभी: मानु जी आप बिलकुल भोले हो और इसलिए आप मुझे इतने पसंद हो!

मैं: जी.. मैं कुछ समझा नहीं| (मेरा भोले बनने का नाटक जारी था|)

रसिका भाभी: क्या तुम्हें सेक्स के बारे में कुछ नहीं पता?

मैं: (झेंपते हुए) जी नहीं!

रसिका भाभी: चलो मैं तुम्हें बताती हूँ की सेक्स किसे कहते हैं? जब लड़का अपना वो (मेरे लंड की ओर इशारा करते हुए) लड़की की इस जगह (अपनी योनि की ओर इशारा करते हुए) घुसता है तो उसे सेक्स करना कहते हैं!

ये सुन के मेरे कान लाल होने लगे ओर मैंने अपनी नजरें झुका ली|

मैं: आप बहुत गन्दी बातें करते हो|

रसिका भाभी: गन्दी कसी? ये तो तुम भी करोगे...

मैं उठ के जाने लगा तो उन्होंने ने मेरे हाथ पकड़ के मुझे फिर बैठा दिया| फिर मेरा दायां हाथ अपने दोनों हाथों के बीच में रख के बोलीं;

रसिका भाभी: मानु जी... बस एक बार मेरी प्यास बुझा दो....प्लीज !!! बस एक बार....

मैं: क्या (उठ के खड़ा हो गया) आपका दिमाग ठीक है!!! आप मेरी भाभी हो.... आप पागल हो गए हो!

रसिका भाभी: मानु जी ... आपको देख के मैं बहक जाती हूँ| उस दिन जब मैंने आपको नहाते हुए देखा तो मैं बता नहीं सकती मुझ पे क्या बीती| प्लीज ... एक बार ....

मैं बोला कुछ नहीं बस उठ के जाने लगा तो उन्होंने मेरा हाथ पकड़ के रोक लिया और मुझे धकेल के दिवार से लगा दिया और मुझसे एक डैम सट के कड़ी हो गईं| मुझे उनकी सांसें मेरे मुंह पे महसूस हो रही थी|

रसिका भाभी: मान जाओ ना.... क्यों तड़पा रहे हो मुझे? जान लोगे क्या मेरी? लेलो ... (इतना कहके उन्होंने अपना पल्ला गिरा दिया और मुझे उनके स्तनों के बीच की खाईं साफ़ दिखने लगी|)

मैं: मुझे आपसे कोई बात नहीं करनी| आप होश में नहीं हो!

रसिका भाभी ने अपना वजन मुझ पे डाल दिया ताकि मैं हिल ना पाऊँ| अब मेरी हालत ख़राब होने लगी थी... मुझे टेंशन ये थी की अगर किसी ने हमें इस हाल में देख लिया तो मेरी वॉट लग्न तय था!


RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन - sexstories - 07-16-2017

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अब आगे...

मैं: भाभी मुझे गुस्सा मत दिलाओ... और हटो मुझ पर से| मैं आपके चक्कर में नहीं पड़ने वाला!

मैंने उन्हें धकेला और उनके चंगुल से निकल भागा .... जैसी ही मैं बड़े घर से निकल के बहार आय मुझे कोई आता हुआ दिखाई दिया| वो कोई और नहीं बल्कि रसिका भाभी का बेटा वरुण था जिसे छोड़ने कोई आदमी आया था| वो उसे मेरे पास छोड़के फटा-फट चला गया| साफ़ था की रसिका भाभी के घर और हमारे घरों के बीच सम्बन्ध भारत-पाकिस्तान जैसे थे| बस एक बात का फर्क था, रसिका भाभी के घर वाले जानते थे और मानते थे की खोट उनकी ही बेटी में है| पर इधर मेरा मिशन उल्टा पड़ चूका था| मेरा उनके विबाहित जीवन में सुख लाने का प्लान मेरी ही गांड में घुस गया था!!! मैं जानता हूँ की आप में से कई रीडर्स मुझे चु समझेंगे क्योंकि ऐसा मौका कोई हाथ से जाने नहीं देता! पर ये मेरा अपनी भौजी, जिन्हें मैं अपनी पत्नी मानता था उनके प्रति मेरा समर्पण था जो मुझे गिरने नहीं दे रहा था! अब वरुण से मैं इतना घुला-मिला नहीं था इसलिए वो मेरे साथ बिलकुल चुप-चाप खड़ा था| इतने में अंदर से रसिका भाभी निकलीं और वरुण को देख के खुश हो गई| मैं वहाँ से अपनी जान बचा के भागना चाहता था पर रसिका भाभी ने फिर मुझे पकड़ लिया;

रसिका भाभी: मानु जी... मुझे ना सही पर काम से काम अपने भतीजे को ही थोड़ा प्यार दे दो!

मैं: वरुण बेटा... चलो क्रिकेट खेलते हैं?

रसिका भाभी: हाय!!! जब आप बेटा बोलते हो तो मेरे दिल पे छुरियाँ चल जाती हैं! और उसके साथ क्रिकेट खलने को तैयार हो पर मेरे साथ नहीं, ऐसा भेद-भाव क्यों?

मैं: आपको जरा भी शर्म हया नहीं? अपने बेटे के सामने ऐसी बातें कर रहे हो!

रसिका भाभी बोलीं कुछ नहीं बस चोरों वाली हँसी हँस दी| मैं वरुण को अपने साथ ले के खेतों की ओर चल दिया क्योंकि अब वही सुरक्षित जगह बची थी मेरे लिए| मैं जानता था की मैं खुद पे सैयाम रख सकता हूँ पर अगर उन्होंने जबरदस्ती कुछ किया और किसी ने हमें देख लिया तो? रास्ते में मैं वरुण से बात करता रहा.. इससे एक तो मेरा ध्यान भाभी पे कम था और मैं वरुण को जानना भी चाहता था| जब हम खेत पहुंचे तो वरुण को देख के किसी के मुंख पे कोई ख़ुशी नहीं थी... अजय भैया का पारा तो चढ़ने लगा था| मैं किसी से कुछ नहीं बोला और वरुण को लेके घर वापस आ गया| मुझे बेचारे पे तरस आया और चूँकि अब नेहा नहीं थी तो मैंने सोचा की चलो कोई तो है मेरा दिल बहलाने के लिए! मैंने वरुण को लेके गाँव की छोटी सी दूकान की ओर चल दिया ओर वहाँ जाके उसे चॉकलेट दिलाई| वो बहुत खुश हो गया ओर मैंने प्यार से उसके सर पे हाथ फेरा| हम वापस घर आये तो खाने का समय हो चूका था| पर नाजाने क्यों आज मेरा खाने का मन बिलकुल नहीं था| जी बड़ा उचाट था! खाना रसियक भाभी ने पकाया था ओर सब बैठ के भोजन कर रहे थे ... मैंने अपना खाना भाभी से लिया और वरुण को अपने साथ लेके कुऐं की मुंडेर पे बैठ गया| वहाँ मैंने उसे अपने हाथ से खाना खिलाया और खाली थाली ले के धोने के लिए डाल दी| घरवालों के लिए मैंने खाना खा लिया था और खाना खाने के बाद सब खेत चले गए और मैं पेड़ के नीचे चारपाई डाले लेट गया| अब तक वरुण मेरे से थोड़ा खुल गया था और वो भी मेरे पास ही बैठ गया और अपने खिलौनों से खेलने लगा| मैं आँख बंद की और सोने लगा| पर नींद कहाँ... भौजी की बड़ी याद आ रही थी| अभी उन्हें गए कुछ घंटे ही हुए थे और मेरा ये हाल था! मन कर रहा था की उनके मायके धडधाता हुआ पहुँच जाऊँ और उन्हें गले लगा लूँ और सब के सामने उन्हें गोद में उठा के ले आऊँ| मेरा दायाँ हाथ सर के नीचे था और बायाँ हाथ मेरे सीने पे था और मैं आँख मूंदें सोने की कोशिश कर रहा था| इतने में मुझे रसिका भाभी के आने की आहात सुनाई दी| मैं झट से आँखें बंद कर ली और ऐसा दिखाया जैसे मैं सो रहा हूँ| भाभी मेरे पास आइन और वरुण को अपनी गोद में लेके चली गईं| मैं रहत की साँस ली पर ये रहत ज्यादा देर के लिए नहीं थी| भाभी फिर लौट के आईं, मैंने फिर से आँखें बंद कर ली| भाभी झुकी और मेरे लंड को सहलाने लगी| जैसे ही उनका हाथ मेरे लंड से स्पर्श हुआ मैं चौंक के उठ खड़ा हुआ;

मैं: आपकी हिम्मत कैसे हुई मुझे छूने की?

रसिका भाभी: हाय... तुम गुस्से में बहुत प्यारे लगते हो!

मैं: भाभी अब बहुत हो गया! मैं अब और बर्दाश्त नहीं करूँगा! अब अगर दुबारा आपने मेरे नजदीक आने की कोशिश की तो मैं भूल जाऊंगा की मेरे पिताजी ने मुझे संस्कार दिए हैं की अपने से बड़ों पे हाथ नहीं उठाते! (मैंने ऊँची आवाज में उन्हें साफ़ जता दिया की मैं ये सब आसानी से सहने वालों में से नहीं हूँ|)

रसिका भाभी: मुझे मार लो.. काट दो… चाहे मेरे टुकड़े-टुकड़े कर दो पर बस एक बार....एक बार मेरी प्यास बूझा दो!

मैं: कभी नहीं!!!

बस इतना कह के मैं वहाँ से चला आया और खेतों में सब के साथ काम करने लगा| करीब घंटे भर के अंदर सभी लोग खेत से वापस चल दिए, घर आये तो देखा वरुण रो रहा था! वो भागता हुआ आया और मुझसे लिपट गया| मैंने रसिका भाभी की ओर देखा तो वो गुस्से में तमतमा रहीं थी| लग रहा था जैसे मेरा सारा गुस्सा उस बेचारे पे निकाल दिया हो! मैंने वरुण को चुप कराया ओर उसे गोद में ले के बड़े घर गया ओर उसके कपडे जिन पर मिटटी लगी थी वो उतारने लगा| फिर मैं रसिका भाभी के कमरे में घुस ओर वरुण के कपडे निकाले औरजैसे ही मुड़ा पीछे भाभी खड़ी थीं|

मैं: (गरजते हुए) क्यों डाँटा उस बिचारे बच्चे को? मेरा गुस्सा उसी पे निकालना था?

रसिका भाभी: हाय! मेरे बेटे के लिए प्यार है... पर मेरे लिए नहीं? ऐसी बेरुखी मेरे साथ क्यों?

मैं: आप मेरे प्यार के लायक नहीं हो!

रसिका भाभी: तो किस लायक हूँ मैं?

मैं: नफरत के!!!

रसिका भाभी: तो नफरत ही कर लो मुझसे, मैं उसी को तुम्हारा प्यार समझ लूँगी|

मैं: अब बहुत हो गया... जाने दो मुझे|

रसिका भाभी ने दरवाजा अपने दोनों हाथों से रोक रखा था और मुझे जाने नहीं दे रहीं थी|

रसिका भाभी: एक शर्त पे जाने दूंगी...

मैं: कैसी शर्त?

रसिका भाभी: मुझे तुम्हारा वो (मेरे लैंड की ओर इशारा करते हुए) एक बार देखना है|

मैं: (गरजते हुए) क्या? मुझे मजबूर मत करो हाथ उठाने के लिए ...

रसिका भाभी: तो मैं नहीं हटने वाली|

मैं कुछ नहीं बोला और अपने आप को अंदर ही अंदर रोकता रहा की मैं उन पर हाथ न उठाउँ| इतने में किसी के आने की आहट हुई और रसिका भाभी एक दम से पीछे घूमीं ... उनका बयां हाथ दरवाजे की चौखट से हटा और मैंने सोचा की मैं इसी का फायदा उठा के निकला जाता हूँ| जैसे ही मैं उनके नजदीक पहुंचा उन्होंने अपना हाथ फिर चौखट पे रख दिया और बायीं और झुक गईं| मेरे और उनके होठों के बीच बहुत काम फासला था| ऊपर से मुझे इतने नजदीक से भाभी के स्तनों के बीच की घाटी दिखने लगी थी| उनके वो सफ़ेद-सफ़ेद स्तन देख के दिमाग चक्र गया पर फिर अपने आप को संभाला और मैं पीछे हुआ ... तभी भाभी ने अपने दायें हाथ से फिर मेरे लंड को अपने हाथ से पकड़ लिया और मैं छिटक के पीछे हुआ|

मैं: बहुत हो गया अब...

रसिका भाभी: (मेरी बात काटते हुए) हाय! अभी बहुत हुआ कहाँ... अभी तो बहुत कुछ बाकी है!!!

अब मेरे सब्र का बांध टूट गया और मैंने एक जोरदार तमाचा उनके बाएं गाल पे जड़ दिया| भाभी का बैलेंस बिगड़ा और वो चारपाई का सहारा ले के नीचे बैठ गईं| आज पहली बार मैंने किसी औरत पे हाथ उठाया था... पर शायद वो उसी के लायक थी;

मैं: (झिड़कते हुए) खबरदार जो मेरे आस-पास भटके!

मैं हैरान था की उनके माथे पे एक शिकन तक नहीं पड़ी थीं बल्कि वो तो हँस रही थी| मैं वहाँ से गुस्से में तमतमाता हुआ बहार आ गया| वरुण को मैंने बहार दरवाजे से पुकारा और उसे रसोई के पास छप्पर के नीचे बिठा के उसके कपडे बदले| इतने में अजय भैया आये और वरुण को देख के उनका गुस्सा और भड़क गया| वो पाँव पटकते हुए रसिका भाभी से लड़ने के इरादा लिए बड़े घर की ओर चल दिए| जहाँ शायद वो अब भी उसी तरह नीचे बैठी थीं| मेरा दिमाग कह रहा था की तुझे कोई जर्रूरत नहीं उनके बीच में पड़ने की औरभाभी को उनके किये की सजा तो मिलनी ही चाहिए! पर मन बेचैन हो रहा था और रह-रह के मन कर रहा था की मैं भैया को भाभी की पिटाई करने से रोकूँ| अंदर ही अंदर मेरा भाभी पे हाथ उठाना मुझे सही नहीं लग रहा था| मैं अंदर ही अंदर घुटने लगा था... अपने आप को कोस रहा था| कुछ ही देर में मुझे भैया-भाभी के जोर-जोर से लड़ने की आवाज आने लगी| मैं खुद को नहीं रोक पाया और जल्दी से बड़े घर की ओर भागा| अंदर का नजारा दर्दनाक था... अजय भैया के हाथ में बांस का डंडा था जिससे वो कम से कम एक बार तो भाभी की पीठ सेंक ही चुके होंगे क्योंकि भाभी फर्श पे पड़ी करहा रही थी ओर जल बिन मछली की तरह फड़-फड़ा रही थी| जब तक मैं भैया को रोकता उन्होंने एक और डंडा भाभी को दे मारा! मैंने लपक के भैया के हाथ से डंडा छुड़ाया और भैया को खींच के बहार ले गया| इतने में पिताजी भी दौड़े, अब चूँकि भाभी फर्श पे पड़ीं थी और ऐसा लग रहा था जैसे वो होश में नहीं हैं और ऊपर से उनके सर पे घूँघट नहीं था और उनका नंगा पेट साफ़ झलक रहा था इसलिए मैंने खुद को परदे की तरह उनके सामने कर दिया ताकि किसी को अंदर का हाल न दिखे| इतना अवश्य दिख रहा था की कोई फर्श पे पड़ा है ... पिताजी ने जब इतना दृश्य देखा तो वो अजय भैया को गुस्से में पकड़ के बहार ले गए| मुझे लगा की शायद माँ या बड़की अम्मा कोई तो आएंगे पर कोई नहीं आया|

जिस इंसान पे थोड़ी देर पहले मुझे गुस्सा आ रहा था अब उस पे दया आने लगी थी| मैंने आगे बढ़ के उन्हें सहारा दे कर चारपाई पर लेटाया और वो किसी लाश की तरह दिख रहीं थी| दिमाग कह रहा था की दो डंडे खाने से कोई नहीं मरता पर फिर भी अपने मन की तसल्ली के लिए मैंने उनकी नाक के आगे ऊँगली रख के सुनिश्चित किया की वो साँस ले रहीं है| मैंने उन्हें हिला के होश में लाने की कोशिश की पर वो नहीं उठी| फिर मैं स्नान घर से पानी ले कर आय और उनके मुँह पे छिड़का तब जाके वो हिलीं और होश में आते ही मुझसे लिपट गईं और मुझे अपने ऊपर खींच लिया| मेरा बैलेंस बिगड़ा और मैं सीधा उनके ऊपर जा गिरा| मेरा मुँह सीधा उनके स्तनों के ऊपर था और भाभी का दबाव मेरी गर्दन पे इतना ज्यादा था की एक पल के लिए लगा मैं साँस ही नहीं ले पाउँगा| मैंने अपने आप को उनसे छुड़ाया और छिटक के दूर दिवार से लग के खड़ा हुआ और अपनी सांसें ठीक की| अब उनका करहना और रोना-धोना शुरू हो गया| मेरा दिल फिर पिघल गया और मैं उनके लिए पेनकिलर ले आया और उनकी ओर दवाई का पत्ता बढ़ा दिया| वो बोलीं; "मेरी पीठ बहुत दुःख रही है... दवाई लगा दो ना?" जिस तरह से वो बोल रहीं थीं उससे लग रहा था की जैसे वो मुझे seduce कर रही हो| मैंने अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाये और कहा; "अभ आता हूँ|" मैं बहार गया ओर अपने साथ वरुण को ले आया| अब वरुण को देख के भाभी के तोते उड़ गए! और मुझे बहुत हँसी आई ...

रसिका भाभी: मुझे इस तरह तड़पता देख के तुम्हें बहुत हँसी आ रही है|

मैं: हाँ... (बड़े गंभीर स्वर में)

रसिका भाभी: तुम ऊपर से चाहे कितना ही दिखाओ की तुम मुझसे बहुत नफरत करते हो पर अंदर से तुम मुझसे प्यार करते हो|

मैं: ये आपका वहम् है| मैं आपसे कटाई प्यार नहीं करता और न ही कभी करूँगा| आपको एक बात समझ नहीं आती... अजय भैया मेरे "भैया" हैं! और आप उनकी पत्नी आपके मन में ये गन्दा ख्याल आया ही कैसे?

रसिका भाभी: पहली बात तो ये की तुम उनके चचेरे भाई हो .. सगे नहीं और अगर होते भी तो मुझे क्या फर्क पड़ना था| और दूसरी बात ये की जब कामवासना की आग किसी के तन-बदन में लगी हो तो वो किसी भी रिश्ते की मर्यादा नहीं देखता|

मैं: छी..छी... आप बहुत गंदे हो! मुझे आपसे कोई बात नहीं करनी|

मैं वहाँ से जाने लगा... तभी मुझे याद आया की ये घायल शेरनी है और ये मेरा गुस्सा फिर से अपने बच्चे पे ना निकाले इसलिए मैं जाते-जाते उन्हें हिदायत दे गया;

मैं: वरुण बेटा आप मम्मी को दवाई लगा के ये गोली खिला देना और फिर मेरे पास आ जाना| और हाँ आप (रसिका भाभी) अगर आपने वरुण पे हाथ उठाया तो .... सोच लेना!!!

मैंने उन्हें बिना सर-पैर की धमकी दे डाली थी पर मैं अब भी डर रहा था की कहीं ये शेरनी अपने ही बच्चे को पंजा मार के घायल ना कर दे| पर शुक्र है भगवान का की ऐसा कुछ नहीं हुआ|

अंधेरा हो रहा था और इधर मुझे अपने ही शरीर से रसिका भाभी की बू आ रही थी! बार-बार उनका मेरे लंड को पकड़ना याद आने लगा था| ऐसा लग रहा था जैसे अभी भी मेरा लंड उनकी गिरफ्त में है| इस वहम् से बहार निकलने का एक ही तरीका था की मैं स्नान कर लूँ| पर इतनी रात को ...हैंडपंप के ठन्डे पानी से.... वो भी नंगा हो के? अब मैं बड़े घर में जाके नहीं नहा सकता था क्योंकी वहाँ रसिका भाभी जीभ निकाले मेरा लंड देखने को तैयार लेटी थीं| और अगर वो ये नजारा देख लेटी तो मुझ पे झपट पड़ती और मेरी मर्जी के खिलाफ वो सब करने की कोशिश करती| वो सफल तो नहीं होती पर पर उनका मेरे शरीर को छूना.... वो मुझे फिर से उसी मानसिक स्थिति में डाल देता जिससे भौजी ने मुझे बाहर निकला था| मैं पहले चन्दर भैया के पास गया;

मैं: भैया मुझे नहाना है तो क्या मैं आपके घर में नहा लूँ?

चन्दर भैया: मानु भैया, घर आपका है कहीं भी नहाओ पर इतनी रात को नहाना सही नहीं| ठण्ड लग जायेगी... वैसे भी ठंडी हवा तो चल रही है, क्या जर्रूरत है नहाने की?

मैं: भैया मन थोड़ा उदास है, नहाऊंगा तो थोड़ा तारो-ताजा महसूस करूँगा|

चन्दर भैया: अपनी भौजी को याद कर के उदास हो रहे हो?

मैं: नहीं... पर नेहा की बहुत याद आ रही है|

चन्दर भैया: मुझे तो लगा की आप अपनी भौजी को याद कर रहे होगे... पर ठीक है जैसी आप की मर्जी|

अब उनकी ये डबल मीनिंग बात का मतलब मैं समझ चूका था पर मैंने इस बात को कुरेदा नहीं| मैं बाल्टी में पानी लिए भौजी के घर में घुसा और स्नानघर मैं बाल्टी रख के अपने कपडे उतारने लगा| आँगन में राखी चारपाई को बार-बार देख के लगता था जैसे भौजी वहीँ बैठी हैं और अभी उठ के मेरे गले लग जाएँगी| जब मैंने अपनी टी-शर्ट उतारी तो अपने निप्प्लेस को देखा जिन पर भौजी ने एक दिन पहले कटा था और चूस-चाट के उसे लाल कर दिया था| मैं आँखें बंद किये वही मंजर याद करने लगा और मेरे रोंगटे खड़े हो गए! हमेशा नहाने में मुझे दस मिनट से ज्यादा समय नहीं लगता था पर आज मुझे आधा घंटा लगा, क्योंकी आज नहाते हुए मैं उन सभी हंसी लम्हों को याद करता रहा| साथ ही साथ मैंने खुद को इतना रगड़ के साफ़ किया जैसे मैं एक सदी से नहीं नहाया हूँ... क्योंकी मैं चाहता था की मेरे शरीर से रसिका भाभी की बू जल्द से जल्द निकल जाए| ठन्डे-ठन्डे पानी से नहाने के बाद अब बारी थी कुछ खाने की क्योंकी सुबह से मैं कुछ नहीं खाया था ... पर हाय रे मेरी किस्मत जब मैं रसोई पहुँचा तो वहाँ रसिका भाभी बैठी रोटी सेंक रही थी| अब ना जाने क्यों मेरे अंदर गुस्से की आग फिर भड़की और मैं मुँह बना के वापस चारपाई पे लेट गया| पता नहीं क्यों पर मेरी इच्छा नहीं हो रही थी की उनके हाथ का बना हुआ खाना खाऊँ!


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अब आगे...

वरुण मेरे पास बैठ गया और हाथ से है जहाज बनाके उड़ाने लगा| उसे खुश देख के मन को थोड़ी तसल्ली हुई.. जब खाना बन गया तब मैं खाना लेने रसोई तो गया और अपना खाना ले के वापस अपनी चारपाई पे आया पर खुद ना खाके मैंने सारा खाना वरुण को खिला दिया| अब मैं वापस भूखे पेट सोने लगा और वरुण भी मुझसे चिपक के सो गया| ये पहलीबार था जब मैं बिना कहानी सुनाये सो रहा था, पर एक अजब सी ख़ुशी थी मन में... वो ये की आज दिन भर में जो भी हुआ ... वो अब मेरे शरीर के किसी भी भाग को विचिलित नहीं करेगा| मन साफ़ है और खुश है, बस कमी है तो बस भौजी की! पता नहीं कब पर मुझे नींद आ ही गई... और मैं एक सपना देखने लगा| सपने में मेरे और भौजी के आलावा और कोई नहीं था| हम हाथ में हाथ डाले फूलों से लैह-लहाते बाग़ में घूम रहे थे| नंगे पाँव... घांस में पड़ी ओस की बूँदें पाँव को गीला कर रहीं थी| भौजी बहुत खुश थीं और मैं भी... फिर अचानक से भौजी के पाँव में एक काँटा चुभ गया और वो लँगड़ाने लगीं|, मैं नीचे बैठ के उनके पाँव से कांटा निकालने लगा और फिर भौजी वहीँ बैठ गईं| मैंने उनकी गोद में सर रख लिया और उन्होंने उसी स्थिति में झुक के मेरे होठों पे अपने थिरकते हुए होंठ रख दिए और हम एक दूसरे के होठों का रसपान करने लगे| भौजी मुझे Kiss कर रहीं थीं और तभी अचानक उन्होंने अपना हाथ सरकाते हुए मेरे गले से लेकर लंड तक हाथ घुमाया और मेरा लंड पकड़ लिया| जैसे ही उन्होंने मेरा लंड पकड़ा मेरा सपना टूटा और मैं उठ के बैठ गया| मेरे सामने रसिका भाभी थीं जिनका हाथ मेरे लंड पे था और मेरे सपने में जो कुछ हुआ वो रसिका भाभी मेरे साथ कर रहीं थी सिवाय उस चुम्बन के जो सपने में मेरे और भौजी के बीच हुआ था! अब मैं अगर चिल्लाता तो शोर मचता और बवाल खड़ा होता| मैंने दबी हुई आवाज में आँखें दिखाते हुए रसिका भाभी को डराया;

मैं: ये क्या बेहूदगी है? मैंने मन किया था न मेरे आस-पास मत भटकना?

रसिका भाभी: अब तो तुमने मुझे पीट भी लिया अब तो पूरी कर दो मेरी ख्वाइश?

मैं: आप जाओ यहाँ से... कोई देख लेगा तो… आपकी इजात का तो कुछ नहीं पर मेरी मट्टी-पलीत हो जाएगी|

रसिका भाभी: ना..मैं नहीं जाउंगी जब तक तुम मुझे अपना ये (मेरा लंड) नहीं दिखते!

मैं: आपका दिमाग ख़राब हो गया है! आप मत जाओ मैं यहाँ से जा रहा हूँ!

जैसे ही मैं उठ के खड़ा हुआ तो देखा वरुण मेरी बगल में नहीं था, यानी पहले भाभी उसे उठा के ले गईं और दूसरी चारपाई पे सुला दिया और फिर खुद आके मेरे साथ बदतमीजी करने लगी| भाभी ने मेरा हाथ जकड लिया और मुझे इतनी जोर से खींचा की मैं वापस चारपाई पे आ गिरा| सच में बहुत ताकत थी उनमें... पर दिखने में तो छुइ-मुई सी थी!

रसिका भाभी: तुम कहनी नहीं जाओगे जब तक मैं तुम्हारा वो नहीं देख लेती|

मैं: छोड़ दो... वरना मैं चिल्लाउंगा!!

रसिका भाभी: चिल्लाओ... बदनामी तुम्हारी ही होगी| मैं कह दूंगी की तुम मेरे साथ जबरदस्ती कर रहे थे|

मैं: आप तो सच में बहुत कमीनी निकली! मुझे ब्लैकमेल कर रहे हो?

रसिका भाभी: जिस आग में मैं जल रही हूँ उसे बुझाने के लिए उझे जो भी करना पड़े मैं करुँगी|

मैं: ठीक है... पर अब मेरा हाथ छोडो और, मुझसे थोड़ा दूर हटो!

मैंने सोच लिया था की चाहे जो हो जाए मैं वो कभी नहीं करूँगा जो ये चाहती हैं| मुझे अब उनसे घिन्न होने लगी थी| मैं झट से उठा और भाग के पिताजी की चारपाई के पास आ गया| पिताजी पीठ के बल लेटे थे और मैं ठीक उनके सामने खड़ा हो गया| अगर जरा सी भी आवाज होती और पिताजी की आँख खुलती तो उन्हें सबसे पहले मैं दिखता| भाभी का मुँह सड़ गया और मेरे दिल को चैन आया| पर भाभी इतनी ढीठ थीं की अभी भी मेरी चारपाई से गईं नहीं और उसी चारपाई पे बड़े आराम से बैठ गईं| ऐसा लग रहा था मानो मुझे चिढ़ा रहीं हो की बच्चू कभी न कभी तो आओगे ही अपनी चारपाई पे सोने| मैं उनसे भी ढीठ था.. मैं पिताजी की बगल में लेटने लगा| जैसे ही मैं चारपाई पे बैठा तो पिताजी की आँख खुल गई;

पिताजी: क्या हुआ?

मैं: जी.. नींद नहीं आ रही थी... तो आपके पास आगया|

पिताजी थोड़ा एडजस्ट हुए और मैं उनकी ही बगल में लेट गया| जगह काम थी पर कम से कम अपनी इज्जत तो लूटने से बचा ली मैंने!!! अब भाभी का पारा चढ़ गया होगा!!! अगली सुबह तो और भी मुसीबतों वाली थी!!! सुबह मैं सब के साथ ही उठा और दुबारा रगड़-रगड़ के नहाया क्योंकी मुझे अपने बदन से रसिका भाभी की बू जो छुडानी थी| किस्मत अब भी चैन नहीं ले रही थी और मुझे तंग किये जा रही थी| चाय भी रसिका भाभी ने बनाई थी जो पीना मेरे लिए मानो जहर पीना था| चाय तो मैं ले के खेतों की ओर गया ओर फेंक दी| आजका प्लान बिलकुल साफ़ था... घरवालों की आड़ में रहो तो इज्जत बची रहेगी| पिताजी और बड़के दादा खेत जाने के लिए तैयार थे मैं उन्हीं के पास बैठ गया| तभी वहाँ सर पे पल्ला किये माँ और बड़की अम्मा आ गए|

माँ: क्यों भई लाड साहब, रात को बड़ा प्यार आ रहा था अपने पिताजी पर जो उनके साथ सोया था|

मैं: जी ... नींद नहीं आ रही थी इसलिए ....

माँ: हाँ..हाँ.. जानती हूँ|

मैं: अब आप लोगों की मदद खेतों में करूँगा तो नींद जबरदस्त आएगी|

बड़के दादा: हाँ मुन्ना... अजय और चन्दर तो आज लखनऊ जा रहे हैं|

मैं: किस लिए?

बड़के दादा: वो मुन्ना ... एक पुराना केस है उसके लिए|

मैं: केस?

बड़के दादा: हाँ बेटा तुम्हारे दादा की एक जमीन थी जिस पे कुछ लोगों ने कब्ज़ा कर लिया था|

खेर बातें ख़त्म हुईं और हम खेतों में चले गए| मैं काम कर रहा था पर ध्यान अब भी भौजी पे लगा हुआ था| हाथ में हंसिया लिए फसल काट रहा था और ना जानने कब हंसिए से मेरा हाथ काट गया मुझे पता ही नहीं चला| मेरी हथेली की जो सबसे बड़े रेखा थी वो कट गई और खून निकलने लगा| मेरा उस पे ध्यान ही नहीं गया.. जब माँ घर से पानी लेके आईं तब उन्होंने खून देखा और तब जाके कहीं मेरा ध्यान हाथ पे गया| मैंने रुमाल निकला और ऐसे ही बांध लिया और वापस काम पे लग गया| खेत में बस पिताजी, बड़की अम्मा, मैं और माँ ही थे| चन्दर भैया और अजय भैया लखनऊ के लिए निकल चुके थे| तभी अचानक से वरुण भागता हुआ आया;

वरुण: चाचा ...चाचा ... माँ ने आपको बुलाया है|

मैं: क्यों?

वरुण: टांड से एक गठरी उतारनी है|

मैं जानता था की उन्हिएँ कोई गठरी नहीं उतरवानी बस अपनी कमर की गठरी खोल के दिखानी है! मैं वरुण से साफ़ मन कर दिया और कह दिया की बाद में उतार दूँगा| वरुण जवाब सुनके चला गया... और पांच मिनट में ही भागता हुआ फिर आया;

वरुण: चाचा, माँ कह रही है की गठरी में कुछ कपडे हैं जो उन्हीने "सी" ने हैं|

मैं: कहा ना बाद में उतार दूँगा अभी काम करने दो!

पिताजी: जाके उतार क्यों नहीं देता गठरी| क्यों बार-बार बच्चे को धुप में भगा रहा है?

मैं: जी ... जाता हूँ|

अब मैं घर पहुँचा तो भाभी कुऐं के पास मेरा बेसब्री से इन्तेजार कर रही थी| मुझे लगा की ये कल रात का बदला जर्रूर लेगी मुझसे|

पर हुआ कुछ अलग ही;

रसिका भाभी: कल रात जो हुआ उसके लिए मुझे माफ़ कर दो! मैं हाथ जोड़के तुमसे माफ़ी मांगती हूँ!

मैं हैरान हो गया की अचानक से ये इतने प्यार से कैसे बात कर रही है| इतनी जल्दी इसका हृदय परिवर्तन कैसे हो गया| कुछ तो गड़बड़ है!

रसिका भाभी: प्लीज मुझे माफ़ कर दो!

मैं बोला कुछ नहीं बस हाँ में गर्दन हिला दी और उन्हें लगा की मैंने उन्हें माफ़ कर दिया| मैं अब भी उनकी पहुँच से दूर था क्योंकी दिल को लग रहा था की ये लपक के कहीं फिर से तुझे जकड न ले|

रसिका भाभी: अच्छा तो अब हम दोस्त हैं ना?

मैं फिर कुछ नहीं बोला बस हाँ में सर हिला दिया|

रसिका भाभी: तो मेरी मदद करोगे?

मैं: कैसी मदद?

रसिका भाभी: मेरे कमरे में सीढ़ी लगा के टांड से एक गठरी उतार दो| 

अब मैंने “सविता भाभी कॉमिक्स का एपिसोड 2” देखा था| इसलिए मैं सचेत था की जब मैं सीढ़ी पे चढ़ा हूँ तब ये मेरा लंड हमेशा पकड़ लेगी और उस हालत में अगर मेरा बैलेंस बिगड़ा तो मैं सीधा जमीन पे गिरूंगा और हड्डी टूटेगी ही| और अगर मैं बेहोश हो गया तो ये मेरा फायदा अवश्य उठाएगी| मैं सीढ़ी ले के उनके कमरे में पहुँचा और टांड से सीढ़ी लगा दी| इतने में भाभी आई और मुझे लगा की अब ये कहेगी की तुम सीढ़ी पर चङो मैं सीढ़ी पकड़ती हूँ और जैसे हे मैं ऊपर चढूंगा ये फिर मुझसे छेड़खानी करेंगी| पर भाभी मेरे पास आईं और मुझे टांड पे रखी गठरी दिखाई और उसे उतारने के लिए कहा और बाहर आँगन में चली गईं| मैं हैरान था की इतनी जल्दी ये लोमड़ी सुधर कैसे गई? खेर मैं सीढ़ी पर चढ़ा और गठरी को छूने की कोशिश करने लगा| गठरी मेरी पहुँच से थोड़ा दूर थी| मैंने बहुत कोशिश की परन्तु मेरा हाथ नहीं पहुँचा फिर मैंने अपनी बीच वाली ऊँगली से उसे खींचा परन्तु असफल रहा| मैं कोसिशकर रहा था तभी अचानक वो हुआ जिसका मुझे डर था| भाभी ने अचानक से मेरा लंड सामने से पकड़ा और एक झटके में मेरा पाजामा खेंच के नीचे कर दिया| पाजामा नीचे गिरते ही मेरा लंड उनके सामने था| इधर मेरा हाथ गठरी तक पहुँच गया था| जैसे ही भाभी ने मेरा पाजामा खींचा मैंने गठरी खेंची और वो धड़ाम से नीचे गिरी और मैं सीढ़ी से कूद पड़ा और अपना पजामा ठीक किया| मैंने एक लात सीढ़ी में मारी और वो जाके दूसरी दिवार से जा लगी| अब मैं एक दम से भाभी पे चढ़ गया और खींच के दो लाफ़े उनके गाल पे जड़ दिए| 



पर हैरानी की बात ये थी की भाभी को कोई फर्क ही नहीं पड़ा था हँस रही थी! वो बहुत तेजी से खिलखिला के हँसी... मैं हैरानी से कुछ पल उन्हें घूरता रहा जैसे मैं जानना चाहता था की आखिर इन्हें हुआ क्या है| मैं मुड़ के जाने लगा तो वो बोलीं; "मज़ा आ गया मानु जी...!!!" एक पल के लिए मेरा दिमाग जैसे सन्न रह गया| भला ये कैसी औरत है जो दो लाफ़े खा के भी खुश है और कह रही है की मज़ा आ गया| मैं वहां से वापस खेत भाग आया, पर अब मुझे एक जाइब सा डर लगने लगा था| पर मेरी मुसीबतें तो अभी शुरू ही हुईं थी| मैं यूँ तो खेत में बैठा काम कर रहा था परन्तु मन मेरा बैचैनी से पागल हुआ जा रहा था| दिल भौजी को याद कर रहा था... दिमाग रसिका भाभी से सहमा हुआ था और मन तो जैसे बावला हो रहा था| तभी अचानक पिताजी का फ़ोन बज उठा| फ़ोन चन्दर भैया ने किया था, उन्हें कोर्ट कचहरी के काम के कारन कुछ दिन और रुकना था लुक्खनऊ में| खेर भोजन का समय हुआ तो सब घर वापस आ गए| घर आके बड़की अम्मा ने भाभी को बताया की अजय भैया कुछ दिन और नहीं आएंगे तो भाभी की बाँछें खिल गेन| वही कटीली मुस्कान उनके होंठों पे लौट आई| ये सब वो मेरी ओर देख के कर रहीं थीं| हमेशा की तरह मैंने अपना खाना लिया और वरुण को अपने साथ बिठा के सब खिला दिया| खाने के उपरान्त सब वापस जाने को हुए तभी एक और बिजली गिरी| दुबारा फ़ोन बजा, परन्तु इस बार बड़के दादा का| ये फ़ोन मां जी के घर से आया था| बात ख़ुशी की थी, वो दादा बन गए थे|

उन्होंने सब को अपने घर पे आमंत्रित किया था| परन्तु खेतों में कटाई बाकी थी इसलिए बड़के दादा ने कह दिया की वो नहीं आ पाएंगे| अब घर पे काम से काम दो लोगों को रहना था, और बड़की अम्मा और बड़के दादा दोनों तैयार थे| अब मेरा मन तो वैसे ही भौजी के बिना अशांत था और मैं वहां जाना भी नहीं चाहता था| इसलिए मैंने कहा की मैं यहीं रह के बड़के दादा के पास रह के खेत की कटाई में मदद करूँगा| बड़के दादा ने मन किया पर पिताजी के जोर देने पर वो मान गए| दरअसल बड़के दादा चाहते थे की मैं थोड़ा घूमूं -फिरूँ पर उन्हें क्या पता मेरी मनोदशा क्या थी| मैं अंदर ही अंदर खुश था की कम से कम भाभी घर में नहीं होंगी तो कुछ तो चैन मिलेगा|

लेकिन एक बार फिर उन्होंने अपना तुरुक का इक्का फेंका;

रसिका भाभी: काका (मेरे पिताजी) मेरी तबियत कुछ ठीक नहीं है| और फिर इतने दिनों बाद वरुण आया है तो आप बड़की अम्मा को साथ ले जाइये मैंने यहाँ खाना वगेरह संभाल लुंगी|

बड़की अम्मा: नहीं बहु .... तुम आराम करो| मैं देख लूंगी सब|

रसिका भाभी: अम्मा आप वैसे भी कहीं बहार नहीं जाते... और पिछली बार आप मामा के घर साल भर पहले गए थे.

पिताजी: हाँ भाभी... आप चलो ये संभाल लेगी और फिर हुमक-दो दिन में आ ही जायेंगे|

तब जाके बड़की अम्मा मानी पर इधर मुझे अंदर-ही-अंदर गुस्सा भी आ रहा था और डर भी लग रहा था| सभी जल्दी तैयार होक निकल गए और अब घर पे केवल हम चार लोग रह गए थे; मैं. बड़के दादा, वरुण और रसिका भाभी| मैं बड़के दादा के साथ काम में जुट गया| कुछ देर बाद भाभी भी आ गईं और मेरे पास ही बैठ के कटाई करने लगी| वरुण भी अपने नन्हे-नन्हे हाथों से मदद करने लगा| पर बड़के दादा के चेहरे पर कोई भाव नहीं थे| वो बस काम में लगे हुए थे, और इधर भाभी धीरे-धीरे मेरे नजदीक आ रहीं थीं| जब वो मेरे कुछ ज्यादा नजदीक आ गईं तो मैं उठ के दूसरी तरफ जाने लगा, तभी उन्होंने जानबूझ के मुझ से पूछा; "मानु जी... कहाँ जा रहे हो?" मैं कुछ नहीं बोला| तभी बड़के दादा ने पूछा; "अरे मुन्ना वहाँ कहाँ जा रहे हो?" अब वो चूँकि मेरे बड़े थे तो उनकी बात का जवाब देना जर्रुरी था; "जी मैं बाथरूम जा रहा हूँ|" अब बाथरूम किसे आया था? मैं कुछ दूरी पे दूसरे खेत की ओर मुंह करके ऐसे खड़ा हो गया जैसे मूट आ रहा हो| पर मूता नहीं... कुछ देर बाद वापस आया ओर बड़के दादा के पास ही बैठ के कटाई चालु कर दी| जब अँधेरा होने लगा तो हम वापस घर आ गए|घर लौट के सबसे पहले तो मेरा नहाने का मन था| क्योंकि रसिका भाभी ने मुझे दोपहर में जो छुआ था| पर दिक्कत ये थी की चन्दर भैया का घर लॉक था औरउसकी चाभी रसिका भाभी के पास थी| अब मैं उनके सामने नहीं जान चाहता था इसलिए मैं बड़े घर ही चला गया स्नान करने| बड़के दादा ने मुझे बाल्टी में पानी ले जाते हुए देखा तो पूछा;

बड़के दादा: मुन्ना इस पानी का क्या करोगे?

मैं: जी नहाने जा रहा हूँ|

बड़के दादा: अरे मुन्ना बीमार पद जाओगे| मौसम ठंडा है और ऊपर से पानी बहुत ठंडा है|

मैं: नहीं दादा थकावट उतर जाएगी|

बड़के दादा: बेटा इसीलिए मैं कह रहा था की तुम चले जाओ, अब यहाँ रह के तुम खेतों में काम करोगे तो थक तो जाओगे ही|

मैं: नहीं दादा... आदत पड़ जाएगी| (मैं मुस्कुरा के नहाने चल दिया|)

पानी वाकई में बहुत ठंडा था, और ऊपर से जैसे ही मैंने सारे कपडे उतारे और पहला लोटा पानी का डाला तो मेरी कंपकंपी छूट गई| किसी तरह मैं रगड़-रगड़ के नहाया ताकि रसिका भाभी की महक छुड़ा सकूँ| नह के काँपता हुआ मैं बहार आया और छापर के नीचे एक चादर ले के लेट गया| रात को जब खाना बना तो मैंने अपना वही पुराण तरीका अपनाया और बर्तन रख के हाथ धोके आया|


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अब आगे...

तब भाभी ने अपनी दूसरी चाल चली;

रसिका भाभी: पिताजी (बड़के दादा) रात को मैं साउंगी कहाँ?

बड़के दादा: क्यों? तुम बड़े घर में सो जाना, हमेशा वहीँ तो सोती हो तुम|

रसिका भाभी: वो पिताजी ... आज तो घर में हम तीन ही हैं| मुझे वहाँ अकेले सोने में डर लगता है| ऐसा कीजिये आप यहाँ रसोई के पास सो जाइये और मैं, वरुण और मानु जी बड़े घर में सो जाते हैं|

बड़के दादा: जैसे तुम ठीक समझो|

अब भाभी की बात सुन के मेरी आँखें खुली की खुली रह गईं| मैं तो जैसे पलक झपकना ही भूल गया| कैसी औरत है ये जो अपने ही ससुर से कह रही है की उसे मेरे साथ सोना है? अब बड़के दादा तो रसोई के पास अपनी चारपाई पे लेट गए| अब मुझे और रसिका भाभी को बड़े घर में सोना था...वो भी अकेले!! अब मैं अपनी चारपाई खींच के स्नान घर के पास ले गया और भाभी की चारपाई प्रमुख दरवाजे से कुछ बारह कदम दूरी पर थी| मेरी और भाभी की चारपाई में करीब पंद्रह फुट की दूरी थी| अब मैं लेट गया पर नींद नहीं आ रही थी| पिछले दो-तीन दिनों से मैंने रसिका भाभी के हाथ का बना कुछ भी नहीं खाया था| एक बस चाय का सहारा था जो बड़की अम्मा सुबह-शाम बनाया करती थीं, पर आज तो वो भी नहीं मिली क्योंकि अम्मा चलीं गई थी| इसलिए आज पेट बिलकुल खाली था और ऊपर से जो मैं ठन्डे पानी से नहाया था तो शरीर ठण्ड से काँप अलग रह था|

मैं आँख बंद किये सीधा लेटा था और दायें हाथ से अपनी आँखों को ढक रखा था| आँखें बंद किये भौजी को याद कर रहा था... सोच रहा था की अगर वो यहाँ होती तो हम कितनी बातें करते... नेहा की भी याद आ रही थी| मेरी बगल में ही वरुण लेटा था, मैंने उससे कहा की "बेटा आप आज मम्मी के पास सो जाओ"| ताकि आज भाभी उसे उठाने के बहाने फिर मुझसे छेड़खानी ना करें| पर मेरी बात भाभी ने आगे खुद ही पूरी कर दी; "बेटा आओ मेरे पास सो जाओ| चाचा को आराम से सोने दो|" शायद वो मुझे खुश करने के लिए कह रहीं हो पर मैंने उन्हें जरा भी तूल नहीं दी| मैं फिर अपने ख्यालों में डूब गया .... भौजी को याद करके मन थोड़ा खुश हुआ| वो उनका हर बार जिद्द करना...मुझसे नाराज होना... और जब वो टूटी-फूटी अंग्रेजी बोला करती थीं वो सब मुझे बहुत याद आ रहा था| खड़ी की सुइयाँ तेजी से भागने लॉगिन और रात के करीब दो बजे होंगे, जब मुझपे उस घायल शेरनी ने हमला किया| मैंने एक चादर ओढ़ रखी थी, जिसे एक झटके में भाभी ने खींच लिया और इससे पहले मैं कोई प्रतिक्रिया करता वो मेरे ऊपर लेट गेन... वो भी नंगी! उनके शरीर पे कपडे का एक टुकड़ा भी नहीं था| एक दम से उन्होंने मेरे दोनों हाथों को अपने हाथों से पकड़ लिया, पता नहीं उनमें इतनी ताकत कहाँ से आ जाती थी| मैं खुद को छुड़ाने की भरपूर कोशिश करने लगा पर कोई फायदा नहीं था| वो मुझे Kiss करने की कोशिश करने लगीं और मैं बार-बार अपना मुँह इधर-उधर घुमा लेता था|

अब अगर मैंने भाभी की वो कातिल जवानी की तारीफ नहीं की तो आप लोग मुझे ही गालियां दोगे| पर मैं बता दूँ ये तारीफ सिर्फ आपके लिए है, मेरे लिए ये बस एक जब्बर्दस्ती का काम है जो मैं सिर्फ आपके लिए कर रहा हूँ|

एक दम गोरा बदन .... दूध से सफ़ेद उनके बूब्स*.... भूरे रंग के निप्पल.... बालों का जुड़ा बना हुआ.... चूत पे बालों का घना जंगल जो मुझे बिलकुल पसंद नहीं है| छत्तीस की कमर और मुलायम टांगें तो मेरे पाँव से रगड़ खा रहीं थी|

(मैं बूब्स और चूत जैसे शब्द का प्रयोग केवल और केवल रसिका भाभी के लिए कर रहा हूँ| मैं इसका प्रयोग कभी भी भौजी के लिए नहीं करूँगा| क्योंकि जो मजा "स्तन" या "योनि" कहने में है वो बूब्स कहने में नहीं!"

तो सीन ये था की भाभी मुझे बेतहाशा चूमने की कोशिश कर रहीं थीं पर चूँकि उनके हाथ मेरे हाथों को रोकने में व्यस्त थे इसलिए वो कामयाब नहीं हो रहीं थी| इधर मेरा लंड जो अपने ऊपर भाभी की चूत की गर्मी झेल रहा था वो भी भी अपनी ताकत दिखाने को तरस रहा और पजामे में तम्बू बना चूका था| अब भाभी को भी अपनी चूत पे नीचे से मेरे लंड की आंच महसूस कर रहीं थी;

रसिका भाभी: हाय मानु जी..... देखो अब तो आपके लंड ने भी बगावत कर दी| देखो वो भी कितना प्यासा है... बुझा लेने दो उसे अपनी प्यास|

मैं: कभी नहीं... हटो मुझ पर से| (मैं छटपटाने लगा)

रसिका भाभी: बड़े जालिम हो तुम... और स्वार्थी भी!

मैं: हटो मुझ पर से ....छोडो मेरा हाथ!!! (मैं गुस्सा दिखाते हुए बोला)

रसिका भाभी: ऐसे कैसे कल से आज तक तीन थप्पड़ खा चुकी हूँ.... इसका जुरमाना तो तुम्हें भरना ही पड़ेगा| बहुत जबर्दस्स्त हाथ है तुम्हारा बस एक गलती करते हो.... अपनी ये ताकत मेरी प्यास बुझाने में लगाओ ना की मेरे गाल लाल करने में|

मैं: बहुत हो गया अब... आअह्ह्ह्ह्ह्ह

मैंने अपनी पूरी ताकत लगाईं और अपना सीधा हाथ उनसे छुड़ा लिया और छिटक के दूर जा खड़ा हुआ.... मैंने तुरंत नीचे पड़ी चादर उठाई और भाभी के मुँह पे फेंक के मारी|

मैं: Enough !!! (मैंने चिल्ला के कहा)
पर उस गंवार औरत पे क्या फर्क पड़ना था... अरे उसे समझ ही नहीं आया होगा|

मैं: भाभी बहुत हो गया... आपने अपनी साड़ी शर्म हाय बेच खाई| अब इस चादर से को खुद को ढको|

रसिका भाभी: क्यों ढकूँ?

मैं: मुझे नहीं देखना आपको इस तरह!

रसिका भाभी: तो तुम अपनी आँखें बंद कर लो| खुद तो कभी अपना लंड दिखाते नहीं जो.. और जब मैं अपनी चूत दिखा रही हूँ तो वो भी नहीं देखि जाती तुम से!!!

मैं: मुझे क्या आपने अपने जितना गिरा हुआ समझा है|

रसिका भाभी: अच्छा एक बात बताओ की तुम मुझसे इतना दूर क्यों भागते हो .... मानो मुझसे नफरत करते हो| मैंने तुम से माँगा ही क्या है? यही न की एक बार मेरी प्यास बुझा दो ! बस... मैंने तुमसे कोई जायदाद तो नहीं माँग ली? पता है जिस तरह तुम मुझसे से व्यवहार करते हो... मुझे तो लगता है की तुम कुंवारे हो.... कुंवारा मतलब तो समझ ही गए होगे तुम?

मैं: जो आप चाहते हो वो मैं नहीं कर सकता क्योंकि मैं आपसे प्यार नहीं करता| मैं ये सब उसी के साथ करूँगा जिससे मैं प्यार करता हूँ|

रसिका भाभी: पर मैं तो तुमसे प्यार करती हूँ|

मैं: सिर्फ अपने काम के लिए .... और आप मुझे दिल से प्यार नहीं करते बस उस नीचे वाले मुँह में कुछ डालने के लिए ये सब कर रहे हो|

रसिका भाभी: हाय... तुम उतने भी ना समझ नहीं जितना बनते हो|

मैं आगे उनसे कुछ नहीं बोला और पैर पटकता हुआ अपने कमरे में जा के चारपाई पे बैठ गया और सर झुका के सोचने लगा| इतने में भाभी उठ के मेरे सामने नंगी खड़ी होगी| वो चौखट पे अपने कंधे टिका के खड़ी थीं और और डायन हाथ उनकी कमर पे था जिससे उनकी गांड का उभार साफ़ दिख रहा था| 

उनके बूब्स आगे की ओर निकले हुए साफ़ दिख रहे थे| मैंने एक नजर उन्हें देखा और फिर अपना तौलिया उठा के उनकी ओर बढ़ा;

रसिका भाभी: कहाँ जा रहे हो तौलिया ले के?
मैं कुछ नहीं बोला पर मुझे स्नान घर की ओर जाता देख वो समझ गईं की मैं कहाँ जा रहा हूँ|

रसिका भाभी: मानु इतनी रात को नहाओगे तो ठण्ड लग जाएगी| पानी बहुत ठंडा है! मान जाओ!!!

मैं अब भी कुछ नहीं बोला और स्नान घर में घुस गया| स्नान घर में दिवार करीब चारफूट ऊँची है| तो जब कोई खड़ा हो के नहाता है तो गर्दन से ऊपर का भाग साफ़ दिखाई देता है| मैं उसी दिवार की आड़ लेके नहा रहा था| मैंने अपनी टी-शर्ट उतारी, फिर पजामा उतार और आखिर में अपना कच्छा भी उतार के उसी दिवार पे रख दिया| जैसे ही मैंने पहला लोटा पानी का डाला तो मेरी कंप-कंपी छूट गई...बर्फ सा ठंडा पानी था... मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे| मैंने साबुन लगा के रगड़ के नहाना शुरू कर दिया;

रसिका भाभी: हाय ...मानु जी... अब कौन सी मिटटी में खेल के आये हो जो इतना रगड़-रगड़ के नहा रहे हो?

मैं: आपकी वजह से नहाना पड़ रहा है| (गुस्से में)

रसिका भाभी: अरे बाबा मैंने क्या कर दिया?

मैं: जब-जब आप मुझे छूते हो आपकी गंध मेरे शरीर में बस जाती है| उसी गंध को छुड़ाने के लिए मैं इतना रगड़-रगड़ के नहा रहा हूँ|

रसिका भाभी: हाय दैया मैं इतनी बड़ी अछूत हूँ? और अगर मेरी महक तुम्हें इतना तंग करती है तो मेरे हाथ का बना खाना कैसे कहते हो? (उन्होंने मुझे ताना मार)

मैं: हुंह...पिछले दो दिनों से मैंने आप के हाथ का बना कुछ भी नहीं खाया|

रसिका भाभी: तो जो मैं खाना परोस के देती हूँ उसे क्या तुम फेंक देते हो?

मैं: मैं अन्न की इज्जत करता हूँ| जो झना आप परोस के देते हो उसे मैं आपके ही सपूत वरुण को खिला देता हूँ|

रसिका भाभी: तो ये बताओ की अपनी भौजी के साथ जो चिपके रहते हो तो उनकी महक नहीं बस जाती तुम्हारी नाक में?

मैं: उनके मन में मेरे लिए वासना नहीं है| प्यार है... इज्जत है|

रसिका भाभी: हाँ भाई हमारे मन में तो सिर्फ वासना ही भरी है!

इतना कहके उन्होंने फिर से अपनी ओछी हरकत की| वो मेरे सामने अपनी टांगें खोल के उकड़ूँ होक बैठ गईं और अपनी झांटों वाली चूत मुझे दिखाते हुए उसमें ऊँगली करने लगी| मैंने मुंह फेर लिया, पर जब मैंने कनखी आँखों से देखा तो वो अब भी मेरी ओर देख के अपनी चूत में ऊँगली कर रहीं थीं और हस्त मैथुन कर रहीं थी| मैं उन पे ध्यान नहीं देना चाहता था पर वो जान-बुझ के अपने मुंह से सिस्कारिया निकाल रहीं थी जिससे मेरा ध्यान भंग हो रहा था| मैंने जल्दी से अपना नहाना खत्म किया और नए कपडे पहन के (कुरता-पजामा) पहन के बहार आ गया, सामने देखा तो जमीन पे भाभी की चूत से जो पानी निकला था वो जमीन पे पड़ा हुआ था| मैं नाक सिकोड़ के छत पे भाग गया| अब जो कुछ अभी हुआ था उससे ये बात तो साफ़ थी की मैं नीचे नहीं सो सकता वरना ये सुबह तक मुझे नोच खायेंगी| मैं छत के सबसे दूर वाले कोने पे बैठ गया और पेरापेट दिवार से पीठ लगा के बैठ गया| मुझे बहुत जोर की ठण्ड लग रही थी और बुरी तरह काँप रहा था| पर मैं नीचे नहीं जाना चाहता था.... करीब एक घंटे बाद मैंने छत से नीचे आँगन में झाँका तो देखा भाभी चारपाई पे ब्लाउज और पेत्तिसोअत पहने लेती हुई हैं| मैं वापस अपनी जगह बैठ गया और उम्मीद करने लगा की अब सुबह होगी...अब सुबह होगी... और ऐसे करते-करते सुयभ हो ही गई| साड़ी रात आँख खोले जागता रहा, और जैसे ही सूरज की किरण मेरे ठन्डे पड़ चुके शरीर पे पड़ी तो दिल ने कुछ रहत की साँस ली|


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अब आगे...

मैंने उठ के छत से नीचे आँगन में झाँका तो देखा भाभी उठ के चाय बनाने जा चुकीं थी| मैं उठा और नीचे आके ब्रश किया, कपडे बदले...अब नहा तो मैं रात को ही चूका था और ऊपर से ठण्ड इतनी लग रही थी की पानी छूने का मन नहीं कर रहा था| मैं रसोई के पास आया तो बड़के दादा नाश्ता कर रहे थे| उन्होंने मुझे भी नाश्ता करने को कहा पर मैं भला भाभी के हाथ का बना कुछ भी कैसे खा सकता था? मैंने ये कह के बात ताल दी की आज मैं फ़ाक़ा करूँगा| मैं बिना कुछ और बोले खेत चला गया| करीब आधे घंटे बाद बड़के दादा भी आ गए| आज मैं खुश था...क्योंकि आज मेरा प्यार जो वापस लौटने वाला था| मैं दो बस हसीन सपने सजोने में लगा था| और आज पूरी ताकत से काम करना चाहता था...मतलब जितनी भी बची थी| भौजी से मिलने की ख़ुशी इतनी थी की कल रात का सारा वाक्य भूल गया..ना भूख लग रही थी ना ही प्यास! इस मिलने के एक एहसास ने मेरे अंदर एक नै ताकत सँजो दी थी और मन कर रहा था की अकेला सारा खेत काट डालूँ| दोपहर तक मैं बिना रुके...पूरे जोश से लगा हुआ था और बड़के दादा तक मेरा जोश देख के हैरान थे और खुश भी थे| इधर रसिका भाभी भी कुछ देर बाद आ गईं और वो भी हाथ बताने लगीं| मैंने उनि जरा भी ध्यान नहीं दिया और अपने काम में लगा रहा| एक अलग ही मनुस्कान मेरे मुख पे तैर रही थी| इतना खुश तो मैं तब भी नहीं हुआ था जब मैं भौजी से मिलने गाँव आया था| रसिका भाभी भी हैरान दिख रहीं थी की आज मैं इतना खुश क्यों हूँ? खेर दोपहर के भोजन का समय हुआ तो हम वापस घर लौटे| मैं तो ख़ुशी से इधर से उधर चक्कर लगा रहा था| सड़क पे नजरें बिछाये बेसब्री से भौजी के आने का रास्ता देख रहा था| बड़के दादा ने भोजन के लिए कहा पर मैंने अनसुना कर दिया| कल रात को जो मैं ठन्डे पानी से नहाया था अब वो भी असर दिखाने लगा था| गाला भारी हो गया था और नाक बंद हो गई थी| बदन भी दर्द करने लगा था... पर दिल जिस्म की शिकायतों को अनसुना कर रहा था| जब घडी में तीन बजे और बड़के दादा पुनः खेत में जाने के लिए कहने लगे तब एक पल के लिए लगा की भौजी आज आएँगी ही नहीं| शायद सासु जी और ससुर जी ने उन्हीं रोक लिया होगा| मन थोड़ा मायूस हुआ पर दिल कह रहा था की थोड़ा सब्र कर वो शाम तक जर्रूर आ जाएँगी| दिमाग ने तैयारी कर ली थी की जैसे ही वो आएँगी मैं उन्हें कस के गले लगा लूँगा| खेर मैं बेमन से खेत में काम करने छाला गया|

बड़के दादा: अरे मुन्ना आज क्या बात है, तुम सुबह तो बड़े जोश से काम कर रहे थे| मुझे तो लग रहा था की तुम अकेले सारा खेत काट डालोगे, पर अब तुम ढीले पड़ गए| क्या हुआ?

मैं: जी सुबह-सुबह फूर्ति ज्यादा होती है और अभी थोड़ा थकावट लग रही है|

बड़के दादा: तो जाके थोड़ा आराम कर लो|

मैं: जी ठीक है|

मैं उठ के जाने लगा तभी बड़के दादा के फ़ोन की घंटी बज उठी| ये फ़ोन पिताजी ने किया था| बात होने के बाद बड़के दादा ने बताया की माँ, पिताजी और बड़की अम्मा कुछ दिन और रुकेंगे| पर हो सकता है की बड़की अम्मा कल लौट आएं| खेर मैं बहुत थक चूका था और कल रात से तो मानसिक और शारीरिक से पीड़ित था!

मैं खेत से घर आ रहा था तो रास्ते में मुझे माधुरी खड़ी दिखी, ऐसा लगा जैसे वो मेरा ही इन्तेजार कर रही हो| उसे देख के मेरा मन फिर से दुखी हो गया| मैं वहीँ खड़ा हो गया ... और दो सेकंड बाद वो ही चल के मेरे पास आई;

माधुरी: मानु जी....

मैं: बोल.... (मैंने मन में सोचा की एक तू ही बची थी ... तू भी ले ले मुझसे मजे|)

माधुरी: आपकी तबियत ठीक नहीं लग रही|

मैं: वो सब छोड़.... तू बता क्या चाइये तुझे?

माधुरी: आप बड़े रूखे तरीके से बात कर रहे हो|

मैं: देख मुझ में इतनी ताकत नहीं है की मैं तुझसे यहाँ खड़े रह के बात करूँ| तू साफ़-साफ़ ये बता की तुझे क्या चाहिए?

माधुरी: वो.... मेरे पिताजी ने जो लड़का पसंद किया है वो "अम्बाले" का है... लड़के वाले इस गाँव तक बरात लेके नहीं आ सकते क्योंकि..... यहाँ की हलात तो आप जानते ही हो| तो पिताजी ने ये तय किया है की शादी अम्बाला में मेरे मामा के घर पर ही होगी|

मैं: तो?

माधुरी: हमें कल ही निकलना है....और जाने से पहले मिअन चाहती हूँ की एक बार आप अगर....

मैं: अगर क्या?

माधुरी: मेरे साथ सेक्स कर लें तो.....

मैं: तेरा दिमाग ख़राब है क्या? तेरी शादी होने वाली है और तेरे अंदर अब भी वो कीड़ा कुलबुला रहा है? तुझ जैसी गिरी हुई लड़की मैंने अब तक नहीं देखि|

माधुरी: उस दिन आपने बड़े rough तरीके से किया था... तो इस बार....

मैं: मैं तुझसे प्यार नहीं करता ...जो तेरे साथ प्यार से वो सब करता| और वैसे भी वो सब करने के लिए तूने मुझे मजबूर किया था| तब मैं नहीं जानता था की तेरी असलियत क्या है... गर मैं जानता तो मरते मर जाता पर तुझे कभी हाथ नहीं लगता| भले ही तू मर जाती पर....मैं तेरा कहा कभी नहीं करता!

माधुरी: कैसी असलियत? (उसने अनजान बनते हुए कहा)

मैं: तू पुराने मास्टर साहब के लड़के को अपने साथ भगा कर ले गई थी ना?

माधुरी: नहीं...वो मुझे भगा के ....

मैं: चुप कर... मैं जानता हूँ कौन किसे भगा के ले गया|

माधुरी: नहीं...नहीं... आप मुझे गलत समझ रहे हैं!

मैं: मुझे ये बात तेरी ही सहेली ने बताई है...रसिका भाभी ने! अब कह दे की वो झूठ कह रहीं थी!

माधुरी का सर शर्म से झुक गया|

मैं: उस दिन जब मैं बीमार था और तू मुझसे मिलने आई थी... तब तूने जो कुछ कहा.... उसे सुन के एक पल के लिए मुझे विश्वास हो गया था की तू मुझसे सच में प्यार करती है| पर जब मुझे तेरी सारी असलियत पता चली तो मुझे एहसास हुआ की तू मुझसे कोई प्यार-व्यार नहीं करती| तुझे तो बस शहरी लड़कों का चस्का है|

माधुरी: (आँखों में आँसूं भरे) पर मैंने आपको अपना कुंवारापन सौंपा था!

मैं: वो इसलिए की तू उस लड़के के साथ उसी के किसी दोस्त के यहाँ ठहरी थी| वहां वो तेरे साथ तो कुछ कर नहीं सकता था...या शायद वो लड़का साफ़ दिल का होगा| जो आग उस लड़के से नहीं बुझी उसे बुझाने के लिए तू मेरे पास आ गई| और मैं भी बेवकूफ निकला जो तेरी बातों में आ गया! इस बात का मुझे ताउम्र गिला रहेगा की मैंने तेरे जैसी लड़की की बात में आके ये दुष्कर्म किया|

......और इतने से भी तेरा दिल नहीं भरा तो तूने उस बिचारे लड़के और उसके बाप को ही फँसा दिया और बेइज्जत करके गाँव से निकलवा दिया| अगर इतनी ही दया भाव था तो तू ने उसी लड़के से शादी क्यों नहीं की?

माधुरी: आप मुझे गलत समझ रहे हो... मैं आपसे बहुत प्यार करती हूँ|

मैं: हुंह....प्यार? तेरे प्यार की हद्द सिर्फ जिस्म तक है| खेर मुझे अब तुझसे कोई बात नहीं करनी.... और ना ही मैं तुझसे दुबारा मिलूंगा| GOODBYE !!!

मैं इतना कहके वहाँ से चला आया| मैं घर आके चारपाई पे पड़ गया और चादर ओढ़ ली|

पेट में चूहे दौड़ रहे थे ... बुखार लग रहा था... बदन टूट रहा था और खांसीजुखाम तो पहले से ही तंग कर रहे थे| मैंने सुना था की खाली पेट दवाई नहीं लेनी चाहिए पर क्या करता ...शहर होता तो मैं खुद किचन में घुस के कुछ बना लेता पर गाँव में तो तो नियम कानों इतने हैं की पूछो मत! मैं जैसे तैसे उठा और बड़े घर जाके अपने कमरे से क्रोसिन निकाली और खाली पेट खाली! मन में सोच जो होगा देखा जायेगा! पेट को समझाया की "यार शांत हो जा...शाम को भौजी आ जाएँगी तो वो कुछ बनाएंगी तब तेरी बूख मिटेगी|" पेट ने तो जैसे-तैसे समझौता कर लिया पर बिमारी थी की तंग करने से बाज नहीं आ रही थी| कुछ समय में मेरी आंख लग गई... और जब उठा तो रात के आठ बज रहे थे| अभी तक भौजी नहीं आईं? हाय अब मेरा क्या होगा? सारी उम्मीद खत्म हो गई थी| दिल टूट के टुकड़े-टुकड़े हो गया... खुद पे गुस्सा भी आया की बड़ा आया तीसमारखां ... लोग अपने पाँव पे कुल्हाड़ी मारते हैं मैंने तो पाँव ही कुल्हाड़ी पे दे मारा|

रसिका भाभी मुझे उठाने आईं पर मैं तो पहले ही जाग चूका था;

रसिका भाभी: चलो मानु जी... खाना खा लो?

मैं: (अकड़ते हुए) आपको मेरा जवाब मालूम है ना? फिर क्यों पूछ रहे हो?

रसिका भाभी: नहीं आने वाली आपकी भौजी! अब कम से कम पंद्रह दिन बाद आएँगी तो तब तक यूँ ही भूखे बैठे रहोगे?

मैं: आपको इससे क्या?

रसिका भाभी: दीदी आके मुझे डाटेंगी की मैंने तुम्हारा ख़याल नहीं रखा!

मैं: आपने तो हद्द से ज्यादा ही ख्याल रखा है... इतना ख्याल रखा की मेरी हालत ख़राब कर दी| आप जाओ और मुझे सोने दो|

रसिका भाभी: मानु जी ... मान जाओ पिछले तीन दिनों से आप्पने कुछ नहीं खाया और आज भी सारा दिन हो गया कुछ नहीं खाया| मेरा गुस्सा खाने पे मत निकालो और कृपा करके कुछ खा लो|

मैं: मुझे नहीं खाना!!

मैं वापस लेट गया, और चादर सर पे डाल ली| रसिका भाभी पिनाक के चली गईं अब मुझे चिंता हुई की मैं आज सोऊंगा कहाँ? आँगन में सोया तो यी फिर काल रात वाला सीन दोहरायेेंगी और आज तो मुझ में इतनी ताकत भी नहीं की मैं इनका सामना कर सकूँ| मैंने एक आईडिया निकला, मैं अपने कमरे में सोने के लिए चल दिया| अब दिक्कत ये थी की कमरे के दरवाजे में अंदर से चिटकनी नहीं थी जिससे मैं दरवाजा लॉक कर सकूँ! फिर उसका भी रास्ता धुंध लिया मैंने| कमरे में एक चारपाई पड़ी थी मैंने उसे दरवाजे के सामने इस तरह से बिछा दिया की दरवाजा खुले ही ना| जब मैं चारपाई पे लेट गया तो वजन से दरवाजा बहुत थोड़ा ही खुल पाता था .. उतने Gap से केवल एक हाथ ही अंदर आ सकता था| मेरे लेटने के करीब घण्टे भर बाद भाभी आ गईं और मुझे घर के अंदर ना पाके आवाज मारने लगी| मैं कुछ नहीं बोला... कुछ देर बाद उन्होंने कमरे की खिड़की जो दरवाजे के बगल में लगी थी उसमें से झाँका तो देखा अंदर मैं सो रहा था;

रसिका भाभी: हाय राम.... बहुत उस्ताद हो? दरवाजा बंद करके सो रहे हो? डर रहे हो की मैं कल वाली हरकत फिर दोहराऊंगी?

मैं कुछ नहीं बोला बस ऐसा जताया जैसे मैं गहरी नींद में हूँ|

रसिका भाभी: अच्छा बाबा मैं कुछ नहीं करुँगी... अब तो बहार आ जाओ| मैं यहाँ अकेले कैसे सोउंगी?

मैं कुछ नहीं बोला और आखिर में भाभी हार मान के आँगन में अपनी चारपाई पे लेट गईं| सुबह कब हुई पता ही नहीं चला| सुबह मुझे बड़के दादा ने जगाया| उन्होंने दरवाजे पे दस्तक दी तब जाके मैं उठा और मैंने दरवाजा खोला| घडी सुबह के साढ़े नौ बजा चुकी थी| शरीर बिलकुल जवाब दे चूका था... जरा सी भी ताकत नहीं बची थी| बड़के दादा मेरे पास बैठे और मेरे सर पे हाथ फेरा तब उन्हें पता चला की मुझे बुखार है| उन्होंने मुझे आराम करने की हिदायत दी और खेत पे चले गए| मैं वापस लेट गया, कुछ देर बाद वरुण मेरे पास आया| मैंने उसे ये कहके खुद से दूर कर दिया की "मुझे जुखाम-खांसी है... और अगर आप मेरे पास रहोगे तो आपको भी हो जायेगा|" वो बिचारा बच्चा चुप-चाप बाहर चला गया| ऐसा नहीं है की मैं उससे नफरत करता था, पर मैं नहीं चाहता था की वो मेरी वजह से बीमार पड़ जाए|

अभी मैंने चैन की सांस ली ही थी की इतने में भाभी आ गईं;

रसिका भाभी: मानु जी... ये गर्म-गर्म काली मिर्च वाली चाय पी लो, जुखाम-खांसी ठीक हो जायेगा|

मैं: No Thank You !

मैं और कुछ नहीं बोला और अपने दाहिने हाथ से आँखों को ढका और सोने लगा| घड़ी में करीब डेढ़ बजा होगा जब किसी ने मुझे जगाया| ये कोई और नहीं बड़की अम्मा थीं|

बड़की अम्मा: मुन्ना तुम्हें तो बुखार है?

मैं: अम्मा.... आप कब आए?

बड़की अम्मा: कुछ देर हुई बेटा| पर तुम ये बताओ की ये क्या हाल बना रखा है? तुम्हारे बड़के दादा तो कह रहे थे मुन्ना ने बहुत काम किया खेत में| आधा खेत तो उसने ही काटा है! लगता है बेटा कुछ ज्यादा ही म्हणत कर ली तुमने?

मैं: अरे नहीं अम्मा...वो तो बस...... खेर एक बात कहूँ अम्मा आज आपके हाथ की अदरक वाली चाय पीने का मन कर रहा है|

बड़की अम्मा: पर बेटा ये तो खाने का समय है?

मैं: अम्मा आप तो देख ही रहे हो की गाला भारी है... अदरक वाली चाय पियूँगा तो गले को आराम मिलेगा और ताकत भी आएगी| अभी आधा खेत भी तो बाकी है!

बड़की अम्मा: नहीं बेटा तुम आराम करो.....काम होता रहेगा|

मैं: नहीं अम्मा....आप देख ही रहे हो मौसम अचानक से ठंडा हो गया है| अगर बारिश हो गई तो बहुत नुक्सान होगा|

बड़की अम्मा: पर बेटा....

मैं: नहीं अम्मा ... प्लीज!!!

बड़की अम्मा: ठीक है बेटा ... पहले मैं चाय लाती हूँ|

मैं उठा और बड़की अम्मा के पीछे-पीछे जा पहुंचा| दरअसल मैं ये पक्का करना चाहता था की चाय अम्मा ही बनाएं| मैं छप्पर के नीचे तख़्त पे पसर गया| मेरी नजर रसोई पे थी... अम्मा ने हाथ-मुंह धोया और चाय बनाने घुस गईं| बड़के दादा ने मुझे खाने के लिए कहा पर मैंने ये बहन कर दिया की खाना खाने से सुस्ती आएगी और मुझे खेतों में काम करना है| रसिका भाभी ने मेरी शिाकायत करनी चाही;

बड़के दादा: मुन्ना कुछ तो खा लो?

मैं: नहीं दादा... अभी मन सिर्फ अम्मा के हाथ की चाय पीने का है| शहर में तो पेपरों के दिनों में मैं सिर्फ माँ की हाथ की चाय ही पीटा हूँ| ताकि दिन में नींद ना आये|

रसिका भाभी: पिताजी...मानु जी ने चार दिनों से.....

मैं: (बीच में बात काटते हुए) अम्मा... माँ और पिताजी कब आ रहे हैं?

बड़की अम्मा: बेटा वो परसों आएंगे|

मैं: तो आप अकेले आए हो?

बड़की अम्मा: नहीं बेटा ... तुम्हारे मामा का लड़का छोड़ गया था|

मैंने इसी तरह बातों का सील-सिला जारी रखा ताकि भाभी को बोलने का मौका ही ना मिले| मैंने अम्मा और दादा को बातों में असा उलझाया की रसिका भाभी को बात शुरू करने का कोई मौका ही नहीं मिला| बातें करते-करते हम खेत चले गए और मैंने अपनी पूरी ताकत कटाई में झौंक दी| शाम को वापस आए तो मेरी हालत नहीं थी की मैं कुछ कर सकूँ| मैं बस अपने कमरे में गया और वहां चारपाई पे पसर गया| सारा दिन मैंने खुद को बहुत सजा दी थी... बीमार होते हुए भी कटाई जारी रखी.... हाँ एक बात थी की अम्मा के हाथ की बानी चाय ने मुझ में कुछ तो जान फूंकी थी!!! करीब दो घंटे ककी कटाई रह गई थी बाकी सब मैंने और बड़के दादा ने मिलके काट डाला था| चारपाई पे लेटते ही मैं बेसुध होके सो गया| बस सुबह आँख खुली और अब मेरी तबियत बहुत खराब थी| बुखार से बदन तप रहा था .. गले से आवाज नहीं निकल रही थी क्योंकि खांसी और बलगम ने गला चोक कर दिया था| मैं बस एक चादर ओढ़े पड़ा था| दिमाग ने तो भौजी के आने की उम्मीद ही छोड़ दी थी पर दिल था जो अब भी कह रहा था की नहीं तेरा प्यार जर्रूर आएगा|


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अब आगे...

सुबह छः बजे मेरी आँख खुली| मैंने उठने की कोशिश की पर ताकत नहीं थी... बहुत कमजोरी थी! अब मूतने जाना था तो उठना तो पड़ता ही| जैसे-तैसे कर के सहारा लेते हुए मैं उठ बैठा और स्नानघर तक लड़खड़ाते हुए पहुँच गया| मूट के वापस आ रहा था तो अम्मा दिखीं;

बड़की अम्मा: अरे मुन्ना तुम्हारी तबियत तो और ख़राब लग रही है| तुम आज आराम करो! खेत में अब जयदा काम नहीं है|

मैं चुप-चाप चारपाई पे पीठ के बल लेट गया और उसके बाद क्या हुआ मुझे कुछ पता नहीं| आगे जो भी हुआ वो मुझे भौजी ने ही बताया था| तो मैं आगे की कहानी भौजी की जुबानी सुना रहा हूँ|

करीब दस बजे भौजी घर पहुंची और सब से पहले मुझे ढूंढने लगीं| उन्हें मैं ना तो खेतों में मिला...न प्रमुख आँगन में और ना ही उनके घर में| जब उन्होंने रसिका भाभी से पूछा तब पता चला की मैं अपने कमरे में हूँ| भौजी दौड़ती हुई कमरे में दाखिल हुईं और मुझे सोते हुए देख उन्होंने मुझे पुकारा; "सुनिए..........सुनिए.........सुनिए......" तीन बार पुकारने पर भी जब मैं कुछ नहीं बोला तो उन्हें चिंता हुई और उन्होंने मेरा हाथ पकड़ के हिलाया| मेरा शरीर बुखार से तप रहा था| उन्होंने मेरा हाथ पकड़ के हिलाया पर मैं तब भी नहीं उठा, तो भौजी के मन में बुरे ख्याल आने लगे की कहीं मैं मर तो नहीं गया| ये ख्याल आते ही उनके आँखों से आँसूं बह निकले| उन्होंने चीखते हुए कहा; "No.No.No….. you can’t do this to me! …Please…. Talk to me!!! Please …." इतना कहते उए वो बिलख-बिलख के रोने लगीं... उन्होंने मेरी छाती पे अपना कान लगा की मेरे दिल की धड़कन चेक की.... वो अब भी उनके लिए धड़क रहा था| वो तुरंत भाग के बहार आइन और लोटे में पानी ले के उसके कुछ छींटें मेरे मुख पे मारे|

पानी की ठंडी बूंदों ने मेरी चेतना को भांग किया और मैं बेहोशी की हालत से बाहर आया| जब आँख खुली तो शुरू-शुरू में सब धुंधला सा दिखा क्योंकि बहार से प्रकाश तेजी से आँखों को चुभ रहा था| जब गर्दन घुमा के भौजी को देखा तो दिल की धड़कन तेज हो गई| एल पल के लिए तो विश्वास ही नहीं हुआ की भौजी मेरे पास बैठीं हैं| मन तो किया की उन्हें कस के गले लगा लूँ पर शरीर साथ नहीं दे रहा था| भौजी को रोता हुआ देख के मन दुखा पर ये समझ नहीं आया की वो रो क्यों रहीं है| मेरा गाला सुख रहा था इसलिए शब्द बड़ी मुश्किल से बाहर आये; "आप.....रो क्यों......रहे हो?"

भौजी कुछ बोलीं नहीं बस मुझसे लिपट गई और फुट-फुट के रोने लगीं| मैंने उनकी पीठ को सहलाया और उन्हें चुप कराया| उन्होंने आँसूं पोछते हुए कहा; "आपने मेरी जान ही निकाल दी थी!"

मैं: क्यों..... मैंने क्या ....किया?

भौजी: आप बेहोश थे! और मैं कितना डर गई थी ... आपको नहीं पता|

मैं: हुंह.....

भौजी: ये क्या हालत बना ली है आपने? आपका शरीर बुखार से जल रहा है... आँखें सूजी हुई हैं... DARK CIRCLES हो गए हैं.... इतनी कमजोरी.... जब मेरे बिना रह नहीं सकते तो क्यों भेजा आपने मुझे?

मैं: मैं.... भी यही... सोच रहा था| पर....

भौजी: पहले आप पानी पीओ....

भौजी ने मुझे सहारा दे के बैठाया और पानी पिलाया| पर सच में अब मुझ में वो शक्ति नहीं थी की मैं बैठ पाऊँ इसलिए मैं पुनः लेट गया| भौजी: अब मैं आपको छोड़के कहीं नहीं जाऊंगी....

इतने में रसिका भाभी आ गईं;

भौजी: क्यों छोटी.... तूने ध्यान नहीं रखा इनका? और आप बताओ की आखिर हुआ क्या है?

मैं कुछ नहीं बोला बस अपना मुँह फेर लिया.... भौजी समझ गईं की कुछ तो बात है जो मैं उनसे छुपा रहा हूँ| भौजी ने रसिका भाभी से कहा की वो नेहा को देखें वो कहाँ है?

भौजी: अब आप बताओ क्या बात है?

मैं कुछ नहीं बोला ...

भौजी: आपको मेरी कसम...मुझसे कुछ मत छुपाना!

अब मुझे उनकी कसम दी गई थी तो मैंने उन्हें सारी बात बता दी| ये सब सुन के भौजी का चेहरा देखने लायक था| गुस्से से उनका मुँह तमतमाया हुआ था| उन्होंने गरज के आवाज लगाईं;

भौजी: रसिका !!! रसिका !!!

मैं: आप प्लीज शांत हो जाओ...सीन मत CREATE करो!

भौजी: मैं आज इसे नहीं छोडूंगी|

भौजी की सांसें तेज हो गईं थी.. वो इतना गुस्से में थी की सामने वाले को चीर दें और आज उनकी बिजली रसिका नाम की बेल पर गिरने वाली थी जिसने उनके प्यारे से घरौंदे को अपने वष में करने की कोशिश की थी|
इतने में रसिका भाभी नेहा को लेके आ गईं, और भौजी को तमतमाया देख उनकी फटी जर्रूर होगी|

भौजी: तेरी हिम्मत कैसे हुई इनहें छूने की? ये सिर्फ मेरे हैं!!! और अगर तू इनके आस पास भी भटकी ..या आँख उठा के देखा तो मैं तेरी चमड़ी उधेड़ दूँगी!!

भौजी का ये रोद्र रूप देख के बेचारी नेहा सहम गई और आके मेरी चारपाई के नीचे छिप गई| मैं भी हैरान था की भौजी मुझे लेके इतनी Possessive हैं!!! और सच कहूँ तो मैं भी थोड़ा डर गया था| मैं परेशान था की भौजी ने बिना डरे रसिका भाभी से ये कह दिया की "ये मेरे है"... अब अगर रसिका भाभी ने जलन के मारे ये बात किसी से कह दी तो? रसिका भाभी मोटे-मोटे आँसूं गिराते हुए वहाँ से चली गईं और इधर भौजी करीब दो मिनट तक आँगन में अकेली कड़ी रहीं| वो सर झुकाये कुछ सोच रहीं थीं...फिर वो अंदर कमरे में आई| मैं कुछ नहीं बोला...बस उन्हें एकटक देख रहा था| भौजी मुझसे कुछ नहीं बोलीं, फिर अचानक उठीं और मुझसे पूछा; "आपका पर्स कहाँ है?" मैंने इशारे से उन्हें बताय की दरवाजे के पीछे टंगी पैंट की जेब में है| भौजी ने पर्स निकला और उसमें कुछ ढूंढने लगीं| फिर उन्होंने पर्स से एक कागज का टुकड़ा निकला और उसे लेके बहार चलीं गई| मुझे याद आया की नेहा चारपाई के नीचे छुपी है| मैंने उसे पुकारा और उसे बहार निकलने को बोला| नेहा बहार आई तो सहमी थी और रो रही थी| मैंने उसके आँसूं पोछे; उसने अपनी प्यारी सी आवाज में पूछा, "पापा....मम्मी च्जची को डाँट क्यों रही थी?" मैंने उसे कहा; " बेटा आपकी चाची ने कुछ गलत काम किया इसलिए उन्हें झाड़ पड़ी| आप घबराओ मत और यहाँ कुर्सी पे बैठो|" नेहा ने मेरी बगल में लेटना चाहा तो मैंने उसे ये कह के मना कर दिया की, " बेटा मुझे खांसी-जुखाम है... आप मुझसे थोड़ा दूर रहो नहीं तो आपको भी हो जायेगा?" नेहा ने अच्छे बच्चे की तरह मेरी बात मान ली और सामने पड़ी कुर्सी पे बैठ गई और वहीँ से मेरे साथ "चिड़िया उडी" खेलने लगी|

करीब पांच मिनट बाद भौजी लौटीं और अब वो नार्मल लग रहीं थीं| एक बार फिर उन्हें देख नेहा डर गई और मेरे पास आके बैठ गई|

भौजी कुर्सी पे बैठ गई और मुझसे बोलीं;

भौजी: थोड़ी देर में डॉक्टर साहब आ रहे हैं|

दरअसल भौजी नेमेरे पर्स से डॉक्टर का नंबर ढूंढा था ओर डॉक्टर साहब को फ़ोन कर के बुला लिया था|

मैं: ठीेक है| (मैंने कोई बहस नहीं की)

भौजी: नेहा चलो आप कपडे बदल लो और फिर पापा के पास सो जाना तब तक मैं खाना बनाती हूँ|

मैं: नहीं...नेहा बेटा आप मेरे साथ मत सोना!

भौजी: क्यों?

मैं: मुझे जुखाम-खांसी है और मैं नहीं चाहता की नेहा बीमार पड़ जाए|

भौजी: कुछ नहीं होगा!

मैं: नहीं ...

भौजी समझ गई की उनके बर्ताव ना केवल नेहा डरी हुई है बल्कि मैं भी नाराज हूँ| पर अब भी उनका गुस्सा शांत नहीं हुआ था और वो अगर बहस करती तो बात बिगड़ जाती| इसलिए वो चुप-चाप खाना बनाने चली गईं| नेहा डर के मारे कहीं नहीं गई और मेरे पास बैठ के मुझे कंपनी देने लगी और बीच-बीच में अपने प्यारे-प्यारे सवालों से मुझे हँसाती रही| करीब आधे घंटे बाद डॉक्टर साहब आये और मेरे पास कुर्सी पे बैठ गए| उन्हें देखते ही नेहा भौजी को बुलाने चली गई|

डॉक्टर साहब: Hey Friend….How are you feeling now?

मेरे जवाब देने से पहले ही भौजी आ गईं और मेरे सिरहाने आके बैठ गईं| मैंने उनकी ओर देखते हुए जवाब दिया:

मैं: Well I’m feeling better…Cause I’m in safe hands now!

डॉक्टर साहब: Oh! Okay your bhabhi told me that you haven’t eaten anything since she was gone to her Mom’s.

मैं: Yeah….. I was missing her!

भौजी हमारी बातें समझ चुकी थीं ओर उनके मुख पे मैंने वही प्यारी मुस्कान देखी| उन्होंने बीच में ही अपनी बात जोड़ दी ओर मेरी बात को नया मोड़ दे दिया;

भौजी: डॉक्टर साहब दरअसल इन्हें नेहा की याद बहुत आई| इनका उसके साथ लगाव इतना है की क्या बताऊँ| वहाँ नेहा का भी यही हाल था...बार बार इनके बारे में पूछती थी| रोने लगती थी ...की मुझे इनके पास जाना है|

भौजी ने नेहा की आध लेके अपने दिल के बात सामने रख दी| मैं हैरान था की एक तरफ तो भौजी खुद रसिका भाभी के सामने हमारे रिश्ते को उजागर कर रहीं थी ओर दूसरी तरफ अभी डॉक्टर साहब के सामने जब मैंने कुछ कहँ अ चाहा तो उन्होंने बातों को घुमा दिया|

डॉक्टर साहब: यार तुम्हें कमजोरी बहुत हो गई है| मैं तुम्हें एक इंजेक्शन दे रहा हूँ| इससे कमजोरी कम होगी पर हाँ जरा चलने फिरने में ध्यान रखना कहीं गिर ना जाओ|

भौजी: आप चिंता ना करें डॉक्टर साहब, अब मैं आ गईं हूँ तो मैं मैं इनका पूरा ध्यान रखूँगी|

डॉक्टर साहब: That's Good ! ठन्डे पानी से नहाना मत ओर ठंडी चीजों से परहेज करना| ओर ये दवाइयाँ समय पे लेते रहना| वैसे इस इंजेक्शन से बुखार कम हो जायेगा बाकी काम ये दवाइयाँ कर देंगी| हो सकता है की रात में बुखार चढ़ जाए...ऐसे में आपको (भौजी) को थोड़ा ध्यान रखना होगा| अगर बुखार चढ़ गया तो ठन्डे पानी की पत्तियां बदलते रहना ओर मुझे कल फ़ोन करके जर्रूर बुलाना नहीं तो बिमारी बढ़ जाएगी|

भौजी: जी डॉक्टर साहब|

मैं: अच्छा डॉक्टर साहब एक बात आपसे पूछनी है? आपने तो देखा ही है की मुझे जुखाम-खांसी है, जो की एक COMMUNICABLE DISESASE है और ऐसे में मैं नेहा को खुद से दूर रखता हूँ तो इन्हें (भौजी को) बड़ी तकलीफ होती है| मैं कहता हूँ की बच्ची को भी ये बिमारी लग जाएगी तो ये कहतीं हैं की कुछ नहीं होगा| अब आप ही इन्हें (भौजी को) समझाइये!

डॉक्टर साहब: देखिये ये कोई बड़ी बिमारी नहीं है पर फिर भी एक इंसान से दूसरे को बड़ी आसानी से लग जाती है| जल्द ही मानु ठीक हो जायेगा तब आप अपने चाचा के साथ खूब खेलना| (उन्होंने नेहा के सर पे हाथ फेरते हुए कहा)

मैंने मेरे सिरहाने पड़े पर्स से ५००/- रूपए निकाल के डॉक्टर को दिए तो भौजी मुझे रोकने लगीं की मैं दूँगी तो मैंने जिद्द करके दे दिए| भौजी का मुँह बन गया! डॉक्टर साहब तो चले गए ....पर यहाँ मेरे ओर भौजी में शीत युद्ध का माहोल बन गया|

खेर ये युद्ध कम शरारत ज्यादा थी...भौजी ने शिकायती लहजे में कहा;

भौजी: आपने पैसे क्यों दिए?

मैं: क्यों क्या हुआ?

भौजी: मैंने उन्हें बुलाया था...पैसे मुझे देने थे ओर आप.....

मैं: अरे बाबा, पैसे मैं दूँ या आप बात तो एक ही है|

भौजी: नहीं ...आप मुझे कभी भी कुछ नहीं करने देते|

मैं: अच्छा बाबा...अगली बार आप दे देना|

भौजी: मतलब अगली बार फिर बीमार पड़ोगे?

भौजी की इस बात पे हम दोनों खिल-खिला के हंस पड़े| वाकई कई दिनों बाद मैं हँसा था....!!! दोपहर को उन्हीं के हाथ का बना खाना मैंने खाया जिसे उन्होंने मुझे खुद खिलाया| मैं उनसे कहा भी की मैं खुद खा लूंगा पर वो नहीं मानी| खाने में, अरहर की दाल, चावल, रोटी और भिन्डी की सब्जी थी| अब हमारे गाँव में यही म मिलता है तो क्या करें! खाना मैं कम ही खा रहा था क्योंकि पेट को आदत नहीं थी इतना प्यार भरा खाना खाने की! शाम को भौजी ने चाय बनाई और मुझे पिलाई...घर में बड़के दादा और अम्मा भी खुश थे| क्योंकि एक तो मैंने काम बहुत किया था ऊपर से भौजी की वजह से मैं खुश था| शाम को सब साथ बैठे थे और शादी में क्या-क्या हुआ उसकी बातें चल रही थी| रसिका भाभी भी पास ही बैठी थीं पर वो कुछ बोल नहीं रही थी, शायद भौजी का खौफ अब भी उनके दिल में था| रात को सबने भोजन एक साथ बड़े घर में खाया क्योंकि मैं कमजोरी महसूस कर रहा था और मैं अकेला खाता इसलिए अम्मा, बड़के दादा सब मेरे पास ही बैठ के खाना खाने लगे| हाँ एक बात और अब बड़के दादा और बड़की अम्मा को ये बात साफ़ पता चल गई थी की मैं खाना भौजी की वजह से नहीं खा रहा था,पर वो ये बात नहीं जानते थे की रसिका भाभी ने मेरे साथ कैसा अभद्र व्यवहार किया था| उन्होंने जो सवाल पूछा वो कुछ इस प्रकार था;

"मुन्ना ...अब हम समझे तुम खाना क्यों नहीं खा रहे थे? अपनी भौजी को याद करके तुमने अन्न-जल त्याग दिया था| बेटा प्यार...मोह ठीक है.... पर अधिक हो जाए तो कष्ट अवश्य देता है| खेर ये बात तो तुम समझ ही गए होगे|" इस बात पे सब खाना खा के हटे और मैं अपनी चाराई पे फ़ैल गया|

कुछ समय बाद भौजी आईं, और मेरे सिराहने बैठ गईं... फिर धीरे-धीरे उन्होंने मेरे सर को सहलाना शुरू कर दिया|


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भौजी: आप यहीं अंदर साओगे?

मैं: हाँ ... और आप भी जाके आराम कर लो| जब से आये हो मेरी ही तीमारदारी में लगे हो|

भौजी: आपका ध्यान रख रही हूँ जो मेरा फर्ज है और आप इसे तीमारदारी कहते हो? और जब आपने दिन रात मेरा ध्यान रखा था तब? जाइए मैं आपसे बात नहीं करती!

मैं: SORRY यार!

भौजी: ठीक है माफ़ किया....!!! ही ही ही ही

मैं: अच्छा अब आप जाके सो जाओ, कल सुबह उठना भी तो है| कल तो शायद माँ और पिताजी भी आ जाएं|

भौजी: नहीं मैं यहीं बैठूंगी| भूल गए डॉक्टर साहब ने क्या कहा था? रात को बुखार चढ़ गया तो| और मैं आपको जानती हूँ की अगर बुखार चढ़ गया तो आप मुझे उठाओगे भी नहीं| इसीलिए मैं यहीं बैठूंगी|

मैं: देखो मेरे साथ रहोगे तो आप भी बीमार हो जाओगे| और रसिका भाभी क्या कहेंगी? और कहीं अम्मा ने हमें एक साथ लेटे हुए देख लिया तो?

भौजी: वो सब मैं नहीं जानती... मैं तो यहीं सोऊँगी... वो भी आपके बगल में| ही..ही..ही..ही

मैं: यार प्लीज जिद्द मत करो... आप बीमार पड़ जाओगे?

भौजी: कुछ नहीं होता... डॉक्टर साहब ने कहा था की ये छोटी सी बिमारी है जो एक-दो दिन में ठीक हो जाती है|

मैं: अपना नहीं तो उस नन्ही सी जान के बारे में सोचो जो अभी इस दुनिया में आने वाली है| मैं चाहता हूँ की वो स्वस्थ पैदा हो|

भौजी: वो स्वस्थ ही होगी... और आप बेकार की चिंता करते हो! ऐसे बीमारियां एक दूसरे में नहीं फैलतीं...कभी देखा की बच्चे की वजह से माँ बीमार पड़ीं हो... कितनी पत्नियां होती हैं जो अपने पति के बीमार होने पे उनकी सेवा करती हैं| वो तो बीमार नहीं होती| तो मैं कैसे बीमार हूँगी| अब आप बहस मत करो और सो जाओ|

मैं जानता था की मुझसे ज्यादा भौजी को फ़िक्र है की हमारे रिश्ते के बारे में किसी को पता ना चले| पर मुझे तकलीफ इस बात से हो रही थी की मेरी वजह से वो ठीक से सो नहीं पाएंगी|

मैं: अच्छा आप एक काम करो, इस कमरे में एक चारपाई और बिछा दो| और आप उसी पे सो जाना|

भौजी: इस कमरे में इक और चारपाई नहीं घुसेगी| आप मेरी चिंता मत करो.... अगर मुझे नींद आई तो मैं अपनी चारपाई पे जाके सो जाऊँगी|

मैं: यार आप जिद्द बहुत करते हो...कभी मेरी बात नहीं मानते|

भौजी: एक बार मानी थी तो आपकी ये हालत हो गई| अब नहीं मानूँगी!!!

मैं लेट गया और ऐसे दिखाया जैसे मैं घोड़े बेच के सो गया हूँ| तब जाके भौजी बहार अपनी चारपाई से सोने गईं|

पर मुझे नींद नहीं आ रही थी| उनके जाने के बाद मैंने अनेकों बार करवटें बदली पर नींद नहीं आई| आखिर में बाईं करवट लेट गया की शायद ननद आ जाए| पर मैं ये नहीं जानता था की बभुजी खिड़की से मुझे करवटें बदलते हुए देख रही हैं| मेरे करवट लेने के करीब दो मिनट बाद वो आईं और मेरे पीछे लेट गईं और अपना हाथ मेरी बगल में डाल दिया| उनके हाथ के स्पर्श को मैं भलीं-भाँती जानता था|
भौजी मेरे कान में धीरे से खुसफुसाइन; "नींद नहीं आ रही है ना?" मैंने ना में सर हिला दिया| "तो फिर मुझे क्यों दूर भेजा, वो भी ड्रामा कर के की आपको बहुत जबरदस्त नींद आ रही है?" उन्होंने प्रश्न किया|

मैं: क्योंकि मैं नहीं चाहता की आप बीमार पड़ो|

भौजी: कुछ नहीं होगा मुझे....आपको कोई छूत की बिमारी नहीं है, और अगर होती भी तो भी मैं आपके पास यूँ ही रहती!

मैं: आप नहीं सुधरोगे!!!

मैंने उनका हाथ पकड़ के चूम लिया पर मैं अब भी करवट लिए हुए था ताकि मेरी सांसें उनकी साँसों से ना मिली वरना इन्फेक्शन उन्हें भी हो जाता|

भौजी: मेरी तरफ करवट करो?

मैं: नहीं...

भौजी: आपको मेरी कसम|

अब फिर से मैं उनकी कसम से बंध गया था| मैंने उकी तरफ करवट ली और हमारी आँखें एक दूसरे से मिलीं| मैंने अपनी सांस रोक रखी थी.... ताकि उन्हें इन्फेक्शन ना हो| भौजी ने अपना हाथ मेरे दिल पे रखा जो अब तेजी से धड़कने लगा था|

भौजी: कब तक सांस रोकोगे?... मैंने कहा न कुछ नहीं होगा....

तब जाके मैंने सांस धीरे-धीरे छोड़ी|

भौजी: अगर मैं बीमार होती तो आप मुझसे दूर रहते?

मैं: कभी नहीं ....पर आप माँ बनने वाले हो...और अगर बच्चा....

भौजी: कुछ नहीं होगा उसे.... आप बस मुझसे दूर मत रहा करो, मैं अधूरी हो जाती हूँ| और इन दिनों में आपने जो कुछ किया...आपका मेरे प्रति ये समर्पण .... मैं आपकी कायल हो गई| You’re a One Woman Man! And I LOVE YOU !!!

मैं: I LOVE YOU TOO !!!

इसके बाद उन्होंने मेरे होंटों को चूम लिया और मैं भी खुद को नहीं रोक पाया| मैं उनके रसीले होठों को चूसने लगा और जब मैं थक जाता तो वो मेरे होठों को चूसने लगतीं| हम ये भी भूल गए की घर में हमारे आलावा एक औरत और भी है...जो शायद ये सब देख रही हो| मैंने अपने दोनों हाथों से बहूजी का चेहरे को थामा हुआ था और भौजी ने मेरा चेहरा अपने हाथ में थामा हुआ था| कुछ ही देर में जीभ से रस का आदान-प्रदान भी शुरू हो गया| जब हम अलग हुए तो मेरे और भौजी के होठों के बीच हमारे रस की एक पतली सी तार थी| उसे देख ना तो भौजी खुद को रोक पाई और ना ही मैं| हुमदोनो के होंठ एक बार और मिल गए| इस बार हम एक दूसरे को इस बेतहाशा तरीके से चूम और चूस रहे थे जैसे आज पहली बार मिलें हों| ये प्यार भरा सिलसिला करीब पंद्रह मिनट चला और अब हालत ये थी की लंड महाशय अपना प्रगाढ़ रूप धारण कर चुके थे| भौजी ने अपना हाथ उसपे रखा तो मेरे अंदर एक करंट दौड़ गया| पर मैं अभी उस हालत में नहीं था की उन्हें संतुष्टि प्रदान कर पाऊँ, कारन आप सब पढ़ ही चुके हैं| आधे घंटे बाद मैंने दूसरी तरफ करवट ली... भौजी का हाथ अब भी मेरी कमर पे था... और मुझे कब नींद आ गई पता ही नहीं चला|


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अगला दिन .....

सुबह नाजाने क्यों नींद नहीं खुली| मन कर रहा था बस सोते रहो| मैं बाईं करवट लेटा था, और तभी अचानक मेरे गालों पे नरम-नरम होंठ स्पर्श हुए| उन होठों की नरमी और गीलेपन के कारन मेरी नींद खुली और मैंने आँखें खोल के देखा तो सामने भौजी खड़ीं थी|

भौजी: Good Morning जी!

मैं: Good Morning .... आपके इस Kiss ने वाकई morning good कर दी|

भौजी: (प्यार से मुस्कुराईं) अब आप की तबियत कैसी है?

मैं: जी कल रात के बाद तो अच्छी है...और आगे भी यही प्यार और देखभाल मिली तो और अच्छी हो जाएगी|

भौजी: प्यार तो आपको इतना मिलेगा की आप उसे माप नहीं पाओगे!

मैं: हाय!!!!

खेर मैं उठा...और अब मुझे पहले से बहुत अच्छा लग रहा था| कमजोरी नहीं थी..बुखार नहीं था...जुखाम और खांसी लघभग ठीक हो चुके थे| पर फिर भी भौजी मेरा इतना ध्यान लग रहीं थी जैसे किसी बहुत बीमार इंसान का ख्याल रखा जाता है| दोपार का समय हुआ तो भौजी फिर से जिद्द करके मुझे खाना अपने हाथ से खिलाने लगी| खाना खाने के बाद बाकी सब तो खेत चले गए अब घर पे केवल मैं, नेहा और भौजी ही बचे थे| मैं तखत पे लेटा हुआ था जबकि मैं लेटना नहीं चाहता था, परन्तु भौजी के जोर देने पे मान गया था| भौजी को लगा की मैं सो गया हूँ तो वो अपने धुले-हुए कपडे लेके अपने घर चलीं गईं और मैं भी उनके पीछे-पीछे घर में घुस गया| भौजी ने कपडे चारपाई पे रखे और अपनी साडी को तहाने लगीं उन्होंने साडी को दोनों हाथों से हवा में लटका रखा था जिससे मुझे पूरा मौका मिल गया था| मैं भौजी के पीछे चुप-चाप खड़ा हुआ और अपने हाथ उनकी बगल से ले जाते हुए उनके पेट पे रख के खुद से चिपका लिया| आज बहुत दिनों बाद उनके शरीर की मादक खुशभु ने दिल में हल-चल पैदा कर दी| दिल की धड़कनें तेज हो गईं...धक-धक....धक-धक...धक-धक...धक-धक...धक-धक...धक-धक...धक-धक…

भौजी भी मेरे आगोश में कसमसाने लगीं और मेरे सर पे अपने हाथ पीछे रख के उँगलियाँ चलाने लगीं| मेरे हाथ उनके नंगे पेट पे तेजी से चलने लगे थे...और मैं किसी भी समय सीमा लांघने को तैयार था| मैंने भौजी को अपनी ओर घुमाया और उनके माथे को चूमा| भौजी मेरे शरीर से एक दम बेल की तरह लिपट गईं| मन ही नहीं कर रहा था की उन्हें छोड़ूँ| नीचे लंड ने पेंट में तगड़ा सा उभार बना दिया था और जिस तरह भौजी मुझसे चिपटी हुई थीं मेरा लंड उनकी योनि में गड़ा जा रहा था| भौजी को उभार साफ़ महसूस हो रहा था और उनके मुंह से :सी....सी...." की आवाजें निकलने लगीं थी| दोनों ही बहुत प्यासे थे...पर कुछ तो कारन था की भौजी ने अब तक पहल नहीं की और न ही मुझे पहल करने का कोई अवसर दिया| ऐसा लग रहा था मानो जैसे वो खुद को रोक रहीं हो! पर क्यों? ऐसा क्या था जिसने हमें एक दूसरे से दूर कर दिया था? ये सभी सवाल दिमाग में दौड़ने लगे पर मन अब भी कह रहा था की कुछ कर...कुछ कर ...जिससे वो तेरे करीब आएं...और ये सारी दूरियां मिट जाएँ| भौजी के स्तन मेरे सीने में गड़े जा रहे थे और वासना मुझपे बुरी तरह हावी हो चुकी थी| पर एक मर्यादा थी जो मुझे रोक रही थी... मैं कुछ भी जबरदस्ती से नहीं करना चाहता था...मैं उन्हें दुःख या ग्लानि का आभास तक नहीं करना चाहता था| मैं चाहता था जैसे अब तक होता आया है....जिसमें उनकी पूरी रजामंदी होती थी...वैसे ही सब कुछ हो| मैं अपनी दिमागी ओर जिस्मानी उधेड़-बुन में लगा था की तभी अचानक भौजी बोलीं;

भौजी: मेरे पास आपके लिए एक सरप्राइज है! आप जरा आँखें बंद करिये....

मैं: ठीक है!

तभी मुझे प्लास्टिक की कचर-पचर आवाज सुनाई दी.. और उसके कुछ क्षण बाद भौजी की आवाज सुनाई दी;

भौजी: अब आँखें खोलिए|

जब मैंने आँखें खोली तो देखा भौजी के हाथों में एक सफ़ेद गोल गले की टी-शर्ट है.... जिसपे लिखा था “LOVER”.

मैं: वाओ !!! ये आप ...कैसे?

भौजी: मैं भाई के साथ शहर गई थी विदाई का सामान लेने तब वहाँ एक के बाद एक दूकान छान मारी और आखिर ये टी-शर्ट पसंद आई| इसे पहन के दिखाओ ना!

मैं: लो अभी लो...

मैंने तुरंत एक झटके में अपनी टी-शर्ट उतार फेंकी और भौजी की टी-शर्ट पहनने लगा| ये टी-शर्ट स्किन फिट थी| जब मैंने पहनी तो ये मेरे शरीर से बिलकुल चिपक गई| Biceps पे तो बिलकुल टाइट थी और टी-शर्ट पे लिखा LOVE ठीक मेरे दोनों nipples के बीच आता था| अगर मेरी बॉडी-बिल्डर टाइप बॉडी आती तो Biceps फुलाते ही टी-शर्ट फट जाती! पीछे से टी-शर्ट ने मेरी पीठ और कमर को एक दम परफेक्ट V का अकार दिया था|

मैं: वाओ... Awesome यार! आपको मेरा साइज कैसे पता? और कितने पासी फूके आपने?

भौजी: कुछ ज्यादा नहीं आठ सौ|

मैं: क्या? वापस कर दो ये .... इतनी महंगी टी-शर्ट लेने से पहले पूछ तो लेते?

भौजी: मैं मजाक कर रही थी... और आप पैसों की बात करते हो... मैंने आपको अपना दिल दे दिया...अपनी आत्मा समर्पित कर दी| खबरदार जो इसे उतार तो.... बड़े सोणे लग रहे हो! SEXY !!!

मैं: तो बताओ न कितने में ली?

भौजी: कहा ना ज्यादा महँगी नहीं है|

मैं: अच्छा अब एक return गिफ्ट तो बनता है|

भौजी: return गिफ्ट कैसा?

मैं: अच्छा आओ..पहले गले तो लगो|

भौजी मेरी ओर बढ़ीं ओर मुझे कस के गले लगा लिया|

मैं: पिछले दिन मैं इतना नहाया हूँ की आपकी खुशबु अब मेरे शरीर में नहीं बसती!

भौजी: ह्म्म्म्म्म....

फिर अचानक पांच सेकंड बाद भौजी मुझसे एक दम अलग हो गईं और सामने वाली दिवार पे पीठ लगाके खड़ी हो गईं|

भौजी: नहीं..... हम सम्भोग नहीं कर सकते! आप अभी पूरी तरह से स्वस्थ नहीं हो...आज जाके आपका ब्ंउखार उतरा है...कमजोरी कुछ कम हुई है... ऐसे में आप सम्भोग करने से और थक जाओगे और आपको फिर से बुखार चढ़ जाएगा|

मैं: ओह! तो आप मेरी कही पुरानी बात का बदला ले रहे हो? (जब वो बेल्ट वाला कांड हुआ था तब भौजी की पीठ जख्मी थी तब मैंने उन्हें यही बात बोली थी|)

भौजी: नहीं...नहीं... ऐसा नहीं है|

मैं कुछ नहीं बोला और भौजी के घर से निकल बड़े घर आ गया, और आँगन में खड़ा हो के सोचने लगा! नजाने क्यों मुझे ऐसा लगा जैसे मेरा KLPD हो गया हो!!! अब KLPD क्या होता है ये तो आप सभी जानते हैं| (खड़े लंड पे धोका)

फिर अगले ही पल मुझे एक एहसास हुआ, की भौजी ने जो कहा वो गलत तो नहीं था| अगर मैं उनकी जगह होता तो मैं भी यही करता| मैं सर झुका के खड़ा था ओर सोच रहा था की तभी मुझे किसी के आने के क़दमों की आहट सुनाई दी| मैं पीछे नहीं मुदा क्योंकि मैं जानता था की ये भौजी ही होंगी| उन्होंने मेरा हाथ पकड़ के मुझे घुमाया ओर मेरे गले लग गईं;

भौजी: प्लीज मुझे माफ़ कर दो! मैं आपका दिल नहीं दुखाना चाहती थी...पर मेरे लिए आपकी सेहत सबसे पहले है| प्लीज....प्लीज....

इतना कहके वो रोने लगीं;

मैं: अरे बाबा मैं आपसे नाराज नहीं हूँ... हाँ एक पल के लिए थोड़ा बुरा लगा था पर यकीन मानो मैं समझ सकता हं आप क्या कह रहे हो ओर आपकी बात की इज्जत करता हूँ| जबतक आप नहीं कहोगे मैं कुछ नहीं करूँगा| अब ठीक है?

भौजी: नहीं.....

मैं: तो?

भौजी कुछ नहीं बोलीं बस मुझसे लिपटी खड़ी रहीं| वो कुछ नहीं बोल रहीं थी बस चुप-चाप मुझे जकड़े खड़ीं थी| मुझे ये डर था की कहीं कोई आ गया तो हमें ऐसे खड़ा देख शक करेगा|

मैं: देखो नेहा आ गई... अब तो छोड़ दो| (मैंने जानबूझ के जूठ बोला|)

भौजी: नहीं

मैं करीब पांच मिनट तक खड़ा रहा फिर मुझे भी जोश आगया;

मैं: तो आप ऐसे नहीं मानोगे?

भौजी ने ना में गर्दन हिलाई| मैंने उन्हें गर्दन पर कूल्हों पर से अपनी गॉड में उठा लिया और अपने कमरे में ले जाकर चारपाई पर लेटा दिया| पर अब भौजी ने अपने दोनों हाथों से मेरी गर्दन को लॉक कर दिया और उसे छोड़े ही नहीं रही थी| मैंने उनके मुख की ओर देखा तो वो गंभीर लग रहीं थीं|

मैं: क्या हुआ?

भौजी ने ना में सर हिला के ये बताना चाहा की कोई बात नहीं है...पर मेरा दिल कह रहा था की उन्होंने मुझे सम्भोग करने के लिए रोक था उसको लेके उन्हें ग्लानि हो रही है| इधर भौजी ने अब तक अपने हाथों का लॉक नहीं खोला था तो मैंने बिना कुछ सोचे उनके ऊपर लेट गया और उनके वक्ष में अपना सर रख दिया| उनकी धड़कनें खूब तेज थीं.... मैं उनकी धड़कनें महसूस करने लगा था| उनका भी वही हाल था जो कुछ क्षण पहले मेरा था| मैंने भौजी की आँखों में झाँका तो कुछ समझ नहीं आया...

पर पता नहीं क्यों मन ने कहा की "Kiss Her" ... इसलिए मैं उनके ऊपर झुकने लगा और फिर उनके होठों को अपने होठों की गिरफ्त में ले लिया| जो वासना कुछ देर पहले शांत हो चुकी थी वो एक दम से भड़क उठी और मन बेकाबू हो गया| मैं भौजी को बेतहाशा चूमने लगा... और भुाजी भी मेरी हर Kiss का जवाब दे रहीं थीं| जल्दी-जल्दी में मैंने उनकी साडी ऊपर खींची...अपनी जीन्स की ज़िप खोली लंड बहार निकला और भौजी की टांगों के बीह में आ गया| फिर मैंने नीचे से एक जोर दार धक्का मारा और लंड उनकी योनि में प्रवेश हो गया| मैं हैरान था की भौजी की योनि अंदर से गीली थी और मुझे डर था की कहीं घर्षण के कारन उन्हें तकलीफ ना हो| जैसे ही लंड अंदर दाखिल हुआ भौजी ने अपनी गर्दन को ऊपर की ओर झटका दिया और उनके मुंह से "आह!" निकला| मैंने बिना रुके जल्दी-जल्दी झटके देना शुरू कर दिया और इधर भौजी भी बड़े मजे से मेरा साथ दे रहीं थीं| हम सम्भोग में इतने मशगूल हो गए की ये भी भूल गए की प्रमुख द्वार खुला हुआ है|

बीस मिनट के बाद मैं झाड़ा और मेरे साथ ही भौजी भी झड़ीं ...हम दोनों की आँखें बंद थी और मैं भौजी के ऊपर ऐसे ही पड़ा हुआ था| भौजी की साडी जाँघों तक ऊपर थी और पैर घुटनों से मुड़े हुए थे| तभी अचानक वहाँ नेहा आ गई! उसे देख हम दोनों हड़बड़ा गए पर अगर हम हिलते तो उसे हमारे यौन अंगों की झलक अवश्य मिल जाती और ये अच्छा नहीं होता| इसीलिए हम ऐसे ही पड़े रहे ताकि उसे सब सामान्य लगे... उसने हमें इस स्थिति में देखा और कुछ समझ ना पाई; नासमझी में उसने मुझसे सवाल किया;

नेहा: पापा ....आप ये मम्मी केसाथ क्या कर रहे हो|

उसके इस सवाल से हम दोनों बुरी तरह झेंप गए .... पर जवाब देना अनिवार्य था तो मैंने जवाब कुछ इस प्रकार दिया;

मैं: बेटा मैं आपकी मम्मी को प्यार कर रहा हूँ| (अब इससे उपयुक्त जवाब क्या होता|)

इतना कहते हुए मैंने भौजी की नंगी जाँघ को साडी से ढकने की पूरी कोशिश की और किसी तरह उन्हें थोड़ा बहुत ढक भी दिया|

नेहा: पर वो (चन्दर भैया) तो कभी मम्मी को ऐसे प्यार नहीं करते?

भौजी: बेटा क्योंकि मैं उनसे प्यार नहीं करती....और आप भी तो इन्हें (मुझे) ही पापा कहते हो? उन्हीने थोड़े ही कहते हो!

अब मुझे डर था की अगर कोई और आगया तो सब खत्म हो जाएगा, इसलिए मैंने नेहा से कहा;

मैं: बेटा आप प्रमुख दरवाजा बंद करके आओ फिर बैठ के बातें करते हैं|

नेहा तुरंत दरवाजा बंद करने गई और उसी मौके का फायदा उठा के मैं और भौजी अलग हुए और अपने-अपने कपडे ठीक करके पुनः लेट गए| मुझे भौजी की आँखों में मेरे प्रति चिंता साफ़ दिख रही थी| इतने में नेहा भी आ गई;

मैं: आपको चिंता करने की कोई जर्रूरत नहीं और न ही खुद को दोष देने की कोई जर्रूरत है...मैं बिलकुल ठीक हूँ....

भौजी अब भी थोड़ी परेशान थीं और मैं मन ही मन ये दुआ कर रहा था की मैं बीमार न पड़ जाऊं नहीं तो भौजी का दिल टूट जायेगा और वो इसी तरह खुद को दोष देंगी| अब चूँकि नेहा हमारे पास थी तो तो मैंने माहोल को हल्का करने के लिए नेहा को हमारे बीच में सोने को कहा| 


नेहा मुझसे कुछ ज्यादा ही दुलार करती थी, इसलिए बजाय हमारे बीच में लेटने के वो सीधा मेरे पेट पे बैठ गई और मेरे सीने पे सर रख के लेट गई|

भौजी: नेहा बेटा...यहाँ सो जाओ...पापा को आराम करने दो!

पर नेहा नहीं मानी और आखिर कर मुझे ही उसका पक्ष लेना पड़ा|

मैं: कोई बात नहीं सोने दो, वैसे भी बहुत दिन हुए मुझे इसको लाड किये|

भौजी: सर पे चढ़ा रखा है आपने इसे!

मैं: तो चढाउँ नहीं... एक ही तो बेटी है मेरी!

भौजी: बहुत जल्द कोई और भी आने वाला है!

मैं: हाँ!!!

भौजी: मैं आपके लिए दूध लेके आती हूँ|

मैं: नहीं रहने दो...आप यहीं लेटे रहो|

भौजी: आपको जर्रूरत है....

मैं: (बीच में बात काटते हुए) नहीं बाबा...अगर होगी तो मैं आपको बता दूँगा| खेर अब आप (नेहा) ये बताओ की क्या किया इतने दिन नानू के घर? (मैंने बात बदल दी)

भौजी: क्या किया ...पहले दिन तो बस रोती रही की पापा के पास जाना है.... फिर अगले दिन इसे कुछ दोस्त मिल गए और उनके साथ खेलती रही| हाँ दिन में एक बार पूछती थी की हम वापस कब जायेंगे?

मैं: aww !!! बेटा आपने मुझे miss किया?

नेहा ने हाँ में सर हिलाया|

मैं: और आप (भौजी) ....आपका क्या हाल था?

नेहा: मम्मी छुप-छुप के बहुत रोती थी|

मैं: (एकदम से भौजी की ओर देखते हुए) मैंने आपको शादी अटेंड करने भेजा था...रोने नहीं! क्या सोचते होंगे पिताजी (ससुर जी) और माँ (सासु जी)?

भौजी: वो तो ये कह रहे थे की आपने कैसा जादू कर दिया उनकी लड़की पे जो अपने आगे कभी किसी की नहीं सुनती थी वो आपकी बात मान के शादी अटेंड करने आ गई|

मैं: तो साले साहब ने सब कुछ बोल दिया?

भौजी: हाँ... माँ और पिताजी तो आपसे मिलना चाहते थे पर आप हैं की.....

मैं: कोई बात नहीं...मिल लेंगे!

नेहा: पापा .....मैं एक बात पूछूं?

मैं: हाँ बेटा पूछो?

नेहा: पापा आप मुझसे ज्यादा प्यार करते हो या मम्मी से?

मैं: आपसे

नेहा भौजी को अपने जीभ दिखा के चिढ़ाने लगी और बदले में भौजी भी उसे जीभ दिखा के चिढ़ाने लगी| और इधर भौजी मेरी और देख के अपना प्यार भरा गुस्सा दिखाने लगीं;

भौजी: अच्छा जी...तो आप इससे बहुत प्यार करते हो? और हम...हम गए तेल लेने!

मैं: अब क्या करें...हमारी बिटिया है ही इतनी प्यारी!!!

भौजी: और मैं?

मैं: भई आखिर वो है तो आपकी ही बेटी...तो अगर शोरूम शानदार होगा तो जाहिर है की कंपनी भी मशल्ला खूबसूरत होगी|


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